शुक्रवार, 29 मई 2026

संस्मरण

आपने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं

(महाकवि का थप्पड़)

                          डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

रंग का रंग जमाने ने बहुत देखा है

आप ने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं।’

शायद ही कोई ऐसा काव्य-रसिक हो जिसने रंग जी का यह मशहूर शेर न सुना हो। ‘रंग का रंग देखना’ और ‘बलबीर से बातें’ करना दोनों अपने में अर्थपूर्ण हैं..इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी कवि की कविता के पाठक या श्रोता तो अगणित हो सकते हैं पर उसे व्यक्तिगत रूप से जानने /समझने वाले कम ही लोग होते हैं। प्रत्येक कलाकार के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हो सकते हैं उसे देखने समझने की दृष्टि, उसकी निजी चिंताएँ, पीड़ाएँ या सुख हो सकते हैं,उन सबका साक्षात्कार कलाकार से साक्षात्कार के बाद ही संभव है इसीलिए रंग जी जब कहते हैं..आपने क्या कभी बलबीर से बातें की हैं..तो वे इसी तथ्य की ओर संकेत कर रहे होते हैं। मैं स्वयं को उन सौभाग्यशाली लोगों में मानता हूँ जिन्होंने ‘रंग’ के रंग को देखने के साथ ही उनके ‘बलबीर’ रूप से भी बातें की हैं, उनका आत्मीय और स्नेहपूर्ण सान्निध्य प्राप्त किया है। रंग जी का जब भी कहीं उल्लेख आता है तो स्मृति-पटल पर रंग जी साक्षात आकर खड़े हो जाते हैं और अचानक रंग जी के हाथों से खाए गए एक थप्पड़ की याद आ जाती है। स्मृति-कोष में वह घटना आज तक ज्यों की त्यों सुरक्षित है...

     शायद 1969 या 70 की सर्दियाँ थीं मैं अपने घर में बाबू के कमरे में सोया था। बाबू का कमरा कोई अलग से कोई ऐसा कमरा नहीं था जो उनका कोई व्यक्तिगत कमरा हो या जहाँ किसी को जाने की अनुमति न हो। वह घर का एक सार्वजनिक कमरा था जो ऊपर वाली मंजिल पर था, उस कमरे को हम लोग ऊपर का कमरा या बाबू का कमरा कहते थे, उस कमरे की खासियत यह थी कि उसमें दो निवाड़ के पलंग स्थाई रूप से बिछे ही रहते थे। उन दिनों मध्यवर्ग के परिवारों में निवाड़ के पलंग की अलग ही अहमियत होती थी, बाकी सब या तो मूंज की चारपाई पर सोते थे या जमीन में बिस्तर लगते थे... उन निवाड़ के पलंग में से एक पर बाबू ही सोते थे, उस पलंग को भी हम लोग बाबू का पलंग कहा करते थे क्योंकि उसमें आधे पलंग में वे सोते थे आधे में उनकी पुस्तकें स्थायी रूप से पसरी रहती थीं, किताबों के कारण उस पलंग पर लेटने की किसी को अनुमति नहीं थी क्योंकि जब बाबू ड्यूटी पर जाते या कहीं और जाते तब भी उनकी किताबें वहीं पसरी रहतीं। उसी पलंग के ठीक बगल में पड़ा हुआ दूसरा पलंग घर पर आने-जाने वाले मेहमानों के लिए था। उस पलंग पर प्रायः मैं सो जाता था क्योंकि किताबो का आकर्षण मुझे खींचता था, बाबू की अनुपस्थिति में उनकी किताबों में से कोई किताब उठा कर पढ़ लेता था। उस दिन बाबू किसी स्थानीय कवि-सम्मेलन में गए हुए थे, मैंने उनकी पुस्तकों से एक पुस्तक निकाली और पढ़ते-पढ़ते ही कब सो गया पता नहीं चला। गहरी नींद में था अचानक गाल पर पड़े एक थप्पड़ से हड़बड़ाकर उठ गया। सामने देखा बाबू खड़े मुस्करा रहे थे और उनके साथ ही कोई और बुजुर्ग सज्जन खड़े मुस्करा रहे थे,वे बोले, “बरखुरदार ये थप्पड़ मैंने मारा है, तुम मेरे पलंग पर क्यों सो गए?”...मैंने इसके पूर्व रंग जी को कभी देखा नहीं था.. थप्पड़ का प्रभाव, ठंड में गहरी नींद से जगा देना..मन ही मन गुस्सा भी आया,पता नहीं बाबू कैसे-कैसे लोगों को ले आते है? अचानक बाबू हँसकर बोले, “अरे, ये महाकवि रंग जी हैं, इनका ये थप्पड़ महाकवि का आशीर्वाद है, अब समझो तुम भी पक्के कवि बन गए।”

रंग जी का नाम मेरे लिए अपरिचित नहीं था, मैंने उठ कर उनके पैर छुए, उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और बोले, “बेटा दास जी ने अभी मुझे बताया कि तुम भी कुछ लिखने का शौक रखते हो, अच्छी बात है.. खूब पढो और लिखो, अब तुम जाकर कहीं और सोओ इस पलंग में मैं सोऊँगा।” मैं चुपचाप उठकर चला आया।

अगले दिन दोपहर में आँगन में धूप में बाबू और रंग जी भोजन करने बैठे, भोजन की थालियाँ मैं ही लेकर गया। एक बड़े कवि की सेवा- भाव से मेरे अंदर अतिरिक्त उत्साह भरा हुआ था। मैंने थाली उनके सामने रखी, वे बड़े स्नेह से बोले -”बेटा अपनी अम्मा से कहो मुझे एक कटोरी सरसों का तेल दे दें।” मैं चौंक गया, भोजन के साथ एक कटोरी तेल मांगने वाले पहले व्यक्ति थे। बाबू भी चौंके, उन्होने रंग जी की ओर देखा, बाबू के कुछ पूछने के पूर्व ही रंग जी ने समाधान किया -”दास जी, आप तो मेरी आदत जानते ही हैं।” इतना कह कर उन्होंने हाथ से पीने की आदत का संकेत किया, बाबू मुस्कराए, रंग जी ने बात जारी रखी.. “अब बच्चों के सामने क्या कहें, अंदर खुश्की न बढ़े इसलिए मैं घी खूब लेता हूँ, घी में भिगो कर ही रोटी खाता हूँ। जगह- जगह जाना होता है, हर घर में तो इतना घी माँगने में शर्म आती है इसलिए तेल में रोटी भिगा कर खा लेता हूँ।”

उनकी बात सुनकर अम्मा ने छोटे भाई के हाथों से एक कटोरी में शुद्ध घी रंग जी की के लिए भेज दिया , बाबू बोले -”लीजिए आपकी बहू ने घी भेज दिया।” रसोई से अम्मा की आवाज आई, “भगवान की दया से अभी हम आपकी सेवा कर सकते हैं।”.. रंग जी हँसे और अम्मा की प्रशंसा में कुछ कहा, क्या कहा वह याद नहीं।

उसके बाद रंग जी तीन दिनों तक मेरे घर रहे। उन्हें आस-पास कई गोष्ठियों में जाना था। वे दिन में हमारे घर रहते और शाम को बाबू को लेकर किसी गोष्ठी में चले जाते वहाँ से आधी रात बाद ही आते,वे जितने दिन रहे मैं भूलकर भी उस पलंग पर नहीं लेटा। जब वे भोजन करने बैठते तो अम्मा उनकी थाली में एक कटोरी घी अवश्य रखतीं। मैं उन्हे भोजन करते समय बड़े ध्यान से देखता.. रंग जी रोटी का कौर तोड़ते उसे पहले घी की कटोरी में अच्छी तरह डुबो कर तर करते फिर दाल या सब्जी में डुबो कर कौर मुँह में रखते और धीरे-धीरे चबा कर खाते... खाने का ये अद्भुत तरीका मैंने और किसी का नहीं देखा था।  रंग जी चले गए पर उनके थप्पड़ का अहसास मुझे बहुत दिनों तक होता रहा और साथ में बाबू का कहा वाक्य -ये महाकवि का प्रसाद है, समझो तुम भी पक्के कवि बन गए - आह्लादित करता। 

      उस घटना को लंबा अंतराल हो गया। लगभग एक दशक पश्चात रंग जी से अचानक ही मैनपुरी में मुलाक़ात का पुनः सौभाग्य प्राप्त हुआ। दरअसल मैं अपनी शिक्षा पूर्ण करके मैनपुरी के चित्रगुप्त महाविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नियुक्त होकर कर झाँसी से मैनपुरी आ गया था। अब तक मैंने थोड़ा लिखना भी प्रारंभ कर दिया था और मैनपुरी के साहित्य-रसिकों के साथ बैठकों में भी सम्मिलित होने लगा था। मैनपुरी में रंग जी की चर्चा हर गोष्ठी में हुआ करती थी कारण यह कि रंग जी का गृह जनपद तो एटा था पर मैनपुरी को भी वे अपना घर मानते थे और मैनपरी उनका आना-जाना बना रहता था। एक दिन संयोगवश मुझे उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हो गया। मैं साइकिल से कॉलेज से वापस आ रहा था,अचानक देखा सामने रंग जी अकेले अपने विचारों में मग्न धीरे-धीरे चले जा रहे हैं। मैंने उनके निकट साइकिल रोकी और उतर कर उनके चरण स्पर्श किए, वे अपरिचित भाव से मुझे देखने लगे वे कुछ प्रश्न करते मैंने ही कहा, “मैं झाँसी के दास जी का बेटा हूँ।” उन्होंने आह्लाद-भाव से मुझे अपने सीने से लगा लिया और स्नेह से पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले-”यहाँ कैसे?” मैंने अपनी सर्विस के बारे में बतलाया वे अत्यंत प्रसन्न हुए। अचानक मैंने उन्हें थप्पड़ वाला प्रसंग याद दिलाया तो वे बहुत हँसे और बोले -”अरे बेटा मैंने चपत लगाई होगी पर सोते समय तुम्हें थप्पड़ जैसा लगा होगा।” फिर बोले, “तो उस प्रसाद का कुछ फल मिला या नहीं, कुछ लिखना-विखना शुरू किया।”

जी, कुछ टूटा-फूटा लिख लेता हूँ।”- मैंने विनम्रता से कहा।

कुछ देर वे बातें करते रहे फिर बोले, “यहाँ छपट्टी मोहल्ले ललित मोहन द्विवेदी का घर जानते हो।”

हाँ हाँ, अच्छी तरह से जानता हूँ।”

में उन्हीं के घर रुका हूँ बेटा, शाम को वहाँ आ जाओ तो तसल्ली से बातें करेंगे”

 सायँकाल मैं उत्साह में भरकर छपट्टी मोहल्ले में द्विवेदी जी के घर पहुँच गया, रंग जी बाहर बैठक में ही एक चारपाई पर लेटे थे मुझे देखते ही प्रसन्नता से बोले आओ बेटा, आओ।

मैं बहुत देर उनके सानिध्य में रहा। वे झाँसी के कवि मित्रों के विषय में पूछते रहे। मेरे लेखन के विषय में जानकारी लेते हुए उन्होंने मेरी एक गज़ल सुनी और मुस्कराते हुए बोले, “ठीक लिख रहे हो,पर अभी गज़ल कहने के लिए और मेहनत करनी पड़ेगी।” मैं वहाँ काफी देर बैठा रहा, इस अंतराल में मैनपुरी के कई साहित्य-प्रेमी उनसे मिलने आते रहे जब भी मैं उनसे चलने हेतु अनुमति लेना चाहता वे हाथ पकड़ कर स्नेह से बिठा लेते। मेरे लिए वह एक अविस्मरणीय शाम थी।

जब-जब कहीं भी रंग जी की चर्चा होती है, उनके उस शेर की चर्चा होती है मैं गर्व से कहता हूँ.. हाँ मैंने भी बलबीर से बातें की हैं।



डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

सेवानिवृत्त एसोशिएट प्रोफेसर

श्री चित्रगुप्त पी.जी.कॉलेज

मैनपुरी(उ.प्र.)-205001

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