शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2023

दोहे

 



अनिता मंडा

धूप नहाई तितलियाँ, महक़  बिखेरें फूल।

दो पल की जादूगरी, बन जायेगी धूल।।

***

जुगनू ढूँढे भोर में, पतझड़ में भी फूल।

कुदरत के सब क़ायदे, लोग गए हैं भूल।।

***

हरी धरा पर है बिछा, फूलों का कालीन।

गुन-गुन भँवरे गा रहे, रहना क्यों ग़मगीन।।

***

नियति जिंदगी की रही, संग फूल के खार।

दामन छलनी हो गया, जिसने चाहा प्यार।।

***

 

मीठी सी मुस्कान दे, बातें कर लीं चंद।

तितली, भँवरे ले उड़े, फूलों से मकरंद।।

***

फूलों के झूमर पहन, स्वागत करे पलाश।

कहे बसन्त सुहावना, हों मत कभी हताश।।

***

 


अनिता मंडा

दिल्ली

क्षणिकाएँ

 



प्रीति अग्रवाल

1.

मेरे हँसने पर हँसते हो

रोने पर रोते,

कहो तो सही

तुम मेरे कौन हो...

मेरे पूछने से पहले,

आईना पूछ बैठा!!

2.

है खुद की प्यास मिटानी तो

दूजे को नीर पिलाओ...

मिटेगी तृष्णा ऐसे ही

एक बार तो आज़माओ!

3.

कहने को यूँ तो

था बहुत, पर

क्या कहूँ...

कैसे कहूँ...

किससे कहूँ...

कहूँ, न कहूँ...

इस सोच में

उलझी रही...

ज़िन्दगी, ज़िन्दगी ठहरी

क्यों रुकती

चलती रही...!

4.

तुम संग बीते लम्हे

काश! समेट पाते...

नर्म, मुलायम इतने,

हाथों से फिसले जाते....!

5.

ये लोग

जो चले जाते हैं,

जाते हैं कहाँ....

पूछते उन्हीं से,

जो लौटते,

वो यहाँ..!

 

6.

पहुँचने की तुम तक

है कैसी लगन...

हर वक्त यूँ लगे

कि सफर में हैं हम!

7.

हम दोनों की मंज़िल,

हम दोनों ही हैं,

सफर खूबसूरत

यूँही नहीं!

8.

था लम्बा सफर

पर मैं न थकी...

थकी भी तो बस,

तुझे, मना मना थकी!

9.

जज़्बातों को मेरे

समझते वो कैसे...

बातें ही मेरी

समझ वो न पाए!

10.

ज़िन्दगी में साल

चाहे जितने भी हो...

हर साल में, बस,

ज़िन्दगी चाहिए !



 

प्रीति अग्रवाल

कैनेडा

विशेष



प्रेम-सप्ताह

कुलदीप कुमार ‘आशकिरण’

       फरवरी माह इन 12 महीनों में से एक अनोखा माह है। हमें विदित है कि यह तीन वर्ष 28 दिन और चौथा 29 दिन का होता है कितुं कभी संपूर्ण नहीं होता, पर इस अपूर्णता में भी यह किसी पूर्णता से कम नहीं। इस माह में सर्दी अपने अवसान पर होती है, क्षितिज से आ रही हल्की धूप हमारे बदन को राहत देती है। बागों में आम बौरा जाते हैं, महुए कुंचियानें लगते हैं, खेत सरसों के पीले-पीले पुष्पों से लहलहा रहे होते हैं और उस पर भँवरे मधुर सुर में गाते हुए मँडराने लगते हैं, पेड़ों में नए कोपले फूटने लगते हैं,  कोयल की आवाज सुरीली हो जाती है,  तितलियों का फुदकना हमारी आँखों को भाता है, नवयौवनाएँ धानी चुनर पहन अपना सौन्दर्य बिखेरते हुए शिवरात्रि के व्रत में शंकर भोले को धतूरा और बेल-पत्र का चढ़ावा देकर मनौतियाँ मानती हैं। यह सब घटित होता है इसी फरवरी माह में और यह हमारी भारतीयता के अनुकूल भी है। किंतु कुछ दशकों से हम एक और नया जामा ओढ़ने की फिराक में लगातार प्रयासरत है और इसी माह इसके लिए तो विशेष तारीख मुकर्रर कर ली है.. प्रेम प्रदर्शन की। हम कह सकते हैं कि फरवरी माह का दूसरा पूरा सप्ताह प्रेम प्रदर्शन को समर्पित है जिसमें मेरे हमउम्र अपने हाथों में गुलाब लिए इस दिन को (वैलेंटाइन डे) मनाने के लिए इसके लिए एक सप्ताह पूर्व ही तैयारी शुरू कर देते हैं। तरह-तरह के प्रलोभन देकर अपनी प्रेमिका को मनाने के लिए। क्या हमें यह पता है  कि हम वैलेंटाइन डे क्यों मना रहे हैं इसकी शुरुआत कहाँ से हुई।

      बात 269 ई.पू. की है जब रोम में वेलेटाटिनुस प्रेस्ब. म. रोमें और टर्वी के वेलेटिनुस एवं इंटरामेनेसिस म. नामक चर्च पादरी हुआ करते थे। जिन्हें वहाँ के धार्मिक कट्टरपंथियों ने मौत के घाट उतार दिया। दंत कथाओं में यह भी प्रचलित है कि रोमन सम्राट क्लोडियस द्वितीय के एक कानून को मानने से इनकार करने के कारण इन्हें सजा-ए-मौत दी गई। कानून था कि उसके राज्य का कोई सिपाही विवाह नहीं करेगा। कितुं इसके विरुद्ध जाकर सेंट वेलेंटाइन जवान सिपाहियों की शादी करवा दिया करते थे और जब सम्राट को पता चला तो उसने पादरी वेलेंटाइन को गिरफ्तार करवाकर कारावास में डाल दिया और  मौत की तारीख मुकर्रर की... 14 फरवरी। दंत कथाओं में यह भी कहा जाता है कि मरने से पूर्व इन्होंने अपनी किसी प्रेमिका को पत्र लिखा जिसके अंत में लिखा 'तुम्हारा वेलेंटाइन' इसके अलावा भी वैलेंटाइन डे से संबंधित और भी कुछ कथाएँ प्रचलित हैं जिन्हें आप संचारयंत्र की सहायता से खोज कर पढ़ सकते हैं।

      प्राचीन समय से वर्तमान तक अनेक देश में इसे अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है। कहीं पर प्रेम तो कहीं पर शोक के रूप में। हालांकि यूरोप में कुछ दशकों पहले इससे व्यवसायियों को अच्छा खासा मुनाफा भी होता था वैसे आज भी इसका बाजारीकरण हमें हर जगह दिखाई देता है। भारत भी इससे अछूता नही। भारत में इसकी शुरुआत सन 2000 के आसपास से मानी जाती है। हमारे यहाँ के युवाओं में इसे लेकर काफी उत्साह रहता है, और ये पूरा महीना उमंग से भरे रहते हैं। टाफी (चॉकलेट) से लेकर गुलाब और लात-जूते (स्लैप और किक-डे) तक खाने की तारीख निर्धारित है हमारे यहाँ। किंतु कुछ देशों में इसे बैन भी किया गया है।

           मेरे ज़हन में अक्सर यह सवाल कौंधता रहता है कि 'फादर डे', 'मदर डे', 'टीचर डे',  वैलेंटाइन डे, फलाना डे, ढेमाका डे ...ये क्यों और किस लिए मनाए जाते हैं और इन्हें मनाकर हम प्रदर्शित क्या करना चाहते हैं। इश्क जाहिर करने के लिए क्या 14 फरवरी के दिन से बेहतर कोई दिन नहीं है? और इसे मनाने वालों का प्रेम कितने वर्षों तक टिका रह पाता है। मुझे लगता है किसी को सम्मान देने के लिए या अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिए कोई दिन या तारीख मुकर्रर नहीं होता बस हमारे मन में श्रद्धा और प्रेम होना चाहिए। किसी को सम्मान देना या प्रेम करना प्रदर्शन की चीज नहीं है।

 


कुलदीप कुमार ‘आशकिरण’

शोध छात्र, हिंदी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ विद्यानगर (गुजरात)

 


काव्यास्वादन

 


ट्राम में एक याद : चेतना पारीक के बहाने

विकास कुमार मिश्रा

प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक प्रेम काव्य का केंद्रीय कथ्य रहा है। आदिकवि के मुख से नि:सृत संस्कृत का प्रथम श्लोक भी क्रौंच पक्षी की प्रेमक्रीड़ा में विघ्न डाल, जोड़े में से एक की हत्या कर देने वाले निषाद के लिए श्राप रूप में प्रस्फुटित हुआ था। हिंदी के कवि सुमित्रानंदन पंत का “वियोगी पहला कवि” वस्तुत: प्रेम-वियोगी ही है। प्रेम के दोनों पक्षों – संयोग एवं वियोग को केंद्र में रखकर प्रचुर मात्रा में काव्य सृजन हुआ। वस्तुत: वियोग प्रेम में अवकाश नहीं पैदा करता, अपितु वह प्रेम में प्रकाश की उत्पत्ति करता है। वियोग में प्रेमी का भौतिक शरीर भले ही अलग हो, परन्तु मन से वह और भी एकाकार हो जाता है। गोया – तुलसीदास कृत रामचरितमानस के राम हनुमान के द्वारा सीता से कहते हैं –

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं।।

हिंदी साहित्य में भी आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक असंख्य प्रेम केन्द्रित काव्यों का सृजन हुआ। प्रेम पर काव्य सृजन की इतनी प्रचुरता का कारण इसके प्रति ‘नेति-नेति’ की धारणा है। हरेक कवि ने इसका अलग-अलग दर्शन किया और अभिव्यक्ति भी सबकी अलग-अलग रही। प्रेम संबंधी कविताओं को दो भागों में बाँटकर देखा जाता है। पहली, वे कविताएँ जिनमें प्रेम के उदात्त रूप का दर्शन होता है। दूसरी, वो कविताएँ जिनमें प्रेम फूहड़ता के कक्ष में प्रवेश करता दिखाई देता है। हिंदी साहित्य में प्रेम के उदात्त रूप को केन्द्रित कर बहुत कम कविताएँ लिखी गई हैं। अकविता आंदोलन ने तो फूहड़ता की भी परिसीमा को ध्वस्त कर दिया था।

हिंदी में उदात्त प्रेम पर लिखी गई कुछ ही स्मरणीय कविताएँ हैं, जिनमें ज्ञानेंद्रपति की कविता ट्राम में एक याद एक प्रमुख कविता है। यह कविता बहुचर्चित है एवं कई भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया है। इसकी प्रथम पंक्ति -  चेतना पारीक, कैसी हो? इतनी चर्चित हुई कि पाठक के मन में चेतना पारीक कविता के शीर्षक के रूप में पैठ गया। कविता के प्रारम्भिक अंश में कवि ‘चेतना पारीक’ से गत जीवन के अनुभवों के आधार पर कई प्रश्न पूछता है। ये ऐसे प्रश्न हैं, जो चेतना पारीक के बहाने एक आधुनिक प्रगतिशील स्त्री का चित्र मन में पैदा कर देते हैं। एक ऐसी स्त्री का चित्र, जो आधुनिक परिवेश में जी रही है, जो नाटक में भाग लेती है, लाइब्रेरी जाती है, कविता लिखती है, गीत गाती है, चित्र बनाती है, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है, उसे ढेर सारे मित्र बनाने पसंद हैं तथा वह प्रेम भी करती है। इन सबके साथ ही उसमें आदर्श एवं उदात्त चरित्र वाली स्त्री की प्रतिमूर्ति दिखाई देती है। कवितांश पाठक को अपने साथ ही मानसिक यात्रा पर ले चलता है, कविता पढ़ते-पढ़ते पाठक चेतना पारीक से प्रश्न पूछना प्रारम्भ कर देता है और स्मरण में खो जाता है।

चेतना पारीक, कैसी हो?

पहले जैसी हो?

कुछ-कुछ खुश

कुछ-कुछ उदास

कभी देखती तारे

कभी देखती घास

चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?

अब भी कविता लिखती हो?

 

तुम्हें मेरी याद न होगी

लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो

चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो

तुम्हारी क़द-काठी की एक

नन्ही-सी, नेक

सामने आ खड़ी है

तुम्हारी याद उमड़ी है

 

चेतना पारीक, कैसी हो?

पहले जैसी हो?

आँखों में उतरती है किताब की आग?

नाटक में अब भी लेती हो भाग?

छूटे नहीं है लाइब्रेरी के चक्कर?

मुझ-से घुमन्तू कवि से होती है कभी टक्कर?

अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?

अब भी तुम्हारे हैं बहुत बहुत मित्र?

अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?

अब भी जिससे करती हो प्रेम, उसे दाढ़ी रखाती हो?

चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं गेंद-सी उल्लास से भरी हो?

उतनी ही हरी हो?

कवितांश में चेतना पारीक की छवि के साथ ही कवि के प्रेमिल मन का भी दर्शन होता है। कवि का प्रेमी मन आज भी चेतना पारीक की याद में गुम है, वह भूल नहीं पाया। कवि अपने बहाने एक उदात्त प्रेमी का भी अंकन करता है।

कविता के उत्तरार्द्ध में कवि चेतना पारीक के बहाने महानगरीय त्रासदी का वर्णन करता है। विकसित महानगरों में जीवन अतिगत्यात्मक अवस्था में है। सबको दौड़कर पहले पहुँचने की जल्दी है, सबको जिंदगी एक दौड़ लगती है। महानगरों की गलियों में शोर-शराबा और ट्रैफिक जाम एक आम बात बन चुकी है। इस भाग-दौड़ की महानगरीय जिंदगी में कवि को कलकत्ता की विकलता स्पष्ट सुनाई देती है। मनुष्य महानगरीय जिंदगी जीने की प्रक्रिया में प्रकृति से दूर होता जा रहा है। उसके महावन में एक भी गौरैया नहीं है। …और गौरैये के बिना महावन कैसा? चेतना पारीक के बहाने कवि महानगर के महाट्टहास का अंकन करता है। इस महाट्टहास ने न जाने कितने पशु-पक्षियों का बसेरा लील लिया। यह महाट्टहास डरावना है, उसके समक्ष मधुर हँसी ने दम तोड़ दिया है। पूँजीवादी इस समाज में मशीनी धक-धक के सामने किसी एक जीवित धड़कन का कोई महत्व नहीं रह गया है। कवि पूर्व के कलकत्ता का स्मरण कर व्यथित है कि विकसित होते महानगर बहुत कुछ खत्म करते जा रहे हैं।

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है

भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है

ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है

विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

 

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है

एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है

महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम कम है

विराट धक्-धक् में एक धड़कन कम है कोरस में एक कंठ कम है

तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ाली है

वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

 

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ देखता हूँ

आदमियों को किताबों को निरखता लेखता हूँ

रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग-बिरंगे लोग

रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग

देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है

देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

 

चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?

बोलो, बोलो, पहले जैसी हो !

उत्तरार्द्ध में कविता पाठक के मन को त्रास से भर देती है, वह चेतना पारीक के बहाने विकास के नाम पर हो रही विभीषिका के प्रति पाठक को चेताती है। कविता बिल्कुल नये ढंग से प्रेम और महानगरीय समस्या को एक साथ अंकित करती है। कवि का अनुभव इतना व्यापक है कि वह समस्त पाठक को अपना स्वयं का अनुभव प्रतीत होता है।

 


विकास कुमार मिश्रा

शोध छात्र, हिंदी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ विद्यानगर (गुजरात)

 

 

                                    

                                                

 

 

                                                   

 



जुलाई 2026, अंक 73

  शब्द-सृष्टि जुलाई 2026, अंक 7 3 परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है ! संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार...