कुण्डलियाँ छंद
1
बरसात
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
बूँदें झर-झर झर रहीं,
होती जब बरसात ।
घुमड़-घुमड़कर घन करें,
अंबर में उत्पात ।।
अंबर में उत्पात,
चमा-चम चपला चमके ।
क्रोधित होकर लाल,
व्योम शिवजी सा दमके ।।
दिनकर दिन में छुपा,
खड़ा है ऑंखें मूँदें ।
देख-देखकर हँसें,
उछलती नन्ही बूँदें ।।
सार्द्ध
मनोरम छंद
2
पश्चाताप
हो गया
मैला कुचेला वस्त्र मन का ।
धूल
धुसरित हो गया प्रासाद तन का ।।
भाव
करुणा का कभी मन में न आया ।
लोभ
लालच था सदा मन में समाया ।।
शक्ति
थी जब पास तेरे आ न पाया ।
गीत
करुणा प्रेम के भी गा न पाया ।।
दम्भ में
झूठे सदा चलता
रहा था ।
बस
स्वयं को ही सदा छलता रहा था ।।
आज संबंधी
सगे जब छोड़ बैठे ।
मित्र
भी मुख आज सारे मोड़ बैठे । ।
हे
गजानन हे विनायक लो शरण में ।
शीश
रख करता नमन तेरे चरण में ।।
***
डॉ.
अनिल कुमार बाजपेयी ‘काव्यांश’
जबलपुर


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