डॉ. भरत मिश्र प्राची के ‘त्रिपद काव्य स्वर’ में
सामाजिक चेतना और
जीवन-मूल्यों का प्रतिपादन
डॉ. नरेश सिहाग
सारांश
समकालीन
हिंदी कविता अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय
चिंताओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। हिंदी काव्य में विभिन्न
काव्य-रूपों के साथ-साथ लघु काव्य-रूपों ने भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। डॉ.
भरत मिश्र प्राची की प्रस्तुत ‘त्रिपद काव्य स्वर’ रचनाएँ इसी संदर्भ में
महत्त्वपूर्ण हैं। इन रचनाओं में तीन पंक्तियों के संक्षिप्त काव्य-विन्यास के
माध्यम से पितृ-स्मरण, परहित, माता-पिता
की सेवा, बेटी का महत्त्व, वृद्धजनों
का सम्मान, स्वस्थ जीवन शैली तथा आधुनिक जीवन की बनावटी
प्रवृत्तियों जैसे विविध विषयों को अभिव्यक्त किया गया है।
कवि
का उद्देश्य केवल काव्य-सौंदर्य की निर्मिति नहीं, बल्कि
समाज को नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक करना भी है। ‘पितृपक्ष पर्व है’,
‘तीरथ समान’, ‘महाशक्ति है बेटी’, ‘वृद्धजन का करें सम्मान’, ‘स्वस्थ जीवन शैली,
यहीं आधार’ तथा ‘बनावटी जिंदगी दुरंगी चाल’ जैसी रचनाएँ भारतीय
सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक
उत्तरदायित्व को केंद्र में रखती हैं। इन रचनाओं में लोकभाषिक सरलता, संदेशपरकता, तुकात्मकता और सहज संप्रेषणीयता प्रमुख
विशेषताएँ हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में इन्हीं आधारों पर डॉ. भरत मिश्र प्राची के
त्रिपद काव्य की सामाजिक चेतना एवं जीवन-दृष्टि का विवेचन किया गया है।
बीज
शब्द : त्रिपद काव्य,
डॉ. भरत मिश्र प्राची, सामाजिक चेतना, जीवन-मूल्य, पितृपक्ष, वृद्ध
सम्मान, बेटी, स्वस्थ जीवन, पारिवारिक संस्कार।
1. प्रस्तावना
साहित्य
समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने
वाला माध्यम भी है। किसी रचनाकार की संवेदना उसके समय, परिवेश
और सामाजिक अनुभवों से निर्मित होती है। इसलिए साहित्य में व्यक्त विचारों का
अध्ययन सामाजिक संरचना और मानवीय मूल्यों को समझने में सहायता करता है।
डॉ.
भरत मिश्र प्राची की ‘त्रिपद काव्य स्वर’ शृंखला में जीवन के अत्यंत सामान्य दिखाई
देने वाले विषयों को काव्यात्मक एवं संदेशात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उनकी कविता में परिवार, समाज, संस्कृति, स्वास्थ्य, वृद्धावस्था,
नारी और नैतिकता जैसे विषय प्रमुख हैं। कवि जटिल शब्दावली के स्थान
पर सरल एवं प्रचलित भाषा का प्रयोग करते हैं, जिससे कविता
सीधे सामान्य पाठक तक पहुँचती है।
इन
रचनाओं का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि कवि छोटी-सी काव्य-इकाई में एक पूर्ण विचार
को स्थापित करने का प्रयास करते हैं। तीन पंक्तियों में कथ्य का विस्तार,
निष्कर्ष और संदेश—इन तीनों का समन्वय दिखाई देता है।
2. त्रिपद काव्य की संकल्पना
त्रिपद
काव्य का सामान्य अर्थ तीन पंक्तियों वाले काव्य-विन्यास से लिया जा सकता है।
इसमें कवि सीमित पंक्तियों में किसी विचार, अनुभूति
या संदेश को पूर्णता प्रदान करता है। त्रिपद रचना की चुनौती यही है कि कम शब्दों
में प्रभावशाली अभिव्यक्ति की जाए।
डॉ.
भरत मिश्र प्राची की रचनाओं में प्रत्येक त्रिपद एक स्वतंत्र भाव-इकाई के रूप में
सामने आता है। उदाहरण के लिए —
>
“पितृपक्ष पर्व है, जग में खास।
>
पितर पितृ पक्ष में, आते पास।
>
पितर की अपनों से, होती आश।”
यहाँ
पहली पंक्ति विषय का उद्घाटन करती है, दूसरी
पंक्ति सांस्कृतिक विश्वास को सामने रखती है और तीसरी पंक्ति भावात्मक निष्कर्ष
प्रस्तुत करती है। इस प्रकार तीन पंक्तियाँ मिलकर एक संपूर्ण भाव-संदेश निर्मित
करती हैं।
3.
पितृ-संस्कृति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता
‘पितृपक्ष
पर्व है’ रचना में भारतीय पारिवारिक एवं सांस्कृतिक परंपरा का चित्रण हुआ है। कवि
पितरों के प्रति स्मरण, श्रद्धा और कृतज्ञता को
महत्त्व देते हैं। वे लिखते हैं —
>
“पितरों की कृपा से, हैं आबाद।
>
पितृपक्ष में करें, उनको याद।
>
पितर खुश हो देंगे, आशीर्वाद।”
यहाँ
पितृ-स्मरण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता, बल्कि
अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव बन जाता है। कवि का संदेश है कि
वर्तमान पीढ़ी को अपनी पारिवारिक और सांस्कृतिक स्मृतियों से संबंध बनाए रखना
चाहिए।
‘बनावटी जिंदगी दुरंगी चाल’ में यही विचार अधिक आलोचनात्मक रूप में सामने आता है। कवि जीवित माता-पिता की उपेक्षा करके मृत्यु के बाद दिखावटी श्रद्धा प्रदर्शित करने वाली मानसिकता पर प्रश्न उठाते हैं —
>
“बनावटी जिंदगी, दुरंगी चाल।
>
जिंदा रहते हुए, न पूछा हाल।
>
उन्हीं के नाम से, लुटाते माल।”
यहाँ
कविता सामाजिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। कवि के अनुसार वास्तविक श्रद्धा
मृत्योपरांत प्रदर्शन में नहीं, बल्कि जीवित रहते
माता-पिता की सेवा में है।
4.
परहित और सेवा की भावना
‘तीरथ समान’ रचना
में कवि ने परोपकार एवं सेवा को जीवन की श्रेष्ठ साधना माना है। वे कहते हैं—
>
“बुढ़ापा लगे नहीं, यदि करें काम।
>
ताजगी बनी रहे, चल सुबह-शाम।
>
परहित करना सदा, तीरथ समान।”
इस
रचना में तीर्थ की अवधारणा को व्यापक सामाजिक अर्थ दिया गया है। कवि के लिए किसी
पवित्र स्थान की यात्रा से अधिक महत्त्वपूर्ण है—दूसरों के हित में कार्य करना।
माता-पिता
की सेवा को भी कवि तीर्थ के समान मानते हैं—
>
“सेवा माँ बाप की, तीरथ समान।”
यह
पंक्ति भारतीय पारिवारिक संस्कार की मूल भावना को व्यक्त करती है। माता-पिता के
प्रति कर्तव्य को धार्मिक कर्मकांड से जोड़ने के बजाय कवि उसे दैनिक जीवन के आचरण
का हिस्सा बनाते हैं।
5. बेटी : शक्ति,
समृद्धि और सामाजिक समानता
‘महाशक्ति
है बेटी’ कविता में बेटी को परिवार की शक्ति और समृद्धि के रूप में चित्रित किया
गया है। कवि लिखते हैं—
>
“महाशक्ति छिपी है, बेटी भीतर।
>
घर को बना देती, बेटी सुंदर।
>
हर क्षेत्र में आगे, बेटी बढ़कर।”
यहाँ
बेटी को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं किया गया है,
बल्कि उसके व्यक्तित्व और क्षमता को व्यापक सामाजिक क्षेत्र में
स्वीकार किया गया है।
कवि
लैंगिक भेदभाव का विरोध करते हुए स्पष्ट कहते हैं—
>
“बेटा-बेटी बीच, न करो अंतर।
>
बेटा से दक्ष है, बेटी बढ़कर।”
यह
पंक्तियाँ वर्तमान सामाजिक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं। शिक्षा,
रोजगार और आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में बेटियों की बढ़ती भागीदारी
ने पारंपरिक लैंगिक धारणाओं को चुनौती दी है। कविता इसी परिवर्तनशील चेतना को सरल
भाषा में व्यक्त करती है।
6. वृद्धजनों के सम्मान की चेतना
‘अंतरराष्ट्रीय
वृद्धजन दिवस’ के संदर्भ में लिखी गई रचना में कवि ने वृद्धजनों को परिवार की
धरोहर माना है। वे कहते हैं—
>
“वृद्ध जन है घर की, हमारी शान।
>
इनसे ही हमारी, बनी पहचान।
>
इनकी सेवा करें, ये है महान।”
वृद्ध
व्यक्ति परिवार के अनुभव, परंपरा और ज्ञान के वाहक
होते हैं। आधुनिक जीवन की व्यस्तता में वृद्धजनों की उपेक्षा एक गंभीर सामाजिक
समस्या बनती जा रही है। कवि इस प्रवृत्ति के विरुद्ध संवेदनशील चेतना उत्पन्न करते
हैं।
कवि
वृद्धजनों को ज्ञान का स्रोत मानते हुए लिखते हैं—
>
“वृद्धजनों के यहाँ, बहुत से ज्ञान।
>
जग में न दूजा है, इनके समान।
>
इनके आशीष से, बनिये विद्वान।”
इस
प्रकार वृद्ध सम्मान को केवल पारिवारिक दायित्व नहीं,
बल्कि ज्ञान और संस्कार की निरंतरता से भी जोड़ा गया है।
7.
स्वस्थ जीवन शैली की अवधारणा
‘स्वस्थ
जीवन शैली, यहीं आधार’ में कवि ने स्वास्थ्य को
समग्र जीवन का आधार माना है। रचना में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक और सामाजिक
स्वास्थ्य को भी महत्त्व दिया गया है।
>
“संतुलित भोजन हो, शुद्ध आहार।
>
तन-मन प्रफुल्लित रहे, सात्विक विचार।
>
स्वस्थ जीवन शैली, यहीं आधार।”
यहाँ
संतुलित आहार और सकारात्मक विचारों को स्वस्थ जीवन का आधार बताया गया है। कवि केवल
शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं रहते, बल्कि
व्यवहार और मानसिकता को भी स्वास्थ्य से जोड़ते हैं।
एक
अन्य त्रिपद में वे कहते हैं —
>
“आचरण सही रहे, सही व्यवहार।
>
किसी से कभी नहीं, करें तकरार।
>
स्वस्थ जीवन शैली, यहीं आधार।”
इससे
स्पष्ट होता है कि कवि के लिए स्वस्थ जीवन का अर्थ केवल रोगमुक्त शरीर नहीं है।
शांत व्यवहार, सकारात्मक सोच, संतुलित
आहार और अच्छी आदतें भी स्वस्थ जीवन का हिस्सा हैं।
8. आधुनिक जीवन और बनावटीपन पर व्यंग्य
‘बनावटी
जिंदगी दुरंगी चाल’ में आधुनिक समाज की एक विडंबना को सामने रखा गया है। कविता में
उन लोगों की मानसिकता पर प्रश्न उठाया गया है जो जीवन भर माता-पिता की उपेक्षा
करते हैं,
लेकिन मृत्यु के बाद उनके नाम पर धार्मिक या सामाजिक प्रदर्शन करते
हैं।
>
“जब तक जिंदा रहे, न पूछा हाल।
>
दाने-दाने के लिए, किया बेहाल।
>
अब उनकी याद में, खिलाए माल।”
यहाँ
व्यंग्य का केंद्र सामाजिक प्रदर्शन और वास्तविक संवेदना के बीच का अंतर है। कवि
के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया गया दिखावटी सम्मान उस उपेक्षा की
भरपाई नहीं कर सकता जो उसे जीवनकाल में मिली।
इस
प्रकार कविता सामाजिक नैतिकता का प्रश्न उठाती है— क्या श्रद्धा केवल अनुष्ठान
है अथवा जीवित मनुष्य के प्रति हमारा व्यवहार ही वास्तविक श्रद्धा है?
9. भाषा और शिल्प
डॉ.
भरत मिश्र प्राची की इन रचनाओं की प्रमुख विशेषता उनकी सहज एवं सरल भाषा है।
अधिकांश शब्द सामान्य बोलचाल और लोकजीवन से जुड़े हुए हैं। इससे उनकी कविता की
संप्रेषणीयता बढ़ती है।
9.1
सरलता
कवि
कठिन दार्शनिक शब्दावली से बचते हैं। ‘बेटी’, ‘माँ-बाप’,
‘वृद्धजन’, ‘दान’, ‘सेवा’,
‘स्वस्थ जीवन’, ‘परहित’ जैसे शब्द सीधे पाठक
के अनुभव संसार से जुड़े हैं।
9.2
तुक और लय
त्रिपदों
में ‘मान–दान–स्थान’, ‘आहार–विचार–आधार’,
‘शान–पहचान–महान’ जैसे तुकांत शब्दों का प्रयोग मिलता है। इससे
रचनाओं में श्रव्यता और स्मरणीयता उत्पन्न होती है।
9.3 पुनरावृत्ति
कवि
कई रचनाओं में तीसरी पंक्ति को स्थायी भाव-सूत्र के रूप में इस्तेमाल करते हैं,
जैसे—
>
“स्वस्थ जीवन शैली, यहीं आधार।”
इस
प्रकार की पुनरावृत्ति कविता के केंद्रीय संदेश को पाठक के मन में स्थापित करती
है।
9.4 लोकमंगल की भावना
काव्य
में व्यक्तिगत आत्माभिव्यक्ति की अपेक्षा सामूहिक हित की भावना अधिक दिखाई देती
है। सेवा,
परहित, माता-पिता, बेटी,
वृद्धजन और स्वास्थ्य—सभी विषय लोकमंगल से जुड़े हैं।
10.
नैतिक चेतना और भारतीय जीवन-दृष्टि
इन
रचनाओं का केंद्रीय स्वर नैतिक चेतना है। कवि आधुनिकता का विरोध नहीं करते,
बल्कि आधुनिक जीवन में भारतीय पारिवारिक और मानवीय मूल्यों की
आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
पितृ-स्मरण
में परंपरा, माता-पिता की सेवा में कर्तव्य,
बेटी के सम्मान में समानता, वृद्धजनों के
सम्मान में संस्कार और स्वस्थ जीवन में अनुशासन—ये सभी भारतीय जीवन-दृष्टि के
विभिन्न पक्ष हैं।
इस
दृष्टि से ‘त्रिपद काव्य स्वर’ को केवल लघु काव्य-रचनाओं का समूह न मानकर सामाजिक
एवं नैतिक संदेश का काव्यात्मक दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
11.
समकालीन प्रासंगिकता
आज
संयुक्त परिवारों के विघटन, पीढ़ियों के बीच बढ़ती
दूरी, वृद्धजनों की उपेक्षा, लैंगिक
असमानता, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और सामाजिक दिखावे के
दौर में इन कविताओं के विषय अत्यंत प्रासंगिक हैं।
‘महाशक्ति
है बेटी’ लैंगिक समानता का संदेश देती है। ‘वृद्धजन का करें सम्मान’ पीढ़ियों के
बीच संवेदनात्मक संबंध मजबूत करने का आग्रह करती है। ‘स्वस्थ जीवन शैली,
यहीं आधार’ व्यक्ति को संतुलित जीवन की ओर प्रेरित करती है। वहीं
‘बनावटी जिंदगी दुरंगी चाल’ सामाजिक पाखंड पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
इस
प्रकार इन रचनाओं में परंपरा और समकालीनता का एक संवाद स्थापित होता है।
12. निष्कर्ष
डॉ. भरत मिश्र प्राची की ‘त्रिपद काव्य स्वर’ रचनाएँ संक्षिप्त आकार में व्यापक सामाजिक और नैतिक संदेश प्रस्तुत करती हैं। इनका प्रमुख उद्देश्य पाठक को मनोरंजन के साथ-साथ चिंतन और आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है।
पितृपक्ष
संबंधी रचना पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता सिखाती है; ‘तीरथ
समान’ सेवा और परहित को जीवन का श्रेष्ठ मूल्य मानती है; ‘महाशक्ति
है बेटी’ नारी-सम्मान एवं लैंगिक समानता की चेतना जगाती है; ‘वृद्धजन का करें सम्मान’ अनुभव और संस्कार के स्रोत के रूप में वृद्धों की
प्रतिष्ठा स्थापित करती है; ‘स्वस्थ जीवन शैली, यहीं आधार’ शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य का
संदेश देती है; जबकि ‘बनावटी जिंदगी दुरंगी चाल’ सामाजिक
पाखंड और दिखावे पर प्रहार करती है।
इन
सभी रचनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि कवि का काव्य-संसार परिवार,
संस्कार, सेवा, समानता,
स्वास्थ्य, नैतिकता और लोकमंगल
के मूल्यों पर आधारित है। उनकी त्रिपद रचनाएँ सरल भाषा और तुकात्मक विन्यास के
माध्यम से सामान्य पाठक तक सहजता से पहुँचती हैं।
अतः
डॉ. भरत मिश्र प्राची का ‘त्रिपद काव्य स्वर’ समकालीन हिंदी कविता में एक ऐसे
काव्य-प्रयास के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें
लघु काव्य-विन्यास के माध्यम से व्यापक सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति मिली है।
इन रचनाओं की शक्ति उनकी सरलता, संक्षिप्तता,
संदेशपरकता और लोकमंगल की भावना में निहित
है।
संदर्भ-सूची
1. प्राची,
डॉ. भरत मिश्र — त्रिपद काव्य स्वर : ‘पितृपक्ष पर्व है’,
‘तीरथ समान’, ‘महाशक्ति है बेटी’, ‘वृद्धजन का करें सम्मान’, ‘स्वस्थ जीवन शैली,
यहीं आधार’ तथा ‘बनावटी जिंदगी दुरंगी चाल’।
2. हिंदी काव्य
एवं छंद संबंधी मानक ग्रंथ।
3. भारतीय
संस्कृति,
परिवार एवं सामाजिक मूल्यों से संबंधित साहित्य।
4. समकालीन हिंदी
कविता में सामाजिक चेतना से संबंधित आलोचनात्मक साहित्य।
****
डॉ.
नरेश सिहाग
एडवोकेट
गुगन
निवास, 26 पटेल नगर
भिवानी
–
हरियाणा


सारगर्भित आलेख के लिए बहुत बधाई।
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