राष्ट्रभाषा
के प्रश्न से जूझती हिंदी
इन्द्र
कुमार दीक्षित
राष्ट्रभाषा,किसी संप्रभु राष्ट्र केअस्मिता,एकता ,अभिव्यक्ति एवं संस्कृति की पहचान होती है।
सुदृढ़ तथाअखंड भारत की कल्पना राष्ट्रभाषा
हिन्दी के बिना नहीं की जा सकती । भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को
सम्पूर्ण राष्ट्र के लिये हिन्दी की व्यापक स्वीकार्यता, बहुलवादी संरचना और सभी भाषाओं के बीच सेतु बनने की क्षमता रखने वाली भाषा
हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके प्रमाण स्वरूप संविधान के
अनुच्छेद 343में यह उल्लिखित है कि “संघ की भाषा देवनागरी
लिपि में हिन्दी होगी। ”
इन्हीं संवैधानिक उपबंधों के तहत
हिन्दी को 26 जनवरी, 1965 को
भारतीय संघ के ‘राजभाषा(प्रकारांतर से राष्ट्रभाषा) बनाने का
निश्चय किया गया। राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी का कहना था कि ‘बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्र गूँगा है’।
परंतु
भाषायी आधार पर राज्यों के बँटवारे की नीति
ने भाषा की राजनीति का खेल शुरू कर दिया और हिन्दी को राजभाषा घोषित होते
ही दक्षिण के राज्यों- तमिलनाडु,
आन्ध्र, कर्नाटक और केरल से हिन्दी के विरुद्ध
उग्र आंदोलन खड़े हो गये।
परिणाम यह हुआ कि उनके तुष्टिकरण के
लिये संविधान लागू होने के पन्द्रह वर्षों बाद अनुच्छेद 343(2)
के जरिये ‘हिन्दी के साथ साथ
एक
भी राज्य के असहमत रहने तक अंग्रेजी को भी संघ के सरकारी काम काज में जारी रखने का
प्रावधान लागू कर दिया गया।राजभाषा संशोधन अधिनियम1963 के तहत राजभाषा अधिनियम 1975 बनाया गया जिसके
अन्तर्गत समय समय पर हिन्दी के अनुगामी प्रयोग के लिये निर्देश जारी किये जाते
हैं।राष्ट्रभाषा का प्रश्न नेपथ्य में चला गया।
तब से अब तक हिन्दी को
राष्ट्रभाषा बनाने के लिये चल रहे अनेक बहस मुबाहिसों और कोशिशों का कोई सार्थक
परिणाम नहीं निकला हैऔर राष्ट्रभाषा का प्रश्न जहाँ का तहाँ खड़ा है!
नेहरू
युग के शुरू होकर देश में जाति,धर्म,सम्प्रदाय,क्षेत्र और क्षेत्रीय भाषा की राजनीति
प्रबल होती गई ,इस आधार पर प्रभावशाली समूह तथा दल विकसित
होते गये जो केंद्र की सत्ता को प्रभावित करते गये।सरकारें पर सरकारें आती जाती
रहीं पर वे इन्हीं ताकतों के बल पर अपना वोट बैंक मजबूत करने के चक्कर में
राष्ट्रभाषा के मुद्दे को उठाने का साहस न कर सकीं।यही नहीं वे अपनी सत्ता के लालच
मेँ उन समूहों व दलों का तुष्टिकरण करके राष्ट्रहित के इसअहम मुद्दे की उपेक्षा करती रहीं ।
आजादी के संघर्ष के इतिहास पर नज़र
डालने पर पता चलता है कि सन 1857में अंग्रेजी सत्ता से टकराने का बीड़ा उत्तर और
मध्य भारत की हिंदीभाषी जनता ने ही उठाया ।जनता का यह प्रयास एक साल बाद ही विफल कर दिया गया लेकिन उसने देश
की अस्मिता को जगाने और भाषा की ताकत को पहचानने में प्रमुख भूमिका निभाया
।कांग्रेस के गठन के पश्चात गान्धी जी के भारत लौटने पर जब आँदोलन की बागडोर उनके
हाथ में आई तो उन्हों ने राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुए हिन्दी को ही
इसके लिये सबसे उपयुक्त माना ।
हिन्दी
ने भारत के सम्पूर्ण जनमानस को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। आजादी मिलने तक
सारा आँदोलन प्राय: हिन्दी भाषा में ही चला।इस दौरान इसकी ताकत बढ़ी और हिन्दीभाषा
की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता दूसरे राज्यों में भी बढ़ी जिससे इस भाषा ने अपने को
राष्ट्र भाषा बनने की योग्यता अर्जित कर लिया।
हिन्दी की इसी योग्यता के चलते
संविधान बनने के बाद इसे राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव और समर्थन सर्व प्रथम
अहिंदी भाषी राज्यों के प्रतिनिधियों की ओर से लाया गया। प्रसिद्ध तमिल विद्वान
श्री गोपास्वामी आयंगर ने 14 सितम्बर 1949 को संसद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव लाया जिसका समर्थन
पट्टाभि सीता रामय्या,राजगोपालाचारी तथा तमिल भाषा के महाकवि
सुब्र ह्मनियम भारती ने भी किया।बाल गंगाधर तिलक, गोपाल
कृष्ण गोखले, बाबू सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गान्धी(सभी
अहिंदी भाषी)तो पहले ही इसके पक्ष में थे।
पर हकीकत है कि79-80 वर्षों बाद अभी भी राष्ट्र भाषा
का प्रश्न अनुत्तरित है।अब जबकि केंद्र में देश की जनता के व्यापक समर्थन से बनी
एक मजबूत और दृढ इच्छा-शक्ति वाली सरकार विगत सात वर्षों से सत्ता में है और उसने
अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित मुद्दों का समाधान सूझ बूझ,कूटनीतिक कौशल और दृढ़ता पूर्वक करने का साहस दिखाया है तो एक सुखद उम्मीद
जगी है कि हिन्दी को वास्तविक रूप से राष्ट्रभाषाके पद पर प्रतिष्ठित करने की दिशा
मे निर्णय लिया जाना चाहिए इसमें जो भी बाधाएँ आयें उन्हें हल किया जाय ।सरकार ने
नई शिक्षा नीति 2020
केअन्तर्गत
प्राथमिक
तथा जूनियर स्तर पर उस क्षेत्र विशेष
की मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान करके भारत के विशाल हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी
माध्यम अपनाये जाने की पहल कर दिया है,बेशक
दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को
यह पहल नागवार गुज़र सकती है, लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम
आने की संभावनाएँ हैं।
इस समय वैश्विक परिदृश्य पर भारत का
अच्छा और अनुकूल प्रभाव है,हिन्दी सवा सौ से ऊपर देशों
में प्रयुक्त हो रही भाषाओं मे शुमार है। अंग्रेजीऔर मन्दारिन(चीनी)के बाद विश्व
में यह तीसरे स्थान पर है। यदि हिन्दी
अपने देश की राष्ट्रभाषा बन जाय तो अतिशीघ्र इसे संयुक्तराष्ट्र की भाषा होने का
गौरव प्राप्त हो सकता है।तकनीकी तौर पर राष्ट्र भाषा बनने से हिंदी को कुछ वैश्विक
गरिमा या लाभ जरूर हो सकता हो,परन्तु घोषित राष्ट्रभाषा न
होने के बावजूद हिंदी अपनी सहज संप्रेषणीयता, सहजता
व्यावहारिकता और व्यापकता के गुण के कारण निरंतर मजबूत होकर आगे बढ़ रही है,
यह सुखद है।
कहने का तात्पर्य है कि हिंदी अब बाजार की,
सिनेमा की, तकनीक की, न्याय,
प्रौद्योगिकी अभियंत्रण, वाणिज्य व्यापार तथा चिकित्सा विज्ञान की सशक्त भाषा होने की ओर अग्रसर
है, यह राष्ट्रभाषा बने न बने कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
परन्तु
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह अब भी
विचारणीय है कि राष्ट्रभाषा का दर्जा पाए बिना हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ
में स्वीकृति पा सकती है? यह चुनौती जस की तस है,इस पर चिंतन मनन और विचार करने की आवश्यकता है।
***
इन्द्र
कुमार दीक्षित
5/45,
गीतांजलि
मुंसिफ
कालोनी रामनाथ देवरिया,
निकट
वन विभाग कार्यालय,
देवरिया(उ.
प्र.) –
274001


शब्द सृष्टि सितंबर 2026 के 75 वें अंक में मेरा आलेख ` राष्ट्र भाषा के प्रश्न से जूझती हिंदी` प्रकाशित करने के लिए संपादक आदरणीय हसमुख परमार साहब का आभार।पत्रिका परिवार को अशेष हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
जवाब देंहटाएंइंद्र कुमार दीक्षित ,देवरिया।
जवाब देंहटाएंबधाई हो
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