शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कविता

 



बीज

डॉ. सुरिन्दर कुमार

बीज,

तुम में,

 छिपे हैं,

निर्विकल्प आकार ।

तुम हो स्रष्टा,

नव-सृष्टि के ।

तुम्हीं हो,

 प्रारब्ध,

इति के।

तुम्हीं हो,

अस्वादित,

स्वादों का आधार।

तुम हो,

 त्रिकाल दर्शी,

   भूत, भविष्य,और वर्तमान के।

तुम हो,

त्रिगुणी।

सत्व, रजस, तमस से है,

अटूट सम्बन्ध,

 तुम्हारा ।

***

   

  डॉ. सुरिन्दर कुमार

पंचकूला

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