गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69-70(संयुक्तांक)

 



शब्द-सृष्टि

मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69-70(संयुक्तांक)  

परामर्शक की कलम से.... – ‘शब्दसृष्टि’ का प्रस्तुत अंक : विलंब की वजह .... – प्रो. हसमुख परमार

कविताई 

1. युद्धं देहि! 2. कविता है : युद्ध के बावजूद 3. धरती के युद्धप्रिय चौधरियों के नाम – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

माहिया – रंगों की नगरी है – ज्योत्स्ना प्रदीप

1. छुप-छुप मीरा रोये .. (विष्णु पद छंद) 2. श्रीराम-सेतु(चौपाई छंद)3. नीति वाक्य – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी

हाइकु – प्रीति अग्रवाल

गीत – वाचालों का जोर जहाँ – दुष्यंत कुमार व्यास

आलेख

इतिहास, मिथक और आस्था का संगम ‘रामटेक’ – श्रीराम पुकार शर्मा






कविताई

 

विष्णु पद छंद

1.       

छुप-छुप मीरा रोये ..

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी

मन का मंदिर  सूना-सूना,झर-झर अश्रु बहें।

रोये मन का कोना-कोना,किससे पीर कहें।।

गलियाँ  छूटीं द्वारे   छूटे ,सबने  छोड़  दिया।

ठौर  कहाँ जो तूने मोहन,मुखड़ा मोड़ लिया।

 

टूट  गए  सब रिश्ते-नाते, सुमिरन कौन करे।

एक बार दुख पूछो मोहन,तुम भी मौन धरे।।

श्वास-वर्तिका  छोटी होती,लौ भी मंद पड़ी।।

देखूँ  कैसे  तुमको  मोहन, पलकें  बंद पड़ी।।

***

चौपाई छंद

2.

श्रीराम-सेतु

 

देख-देख लंका का सागर।

नाच रहे हनुमन के वानर।।

राम-नाम की लिए शिलाएँ।

काँधे  पर ढो-ढोकर लाएँ।।

 

राम नाम की जय है करते।

जोर-जोर  हुँकार है भरते।।

 

तैर रहीं  विकराल शिलाएँ।

वानर उनको साथ मिलाएँ।।

 

खड़े हुए नल-नील किनारे।

राम लखन सब हर्षित सारे।।

देख प्रभु श्रीराम की  माया।

देवलोक  आनन्द  समाया।।

***

3.

नीति वाक्य

 

प्रथमपूज्य हैं घर की माता,

        फिर मंदिर को जाना जी ।

तात-चरण के जैसा पावन,

       जग में नहीं ठिकाना जी ।।

अन्न कभी मत छोड़ो जूठा,

         जब भी खाएँ खाना जी ।

खून पसीने से कृषकों के,

          बनता है हर दाना जी ।।

 

दान पुण्य करते हो जितना,

          वही लौट कर आना जी ।

सेवा सबसे बड़ा धरम है,

              वेदों ने भी माना जी ।।

रूप छोड़ गुण को ही देखो,

          जब भी बहुएँ लाना जी ।

बिटिया-तुल्य समझना उसको,

         अगर चैन सुख पाना जी ।।

***    


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


दिन कुछ ख़ास है !

 


महिला दिवस पर विशेष

सुरेश चौधरी

आइए जानते हैं कुछ सत्य जिन्हें मध्यकाल में परिवर्तित कर एक अभिशाप बना दिया गया और हम भारतीय नारी विरोधी हो गए नारी को ताड़ना देने वाले।

सबसे पहले हमें समझना होगा महिला दिवस क्यों मनाया जाता है, महिला दिवस की शुरुआत साल 1908 में न्यूयॉर्क से हुई थी, उन्होंने बड़ी संख्या में एकत्रित होकर अपनी जॉब में समय को कम करने, अपने वेतन बढ़ाने और वोट के अधिकार की भी मांग की थी। इसके एक वर्ष पश्चात अमेरिका में इस दिन को राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया था।

इसके बाद 1917 में प्रथम विश्व विश्व युद्ध के दौरान रूस की महिलाओं ने तंग आकर खाना और शांति के लिए विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध प्रदर्शन इतना संगठित था कि सम्राट निकोस को अपना पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। महिलाओं को वोट देने का अधिकार भी मिला। रूसी महिलाओं ने जिस दिन इस हड़ताल की शुरूआत की थी।वह दिन 28 फरवरी था और ग्रेगेरियन कैलेंडर में दिन 8 मार्च था। तब से 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा। इस सब के बावजूद इसे आधिकारिक मान्यता कई वर्षों बाद 1975 में मिली थी।

यह थी पाश्चत्य संस्कृति जहाँ बराबरी की बात तो छोड़िए वोट देने का भी अधिकार नहीं था, आज 300 वर्ष  बाद भी अमेरिका ने एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं चुना, यह संस्कृति नारी उत्थान के लिए जानी जाती है और हम भारतीयों को नारी शोषण, पितृसत्तात्मक प्रवृति और न जाने किन किन आरोपों से मंडित किया जाता है, पर अब आप देखिए हज़ारों हज़ारों वर्ष पूर्व लिखे गए हमारे ग्रन्थ नारी को क्या स्थान देते हैं।

ब्रह्म वेवृत पुराण में वर्णित है की राधा जी का जन्म श्री कृष्ण से ११ १/२ महीने पूर्व हुआ था, जब भगवान विष्णु ने अवतरण लेने का निश्चय किया तो सर्व प्रथम अपने हृदय को अलग कर राधा स्वरूप में अवतरित कराया, अर्थ राधा कोई अलग नही श्रीकृष्ण ही है, यहाँ आरंभ होता है अर्धनारीश्वर की कल्पना का विचार, महादेव ने जब प्रलय की कल्पना की तो उमा को अपने में समा अर्ध नारीश्वर रूप धर नृत्य किया, सत्य तो यह है की पुरुष एवं नारी दोनों के मिलन से ही व्यक्ति जन्म लेता है अतः संतति में माँ एवं बाप दोनों के जींस होते हैं अतः हर मानव में कुछ नारी प्रदत्त गुण अवश्य होते हैं यह ही अर्ध नारीश्वर है, कहने का अर्थ है कि पुरुष नारी के बिना आधा है, नारी का महत्त्व हमारे वेदों में बहुत जगह वर्णित है यह श्लोक तो जग विदित है :

--यत्र: नार्यस्तु पूजयन्ते तत्र रमन्ते देवता: ।   

यजुर्वेद २०.९ –

स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है

यजुर्वेद १७.४५ –

स्त्रियों की भी सेना हो | स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें |

यजुर्वेद १०.२६ –

शासकों की स्त्रियाँ अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें | जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों |

अथर्ववेद ११.७.१८ –

ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है | यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है | कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें |

अथर्ववेद १४.१.६ –

माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें | वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें | जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने – कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे |

अथर्ववेद १४.१.२०

-हे पत्नी ! हमें ज्ञान का उपदेश कर | वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे |

इस तरह वेदों में नारी का महत्व और भी कई ऋचाओं  में वर्णित है,

गुप्त जी की यह पंक्ति याद आती है,

दो दो मात्राओं से नारी नर से भारी है…

 

अंत में मेरी एक रचना :

 

जाग-जाग, हे नारी जाग;

तू भारत की नारी , तू जाग!

 

सहनशील- तू अति धीर -सदृशपृथा,

अनल-मध्य-तपे , तेरी यही व्यथा,

ममता-कोमलता-शीतलता,तेरी कथा !

हे नारी जाग-जाग!

 

दुर्गा बन महिसासुर संघारकरे ,

अनेक रूप धर तू  जन-कल्याण करे ,

तू उज्ज्वल देदप्यप्रमाण करे ,

हे नारी जाग-जाग!

 

सिन्दूर रक्षा-सावित्री परीक्षा-यही शिक्षा,

करे देशउत्थान-पुरुष समान,

दूध महान- तेज भानु समान !

 

-जागजाग,हे नारी जाग;

तू भारत की नारी तू जाग!

अब भारत की नारी जाग रही है…. सभी क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही है। वह फाइटर प्लेन भी चलाती है। इसरो में बैठ चंद्रयान भी बनाती है। वह कुशल डॉक्टर है तो सर्वश्रेष्ठ गृहणी भी, ओलिम्पिक में कमाल दिखाती है तो भारत की रक्षा के लिए सैनिक बन सीमा पर तैनात भी है। आपरेशन सिंदूर में हमने देखा भारत की नारी शक्ति का कमाल। नमन नमन माँ , बहन, पत्नी, बेटी नारी के इन सभी रूप को।

****


सुरेश चौधरी

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता 700046

विशेष

 

केदारनाथ, तुंगनाथ, बद्रीनाथ डोली यात्रा उत्सव 2026

आस्था, परंपरा और आत्मानुभूति का अद्भुत संगम

अश्विन शर्मा

भूमिका : हिमालय से हृदय तक की यात्रा

हिमालय की गोद में स्थित केदारनाथ, तुंगनाथ और बद्रीनाथ धाम केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना के ध्रुवतारे हैं। यहाँ की यात्राएँ केवल पर्वतों की चढ़ाई नहीं, बल्कि भीतर उतरने की प्रक्रिया है।

हर वर्ष शीतकाल के उपरांत जब बर्फ पिघलती है और प्रकृति नवजीवन का स्वागत करती है, तब देवताओं की डोली यात्राएँ आरंभ होती हैं—मानो स्वयं ईश्वर अपने भक्तों के बीच पुनः उपस्थित हो रहे हों।

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डोली यात्रा : परंपरा का जीवंत स्वरूप

डोली यात्रा, जिसे ‘उत्सव डोली’ कहा जाता है, भगवान के शीतकालीन प्रवास से उनके मूल धाम तक लौटने की पावन परंपरा है।

शीत ऋतु में जब ऊँचे हिमालयी धाम बर्फ से ढक जाते हैं और वहाँ पहुँचना असंभव हो जाता है, तब भगवान की चल विग्रह मूर्ति को नीचे के स्थलों पर स्थापित किया जाता है, जहाँ नियमित पूजा-अर्चना जारी रहती है।

ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ, वही डोली पुनः अपने धाम की ओर प्रस्थान करती है—भक्ति, संगीत और आस्था के साथ।

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एक महत्वपूर्ण आयाम : भारतीय सेना की सहभागिता

इस पावन यात्रा का एक अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायक पक्ष भारतीय सेना की सहभागिता है।

जब बर्फ से ढके दुर्गम मार्गों पर सामान्य जन के लिए यात्रा कठिन हो जाती है, तब भारतीय सेना के जवान ही इस डोली यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।

चाहे केदारनाथ से ऊखीमठ की ओर प्रस्थान हो या पुनः धाम की ओर वापसी—

ये सैनिक पूरे उत्साह, श्रद्धा और अनुशासन के साथ प्रभु की सेवा में संलग्न रहते हैं।

यह केवल कर्तव्य नहीं, एक सौभाग्य है—

जहाँ देश सेवा और देव सेवा एक हो जाती है।



केदारनाथ डोली यात्रा एवं कपाट उद्घाटन (2026)

          डोली प्रस्थान (ऊखीमठ): 18 अप्रैल 2026

          धाम आगमन: 21 अप्रैल 2026

          कपाट उद्घाटन: 22 अप्रैल 2026

ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर से आरंभ होकर यह यात्रा गुप्तकाशी, फाटा और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ धाम तक पहुँचती है।

मार्ग में गूँजते “हर हर महादेव” के जयकारे वातावरण को अलौकिक बना देते हैं।

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तुंगनाथ और बद्रीनाथ : यात्रा का व्यापक आयाम

तुंगनाथ धाम

          कपाट उद्घाटन: 2 मई 2026

          विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर

          मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव की भुजाएँ प्रकट हुईं

बद्रीनाथ धाम

          कपाट उद्घाटन: 23 अप्रैल 2026 (प्रातः 6:15, ब्रह्म मुहूर्त)

          यात्रा प्रारंभ: 19 अप्रैल 2026

ये तीनों धाम मिलकर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि चारधाम और पंचकेदार परंपरा की जीवंत धारा हैं।

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पंचमुखी डोली : प्रतीक और दर्शन

केदारनाथ की डोली में विराजमान पंचमुखी मूर्ति भगवान शिव के पाँच स्वरूपों—ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात—का प्रतीक है।

यह केवल एक प्रतिमा नहीं, बल्कि यह संदेश है—

ईश्वर एक रूप में नहीं,

जीवन के प्रत्येक तत्व, प्रत्येक दिशा और प्रत्येक अनुभव में विद्यमान हैं।

 

क्या भगवान को भी ठंड लगती है? — एक प्रश्न, एक अनुभव

यहाँ तक जो कुछ भी है—तिथियाँ, परंपराएँ, मार्ग—यह सब जानकारी है।

परंतु इस यात्रा का वास्तविक अर्थ एक सरल प्रश्न से शुरू होता है—

क्या भगवान को भी ठंड लगती होगी?

यदि तर्क से देखें, तो उत्तर स्पष्ट है—

नहीं।

जो स्वयं कैलाशपति हैं,

जो हिमालय के अधिपति हैं,

जिनके लिए बर्फ, शीत और पर्वत स्वाभाविक हैं—

उन्हें ठंड कैसे लग सकती है?

फिर वे हर वर्ष पर्वतों से नीचे क्यों आते हैं?

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मेरे विचार से… भगवान नहीं आते, संबंध आते हैं

मेरे विचार से—

यह भगवान का “स्थान परिवर्तन” नहीं है,

यह मनुष्य और भगवान के बीच संबंध का विस्तार है।

भगवान नीचे इसलिए नहीं आते कि उन्हें ठंड लगती है,

बल्कि इसलिए आते हैं कि—

वे केवल भगवान बनकर नहीं रहना चाहते,

वे “अपने” बनकर रहना चाहते हैं।

ऊपर केदारनाथ में वे अलौकिक हैं,

पर नीचे ऊखीमठ में वे आत्मीय हो जाते हैं।

 

देवभूमि : जहाँ अनुभव, सुविधा से बड़ा है

देवभूमि उत्तराखंड में रहना, चलना, ठहरना—अपने आप में एक साधना है।

यहाँ हर मोड़ पर प्रकृति, नदियाँ, मौन और अध्यात्म का साक्षात्कार होता है।

यह टूरिस्ट प्लेस नहीं है,

यह आध्यात्मिक स्थल है।

यहाँ सुविधाएँ सीमित हो सकती हैं,

पर अनुभव असीम होता है।

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यात्रा का सत्य : कष्ट भी प्रसाद है

संभव है कि इस यात्रा में आपको कठिनाई हो—

लंबा पैदल मार्ग, ठंडा मौसम, सीमित संसाधन।

परंतु यही इस यात्रा की विशेषता है।

यहीं आप सीखते हैं—

          धैर्य

          संतोष

          समर्पण

और शायद, स्वयं को भी।

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स्थानीय जीवन : जहाँ भगवान परिवार हैं

इस यात्रा का एक अत्यंत सजीव पक्ष है—स्थानीय लोगों का भाव।

यहाँ के लोगों के लिए भगवान केवल पूज्य नहीं,

परिवार का हिस्सा है।

जब डोली गाँव से निकलती है,

तो विदाई का भाव होता है—

जैसे कोई अपना दूर जा रहा हो।

और जब लौटते हैं—

तो स्वागत वैसा ही होता है,

जैसे घर का कोई सदस्य वापस आया हो।

(चित्र) — आस्था और आत्मीयता का क्षण

 


A Sefie with God ☺️एक व्यक्तिगत अनुभूति

जैसे हम किसी अपने से मिलकर उस क्षण को यादगार बनाने के लिए एक तस्वीर लेते हैं,

वैसे ही मुझे भी जीवन में एक ऐसा अवसर मिला—

जब मैंने “भगवान के साथ एक सेल्फी” ली।

यह केवल एक फोटो नहीं थी,

यह एक अनुभव था—एक ऐसा क्षण, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

एक दिन मैं बाबा केदारनाथ के साथ था,

और अगले ही दिन बाबा तुंगनाथ के साथ।

एक ऐसा अनुभव, जो केवल देखा नहीं, जिया जाता है।

 

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भीड़ में भी एकांत : अनुभव की गहराई

आज के समय में डोली यात्रा में भीड़, कैमरे और डिजिटल उपस्थिति बढ़ गई है।

संभव है कि आप डोली के बहुत निकट न जा सकें।

परंतु अनुभव दूरी से नहीं मापा जाता।

कभी-कभी, दूर खड़े होकर भी जो अनुभूति होती है—

वही सबसे गहरी होती है।

 

मेरा आग्रह : इस यात्रा का हिस्सा बनिए

यदि संभव हो, तो संपूर्ण चारधाम यात्रा कीजिए।

यदि नहीं—

          केदारनाथ डोली यात्रा

          तुंगनाथ डोली यात्रा

          या बद्रीनाथ धाम

इनमें से किसी एक का भी हिस्सा अवश्य बनिए।

 

भले ही एक दिन, आधा दिन या कुछ घंटे ही क्यों न हों।

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 यह यात्रा, जो आपको आपसे मिलाती है

यह यात्रा केवल धामों तक पहुँचने की नहीं है,

यह स्वयं तक पहुँचने की है।

शायद इस बहाने आप हिंदी से जुड़ें,

और हिंदी से जुड़ना—अपनेपन से जुड़ना है।

जब हिमालय की वादियों में डोली के साथ “हर हर महादेव” गूँजता है,

तो लगता है—

मानो स्वयं शिव हमें पुकार रहे हों…

क्या आप उस पुकार को सुनेंगे?

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हर हर महादेव!

 


अश्विन शर्मा

बैंगलुरु

 

 

मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69-70(संयुक्तांक)

  शब्द-सृष्टि मार्च-अप्रैल 2026, अंक 69 -70(संयुक्तांक)   परामर्शक की कलम से.... – ‘शब्दसृष्टि’ का प्रस्तुत अंक : विलंब की वजह .... – प्...