बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

परामर्शक [ प्रो. हसमुख परमार ] की ओर से.....

 दिन [31 अक्टूबर ] कुछ ख़ास है !

      

दृढ़ व्यक्ति और दूरदर्शी दृष्टि : सरदार पटेल

प्रो. हसमुख परमार

देशानुराग, राष्ट्रीय चेतना, राजनीतिक व सामाजिक स्वरूप की गहरी सूझ-बूझ, सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की समझ, समाजसुधार-समाजसेवा, अदम्य सहस, तर्कशक्ति, स्पष्टवादिता, अनुशासनप्रियता, व्यावहारिक सहिष्णुता जैसे उम्दा गुणों तथा महत् कार्यों से भारतीय समाज और राजनीति में स्वतंत्रता, सुरक्षा, एकता-समानता, अखण्डता की एक ठोस वैचारिक व व्यावहारिक जमीन तथा विश्वसनीय माहौल का  निर्माण कर आधुनिक भारत को, एक और अखण्ड भारत के रूप में आकार देने वाले दृढ़ व्यक्ति और दूरदर्शी व्यक्तित्व सरदार वल्लभभाई पटेल को आज [ 31 अक्टूबर ] उनकी अवतरण तिथि के अवसर पर विशेष रूप से स्मरण करते हुए नमन !

लौह पुरुष सरदार पटेल के व्यक्तित्व पर बात करते हुए कवि हरिवंशराय बच्चन की कुछेक पंक्तियों का सहज स्मरण हो उठता है-

यही प्रसिद्ध लौह का पुरुष प्रबल

यही प्रसिद्ध शक्ति की शिला अटल

हिला इसे सका कभी न शत्रु दल

पटेल पर, स्वदेश को गुमान है ।

×         ×         ×         ×         ×

हरेक पक्ष को पटेल तोलता

हरेक भेद को पटेल खोलता

दुराव या छिपाव से उसे गरज ?

सदा कठोर नग्न सत्य बोलता

पटेल हिंद की निडर जबान है ।

दरअसल सरदर पटेल की सामाजिक व राजनीतिक यात्रा उनके साहस की, उनके संघर्ष की तथा उनकी सफलता की एक ऐसी कहानी है जो राष्ट्र और समाज के प्रति उनकी उम्दा और ऊँची प्रतिबद्धता व समर्पिता को बखूबी उजागर करती है । आधुनिक भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित इस सरदार साहसगाथा में हम इस Iron Man of India से संबद्ध खेडा सत्याग्रह, बारडोली सत्याग्रह, स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय शिरकत, देशी रियासतों का एकीकरण, आधुनिक राष्ट्र निर्माण-भारत निर्माण, राजनीतिक भूमिका, अखिल भारतीय सिविल सेवा, समाजसेवा-सामाजिक संरचना में एकता-समानता, संविधान और लोकतंत्र प्रभृति मुद्दों-विषयों को देख सकते हैं, इन पर विस्तृत चर्चा कर सकते हैं । स्वतंत्रतापूर्व तथा स्वातंत्र्योत्तर भारत के उत्थान में, भारतीय राजनीति में तथा भारतीय समाज के विकास में इस कृती व्यक्तित्व को इनके महानतम योगदान के एवज में भारत सरकार ने 1991 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न (मरणोपरांत) से सम्मानित किया ।

 “याद रखना मौत एक बार आती है, दो बार नहीं । अंततः हम सभी को मरना तो है ही, गरीब-अमीर चाहे कोई भी हो । अतः मौत से बिना डरे हमें निडर-निर्भीक बनना ही पड़ेगा ।”  इस तरह की बातें बताते हुए स्वतंत्रता की लडाई के दरमियान अपनी ओजस्वी वाणी से जनता में जोश और उत्साह का संचार करने वाले सरदार पटेल स्वतंत्रता व स्वराज के अधिकार को लेकर बड़ी सहजता से कहते हैं- “ हमें किसी दूसरे पर राज नहीं करना है, परंतु जैसे फ्रांसीसी लोग फ़्रांस में राज्य करते हैं, जर्मन लोग जर्मनी में और इटली वाले इटली में करते हैं, उसी प्रकार हम सिर्फ चाहते हैं कि हिन्दुस्तान के लोग हिन्दुस्तान में राज्य करें ।”

 विश्व के इतिहास में जिन देशों के एकीकरण में जिन महान व्यक्तित्वों की भूमिका अहम रही उनमें भारत के एकीकरण में सरदार वल्लभभाई पटेल सबसे प्रमुख नाम है । जर्मनी के बिस्मार्क और सरदार पटेल दोनों को अपने-अपने राष्ट्र के राजनीतिक एकीकरण और बिखरे हुए राज्यों को एक सूत्र में बाँधने के लिए विशेष और विश्व विख्यात महत्ता प्राप्त है । असल में उक्त विषय में बिस्मार्क की तुलना में सरदार पटेल का कार्य कुछ ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण था । ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिए कि जर्मनी के एकीकरण में जितने राज्यों को एकत्र करना था उसके सामने भारत के एकीकरण में एकत्र किये जाने वाले राज्यों की संख्या (562) बहुत बडी थी । दूसरी बडी चुनौती इस बात को लेकर कि बिस्मार्क के सामने धर्म, भाषा और संस्कृति के वैविध्य को लेकर वो प्रश्न उतना मुश्किल नहीं जितना सरदार पटेल के लिए था । सरदार के सामने 562 रियासतें जिसमें धर्म, भाषा और संस्कृति को लेकर वैविध्य और ऐसी स्थिति में उन तमाम रियासतों को एक सूत्र में बाँधना वाकई में बड़ा मुश्किल काम, लेकिन सरदार पटेल ने यह भगीरथ कार्य सिद्ध किया ।

सरदार पटेल के व्यक्तित्व की, उनके विचारों की, उनकी नीतियों व निर्णयों की महत्ता व उपादेयता की चर्चा वर्तमान विविध राजनीतिक व सामाजिक संदर्भों में भी खूब होती है । वर्तमान की कुछेक समस्याओं के समाधान को लेकर, राजनीतिक विचारधारा को और ज्यादा मजबूती व सही दिशा के संदर्भ में, सामाजिक प्रश्नों के निराकरण के संदर्भ में तथा देश में एकता-समानता के प्रसंग में सरदार पटेल को याद किया जाता है । “ व्यक्ति जब अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को अपने लिए ही सीमित, संकुचित न रखकर राष्ट्र व समाज के स्तर पर नियोजित करता है तो वह निश्चित रूप से श्रेय व सम्मान का अधिकारी बनता है । सरदार पटेल इस दृष्टि से निश्चित ही उस श्रेय तथा सम्मान के अधिकारी हैं, जो उन्हें दिया जाता है । स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद जिन राष्ट्र नेताओं की कमी को हमारे देशवासी अनुभव करते हैं, उन्हीं में से वे एक हैं । आज देश के सामने कोई समस्या आती है तो बरबस मुँह से निकल पड़ता है- काश ! आज सरदार पटेल जीवित होते ।” ( महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग, पं.श्रीराम शर्मा, पृ.4.16) यदि आज सरदार होते ! यदि सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते ! यदि सरदार न होते ! जैसे कुछेक काल्पनिक सवाल भी आज एक अच्छी खासी चर्चा का विषय रहा है जो सरदार पटेल की महत्ता व प्रासंगिकता को रेखांकित करता है ।

31 अक्टूबर ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ तथा गुजरात में स्थित ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ दोनों सरदार बल्लभभाई पटेल के व्यक्तित्व को, उनके ऐतिहासिक कार्यों को, उनके मूल्यों व संकल्पों को बताते हैं और हम इनके माध्यम से इस महान शख्सियत के प्रति सम्मान भाव व्यक्त करते हैं ।

            अंत में पुनः एक बार सरदार वल्लभभाई पटेल की अद्वितीय देशभक्ति, राष्ट्रप्रेम तथा उनके द्वारा किए गए महान व ऐतिहासिक कार्यों को याद करते हुए उनको कोटि-कोटि वंदन !

प्रो. हसमुख परमार

स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग

सरदार पटेल विश्वविद्यालय

वल्लभ विद्यानगर

आणंद (गुजरात)

 

1 टिप्पणी:

  1. काश!आज सरदार पटेल जीवित होते -पं. श्रीराम शर्मा का दशकों पूर्व कहा गया कथन आज भी प्रासंगिक है क्योंकि सरदार पटेल आज भी सबके हृदयों मे, स्मृतियों मे विद्यमान हैं। बहुत सुन्दर आलेख. हार्दिक बधाई प्रो. परमार जी

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