दिन कुछ ख़ास है!
गोस्वामी
तुलसीदास : पहुँच जिनकी जन-जन तक, जन-मन तक
प्रो.
हसमुख परमार
दिन,
महीने और साल के हिसाब से जिए जा रहे जीवन को लेकर हमारे स्वयं के
अनुभव व औरों के अवलोकन के आधार पर सामान्यतः तीन तरह के विधान [ किसी के लिए ये
स्वीकृत-असंदिग्ध हों या किसी के लिए अस्वीकृत-संदिग्ध, संभव
है। इस संदर्भ में विचार-विमर्श एक अलग विषय है।] हम दे सकते हैं – • जीवन अपने आप
चलता है। • जीवन हमारे हिसाब से चलता है। • जीवन कैलेंडर के अनुसार चलता है। वैसे
देखें तो हमारा गुजरता जीवन-जिए जा रहा जीवन इन तीनों विधानों से प्रभावित रहता
है। दरअसल बात यहाँ विशेषकर तीसरे विधान के संदर्भ में करनी है। इसमें कोई संदेह
नहीं कि हमारे जीवन में हमारी एक नित्य और बंधी-बंधाई सहज दैनिक जीवनचर्या से हटकर कुछ विशेष तिथियों-तारीखों,
सन्-संवत् का कुछ ज्यादा ही महत्व होता है, और
ये तिथियाँ-तारीखें व वर्ष हमारे व्यक्तिगत-पारिवारिक या सामाजिक-सांस्कृतिक या
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर से जुड़े उन ख़ास प्रसंगों-अवसरों व संदर्भों का
स्मरण कराते हैं जो हमारे वर्तमान जीवन में हमारे भाव-प्रतिभाव, विचार-कार्य, संकल्प-दायित्व आदि को बेहद प्रभावित
करते हैं। हमारे ‘रूटीन’ में नवोन्मेष
भरते हैं।
‘गोद
लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय ।’
श्रावण
शुक्ल सप्तमी - गोस्वामी तुलसीदास जयंती ।
तुलसीदास मतलब – राम के एकनिष्ठ व अनन्य भक्त –
एक
भरोसो एक बल एक आस विस्वास ।
एक
राम घनस्याम हित चातक तुलसीदास ।।
श्रीराम
के प्रति अनन्य आस्था, पूर्ण समर्पण और भक्ति,
श्रीराम में ही एकांतिक निष्ठा ही तुलसीदास के जीवन का एकमात्र
उद्देश्य, तभी तो ‘संतन को कहाँ सीकरी सों काम’ की तरह मुगल बादशाह का यह प्रस्ताव, जिसमें वे
तुलसीदास को अपने दरबार में मनसबदार बनाना चाहते थे, सम्मान
देना चाहते थे, लेकिन राम के इस परम भक्त की प्रतिक्रिया देखिए
–
हम
चाकर रघुवीर के, पटौ लिखौ दरबार
तुलसी
अब का होहिंगे नर के मनसबदार ।।
तुलसी
के लिए तो मानो यह प्रस्ताव स्वीकारने का मतलब ‘प्रमोशन’
नहीं बल्कि ‘डिमोशन’। इसीलिए तुलसी का साफ-साफ इनकार ।
•
हिन्दी रामकवियों में सर्वोपरि – भारतीय साहित्य के विश्वप्रसिद्ध कवि । जिनकी
पहुँच घर-घर तक, जन-जन तक । लोक मानस में बहुत गहरे उतरे
हुए-लोक व्यवहार में, लोक के बहुविध भावों-विचारों में
स्मरणीय । • लोकमंगलवादी दृष्टिकोण से परिपूर्ण-मनुष्यता की तलाश व उसकी प्रस्तुति
के प्रति प्रतिबद्ध संत व भक्त कवि व्यक्तित्त्व। • भारतवर्ष का लोकनायक – डॉ.
ग्रियर्सन ने तुलसीदास को गौतम बुद्ध के बाद का भारत का सबसे बड़ा लोकनायक बताया।
आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के मतानुसार – भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो
समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर
विरोधीनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ,
आचार-विचार और पद्धतियाँ प्रचलित हैं। तुलसीदास स्वयं नाना प्रकार
के सामाजिक स्तरों में रह चुके थे । …… उनका सारा काव्य समन्वय
की विराट चेष्टा है। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं – गार्हस्थ और
वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा
और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण
और काव्य का, भावावेग और अनासक्त चिंतन का समन्वय ‘ रामचरितमानस’ के आदि से अंत तक दो छोरों पर जाने
वाली परा-कोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।” [ देखिए-हिन्दी साहित्य का इतिहास,
सं. डॉ. नगेन्द्र, पृ॰ 205] • शास्त्रों के ज्ञाता के साथ-साथ लोक जीवन के विशेष अनुभवी व अध्येता । • मनुष्य
जीवन के सार्वकालिक व सार्वदेशिक आदर्शों और मूल्यों के स्थापक व प्रचारक । • ‘सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्’ सिद्धांत व आदर्श वाक्य को भी अपनी कविता में प्रस्तुत करने वाले कवि –
कवित्
विवेक एक नहीं मोरे ।
सत्य
कहउँ लिखि कागद कोरे ।।
•••
कीरति
भणिति भूति भलि सोई ।
सुरसरि
सम सब कहुँ हित होई ॥
•••
बिधु
बदनी सब भाँति सँवारी ।
सोह
न वसन बिना वर नारी ।।
•••
हमें
यह बताने की जरूरत नहीं कि तुलसीदास की लेखनी रामभक्ति का प्रचार करती है,
जो उनकी लोकप्रियता का एक बुनियादी आधार है, लेकिन
भक्ति के साथ-साथ इस कवि में, इनकी कविता में कुछ ऐसे महत्
गुण हैं सो उनकी ख्याति में वृद्धि कर उनकी प्रासंगिकता को कम नहीं होने देते। जैसे
– लोकधर्मिता, समन्वयवादी दृष्टि, लोकमंगल
की भावना, मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा आदि।
तुलसीदास
की भक्ति भावना में तथा उनके काव्य में उनकी लोकधर्मिता को बखूबी देखा जा सकता है।
भक्ति के साथ-साथ लोकधर्म की अत्यंत उज्ज्वल छटा उनके काव्य में प्रस्तुत है। असल
में अपनी कविता के ज़रिए तुलसीदास का सामाजिक-सांस्कृतिक अवदान अत्यंत महत्वपूर्ण
रहा है। “लोक जीवन का कोई भी ऐसा प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर तुलसी के मानस से न
मिलता हो। धर्म और समाज की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए; राजा-प्रजा,
ऊँच-नीच, द्विज-शुद्र, गुरु-शिष्य
आदि सामाजिक संबंधों के साथ-साथ माता-पिता, पति-पत्नी,
भाई-भाई आदि पारिवारिक संबंधों की आदर्श व्यवस्था का निरूपण एकसाथ
उनके मानस में मिलता है।” [ हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त सुगम इतिहास, डॉ. पारुकांत देसाई, पृ. 28]
हिन्दी जगत में तुलसीदास का आगमन उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण के साथ ही होता है। उनका यह दृष्टिकोण मात्र सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु साहित्य के संदर्भ में भी हम बराबर देख सकते हैं। अलग-अलग भावों-विचारों-सिद्धांतों-विषय क्षेत्रों में एक अद्भुत सामंजस्य व समन्वय तुलसी के यहाँ मिलता है। “निर्गुण-सगुण, साहित्य-भक्ति, परंपरा-युग, लोक-शास्त्र, लोक संग्रह-आत्मसंग्रह, संस्कृत-भाखा, आदर्श और यथार्थ का अद्भुत सामंजस्य तुलसी की कविता में है।” [ हिन्दी साहित्य : सामान्य परिचय, डॉ. दयाशंकर, पृ०10] तुलसीदास ने लोक और शास्त्र का, दोनों के विविध मतों-मान्यताओं का ऐसा समन्वय किया, ऐसा सामंजस्य किया कि जिसके चलते साहित्य व शास्त्र के मर्मज्ञों तथा जनसाधारण दोनों के लिए उनका साहित्य अत्यंत सुलभ व पसंदीदा । “शास्त्रीयता को लोकग्राह्य कैसे बनाया जाए, यह तुलसी की मुख्य रचना समस्या है जिसमें वे हर दृष्टि से सफल हुए हैं। ‘भाखा’ में काव्य रचना करके वे लोक में प्रिय होते हैं और शास्त्रीय मर्यादा का निर्वाह करके क्रमशः पंडितों में।” [हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृ० 47 ]
तुलसीदास
का काव्य मतलब भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि, और उनके
समस्त कृतित्व में ‘मानस’ तो उनकी अक्षय कीर्ति का सबसे बड़ा आधार । धर्म, दर्शन, भक्ति, लोक, संस्कृति को लेकर यह भारतीय साहित्य का एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ
है। रामचरित की कथाभूमि को लेकर लिखे गए इस भावपूर्ण व प्रभावशाली ग्रंथ के संबंध
में, ग्रंथरूप में हमारी महान धार्मिक- सांस्कृतिक-सामाजिक
धरोहर को लेकर विद्वानों ने अपने उम्दा मतों को प्रस्तुत किया है। “डॉ. शिवमंगल
सिंह ‘सुमन’ ने अपनी मोरिशियस यात्रा के दौरान कहा था कि यदि हमारे सारे धर्म
ग्रंथ और शास्त्र नष्ट हो जाते हैं पर यदि केवल तुलसी का ‘मानस’ बच जाता है तो भी
हमारी संस्कृति का पुन: पल्लवन हो सकता है।” [ समीक्षायण, डॉ.
पारुकांत देसाई, पृ. 21]
तुलसीदास
की दृष्टि से कविता का उद्देश्य लोकमंगल की प्रतिष्ठा करना है और यह विधान उनकी
रचनाओं में विस्तार से व्याख्यायित हुआ है। ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’'
मंत्र का गान करने वाली तुलसी की वाणी में मानवतावादी मूल्यों-तत्त्वों
व मानदण्डों का उद्बोधन, लोकशिक्षा-लोक व्यवहार की
प्रस्तुति बराबर है। तुलसी काव्य में व्यक्त मानवीय मूल्यों को लेकर एक मत
दृष्टव्य – “महामना तुलसी समसामयिक सामाजिक, धार्मिक व
राजनीतिक परिस्थितियों एवं मूल्यों का चित्रण समाजसेवी सुधारक या क्रांतिकारी
विद्रोही के रूप में न करके एक युग बोधक संत के रूप में करते हैं। उनका उद्देश्य
किसी भी भाँति का खण्डन या मण्डन करना नहीं' था वरन्
तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों, मूल्यों एवं मानदण्डों के
सच्चे स्वरूप का उद्बोध करना था।” [ हिन्दी भक्ति साहित्य में सामाजिक मूल्य व
अवधारणाएँ, सावित्री चन्द्र ‘शोभा’, पृ०
124]
मध्यकालीन
हिन्दी भक्तिकाव्य के रचयिताओं की महता व प्रासंगिकता की एक महती विशेषता है उनके
काव्य में मूल्यों की अभिव्यक्ति । ये मूल्य मनुष्य के भौतिक-सामाजिक जीवन के साथ
उसके धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन से भी संबद्ध रहे हैं। भक्ति,
लोकमंगल, समानता व समन्वय से समृद्ध-संपन्न
तुलसी काव्य में जीवन के उम्दा आदर्शों व जीवन
मूल्यों की अभिव्यक्ति को भी परिलक्षित किया जा सकता है। ‘रामचरितमानस’ में
धर्म-विजय व अजेय रथ के वर्णन के प्रसंग में कवि भारतीय संस्कृति के बहुत से
शाश्वत मूल्यों-शौर्य, धैर्य, सत्य,
सदाचार, विवेक, परोपकार,
क्षमा, दया, समता
प्रभृति को बडी ही सहजता से बता रहे हैं –
सौरज
धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ ध्वजा पताका।।
बल
विवेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।
ईस
भजनु सारथी सुजाना। बिरती चर्म संतोष कृपाना।।
दान
परसु बुधि सक्ति प्रचंडा । बर बिग्यान कठिन को दण्डा॥
प्रो. हसमुख परमार
परामर्शक - ‘शब्दसृष्टि’
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग
सरदार पटेल विश्वविद्यालय
वल्लभ
विद्यानगर
आणंद (गुजरात)


गोस्वामी तुलसीदास जी के साहित्य के व्यापक दर्शन के अनेक बिंदुओं को स्पर्श करता सुन्दर आलेख। बधाई डॉ. साहब
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