बुधवार, 30 सितंबर 2026

सितंबर 2026, अंक 75

 

शब्द-सृष्टि

सितंबर 2026, अंक 75


संपादकीय – चलते-चलते पचहत्तर तक....... – डॉ. पूर्वा शर्मा

अभिमत – ‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला आशीर्वाद – डॉ. स्मिता मिश्र

दिन कुछ ख़ास है!

आलेख – शिक्षक गुरु से गूगल तक : अपरिहार्य है शिक्षक – डॉ. घनश्याम बादल

आलेख – हिन्दी मेरी हिन्दी………हिन्दी से हिंदी तक : नुक्तों और बिंदी तक – सुरेश चौधरी

कविता – जय गणेश(मल्लिका छंद) – डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

आलेख – राधाष्टमी – सुरेश चौधरी

कहानी – बदनाम बेटी ! – डॉ. घनश्याम बादल

काव्य

1. वन्दे मातरम् 2. हिन्दी भाषा 3. हिन्दी महीने (कुण्डलियाँ)– लोक कवि कर्मवीर सिंह

1. बादल डाल गया 2. सावन आना तुम 3. सावन आया है 4. साध अवनि की – शिवमोहन सिंह

आधुनिक हिंदी : देश का भविष्य – डॉ. रक्षा मेहता

मैं किसान हूँ – डॉ. नरेश सिहाग

ग़ज़ल – दुष्यंत कुमार

आलेख

राष्ट्रभाषा के प्रश्न से जूझती हिंदी – इन्द्र कुमार दीक्षित

लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती - शरद नायिका – श्रीराम पुकार शर्मा

विशेष – शरीर नहीं, दृष्टि हैं कृष्ण! – डॉ. घनश्याम बादल

पुस्तक समीक्षा – क्रांतिकारी डॉ.भगवान दास माहौर (शिवजी श्रीवास्तव) – कुमार कार्तिकेय


पुस्तक समीक्षा

क्रांतिकारी डॉ.भगवान दास माहौर (शिवजी श्रीवास्तव)

कुमार कार्तिकेय

शहादत और विद्वत्ता के दुर्लभ संयोग की गाथा है –  क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर

डॉ. शिवजी श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे नायक के जीवन और संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। ​यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस कालखंड का आइना है जब देश की युवा पीढ़ी ‘क्रांति’ और ‘आजादी’ के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर थी।

लेखक ने डॉ. भगवान दास माहौर की जीवन-यात्रा को अत्यंत जीवंत, भावपूर्ण और ऐतिहासिक सटीकता के साथ प्रस्तुत किया है जहाँ न केवल उनके अदम्य साहस और प्रतिबद्धता को दिखाया गया है, बल्कि उस दौर की राजनीति, क्रांतिकारी भावना और आत्म-त्याग की भावना भी पाठक तक प्रभावित ढंग से पहुँचती है। सम्पूर्ण पुस्तक को निम्नांकित शीर्षकों में देखा जा सकता है -

1. नायक का व्यक्तित्व और संघर्ष-

पुस्तक के मुख्य पात्र डॉ. भगवान दास माहौर एक बहुआयामी व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने किशोरावस्था में ही क्रांतिकारी अभियान से जुड़ने का निर्णय लिया और ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ के अनुशासित सैनिक बने। चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी के विश्वस्त सहयोगी के रूप में उन्होंने कठोर-सघन संघर्ष का अनुभव किया। शिवजी श्रीवास्तव ने उनकी ‘भुसावल बम कांड’ से लेकर ‘अंडमान की सेलुलर जेल’ तक की कठोर यात्रा को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित किया है।

2. कलम और पिस्तौल का संगम-

            इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह डॉ. माहौर के बौद्धिक पक्ष को उजागर करती है। वर्षों तक फरारी जीवन, क्रांतिकारी योजनाओं में भागीदारी और  जेल यात्रा और फिर रोके गये शिक्षा को बाद में जारी रखते हुए पीएच.डी. तथा शोध-कार्य से उच्च-शैक्षणिक उपाधियाँ भी अर्जित कीं। जेल से छूटने के बाद उन्होंने जिस तरह से साहित्य और शोध के क्षेत्र में कार्य किया, वह प्रेरणादायक है। लेखक ने यह बखूबी दिखाया है कि कैसे एक हाथ में पिस्तौल थामने वाला क्रांतिकारी, दूसरे हाथ में कलम पकड़कर समाज को नई दिशा दे सकता है।

3. लेखन शैली और शोध-

        शिवजी श्रीवास्तव जी की भाषा सरल लेकिन प्रभावशाली है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ कोई समझौता नहीं किया है। पुस्तक को पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे पाठक स्वयं उस दौर की गुप्त बैठकों और जेल की कालकोठरियों का हिस्सा बन गया हो। लेखक का शोध सराहनीय है, क्योंकि उन्होंने उन छोटी-छोटी घटनाओं को भी संजोया है जो डॉ. माहौर के चरित्र निर्माण में सहायक रहीं।

पुस्तक में इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं रह जाता, बल्कि उन तथ्यों में मानवता, प्रेम, साहस और स्वाधीनता की चाह का गहरा रंग भर देता है। यह शैली खासकर युवा पाठकों को प्रेरित करने  वाली है कि वे उन वीरों के बलिदानों को समझे, आत्मसात करें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें और आज़ादी की भावना को नई ऊर्जा दें।

4. किसके लिए है यह पुस्तक?

​         “क्रांतिकारी डॉ. भगवान दास माहौर” उन पाठकों के लिए अनिवार्य है जो भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की गहराई को समझना चाहते हैं, अनछुई कहानियों को जानना चाहते हैं और जो प्रेरणादायी जीवन-कथाओं से सीखना चाहते हैं। शिवजी श्रीवास्तव जी ने इस पुस्तक के माध्यम से एक भूले-बिसरे नायक को वह सम्मान दिलाने का सफल प्रयास किया है, जिसके वे पात्र थे। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि आजादी केवल अहिंसक आंदोलनों से नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम क्रांतिकारियों के रक्त और बौद्धिक विमर्श से भी उपजी है। यह पुस्तक इतिहास के उन वीरों को सम्मान देने वाली एक सशक्त रचना है, जिसे हर स्वतन्त्रता-प्रेमी पाठक को पढ़ना चाहिए।


       एक पंक्ति में: यह पुस्तक “शहादत और विद्वत्ता” के दुर्लभ संयोग की गाथा है।

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समीक्षक - कुमार कार्तिकेय, लेखक -  शिवजी श्रीवास्तव,  पृष्ठ - 142, मूल्य -  210 रुपये, संस्करण - प्रथम 2025, प्रकाशक- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत,  नई दिल्ली -110070

 


कुमार कार्तिकेय

नोएडा उ. प्र.


विशेष


 

शरीर नहीं, दृष्टि हैं कृष्ण!

डॉ. घनश्याम बादल

जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं, उस चेतना के प्रकट होने का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, मोह से विवेक की ओर और स्वार्थ से सत्य की ओर ले जाती है। कृष्ण का कारागार में  जन्म भी गहरा प्रतीक है। जब मनुष्य का विवेक भय, मोह, लोभ, अहंकार और स्वार्थ की बेड़ियों में कैद हो जाता है, तब उसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म आवश्यक हो जाता है।

   कृष्ण को केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व, राजा, कूटनीतिज्ञ या देवता के रूप में देखना उनके विराट स्वरूप की अवहेलना होगी। कृष्ण उस परम चेतना के प्रतीक हैं, जो जीवन के प्रत्येक द्वंद्व में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। इस दृष्टि से महाभारत केवल कौरवों और पांडवों का युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म, विवेक और अविवेक तथा सत्य और मोह के संघर्ष का भी विराट आख्यान है।

महाभारत को यदि संसार का दर्पण माना जाए तो उसमें दिखाई देने वाला कुरुक्षेत्र वस्तुतः हमारा अपना जीवन है। धृतराष्ट्र का अंधत्व केवल आंखों का अंधत्व नहीं, पुत्रमोह और सत्ता-मोह का प्रतीक है। दुर्योधन अहंकार और अधिकार की अंधी भूख का प्रतिनिधि है। शकुनि छल और षड्यंत्र की प्रवृत्ति का प्रतीक है।

अर्जुन क्या है?अर्जुन स्वयं संसार है। वह सामर्थ्यवान, लेकिन संशयग्रस्त है। उसके पास शस्त्र हैं, परंतु निर्णय का साहस नहीं। वह कर्तव्य जानता है, लेकिन मोह उसे रोक देता है। अपने ही संबंधों, भावनाओं और आशंकाओं के बीच खड़ा अर्जुन उस सामान्य मनुष्य का प्रतीक है जो जीवन के कठिन मोड़ पर पूछता है—क्या करूं? किसे सही मानूं? मेरा धर्म क्या है? तब उसके सामने कृष्ण खड़े होते हैं।

कृष्ण सारथी अर्थात मार्ग दिखाने वाले हैं। वे अर्जुन का जीवन अपने हाथ में नहीं लेते, बल्कि उसे दिशा देते हैं। यही कृष्ण का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है—परमात्मा मनुष्य की यात्रा अपने हाथ में नहीं लेता, वह उसे सही दिशा में चलने का विवेक देता है।

कुरुक्षेत्र में कृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार अस्त्र चलाना नहीं, बल्कि अर्जुन के भीतर सोए  विवेक को जगाना है। अर्जुन युद्धभूमि से भागना चाहता है। कृष्ण उसे युद्ध के लिए उकसाते  नहीं, बल्कि कर्म, आत्मा, कर्तव्य, मोह, ज्ञान और निष्कामता का अर्थ समझाते हैं। गीता इसी संवाद का नाम है। इसलिए गीता को केवल युद्ध का उपदेश मानना उसके संदेश को छोटा कर देना होगा। गीता वास्तव में मनुष्य के भीतर के अंधकार से संवाद है।

   कृष्ण आत्मा की अमरता का बोध कराते हैं। वे कर्म का महत्व बताते हैं, लेकिन कर्मफल के मोह से मुक्त होने की प्रेरणा भी देते हैं। वे ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं, भक्ति का मार्ग बताते हैं और अंततः मनुष्य को अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं। इसीलिए गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं थी। अर्जुन के माध्यम से कृष्ण संसार की आत्मा को जगा रहे थे।

महाभारत भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। वह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि सांसारिक विकारों के चरम परिणाम का प्रतीक है।जहां लोभ है, वहां संघर्ष है।जहां अहंकार है, वहां विनाश है। जहां मोह विवेक पर भारी पड़ता है, वहां निर्णय भ्रष्ट होते हैं। जहां सत्ता धर्म से बड़ी हो जाती है, वहां कुरुक्षेत्र जन्म लेता है।

  महाभारत इसलिए हुआ क्योंकि मनुष्य के भीतर के विकार सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर हावी हो गए थे। द्यूत, छल, अपमान, अधिकार की लालसा, प्रतिशोध और सत्ता की भूख ने ऐसे संघर्ष को जन्म दिया जिसमें अंततः पूरा समाज दहक उठा।

आज प्रश्न यह नहीं है कि कुरुक्षेत्र कहां था। प्रश्न यह है कि हमारा कुरुक्षेत्र कहां है?आज भी मनुष्य के सामने वही अर्जुन-सदृश प्रश्न खड़े हैं। परिवार में संबंध और स्वार्थ का संघर्ष है। राजनीति में सत्ता और सेवा का संघर्ष है। व्यापार में लाभ और नैतिकता का संघर्ष है। डिजिटल संसार में सूचना और भ्रम का संघर्ष है। मनुष्य के भीतर सुख की आकांक्षा और मानसिक अशांति का संघर्ष है। ऐसे में कृष्ण की आवश्यकता पहले से अधिक है।कृष्ण को बाहर खोजने से पहले भीतर खोजने की आवश्यकता है।

   कृष्ण हमारे भीतर का वह विवेक हैं, जो गलत से हमें रोकता है। वे वह अंतरात्मा हैं, जो अकेले में भी सही और गलत का अंतर बताती है। वे वह चेतना हैं, जो सफलता मिलने पर अहंकार से बचाती है और असफलता मिलने पर निराशा से।    

   कृष्ण की बांसुरी भी एक सुंदर प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है, तभी उसमें से संगीत निकलता है। मनुष्य भी जब अहंकार, स्वार्थ और विकारों से स्वयं को खाली करता है, तभी उसके भीतर परम चेतना का संगीत सुनाई देने लगता है।

आज के युग में कृष्ण इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि हमारी समस्याएं आधुनिक हो गई हैं, लेकिन मनुष्य के विकार पुराने ही हैं।

आज कुरुक्षेत्र में रथों की जगह मशीनें हैं, शस्त्रों की जगह तकनीक है और द्यूत की जगह डिजिटल संसार के अनेक आकर्षण हैं; लेकिन लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ आज भी मनुष्य को उसी तरह संचालित करते हैं इसलिए आज की गीता पूछती है—क्या हमारे पास अर्जुन जैसी जिज्ञासा है और कृष्ण की बात सुनने जैसा धैर्य?

कृष्ण हमें संसार छोड़ने का संदेश नहीं देते। वे संसार में रहते हुए सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वे कर्म से पलायन नहीं, कर्म की शुद्धता चाहते हैं। वे संबंधों से विमुख होने को नहीं कहते, बल्कि मोह और कर्तव्य के बीच अंतर समझाते हैं।

जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपने भीतर उस कृष्ण का जन्म कराएं, जो हमारे निर्णयों का सारथी बने। जब अहंकार हमें दूसरों से बड़ा समझाने लगे और अंतरात्मा विनम्रता की ओर ले जाए—यही कृष्ण हैं। जब निराशा हमें कर्म से विमुख करे और भीतर से कोई शक्ति कहे कि अपना कर्तव्य करते रहो—यही कृष्ण हैं।

    कृष्ण केवल मथुरा में जन्म लेने वाली देह मात्र नहीं एक चेतना हैं, दृष्टि हैं,विवेक हैं, आत्मा की वह आवाज हैं जो मनुष्य को उसके श्रेष्ठतम ओर ले जाती है। हर उस मन में, जहां अंधकार है, कृष्ण का जन्म आवश्यक है। हर उस जीवन में, जहां मोह है, कृष्ण की आवश्यकता है। हर उस समाज में, जहां अन्याय है, कृष्ण-चेतना आवश्यक है। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होगा, जब हमारे भीतर का अर्जुन जागेगा, मोह से ऊपर उठेगा और अपनी आत्मा की आवाज सुनकर सात्विक कर्म के मार्ग पर चल पड़ेगा।


डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667

आलेख

 



लो आ गई यह नव वधू-सी शोभती - शरद नायिका

श्रीराम पुकार शर्मा

कुछ दिन पूर्व की बात है । एक हरे-भरे कृत्रिम उद्यान में सबेरे-सबेरे मित्रों और पक्षियों के मधुर कलरव तथा गुलाबी-शीतल वायु-प्रवाह के साथ ही प्रातः भ्रमण कर रहा था । पूर्व दिशा के गुलाबी और स्वर्णाभ गगन-मंडल में विभिन्न आकृतियों वाले अनगिनत रंगीन मेघ-खण्डों का मनोभावन इंद्रजाल सजा हुआ था । उन्हीं में से एक कुछ लंबा और खण्डित मेघ सुंदर गुलाबी-पीताभ रेशमी साड़ी के रूप में लहराता दिखाई दिया । मैंने अपनी कल्पना-शक्ति को कुछ जागृतकर उस मेघ-खण्ड पर अपनी कल्पित छवि को आरोपित कर दिया । अब तो ऐसा प्रतीत हुआ, मानो कि उस आकाशीय गुलाबी-पीताभ रेशमी परिधान में लिपटी हुई कोई अप्सरा भी है, जो धीरे-धीरे धरती पर उतर रही हो । उस झिलमिलाती काल्पनिक अप्सरा की ओर संकेत करते हुए, अपने कुछ मित्रों को सहज ही मैंने कहा, — “देखो भाई ! लो आ गई यह नववधू-सी शोभती, शरद नायिका !”

मेरे एक अध्यापक मित्र ने जैसे ही सुना, कुछ स्मरण या चिंतन करते हुए बोले, — “नहीं भाई साहब ! यह तो कालिदास की ‘आगता शरन्नववधूरिव रूपरम्या’ है ।”

महाकवि कालिदास ने अपने ‘ऋतुसंहारम्’ के तृतीय सर्ग के प्रथम श्लोक में शरद ऋतु का वर्णन लगभग इसी भावभूमि पर किया है । मुझे तो लगता है कि कास के सुंदर श्वेत पुष्पों से चित्रित परिधानों से आवृत शरद-नायिका का मुख-मंडल मसृण कमल-दलपत्रों से निर्मित है । उसके मस्त मराल-चाल के सम्मुख राजहंस भी लज्जित हो जा रहे हैं, जबकि उसके कोमल गौर पैरों की नूपुर-रुनझुन की ध्वनि में झींगुरों की सुमधुर सांगीतिक लयात्मक ध्वनि सम्मिलित प्रतीत हो रही है । पकी धान की नत बालियों की तरह उसकी लज्जाशील झुकी पलकें हैं और मंद-मंद लहराते हुए हरित-स्वर्णाभ फसल उसकी मंद-मंद लहराती सुन्दर काया है, जो किसी भी सहृदय पथिक के बढ़ते कदमों को कुछ क्षण के लिए रोक देने में पूर्ण समर्थ है ।

भारतीय काल-गणना में वर्ष को छह विभिन्न ऋतुओं में विभाजित किया गया है — वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर । इस सम्पूर्ण ऋतु-चक्र में शरद का स्थान शारीरिक स्वस्थता, भौगोलिक साम्यता, आध्यात्मिकता और सुख-संपन्नता के आधार पर अति महत्वपूर्ण है । आश्विन और कार्तिक, इन दो माहों में विस्तृत शरद ऋतु, मानो प्रकृति के जीवन-चक्र का वह चरण है, जिसमें अतुलित वर्षा से गहराई तक भीगी धरती को अपनी संचित जल से फल-फूल, धन-धान्य, सुख-संपदा और पर्व-त्योहारों से सजाकर, उसे स्वर्ग से भी सुंदर के बनाने में क्रियाशील रही है । यह वर्षा की अतिशयता और शिशिर के प्रबल शीत के मध्य स्थित अत्यंत ही संतुलित ऋतु-काल है, जिसमें प्रकृति न तो उद्दाम और न तो अत्यधिक जड़ ही है; अपितु यह पूर्ण परिपक्व, संयत, समृद्ध और सौंदर्य-स्वरूप को धारण कर सबके लिए बहुत प्रिय बनी हुई है ।

भारतीय साहित्य में वसंत और पावस ऋतु के बाद सबसे अधिक और सुंदर सरस रचनाएँ संभवतः शरद ऋतु से ही सम्बन्धित हैं । शायद ही ऐसा कोई प्राचीन कवि रहा हो, जिसने शरद के सौंदर्य से प्रभावित होकर उसके रूप-श्रृंगार को कलम-बद्ध न किया है । जब ग्रीष्म की प्रचण्ड अग्नि से झुलसी धरती, पावस की अतुलित जलराशि को प्राप्त कर संतृप्त हो जाती है, तब उसके चतुर्दिक अंग-अंग पर सौंदर्य, शांति, उल्लास और सृजन के नव-स्वरूप सजने लगते हैं । ऐसी नव पल्लवित, विकसित और पुष्पित धरती पर अति सुंदर नववधू सदृश मधुर  शरद ऋतु का आगमन होता है । सम्पूर्ण प्रकृति अपनी विविध स्वरूपों की दिव्य शोभा सहित उसका स्वागत करती है । शरद के दिव्य सौंदर्य और मधुर मुस्कान समस्त प्राणियों के मन को मोह लेते है । तभी तो भक्तकवि गोस्वामी तुलसीदास के प्रभु श्रीराम जी अपने अनुज लक्ष्मण से शरद को ‘परम सुहाई’ बताते हुए कहते हैं —

“बरषा बिगत सरद ऋतु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥”

शरद की सानिध्यता को प्राप्तकर खेतों में लहलहाती हरित फसलें पककर, अब चतुर्दिक स्वर्णाभ आभा बिखेरने लगी हैं । मंद-मंद शीतल बयार से उस सुविस्तृत हरित-स्वर्णाभ महोदधि में निर्बाध लहरें उठने लगी हैं । ऐसी ही प्रसन्नता और संतुष्टि की लहरें धरती-पुत्र किसानों में भी उठने लगी हैं । संपूर्ण धरती को अपने श्वेत रेशमी परिधान से ढँकने के लिए आतुर, जहाँ-तहाँ लहराते कास, कुश, सरकंडे और नरकट के धवल-धूसर ऊर्ध्वमुखी पुष्प परस्पर मिलकर पंक्तिबद्ध उड़ते श्वेत बगुलों की टोली प्रतीत हो रहे हैं । मानो वे दूर-दूर तक मधुर और समृद्ध शरद के आगमन की सूचना देने के लिए भागे चले जा रहे हों । उस अनंत हरित-स्वर्णाभ लहरों के बीच-बीच में घुमावदार अधपक्की पगडंडियाँ, लम्बे अजगर के समान पसरी हुई हैं, जो थोड़ी ही देर में रंग-बिरंगे परिधानों से सजे बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्री और पुरुषों से साज गई हैं । कहीं रक्ताभ, कहीं पीताभ और कहीं धवल कमल-कुमुदिनियों से भरे छोटे-बड़े निर्मल ताल-तलैया और जलकुंड हैं । उनके अथाह जल में नहाने उतरे, अपने छोटे-छोटे जलद-खण्डों के साथ स्फटिक-नील गगन को देखना, अपने आप में कम रोचक नहीं है ।

घर के आँगन से लेकर बगिया तक पालक, मेथी, चोराई साग और न जाने कितनी हरी सब्जियाँ अपनी-अपनी समृद्धि का परिचय दे रही हैं । चार-दीवारी पर लौकी और सेम, बीन आदि हरी-भरी फलियाँ, ऐसे पुष्ट गुच्छों में लटकी हुई हैं, मानो गृहस्वामी एक साथ ढेर सारी साग-सब्जियाँ लाकर जहाँ-तहाँ टाँग दिया हो, — ‘जितना चाहो खाओ और जितना चाहो बाँटो; कोई कमी की बात नहीं है ।’

धरती के ऐसे सुख-समृद्ध सौभाग्य को देखकर ऊपर के मेघरहित स्वच्छ नील गगन में विचरण करते सूर्यदेव भी अतिसंतुष्ट और प्रसन्न दिखाई देते हैं । धन-धान्य और सजी-धजी सुंदर काया से संपन्न लक्ष्मी-स्वरूपा धरती के पावन चरणों का अभिनंदन करते हुए सूर्यदेव अस्ताचल की ओर जल्दी-जल्दी बढ़ते चले जाते हैं, ताकि जल्दी ही पूर्व दिशा से पुनः उदित होकर धरती के नयनाभिराम स्वरूपों का पुनरावलोकन कर सके ।

फिर शरद की रात्रि की, तो किसी अन्य से तुलना ही नहीं की जा सकती है । प्रतीत होता है, मानो देवलोक अपने सारे ऐश्वर्य और संपदा के साथ धरती पर उतर आया हो । निर्मल रातों में अंतरिक्ष की अनंत दूरी पर टिमटिमाते तारें कुछ और निकट आकर हँसते-मुसकुराते है और इशारों-इशारों में कोई न कोई प्रेम-कथा सुनाने को उत्सुक प्रतीत होते हैं । फिर शरद की पूर्णिमा की दिव्य रात्रि ! उसका तो महत्व ही कुछ और होता है । आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक सब दृष्टि से उसे सर्वाधिक दिव्य, मनोहारी और रहस्यमयी रात्रियों में प्रमुख माना जाता है ।

रजत-चंद्र गोलक से अमृतवर्षी मधुर और शांत चाँदनी, मौन आँगन में बेहिचक प्रवेश कर कोना-कोना झाँकती रहती है । कभी-कभी तो वह किसी निर्लज्ज के समान खुली खिड़कियों से कमरों में भी प्रवेश कर जाती है और मनभर उसी में रहती है । अबोध बच्चों को पाते ही वह मंद-मंद मीठी लोरी गाती हुई, उनको नींद में सुलाने का उपक्रम भी करती है । घर-आँगन, गाँव-नगर, नदी-नाले, पहाड़-पठार, मैदान-जंगल आदि सब के सब उसकी दूधिया रोशनी में नहा उठते हैं । हिम-श्वेत चादर में लिपटे हुए सभी प्राकृतिक उपादान अपने अद्भुत सौंदर्य से, मानो देव-अप्सराओं को भी पराजित करने पर तुले प्रतीत होते हैं । उदित चंद्रमा के कदम से कदम मिलाते हुए, रातरानी या हरसिंगार भी अपनी मधुर सुगंध को क्रमशः चरम तक पहुँचा देती है । फिर तो भोर तक सारा वातावरण उसकी खुशबू से मदहोश हो जाया करता है ।

शरद पूर्णिमा की सुरभित और धवल उज्ज्वल रजनी, किसी अमरकानन-सी प्रतीत होती है । पौराणिक मान्यता है कि इसी पावन पूर्णचंद्र रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण, गोपियों के साथ वृंदावन की रासस्थली में ‘महारास’ रचाए थे । चंद्रमा भी अपनी सोलह कलाओं के साथ वहाँ उपस्थित रहकर उस दिव्य रासलीला का साक्षी बना था । इसी कारण इसे ‘रास पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है । आज भी अनेक स्थानों तथा श्रीकृष्ण से संबंधित मंदिरों में इस विशेष पूर्णिमा की रात्रि में रासलीला का आयोजन किया जाता है ।

शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि से जुड़ी एक और अत्यंत लोकप्रचलित मान्यता है । विश्वास किया जाता है कि इस धवल मधुर रात्रि में चंद्रमा की किरणों में अद्भुत अमृत-शक्ति विद्यमान रहती है । इसी विश्वास के चलते गृहिणियाँ खीर बनाकर अपने घर की खुली छत या आँगन में उसे रात्रिभर चाँदनी के नीचे रख देती हैं । मान्यता है कि प्रातःकाल तक चंद्र-किरणों के अद्भुत सम्पर्क से वह खीर अमृतमय हो जाती है । सुबह इस “चंद्र-अमृत” को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा, आज भी अनेक घरों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है ।

इसके विपरीत शरद ऋतु की अमावस्या की घोर अंधियारी रात्रि में अपने प्रिय चंद्रमा के अभाव में, न केवल रातरानी, बल्कि संपूर्ण प्रकृति ही मानो निराश, निस्तेज और सौंदर्यविहीन होकर उस गंभीर अंधकार की प्रबल आगोश में मौन दबी सिसकती रहती है । ऐसी घोर और गंभीर काली रात्रि में तंत्र-शक्ति के साधक अपनी साधना द्वारा शक्ति को प्रबल करने के प्रयास में लगे रहते हैं । सघन प्रांत से दूर सन्नाटे में सियार, उल्लुओं और झींगुरों की डरावनी आवाजों के बीच, निर्जन श्मशान घाटों पर जलती अग्नि-कुण्डों से प्रतिबिंबित शक्ति-साधकों की भयावह रक्तिम बड़ी-बड़ी आँखें और उनके गंभीर चेहरे, शरद को भी भय से प्रकंपित कर देते हैं ।

शरद ऋतु मूलतः पर्व-त्योहारों की ऋतु है, जो अपने पूर्वजों के आशीर्वाद प्राप्ति हेतु आयोजित पितृपक्ष-पर्व से आरंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा अथवा देव-दीपावली में पवित्र सरोवर में स्नान करने तक पहुँचते-पहुँचते अपनी पूर्णता को प्राप्त करती हैं । लोगों में आध्यात्म के प्रति उत्साह और उसकी अभिव्यक्ति भी इस ऋतु में चरम पर पहुँच जाती है । लगता है, जैसे प्रतिदिन कोई न कोई देवी-देवता धरती पर अवतरित हो रहे होते हैं और मनुष्य नृत्य, गान तथा विविध भाव-भंगिमाओं से उनका स्वागत-अभिनंदन कर रहे होते हैं । भव्य नवरात्रि, दुर्गापूजा, लखी-पूजा, दीपावली, कोजागरी, छठ आदि बड़े पर्व-उत्सव, शरद ऋतु की सौन्दर्य-गरिमाएँ हैं । देवी-देवता भी अपने श्रेष्ठ आशीर्वाद से लोगों को सुख-समृद्धि, ऊर्जावान और सशक्त बनाते हैं । अपने घरों से दूर चले गए काम-काजी कारीगर लोग भी घर लौटकर अपने परिजन के साथ पर्व-उत्सव में शामिल होकर उसकी शोभा को अभिवृद्धि करते हैं ।

शरद ऋतु के सभी दिन और रात, मानवीय खुशियों से परिपूर्ण अपने आप में उत्सव-दिवस बन जाते हैं । ऐसे वैविध्य सौन्दर्यपूर्ण मधुर शारदीय वातावरण में सहृदय साहित्यिक व्यक्तित्व में अनगिनत कविता, छंद और लेख अकुलाने और बढ़ने लगते हैं, तो दूसरी ओर संगीत-साधकों के कंठ और वाद्य-यंत्रों से अनगिनत ताल-छंद, राग-रागिनियाँ के स्वर फूट पड़ते हैं । शरद ऋतु में विभिन्न स्थानों पर आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक उत्सव इसके प्रबल दृष्टांत हुआ करते हैं ।

बंगाल की शस्य-श्यामला धरती सदियों से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत सुखी-समृद्ध रही है । यहाँ शरद ऋतु का आगमन मात्र मौसम-परिवर्तन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव के प्राकट्य स्वरूप का संकेत हुआ करता है । स्फटिक-से नील आकाश में जलरहित तैरते श्वेत मेघ, धरती पर यत्र-तत्र लहराते श्वेत कास के फूल और शिउली या हरसिंगार अथवा पारिजात के श्वेत-केसरिया पुष्पों का मादक सुगंध, बंगाली जनमानस में देवी दुर्गा के आगमन की पूर्व-सूचना बनकर आती है ।

बंगाली लोकमानस में एक सुंदर लोकभाव प्रचलित है कि जिस दिन प्रातः बेला में शिउली या हरसिंगार के छोटे-छोटे श्वेत-केसरिया पुष्प आँगन में बिछे दिखाई देने लगें, समझ लेना चाहिए कि घर में माँ दुर्गा देवी अपनी संतानों सहित पधार चुकी हैं । अतः बंगाल में शरद को ‘आगमनी काल’ भी कहा जाता है, अर्थात वह पावन समय, जब देवी दुर्गा अपने मायके, अर्थात धरती पर, अपने पुत्र-पुत्रियों सहित पधारती हैं । उन्हीं के अभिनंदन में शरद ऋतु घर-आँगन और बाग-बगीचों में सुगंधित शिउली के पुष्पों को बिखेर देती है । वह दिन बड़ा ही हर्ष-उल्लास का होता है । यह बड़ा ही मर्मस्पर्शी और मनोहारी प्राकृतिक दृष्टांत है ।

शरद ऋतु के ऐसे मनोहारी भाव को गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, जीवनानंद दास, बिमलचंद्र घोष, कुमुदरंजन मल्लिक आदि कवियों ने अपनी काव्य-रचनाओं में अमरत्व प्रदान किया है । उनकी रचनाओं में शरद ऋतु का सौन्दर्य, मानो माँ दुर्गा देवी के आगमन के उल्लास में प्रकृति का ही पूर्ण सुसज्जित सौन्दर्य है । महालया के पावन प्रभात में जब बीरेंद्र कृष्ण भद्र की दिव्य और सर्वपरिचित आवाज में चतुर्दिक वातावरण में ‘चंडीपाठ’ की पावन ध्वनि गूँजती है —

“या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”

तो सम्पूर्ण बंगाल प्रांत ही माँ दुर्गा देवी के उनकी संतानों सहित आगमन के अभिनंदन हेतु एक साथ जाग उठता है । यह पवित्र क्षण शरद ऋतु और आध्यात्म के अद्वितीय संगम का प्रतीक बन जाता है । फिर तो पूजा-पंडालों में ढाकियों की थाप, उलू-ध्वनि, धुनुची-नृत्य की गूँज आदि सब मिलकर बंगाल प्रांत में शरद को केवल एक ऋतुमात्र नहीं रहने देते हैं, बल्कि उसे एक जीवंत उत्सव का पर्याय मान लिया जाता है ।

शरद का स्वच्छ नील गगन, समशीतोष्ण-सा सुहावन वातावरण, अमृतवर्षिणी चाँदनी और कमल-कुमुदिनियों से भरे ताल-तलैया, भला ये सब फिर कब एक साथ मिलेंगे ? रात्रि के स्वच्छ आकाश में मुक्त विचरण करता रजतवर्णी धवल चंद्र, उसकी दूधिया चंद्रप्रभा और चतुर्दिक फैला सुगंधित वातावरण, ये सभी मधुर शीतल शरद के ही विविध मनोभावन अंग हैं । प्रकृति का यह शारदीय नैसर्गिक सौन्दर्य मानव सहित समस्त प्राणी-जगत के मन में प्रेम और आनन्द के अनगिनत मधुर स्रोतों का संचार करता है ।

सुहावना मौसम, गुलाबी मधुर ठंड, बड़े-बड़े त्योहार और धान जैसी खरीफ फसलों की कटाई, इन सबका सम्मिलित स्वरूप ही इस शरद ऋतु को स्वास्थ्य, सुसंस्कृति, आध्यात्म और कृषि, इन चारों दृष्टियों से लोगों के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण और आकर्षक बना देता है । मानव जीवन और साहित्य के दृष्टिकोण से भी देखें, तो शरद ऋतु का अर्थ ही, प्रकृति के संतुलन, परिपक्वता और उल्लास है । वर्षा की उद्दामता पीछे छूट चुकी होती है और शिशिर की कठोरता अभी कुछ दूर ही है । प्रकृति इस मध्यवर्ती क्षण में अपने सबसे संयत और मनोहारी रूप में हमारे सम्मुख आ खड़ी है । वह न तो कुछ माँगती है, न किसी पर अपना वैभव थोपती है । वह बस आती है, तो वह कास के श्वेत परिधान में, धान की स्वर्णाभ लहरों के साथ, शिउली की सुगंध लेकर, निर्मल नील आकाश के नीचे और चाँदनी रात्रि में दूधिया चादर को ओढ़े हुए ।

वह आती है, तो धरती नववधू-सी सज उठती है, खेत मुस्कुराने लगते हैं, ताल-तलैया स्वच्छ दर्पण बन जाते हैं, रातें स्वप्निल हो जाती हैं, त्योहारों के दीप जल उठते हैं और मनुष्य के अन्तः में भी न जाने कितने अनाम उल्लास जाग पड़ते हैं । तभी तो लगता है कि शरद केवल एक ऋतुमात्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति की स्वयं सुसज्जित, संयत और परिपक्व नायिका है ।

कुछ दिन पहले पूर्व दिशा के आकाश में जिस गुलाबी-पीताभ रेशमी परिधान में लिपटी, वह काल्पनिक अप्सरा मुझे धरती की ओर उतरती दिखाई दी थी, आज लगता है, वह कल्पना मात्र न थी, बल्कि वह तो सचमुच सर्वसुन्दरी नववधू-सी ‘शरद नायिका’ हम सब के सामने आ पहुँची है, अभी भी वह आँखों के सामने है । उसकी उपस्थिति को हम महसूस भी कर रहे हैं -

‘लो, आ गई यह नववधू-सी शोभती — शरद नायिका !’

 

श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक

24, बन बिहारी बोस रोड

हावड़ा – 711101

आलेख

 

राष्ट्रभाषा के प्रश्न से जूझती हिंदी

इन्द्र कुमार दीक्षित

   

राष्ट्रभाषा,किसी संप्रभु राष्ट्र केअस्मिता,एकता ,अभिव्यक्ति एवं संस्कृति की पहचान होती है।

       सुदृढ़ तथाअखंड भारत की कल्पना राष्ट्रभाषा हिन्दी के बिना नहीं की जा सकती । भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को  सम्पूर्ण राष्ट्र के लिये हिन्दी की व्यापक स्वीकार्यता, बहुलवादी संरचना और सभी भाषाओं के बीच सेतु बनने की क्षमता रखने वाली भाषा हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसके प्रमाण स्वरूप संविधान के अनुच्छेद 343में यह उल्लिखित है कि “संघ की भाषा देवनागरी लिपि में हिन्दी होगी। ”

           इन्हीं संवैधानिक उपबंधों के तहत हिन्दी को 26 जनवरी, 1965 को भारतीय संघ के ‘राजभाषा(प्रकारांतर से राष्ट्रभाषा) बनाने का निश्चय किया गया। राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी का कहना था कि ‘बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्र गूँगा है’।

परंतु भाषायी आधार पर राज्यों के बँटवारे की नीति  ने भाषा की राजनीति का खेल शुरू कर दिया और हिन्दी को राजभाषा घोषित होते ही  दक्षिण के राज्यों- तमिलनाडु, आन्ध्र, कर्नाटक और केरल से हिन्दी के विरुद्ध उग्र आंदोलन  खड़े हो गये।

          परिणाम यह हुआ कि उनके तुष्टिकरण के लिये संविधान लागू होने के पन्द्रह वर्षों बाद अनुच्छेद 343(2) के जरिये ‘हिन्दी के साथ साथ

एक भी राज्य के असहमत रहने तक अंग्रेजी को भी संघ के सरकारी काम काज में जारी रखने का प्रावधान लागू कर दिया गया।राजभाषा संशोधन अधिनियम1963 के तहत राजभाषा अधिनियम 1975 बनाया गया जिसके अन्तर्गत समय समय पर हिन्दी के अनुगामी प्रयोग के लिये निर्देश जारी किये जाते हैं।राष्ट्रभाषा का प्रश्न नेपथ्य में चला गया।

                तब से अब तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये चल रहे अनेक बहस मुबाहिसों और कोशिशों का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला हैऔर राष्ट्रभाषा का प्रश्न जहाँ का तहाँ खड़ा है!

            नेहरू युग के शुरू होकर देश में जाति,धर्म,सम्प्रदाय,क्षेत्र और क्षेत्रीय भाषा की राजनीति प्रबल होती गई ,इस आधार पर प्रभावशाली समूह तथा दल विकसित होते गये जो केंद्र की सत्ता को प्रभावित करते गये।सरकारें पर सरकारें आती जाती रहीं पर वे इन्हीं ताकतों के बल पर अपना वोट बैंक मजबूत करने के चक्कर में राष्ट्रभाषा के मुद्दे को उठाने का साहस न कर सकीं।यही नहीं वे अपनी सत्ता के लालच मेँ उन समूहों व दलों का तुष्टिकरण करके राष्ट्रहित के इसअहम  मुद्दे की उपेक्षा करती रहीं ।

              आजादी के संघर्ष के इतिहास पर नज़र डालने पर पता चलता है कि सन 1857में  अंग्रेजी सत्ता से टकराने का बीड़ा उत्तर और मध्य भारत की हिंदीभाषी जनता ने ही उठाया ।जनता का यह प्रयास  एक साल बाद ही विफल कर दिया गया लेकिन उसने देश की अस्मिता को जगाने और भाषा की ताकत को पहचानने में प्रमुख भूमिका निभाया ।कांग्रेस के गठन के पश्चात गान्धी जी के भारत लौटने पर जब आँदोलन की बागडोर उनके हाथ में आई तो उन्हों ने राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुए हिन्दी को ही इसके लिये सबसे उपयुक्त माना ।

हिन्दी ने भारत के सम्पूर्ण जनमानस को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। आजादी मिलने तक सारा आँदोलन प्राय: हिन्दी भाषा में ही चला।इस दौरान इसकी ताकत बढ़ी और हिन्दीभाषा की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता दूसरे राज्यों में भी बढ़ी जिससे इस भाषा ने अपने को राष्ट्र भाषा बनने की योग्यता अर्जित कर लिया।

           हिन्दी की इसी योग्यता के चलते संविधान बनने के बाद इसे राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव और समर्थन सर्व प्रथम अहिंदी भाषी राज्यों के प्रतिनिधियों की ओर से लाया गया। प्रसिद्ध तमिल विद्वान श्री गोपास्वामी आयंगर ने 14 सितम्बर 1949 को संसद में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव लाया जिसका समर्थन पट्टाभि सीता रामय्या,राजगोपालाचारी तथा तमिल भाषा के महाकवि सुब्र ह्मनियम भारती ने भी किया।बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, बाबू सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गान्धी(सभी अहिंदी भाषी)तो पहले ही इसके पक्ष में थे।

           पर हकीकत है कि79-80 वर्षों  बाद अभी भी राष्ट्र भाषा का प्रश्न अनुत्तरित है।अब जबकि केंद्र में देश की जनता के व्यापक समर्थन से बनी एक मजबूत और दृढ इच्छा-शक्ति वाली सरकार विगत सात वर्षों से सत्ता में है और उसने अनेक राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित मुद्दों का समाधान सूझ बूझ,कूटनीतिक कौशल और दृढ़ता पूर्वक करने का साहस दिखाया है तो एक सुखद उम्मीद जगी है कि हिन्दी को वास्तविक रूप से राष्ट्रभाषाके पद पर प्रतिष्ठित करने की दिशा मे निर्णय लिया जाना चाहिए इसमें जो भी बाधाएँ आयें उन्हें हल किया जाय ।सरकार ने नई  शिक्षा नीति 2020 केअन्तर्गत

प्राथमिक तथा जूनियर  स्तर पर उस क्षेत्र विशेष की  मातृभाषा में  शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान करके  भारत के विशाल हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी माध्यम अपनाये जाने की पहल कर दिया है,बेशक दक्षिण  और पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को यह पहल नागवार गुज़र सकती है, लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम आने की संभावनाएँ हैं।

             इस समय वैश्विक परिदृश्य पर भारत का अच्छा और अनुकूल प्रभाव है,हिन्दी सवा सौ से ऊपर देशों में प्रयुक्त हो रही भाषाओं मे शुमार है। अंग्रेजीऔर मन्दारिन(चीनी)के बाद विश्व में यह तीसरे  स्थान पर है। यदि हिन्दी अपने देश की राष्ट्रभाषा बन जाय तो अतिशीघ्र इसे संयुक्तराष्ट्र की भाषा होने का गौरव प्राप्त हो सकता है।तकनीकी तौर पर राष्ट्र भाषा बनने से हिंदी को कुछ वैश्विक गरिमा या लाभ जरूर हो सकता हो,परन्तु घोषित राष्ट्रभाषा न होने के बावजूद हिंदी अपनी सहज संप्रेषणीयता, सहजता व्यावहारिकता और व्यापकता के गुण के कारण निरंतर मजबूत होकर आगे बढ़ रही है, यह सुखद है।

      कहने का तात्पर्य है कि हिंदी अब बाजार की, सिनेमा की, तकनीक की, न्याय, प्रौद्योगिकी  अभियंत्रण, वाणिज्य व्यापार तथा चिकित्सा विज्ञान की सशक्त भाषा होने की ओर अग्रसर है, यह राष्ट्रभाषा बने न बने  कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

            परन्तु अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह अब भी  विचारणीय है कि राष्ट्रभाषा का दर्जा पाए बिना हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ में स्वीकृति पा सकती है? यह चुनौती जस की तस है,इस पर चिंतन मनन और विचार करने की आवश्यकता है।

***



इन्द्र कुमार दीक्षित

5/45, गीतांजलि

मुंसिफ कालोनी रामनाथ देवरिया,

निकट वन विभाग कार्यालय,

देवरिया(उ. प्र.) – 274001


ग़ज़ल


दुष्यंत कुमार

नज़ाकत से हमारे दिल पे बिजली क्यूँ गिराती हो,

दग़ा देकर वफ़ा अपनी हमें क्यूँ कर दिखाती हो।

 

सभी को जाम देती हो, मुझे ही टाल जाती हो,

रकीबों से जरा मिलकर, मुझी को क्यूँ सताती हो।

 

क़सम देकर ज़माने की, मुझे क्यूँ भूल जाती हो,

जला कर मेरे ख़त उनको, हवा में क्यूँ उड़ाती हो।

 

जगाती चाह अनबूझी, नयन से क्या इशारा है,

दबाकर होंठ दाँतों से, जिया को क्यूँ जलाती हो।

 

झुकी नज़रें, लपेटा उंगलियों में अपना ही दामन,

गजब शोखी है चेहरे पे, जहाँ से क्यूँ छिपाती हो।

 

लबों पर हैं तबस्सुम पर, निगाहों में शरारत है,

छुपा कर जुल्फ में क़ातिल, घटा घनघोर लाती हो।

 

ज़माने भर से लड़ता हूँ, तुम्हारे इक इशारे पर,

हमेशा तुम मुझे हंस कर,मगर क्यूँ आज़माती हो।

 

चरागों से नहीं ‘दुष्यंत’ ये दिल जलने वाला है,

बुझा कर मेरी उम्मीदें, अँधेरा क्यूँ बढ़ाती हो।

***

दुष्यंत कुमार स्मारक

सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्राध्यापक गणित

रतलाम - मध्यप्रदेश


काव्य


मैं किसान हूँ

डॉ. नरेश सिहाग

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मिट्टी की खुशबू में

मेरी साँसें बसती हैं,

खेतों की मेड़ों पर

मेरी सुबहें हँसती हैं।

सूरज से पहले उठता हूँ,

सूरज के साथ ढलता हूँ,

धरती की सूखी छाती पर

पसीने की नदी उँडेलता हूँ।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

कभी बादल रूठ जाते हैं,

कभी बारिश बेमौसम आती है,

कभी ओले सपनों पर

पत्थर बनकर गिरते हैं।

कभी सूखा खेत निगल जाता है,

कभी बाढ़ सब बहा ले जाती है,

फिर भी अगली सुबह

मेरी मुट्ठी में बीज रहता है।

 

मैं टूटता हूँ,

मगर हारता नहीं,

मेरी आँखों में

कल का मौसम पलता है।

जिस धरती ने मुझे जन्म दिया,

उसी की गोद में

हर बार नया सपना बोता हूँ।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मेरे हाथों की लकीरों में

हल की मूठ बसी है,

मेरे पैरों में

खेतों की पगडंडी बसी है।

मेरी हथेलियों के छालों को

कौन पढ़ेगा शहर में?

इनमें लिखी हुई कहानी

किसी किताब से कम नहीं।

 

मेरी कमीज़ पर लगी मिट्टी

मेरी शान है,

मेरे माथे का पसीना

मेरी पहचान है।

मैं अन्न उगाता हूँ

तो कितने घरों में चूल्हा जलता है,

मेरी फसल पकती है

तो किसी बच्चे के चेहरे पर

मुस्कान खिलती है।

 

फिर भी न जाने क्यों

मेरी थाली अक्सर खाली रहती है,

जिसके खेत से

दुनिया का पेट भरता है,

उसी के घर में

कभी-कभी रोटी गिनी जाती है।

 

मैं किसान हूँ…

मेरी मजबूरी मत पूछो,

मेरे कर्ज़ की कहानी मत पूछो,

पूछना हो तो

मेरे सपनों का हिसाब पूछना,

पूछना हो तो

मेरे पसीने की कीमत पूछना।

 

बीज महँगा है,

खाद महँगी है,

डीज़ल की कीमत बढ़ती जाती है,

बिजली का बिल

अपना अलग डर दिखाता है।

मंडी तक फसल पहुँचाने में

कितने खर्चे लगते हैं,

और जब दाम की बारी आती है

तो मेरे सपने

कागज़ों पर तौले जाते हैं।

 

फिर भी मैं

अगली फसल की तैयारी करता हूँ,

क्योंकि किसान का दिल

मौसम से बड़ा होता है।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मेरी बेटी की आँखों में

मैं उसका भविष्य देखता हूँ,

मेरे बेटे की किताबों में

मैं अपना अधूरा सपना पढ़ता हूँ।

मैं चाहता हूँ

वे भी मेरी तरह मिट्टी से जुड़ें,

पर मेरी तरह मजबूर न हों।

 

मैं चाहता हूँ

मेरे बच्चों के हाथ में

हल हो तो गर्व से हो,

और किताब हो तो

ज्ञान के उजाले के लिए हो।

 

मैं नहीं चाहता

मेरी औलाद कर्ज़ के नीचे दबे,

न खेत गिरवी रखे जाएँ,

न सपने नीलाम हों।

मैं चाहता हूँ

किसान का बच्चा

किसान बने तो सम्मान से बने,

और किसी दूसरे रास्ते जाए

तो मजबूरी में नहीं,

अपनी इच्छा से जाए।

 

कभी-कभी रात को

खेत की रखवाली करते हुए

मैं आसमान को देखता हूँ,

तारों से पूछता हूँ—

“कब आएगा वह दिन

जब किसान सिर्फ खबरों में नहीं,

नीतियों में भी दिखाई देगा?”

 

हवा चुप रहती है,

चाँद चुप रहता है,

लेकिन मिट्टी

मेरे कान में धीरे से कहती है –

“तू चलता रह,

तेरे पसीने से ही

सुबह का सूरज निकलेगा।”

 

तब मैं फिर

अपनी थकी आँखें खोलता हूँ,

सूखे होंठों पर

एक मुस्कान रखता हूँ,

और अगले मौसम का

एक नया सपना बोता हूँ।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मुझे मालूम है

हर बीज फसल नहीं बनता,

हर सपना सच नहीं होता,

हर मेहनत का फल

तुरंत नहीं मिलता।

मगर मैं यह भी जानता हूँ –

धरती कभी

मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देती।

 

आज नहीं तो कल,

कल नहीं तो परसों,

मेरी मेहनत की कोई कोंपल

ज़रूर फूटेगी।

किसी खेत की हरियाली में

मेरी कहानी लिखी होगी,

किसी रोटी की खुशबू में

मेरी मेहनत मिली होगी।

 

मैं उस रोटी का हिस्सा हूँ

जो किसी मजदूर की थाली में है,

मैं उस दूध का सपना हूँ

जो किसी बच्चे के गिलास में है,

मैं उस दाने की शुरुआत हूँ

जो किसी शहर के गोदाम में है।

 

मेरा खेत छोटा हो सकता है,

लेकिन मेरी जिम्मेदारी बड़ी है।

मेरी जेब खाली हो सकती है,

लेकिन मेरी नीयत भरी है।

मेरे कपड़े पुराने हो सकते हैं,

लेकिन मेरे सपने नए हैं।

 

इसलिए मत समझना

कि मैं सिर्फ अनाज उगाता हूँ –

मैं उम्मीद उगाता हूँ,

मैं जीवन उगाता हूँ,

मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए

एक बेहतर कल उगाता हूँ।

 

जब धरती पर

पहली हरियाली आती है,

मेरी आँखों में

ईश्वर उतर आता है।

जब बालियाँ हवा में झूमती हैं,

मेरी थकान कहीं खो जाती है।

और जब खेत सुनहरा होता है,

तो लगता है

जैसे मेरी मेहनत ने

आसमान पहन लिया हो।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मैं धूप से लड़ता हूँ,

सर्दी से लड़ता हूँ,

बारिश से लड़ता हूँ,

बाज़ार से लड़ता हूँ,

कर्ज़ से लड़ता हूँ,

हालात से लड़ता हूँ—

लेकिन सबसे ज्यादा

मैं निराशा से लड़ता हूँ।

 

क्योंकि मेरे हार जाने का अर्थ

सिर्फ मेरा हारना नहीं है,

मेरे साथ

किसी घर का चूल्हा हारता है,

किसी बच्चे की किताब हारती है,

किसी माँ की दुआ हारती है,

किसी गाँव की उम्मीद हारती है।

 

इसलिए मैं

हर सुबह फिर उठता हूँ।

 

हल कंधे पर रखता हूँ,

मिट्टी को माथे से लगाता हूँ,

धरती माँ से कहता हूँ—

“चल, आज फिर कोशिश करते हैं।”

 

फिर खेत की ओर निकल पड़ता हूँ,

क्योंकि मेरे हिस्से में

रुकना लिखा ही नहीं।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मेरे पसीने की हर बूँद

किसी की रोटी बनती है,

मेरी मेहनत की हर लकीर

किसी की जिंदगी सँवरती है।

मैं मिट्टी में मिलता हूँ

ताकि दुनिया खिल सके,

मैं धूप में जलता हूँ

ताकि किसी घर में

चूल्हा जल सके।

 

और फिर भी

जब कोई पूछता है –

“किसान आखिर चाहता क्या है?”

 

मैं कहता हूँ –

 

बस इतनी-सी बात है,

मेहनत का उचित सम्मान मिले,

मेरी फसल का सही दाम मिले,

मेरे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले,

मेरे घर में इलाज का इंतज़ाम मिले,

और जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ

तो मेरे हाथों के छाले

किसी को दिखाई दें।

 

मैं दया नहीं चाहता,

मैं अपना अधिकार चाहता हूँ।

मैं एहसान नहीं चाहता,

मैं अपनी मेहनत का सम्मान चाहता हूँ।

 

क्योंकि –

 

मैं किसान हूँ,

सिर्फ खेत का मालिक नहीं,

इस देश की भूख का रखवाला हूँ।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता हूँ…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

कल फिर सूरज निकलेगा,

कल फिर हल चलेगा,

कल फिर कोई बीज

मिट्टी के भीतर जाएगा।

और अँधेरी मिट्टी के नीचे

एक छोटा-सा बीज

चुपचाप कहेगा –

 

“मैं मर नहीं रहा,

मैं जन्म ले रहा हूँ।”

 

बस यही विश्वास

मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

 

मैं गिरूँगा तो उठूँगा,

सूखूँगा तो फिर हरियाऊँगा,

मौसम चाहे जितना रूठे,

मैं फिर खेत सजाऊँगा।

 

क्योंकि मैं जानता हूँ –

जिसके हाथों में मिट्टी हो,

उसके हाथ खाली नहीं होते।

 

जिसकी आँखों में उम्मीद हो,

उसकी सुबह कभी खत्म नहीं होती।

 

और जब तक

मेरी साँसों में साँस रहेगी,

जब तक मेरी हथेली में ताकत रहेगी,

जब तक धरती मुझे पुकारेगी –

मैं खेतों में लौटता रहूँगा।

 

चीर के ज़मीन को,

मैं उम्मीद बोता रहूँगा…

मैं किसान हूँ,

चैन से कहाँ सोता हूँ…

 

मैं किसान हूँ –

इस मिट्टी का बेटा हूँ,

इस देश की रोटी हूँ,

इस धरती की धड़कन हूँ।

 

**बोहल मैं किसान हूँ…

और हर फसल के साथ

एक नया भारत बोता हूँ।**

*** 



डॉ. नरेश सिहाग ‘बोहल’

एडवोकेट

गुगन निवास 26 पटेल नगर

भिवानी – हरियाणा


सितंबर 2026, अंक 75

  शब्द-सृष्टि सितंबर 2026, अंक 7 5 संपादकीय – चलते-चलते पचहत्तर तक....... – डॉ. पूर्वा शर्मा अभिमत – ‘लिखते रहो’ - एक गुरु का दिया पहला ...