सोमवार, 16 अगस्त 2021

कविता

 

डॉ. सुरंगमा यादव

आँसू

सजल आँखों को कभी तुम

इस तरह होने न देना

भाव के मोती हैं ये

पत्थरों पर गिरने न देना

आँख का पानी नहीं ये

मौन व्यथा की है कहानी

यह अगर बह जायेगा तो

पीर छिप न पायेगी पुरानी

समझ पाओ तो समझ लो

विकल मन का तरल रूप

आँसुओं को मान लो

आँख से सूखा जो आँसू

आग का दरिया बनेगा

धैर्य धरती के हृदय का

मापने की जिद न करना

शब्द जब लाचार होते

अश्रु उनको थाम लेते

आँसुओं को ढोंग की तुम

फिर कभी संज्ञा न देना।

डॉ. सुरंगमा यादव

4/27, जानकीपुरम विस्तार

लखनऊ -226031

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

फरवरी 2026, अंक 68

शब्द-सृष्टि फरवरी 2026, अंक 68     मुक्तक – नव संवत्सर – डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा कविता – बसंत राग – दुष्यन्त कुमार व्यास कविता – 1. कुटुंब (आ...