शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

काव्य


कुण्डलियाँ छंद

1

बरसात

 डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

बूँदें झर-झर झर रहीं,

होती जब बरसात ।

घुमड़-घुमड़कर घन करें,

अंबर में उत्पात ।।

अंबर में उत्पात,

चमा-चम चपला चमके ।

क्रोधित होकर लाल,

व्योम शिवजी सा दमके ।।

दिनकर दिन में छुपा,

खड़ा है ऑंखें मूँदें ।

देख-देखकर हँसें,

उछलती नन्ही बूँदें ।।

सार्द्ध मनोरम छंद

पश्चाताप


हो  गया  मैला  कुचेला  वस्त्र मन का ।

धूल धुसरित हो गया प्रासाद तन का ।।

भाव करुणा का कभी मन में न आया ।

लोभ लालच था सदा मन में समाया ।।

 

शक्ति थी जब पास तेरे आ न पाया ।

गीत करुणा प्रेम के भी गा न पाया ।।

दम्भ  में  झूठे  सदा  चलता  रहा था ।

बस स्वयं को ही सदा छलता रहा था ।।

 

आज  संबंधी  सगे  जब छोड़ बैठे ।

मित्र भी मुख आज सारे मोड़ बैठे । ।

हे गजानन हे विनायक लो शरण में ।

शीश रख करता नमन तेरे चरण में ।।

***

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी ‘काव्यांश’

जबलपुर

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