।।कोई
होड़ नहीं।।
दुष्यंत
कुमार व्यास
कितना
गिरता है मानव भी, इसकी कोई होड़ नहीं।
जा
पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।
आज
चढ़ावा भी मंदिर का, नहीं सुरक्षित हाथों में।
डाकू
वे ही
बन बैठें हैं, रहा नाम
था नाथों में।
सोना-चांदी
हीरे-मोती, जनता ने थे दे डाले।
अपने
घर में ले जा बैठे, खुद पहरा देने वाले।
पुण्य
किसी का पाप बन गया, बन कर चोरी का कारण।
मानव
के लालच ने देखो, लिख दी फिर से रामायण।
कालकूट
सा जहर पिया है, दिखता कोई तोड़ नहीं।
जा
पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।
आशाएँ
जिनसे पाली थी, जिन पर था विश्वास किया।
आज
उन्हीं उजले हाथों ने, भर कालिख यह काम किया।
किसको
अपना हाथ थमाना, किसको अपना मन देना।
उससे
ज्यादा मुश्किल लगता, अब मंदिर में धन देना।
तन-मन
जिसको अर्पण करके, फूलों की डाली माला।
आज
उन्हीं के कारिंदों ने, कांड नया यह कर डाला।
ऐसा
कर्म किया है उनने, जिसका कोई जोड़ नहीं।
जा
पहुंचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।।
जहाँ
चढ़ावा भी चढ़ता है, धन की बारिश होती है।
लाख-लाख
जनता के मन की, मन्नत पूरी होती है।
वहीं-वहीं
पर ठग जुटते हैं, करने को हेरा-फेरी।
मिल-जुलकर
होती है भैय्या,भगवन के धन की चोरी।
भंडारे
का भोजन हो तो, कुछ जूठन तो गिरती है।
सेवादारों
को वह जूठन भी, अनुपम अमरित लगती है।
संत-असंत
यहाँ सब बसते, दिखती सब में खोड़ यहीं।
जा
पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।
यही
अयोध्या वह नगरी है, सीता को जिसने त्यागा।
किया
कलंकित उस माता को, रजक दोष देकर भागा।
नारी
का अपमान किया था, इस कारण से थी उजड़ी।
चोर-उचक्के
भर-भर आए, तभी नगर शोभा बिगड़ी।
करी
शिकायत सबसे ऊपर, कसे जरा से तार यहाँ।
चला
रहा जो बैठा-बैठा भारत की सरकार जहाँ।
सजा
मिले बस इन चोरों को, जिसकी कोई होड़ नहीं।
जा
पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।।
****************************
दुष्यंत
कुमार व्यास
रतलाम


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें