लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती - शरद नायिका
श्रीराम पुकार शर्मा
कुछ दिन पूर्व की बात है । एक हरे-भरे कृत्रिम उद्यान में
सबेरे-सबेरे मित्रों और पक्षियों के मधुर कलरव तथा गुलाबी-शीतल वायु-प्रवाह के साथ
ही प्रातः भ्रमण कर रहा था । पूर्व दिशा के गुलाबी और स्वर्णाभ गगन-मंडल में
विभिन्न आकृतियों वाले अनगिनत रंगीन मेघ-खण्डों का मनोभावन इंद्रजाल सजा हुआ था ।
उन्हीं में से एक कुछ लंबा और खण्डित मेघ सुंदर गुलाबी-पीताभ रेशमी साड़ी के रूप
में लहराता दिखाई दिया । मैंने अपनी कल्पना-शक्ति को कुछ जागृतकर उस मेघ-खण्ड पर
अपनी कल्पित छवि को आरोपित कर दिया । अब तो ऐसा प्रतीत हुआ, मानो कि उस आकाशीय गुलाबी-पीताभ रेशमी परिधान में लिपटी हुई
कोई अप्सरा भी है, जो धीरे-धीरे धरती पर उतर रही हो । उस झिलमिलाती काल्पनिक
अप्सरा की ओर संकेत करते हुए, अपने कुछ मित्रों को सहज ही मैंने कहा, — “देखो भाई ! लो आ गई यह नववधू-सी शोभती, शरद नायिका !”
मेरे एक अध्यापक मित्र ने जैसे ही सुना, कुछ स्मरण या चिंतन करते हुए बोले, — “नहीं भाई साहब ! यह
तो कालिदास की ‘आगता शरन्नववधूरिव रूपरम्या’ है ।”
महाकवि कालिदास ने अपने ‘ऋतुसंहारम्’ के तृतीय सर्ग के
प्रथम श्लोक में शरद ऋतु का वर्णन लगभग इसी भावभूमि पर किया है । मुझे तो लगता है
कि कास के सुंदर श्वेत पुष्पों से चित्रित परिधानों से आवृत शरद-नायिका का
मुख-मंडल मसृण कमल-दलपत्रों से निर्मित है । उसके मस्त मराल-चाल के सम्मुख राजहंस
भी लज्जित हो जा रहे हैं, जबकि उसके कोमल गौर पैरों की नूपुर-रुनझुन की ध्वनि में
झींगुरों की सुमधुर सांगीतिक लयात्मक ध्वनि सम्मिलित प्रतीत हो रही है । पकी धान
की नत बालियों की तरह उसकी लज्जाशील झुकी पलकें हैं और मंद-मंद लहराते हुए
हरित-स्वर्णाभ फसल उसकी मंद-मंद लहराती सुन्दर काया है, जो किसी भी सहृदय पथिक के बढ़ते कदमों को कुछ क्षण के लिए रोक
देने में पूर्ण समर्थ है ।
भारतीय काल-गणना में वर्ष को छह विभिन्न ऋतुओं में विभाजित
किया गया है — वसंत, ग्रीष्म, वर्षा,
शरद, हेमंत और शिशिर । इस सम्पूर्ण ऋतु-चक्र
में शरद का स्थान शारीरिक स्वस्थता, भौगोलिक साम्यता, आध्यात्मिकता और
सुख-संपन्नता के आधार पर अति महत्वपूर्ण है । आश्विन और कार्तिक, इन दो माहों में
विस्तृत शरद ऋतु, मानो प्रकृति के जीवन-चक्र का वह चरण है, जिसमें
अतुलित वर्षा से गहराई तक भीगी धरती को अपनी संचित जल से फल-फूल, धन-धान्य, सुख-संपदा और पर्व-त्योहारों से सजाकर,
उसे स्वर्ग से भी सुंदर के बनाने में क्रियाशील रही है । यह वर्षा की अतिशयता और
शिशिर के प्रबल शीत के मध्य स्थित अत्यंत ही संतुलित ऋतु-काल है, जिसमें प्रकृति न तो उद्दाम और न तो अत्यधिक जड़ ही है; अपितु यह पूर्ण परिपक्व, संयत, समृद्ध और
सौंदर्य-स्वरूप को धारण कर सबके लिए बहुत प्रिय बनी हुई है ।
भारतीय साहित्य में वसंत और पावस ऋतु के बाद सबसे अधिक और
सुंदर सरस रचनाएँ संभवतः शरद ऋतु से ही सम्बन्धित हैं । शायद ही ऐसा कोई प्राचीन
कवि रहा हो, जिसने शरद के सौंदर्य से प्रभावित होकर
उसके रूप-श्रृंगार को कलम-बद्ध न किया है । जब ग्रीष्म की प्रचण्ड अग्नि से झुलसी
धरती, पावस की अतुलित जलराशि को प्राप्त कर संतृप्त हो जाती है, तब उसके चतुर्दिक अंग-अंग पर सौंदर्य, शांति,
उल्लास और सृजन के नव-स्वरूप सजने लगते हैं । ऐसी नव पल्लवित,
विकसित और पुष्पित धरती पर अति सुंदर नववधू सदृश मधुर शरद ऋतु का आगमन होता है । सम्पूर्ण प्रकृति
अपनी विविध स्वरूपों की दिव्य शोभा सहित उसका स्वागत करती है । शरद के दिव्य
सौंदर्य और मधुर मुस्कान समस्त प्राणियों के मन को मोह लेते है । तभी तो भक्तकवि
गोस्वामी तुलसीदास के प्रभु श्रीराम जी अपने अनुज लक्ष्मण से शरद को ‘परम सुहाई’
बताते हुए कहते हैं —
“बरषा बिगत सरद ऋतु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥”
शरद की सानिध्यता को प्राप्तकर खेतों में लहलहाती हरित
फसलें पककर, अब चतुर्दिक स्वर्णाभ आभा बिखेरने लगी हैं । मंद-मंद शीतल बयार से उस
सुविस्तृत हरित-स्वर्णाभ महोदधि में निर्बाध लहरें उठने लगी हैं । ऐसी ही
प्रसन्नता और संतुष्टि की लहरें धरती-पुत्र किसानों में भी उठने लगी हैं । संपूर्ण
धरती को अपने श्वेत रेशमी परिधान से ढँकने के लिए आतुर, जहाँ-तहाँ लहराते कास, कुश, सरकंडे और नरकट के धवल-धूसर ऊर्ध्वमुखी पुष्प परस्पर मिलकर पंक्तिबद्ध
उड़ते श्वेत बगुलों की टोली प्रतीत हो रहे हैं । मानो वे दूर-दूर तक मधुर और
समृद्ध शरद के आगमन की सूचना देने के लिए भागे चले जा रहे हों । उस अनंत
हरित-स्वर्णाभ लहरों के बीच-बीच में घुमावदार अधपक्की पगडंडियाँ, लम्बे अजगर के
समान पसरी हुई हैं, जो थोड़ी ही देर में रंग-बिरंगे परिधानों से सजे बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री और
पुरुषों से साज गई हैं । कहीं रक्ताभ, कहीं पीताभ और कहीं
धवल कमल-कुमुदिनियों से भरे छोटे-बड़े निर्मल ताल-तलैया और जलकुंड हैं । उनके अथाह
जल में नहाने उतरे, अपने छोटे-छोटे जलद-खण्डों के साथ स्फटिक-नील गगन को देखना,
अपने आप में कम रोचक नहीं है ।
घर के आँगन से लेकर बगिया तक पालक, मेथी, चोराई साग और न जाने कितनी हरी
सब्जियाँ अपनी-अपनी समृद्धि का परिचय दे रही हैं । चार-दीवारी पर लौकी और सेम,
बीन आदि हरी-भरी फलियाँ, ऐसे पुष्ट गुच्छों में लटकी हुई हैं,
मानो गृहस्वामी एक साथ ढेर सारी साग-सब्जियाँ लाकर जहाँ-तहाँ टाँग
दिया हो, — ‘जितना चाहो खाओ और जितना चाहो बाँटो; कोई
कमी की बात नहीं है ।’
धरती के ऐसे सुख-समृद्ध सौभाग्य को देखकर ऊपर के मेघरहित
स्वच्छ नील गगन में विचरण करते सूर्यदेव भी अतिसंतुष्ट और प्रसन्न दिखाई देते हैं
। धन-धान्य और सजी-धजी सुंदर काया से संपन्न लक्ष्मी-स्वरूपा धरती के पावन चरणों
का अभिनंदन करते हुए सूर्यदेव अस्ताचल की ओर जल्दी-जल्दी बढ़ते चले जाते हैं, ताकि
जल्दी ही पूर्व दिशा से पुनः उदित होकर धरती के नयनाभिराम स्वरूपों का पुनरावलोकन
कर सके ।
फिर शरद की रात्रि की, तो किसी अन्य से तुलना ही नहीं की जा
सकती है । प्रतीत होता है, मानो देवलोक अपने सारे ऐश्वर्य और संपदा के
साथ धरती पर उतर आया हो । निर्मल रातों में अंतरिक्ष की अनंत दूरी पर टिमटिमाते
तारें कुछ और निकट आकर हँसते-मुसकुराते है और इशारों-इशारों में कोई न कोई
प्रेम-कथा सुनाने को उत्सुक प्रतीत होते हैं । फिर शरद की पूर्णिमा की दिव्य
रात्रि ! उसका तो महत्व ही कुछ और होता है । आध्यात्मिक, सांस्कृतिक
और साहित्यिक सब दृष्टि से उसे सर्वाधिक दिव्य, मनोहारी और
रहस्यमयी रात्रियों में प्रमुख माना जाता है ।
रजत-चंद्र गोलक से अमृतवर्षी मधुर और शांत चाँदनी, मौन आँगन
में बेहिचक प्रवेश कर कोना-कोना झाँकती रहती है । कभी-कभी तो वह किसी निर्लज्ज के
समान खुली खिड़कियों से कमरों में भी प्रवेश कर जाती है और मनभर उसी में रहती है ।
अबोध बच्चों को पाते ही वह मंद-मंद मीठी लोरी गाती हुई, उनको नींद में सुलाने का
उपक्रम भी करती है । घर-आँगन, गाँव-नगर,
नदी-नाले, पहाड़-पठार, मैदान-जंगल
आदि सब के सब उसकी दूधिया रोशनी में नहा उठते हैं । हिम-श्वेत चादर में लिपटे हुए
सभी प्राकृतिक उपादान अपने अद्भुत सौंदर्य से, मानो देव-अप्सराओं को भी पराजित
करने पर तुले प्रतीत होते हैं । उदित चंद्रमा के कदम से कदम मिलाते हुए, रातरानी
या हरसिंगार भी अपनी मधुर सुगंध को क्रमशः चरम तक पहुँचा देती है । फिर तो भोर तक
सारा वातावरण उसकी खुशबू से मदहोश हो जाया करता है ।
शरद पूर्णिमा की सुरभित और धवल उज्ज्वल रजनी, किसी
अमरकानन-सी प्रतीत होती है । पौराणिक मान्यता है कि इसी पावन पूर्णचंद्र रात्रि
में भगवान श्रीकृष्ण, गोपियों के साथ वृंदावन की रासस्थली में ‘महारास’ रचाए थे ।
चंद्रमा भी अपनी सोलह कलाओं के साथ वहाँ उपस्थित रहकर उस दिव्य रासलीला का साक्षी
बना था । इसी कारण इसे ‘रास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है । आज भी अनेक
स्थानों तथा श्रीकृष्ण से संबंधित मंदिरों में इस विशेष पूर्णिमा की रात्रि में
रासलीला का आयोजन किया जाता है ।
शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि से जुड़ी एक और अत्यंत
लोकप्रचलित मान्यता है । विश्वास किया जाता है कि इस धवल मधुर रात्रि में चंद्रमा
की किरणों में अद्भुत अमृत-शक्ति विद्यमान रहती है । इसी विश्वास के चलते
गृहिणियाँ खीर बनाकर अपने घर की खुली छत या आँगन में उसे रात्रिभर चाँदनी के नीचे
रख देती हैं । मान्यता है कि प्रातःकाल तक चंद्र-किरणों के अद्भुत सम्पर्क से वह
खीर अमृतमय हो जाती है । सुबह इस “चंद्र-अमृत” को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की
परंपरा, आज भी अनेक घरों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है ।
इसके विपरीत शरद ऋतु की अमावस्या की घोर अंधियारी रात्रि
में अपने प्रिय चंद्रमा के अभाव में, न केवल रातरानी, बल्कि संपूर्ण प्रकृति ही मानो निराश, निस्तेज
और सौंदर्यविहीन होकर उस गंभीर अंधकार की प्रबल आगोश में मौन दबी सिसकती रहती है ।
ऐसी घोर और गंभीर काली रात्रि में तंत्र-शक्ति के साधक अपनी साधना द्वारा शक्ति को
प्रबल करने के प्रयास में लगे रहते हैं । सघन प्रांत से दूर सन्नाटे में सियार,
उल्लुओं और झींगुरों की डरावनी आवाजों के बीच, निर्जन श्मशान घाटों पर जलती
अग्नि-कुण्डों से प्रतिबिंबित शक्ति-साधकों की भयावह रक्तिम बड़ी-बड़ी आँखें और उनके
गंभीर चेहरे, शरद को भी भय से प्रकंपित कर देते हैं ।
शरद ऋतु मूलतः पर्व-त्योहारों की ऋतु है, जो अपने पूर्वजों
के आशीर्वाद प्राप्ति हेतु आयोजित पितृपक्ष-पर्व से आरंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा
अथवा देव-दीपावली में पवित्र सरोवर में स्नान करने तक पहुँचते-पहुँचते अपनी
पूर्णता को प्राप्त करती हैं । लोगों में आध्यात्म के प्रति उत्साह और उसकी
अभिव्यक्ति भी इस ऋतु में चरम पर पहुँच जाती है । लगता है, जैसे प्रतिदिन कोई न कोई देवी-देवता धरती पर अवतरित हो रहे
होते हैं और मनुष्य नृत्य, गान तथा विविध भाव-भंगिमाओं से
उनका स्वागत-अभिनंदन कर रहे होते हैं । भव्य नवरात्रि, दुर्गापूजा,
लखी-पूजा, दीपावली, कोजागरी, छठ आदि बड़े पर्व-उत्सव, शरद ऋतु की सौन्दर्य-गरिमाएँ हैं । देवी-देवता भी
अपने श्रेष्ठ आशीर्वाद से लोगों को सुख-समृद्धि, ऊर्जावान और सशक्त बनाते हैं ।
अपने घरों से दूर चले गए काम-काजी कारीगर लोग भी घर लौटकर अपने परिजन के साथ
पर्व-उत्सव में शामिल होकर उसकी शोभा को अभिवृद्धि करते हैं ।
शरद ऋतु के सभी दिन और रात, मानवीय खुशियों से परिपूर्ण
अपने आप में उत्सव-दिवस बन जाते हैं । ऐसे वैविध्य सौन्दर्यपूर्ण मधुर शारदीय
वातावरण में सहृदय साहित्यिक व्यक्तित्व में अनगिनत कविता, छंद और लेख अकुलाने और बढ़ने लगते हैं, तो
दूसरी ओर संगीत-साधकों के कंठ और वाद्य-यंत्रों से अनगिनत ताल-छंद, राग-रागिनियाँ
के स्वर फूट पड़ते हैं । शरद ऋतु में विभिन्न स्थानों पर आयोजित विभिन्न
सांस्कृतिक उत्सव इसके प्रबल दृष्टांत हुआ करते हैं ।
बंगाल की शस्य-श्यामला धरती सदियों से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत सुखी-समृद्ध रही
है । यहाँ शरद ऋतु का आगमन मात्र मौसम-परिवर्तन नहीं, बल्कि
एक संपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव के प्राकट्य स्वरूप का संकेत हुआ करता
है । स्फटिक-से नील आकाश में जलरहित तैरते श्वेत मेघ, धरती
पर यत्र-तत्र लहराते श्वेत कास के फूल और शिउली या हरसिंगार अथवा पारिजात के
श्वेत-केसरिया पुष्पों का मादक सुगंध, बंगाली जनमानस में
देवी दुर्गा के आगमन की पूर्व-सूचना बनकर आती है ।
बंगाली लोकमानस में एक सुंदर लोकभाव प्रचलित है कि जिस दिन
प्रातः बेला में शिउली या हरसिंगार के छोटे-छोटे श्वेत-केसरिया पुष्प आँगन में
बिछे दिखाई देने लगें, समझ लेना चाहिए कि घर में माँ दुर्गा देवी
अपनी संतानों सहित पधार चुकी हैं । अतः बंगाल में शरद को ‘आगमनी
काल’ भी कहा जाता है, अर्थात वह पावन समय, जब देवी दुर्गा
अपने मायके, अर्थात धरती पर, अपने
पुत्र-पुत्रियों सहित पधारती हैं । उन्हीं के अभिनंदन में शरद ऋतु घर-आँगन और
बाग-बगीचों में सुगंधित शिउली के पुष्पों को बिखेर देती है । वह दिन बड़ा ही
हर्ष-उल्लास का होता है । यह बड़ा ही मर्मस्पर्शी और मनोहारी प्राकृतिक दृष्टांत है
।
शरद ऋतु के ऐसे मनोहारी भाव को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, जीवनानंद दास, बिमलचंद्र घोष, कुमुदरंजन मल्लिक आदि कवियों ने अपनी काव्य-रचनाओं में अमरत्व प्रदान किया
है । उनकी रचनाओं में शरद ऋतु का सौन्दर्य, मानो माँ दुर्गा देवी के आगमन के
उल्लास में प्रकृति का ही पूर्ण सुसज्जित सौन्दर्य है । महालया के पावन प्रभात में
जब बीरेंद्र कृष्ण भद्र की दिव्य और सर्वपरिचित आवाज में चतुर्दिक वातावरण में ‘चंडीपाठ’
की पावन ध्वनि गूँजती है —
“या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नमः॥”
तो सम्पूर्ण बंगाल प्रांत ही माँ दुर्गा देवी के उनकी
संतानों सहित आगमन के अभिनंदन हेतु एक साथ जाग उठता है । यह पवित्र क्षण शरद ऋतु
और आध्यात्म के अद्वितीय संगम का प्रतीक बन जाता है । फिर तो पूजा-पंडालों में
ढाकियों की थाप, उलू-ध्वनि, धुनुची-नृत्य की गूँज आदि सब
मिलकर बंगाल प्रांत में शरद को केवल एक ऋतुमात्र नहीं रहने देते हैं, बल्कि उसे एक
जीवंत उत्सव का पर्याय मान लिया जाता है ।
शरद का स्वच्छ नील गगन, समशीतोष्ण-सा
सुहावन वातावरण, अमृतवर्षिणी चाँदनी और कमल-कुमुदिनियों से
भरे ताल-तलैया, भला ये सब फिर कब एक साथ मिलेंगे ? रात्रि के
स्वच्छ आकाश में मुक्त विचरण करता रजतवर्णी धवल चंद्र, उसकी
दूधिया चंद्रप्रभा और चतुर्दिक फैला सुगंधित वातावरण, ये सभी मधुर शीतल शरद के ही
विविध मनोभावन अंग हैं । प्रकृति का यह शारदीय नैसर्गिक सौन्दर्य मानव सहित समस्त
प्राणी-जगत के मन में प्रेम और आनन्द के अनगिनत मधुर स्रोतों का संचार करता है ।
सुहावना मौसम, गुलाबी
मधुर ठंड, बड़े-बड़े त्योहार और धान जैसी खरीफ फसलों की
कटाई, इन सबका सम्मिलित स्वरूप ही इस शरद ऋतु को स्वास्थ्य, सुसंस्कृति,
आध्यात्म और कृषि, इन चारों दृष्टियों से लोगों के लिए अत्यंत ही
महत्वपूर्ण और आकर्षक बना देता है । मानव जीवन और साहित्य के दृष्टिकोण से भी
देखें, तो शरद ऋतु का अर्थ ही, प्रकृति के संतुलन, परिपक्वता
और उल्लास है । वर्षा की उद्दामता पीछे छूट चुकी होती है और शिशिर की कठोरता अभी
कुछ दूर ही है । प्रकृति इस मध्यवर्ती क्षण में अपने सबसे संयत और मनोहारी रूप में
हमारे सम्मुख आ खड़ी है । वह न तो कुछ माँगती है, न किसी पर
अपना वैभव थोपती है । वह बस आती है, तो वह कास के श्वेत परिधान में, धान की स्वर्णाभ लहरों के साथ, शिउली की सुगंध लेकर,
निर्मल नील आकाश के नीचे और चाँदनी रात्रि में दूधिया चादर को ओढ़े
हुए ।
वह आती है, तो धरती नववधू-सी सज उठती है, खेत मुस्कुराने लगते हैं, ताल-तलैया
स्वच्छ दर्पण बन जाते हैं, रातें स्वप्निल हो जाती हैं,
त्योहारों के दीप जल उठते हैं और मनुष्य के अन्तः में भी न जाने
कितने अनाम उल्लास जाग पड़ते हैं । तभी तो लगता है कि शरद केवल एक ऋतुमात्र ही
नहीं, बल्कि प्रकृति की स्वयं सुसज्जित, संयत और परिपक्व नायिका है ।
कुछ दिन पहले पूर्व दिशा के आकाश में जिस गुलाबी-पीताभ
रेशमी परिधान में लिपटी, वह काल्पनिक अप्सरा मुझे धरती की ओर उतरती दिखाई दी थी, आज लगता है, वह कल्पना मात्र न थी,
बल्कि वह तो सचमुच सर्वसुन्दरी नववधू-सी ‘शरद नायिका’ हम सब के सामने आ पहुँची है,
अभी भी वह आँखों के सामने है । उसकी उपस्थिति को हम महसूस भी कर रहे हैं -
‘लो, आ गई यह नववधू-सी शोभती — शरद नायिका !’
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक
24, बन बिहारी बोस रोड
हावड़ा – 711101