शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

दिन कुछ ख़ास है !

परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से....

प्रो. हसमुख परमार

            हिन्दी भाषा व साहित्य से संबद्ध बृहद् समाज के लिए साल भर के कैलेंडर की कुछेक बेहद महत्त्वपूर्ण  तिथियों-तारीखों में से एक है  31जुलाई-प्रेमचंद जयंती । हिन्दी कथा साहित्य में, भारतीय कथा साहित्य में, यहाँ तक ही नहीं अपितु विश्व कथा साहित्य में भी एक महत्त्वपूर्ण तथा प्रभावशाली कथा लेखक की हैसियत हासिल कर चुके मुंशी प्रेमचंद आज अपने जन्म (1880) के 146 वर्ष और अपनी मृत्यु (1936) के 90 वर्ष बाद भी खूब पढ़े जाते हैं, गुने जाते हैं, दिलों में संजोए जाते हैं । उनके लेखन की संवेदना तथा उनके लेखकीय सरोकारों से पाठक, जीवन की सच्चाइयों और समाज की वास्तविकताओं से अच्छी तरह परिचित होता है, बहुत कुछ सीखता है-मार्गदर्शित होता है, लेखक-सर्जक भी उनसे प्रभावित व प्रेरित-प्रोत्साहित होते हैं। इस अर्थ में प्रेमचंद-साहित्य हिन्दी कथाजगत तथा भारतीय साहित्य की एक बहुमूल्य विरासत है ।

क्लास रूम के बाहर बतौर एक हिन्दी अध्यापक जब प्रेमचंद पर मुझे कुछ कहना-लिखना हो, क्लास रूम  के बाहर प्रेमचंद पर कहना-लिखना से आशय है किसी कक्षा में उसके पाठ्यक्रम के अंतर्गत प्रेमचंद को पढ़ाने के अलावा, उस समय दो तरह की स्थितियों से मेरी बराबर टकराहट होती है । टकराहट कहना या होना इसलिए कि ये दोनों स्थितियाँ एक दूसरे से विपरीत। पहली स्थिति या कहिए एक सवाल यह कि प्रेमचंद पर इतना सारा कहा गया-लिखा गया, उनके साहित्य की सर्वांगी व्याख्या-समीक्षा, लगभग सभी दृष्टियों से उन पर विचार-विमर्श हुआ, ऐसी स्थिति में मेरी चिंता-दुविधा इस बात को लेकर कि अब मैं कुछ नया क्या कहूँ ? किस नवीन कोण या दृष्टि से प्रेमचंद पर विचार करूँ ? लेकिन इस प्रश्न के तुरंत बाद एक और स्थिति का भी मैं अनुभव करता हूँ और यह अनुभव प्रेमचंद संबंधी मेरे अध्ययन तथा मेरी शोध-समीक्षा दृष्टि के लिए मानो एक चुनौती । यह दूसरा अनुभव यह कि प्रेमचंद एक बड़े लेखक, वैश्विक स्तर के कथा लेखकों की पंक्ति के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी कथासाहित्य में मील के पत्थर, शोध-समीक्षा की दृष्टि से अनेकों संभावनाओं के लेखक, अत: उनके सृजन-लेखन की महत्ता-उपयोगिता व प्रासंगिकता को लेकर, नवीन दृष्टि से विचार-विमर्श की पूरी संभावना, पर्याप्त अवसर-अवकाश बशर्ते अध्ययन में विस्तार और गहराई हो, सुलझी शोध-समीक्षा दृष्टि हो, साहित्य को देखने-परखने का अपना एक विजन हो तो संभावना को लेकर कोई संदेह नहीं ।

एक बुनियादी और महत्त्वपूर्ण सवाल कि प्रेमचंद में-उनके लेखन में ऐसा क्या है जिसके चलते वे इतने ख्यात हुए, हिन्दी कथा साहित्य और व्यापक अर्थ में भारतीय कथा साहित्य में उनकी अनेक रचनाओं का अद्वितीय महत्त्व है । इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि कुछेक अपवादों को छोडकर, एक लेखक-एक बड़े लेखक की भी कतिपय सीमाएँ-मर्यादाएँ होते हुए भी इस लेखक व उनके लेखन में समाज व जीवन की समग्रता का बोध। प्रेमचंद ने समाज और जीवन, विशेषकर आम-साधारण-जन साधारण का समाज व जीवन, के लगभग हर पक्ष पर लेखनी चलाई है ।

प्रेमचंद का मतलब –  • साहित्य को यथार्थ-जीवन की जमीन पर उतारने वाला लेखक, इसीलिए उनकी रचनाओं में तत्कालीन समाज दिखता है, बोलता है । • जन साधारण – किसानों, मजदूरों, आमजनों की संवेदनाएँ-परिस्थितियाँ-समस्याएँ आदि को पढ़ने-समझने-लिखने वाला लेखक • आम लोगों के हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला, उनके संघर्षों व सामाजिक विषमताओं को बताने वाला, उनमें चेतना जागृत करने वाला एक संवेदनशील के साथ-साथ अपनी एक समाजसुधारक की भूमिका का भी मानो निर्वहण करने वाला लेखक • स्वाधीनता की भावना-राष्ट्रीय चेतना को भी अपनी रचनाओं के माध्यम से जगाने वाला लेखक, मसलन – “खून का यह आखिरी कतरा जो वतन की हिफ़ाजत में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।” [ दुनिया का सबसे अनमोल रतन-कहानी ] • शिक्षा व मानवीय मूल्य की व्याख्या-उपयोगिता बताने वाला लेखक  (शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगी विकास के लिए होती है । शिक्षा सामाजिक दायित्व के निर्वाह की योग्यता पैदा करती है । शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्र की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए ।) एक और सूक्ति वाक्य- क्या बिगाड़ के डर से इमान की बात न कहोगे ।

प्रेमचंद के लेखन में, उनकी वैचारिकी में चाहे हम उन्हें यथार्थवादी, मार्क्सवादी, गाँधीवादी, राष्ट्रवादी, आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी के रूप में देखें लेकिन इन सबसे पहले वे मानवतावादके प्रबल समर्थक एक बडे मानवतावादी लेखक हैं। अपनी रचनाओं के द्वारा वे उन मूल्यों, आदर्शों, विश्वासों व भावनाओं-विचारों को पाठकों के समक्ष रखते हैं जो उनको मनुष्यता से समृद्ध करते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रेमचंद की मनुष्य की मनुष्यता की पक्षधरता तथा उनके लेखकीय गहरे मानवीय व सामाजिक सरोकार ही उनके लेखन-सृजन को सार्थकता प्रदान करते हैं ।

एक साहित्यकार की, और उनके साहित्य की महत्ता व सुंदरता का एक आधार यह भी है कि उनके जीवन और लेखन, दोनों में आपस में तालमेल हो, एक अच्छी खासी समानता मिले । प्रेमचंद इस कसौटी पर भी पूरी तरह खरे उतरते हैं । लेखन के प्रति पूरी ईमानदारी, पूरी प्रतिबद्धता और समर्पित भाव । और लिखने के लिए क्या चाहिए ? कौन लिख सकता है ? प्रेमचंद जी के शब्दों में –  “लिखते तो वह लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है, विचार है । जिन्होंने धन और भोग विलास को जीवन का लक्ष्य बना लिया वह क्या लिखेंगे ?” लेखन के प्रति पूरा समर्पण, लेखन को लेकर एक लेखक के कर्तव्य-दायित्व व नैतिकता का एक ऊँचा आदर्श उन्हीं के शब्दों में – “मैं एक मजदूर हूँ, जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं ।”

हिन्दी में हम देखते हैं कि भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, रांगेय राधव ऐसे और भी साहित्यकार हैं जिन्हें कुछ खास लम्बा जीवन नहीं मिला था, लेकिन उनका सृजन-लेखन-चिंतन-साहित्यिक गतिविधियाँ व उपलब्धियाँ विपुल मात्रा में और उसका स्तर भी काफ़ी ऊँचा । प्रेमचंद भी इसी श्रेणी के लेखक जिन्हें 56 वर्ष की जिन्दगी मिली जिसमें दर्जन-सवा दर्जन उपन्यास, लगभग 300 के करीब कहानियाँ, कुछ नाटक, अनेकों लेख-संपादकीय-पत्र का लेखन साथ ही भाषण व अनुवाद भी ।

प्रेमचंद की दृष्टि उतनी साफ़ व दूरदर्शी, विचार उतने सुलझे हुए, संवेदना उतनी गाढी, लेखनी उतनी समृद्ध व सोद्देश्य कि जिससे उनके समय का ही हिन्दी कथाजगत नहीं बल्कि इससे आगे की हिन्दी कथा लेखकों की पीढ़ी-हिन्दी पाठक भी प्रभावित व मार्गदर्शित, और यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि आने वाले समय में भी हिन्दी जगत में  प्रेमचंद का यह स्थान, महत्त्व व प्रभाव बराबर बना रहेगा ।

प्रो. हसमुख परमार

परामर्शक - ‘शब्दसृष्टि’

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ  विद्यानगर

आणंद (गुजरात)

2 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमचंद को स्मरण करते हुए उनके जीवन और साहित्य का मूल्यांकन करते हुए आपने उनके इस महत्वपूर्ण वैशिष्ट्य की ओर संकेत किया है-"एक साहित्यकार की, और उनके साहित्य की महत्ता व सुंदरता का एक आधार यह भी है कि उनके जीवन और लेखन, दोनों में आपस में तालमेल हो, एक अच्छी खासी समानता मिले । प्रेमचंद इस कसौटी पर भी पूरी तरह खरे उतरते हैं".. निःसंदेह लेखन में धार तभी आती है जब जीवन और लेखन मे समानता हो, महत्वपूर्ण आलेख हेतु बधाई,

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  2. महत्वपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक आलेख। सुदर्शन रत्नाकर

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