गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

माहिया



रंगों की नगरी है

ज्योत्स्ना प्रदीप

1

ये भोर निराली  है

धरती रंगों की

लगती लो ! थाली है।

2

अब आस करो पूरी

साजन आ जाओ

कैसी है  मजबूरी।

3

रंगों  की  नगरी है

सबके हाथों  में

टेसू  की   गगरी है।

4

सखियाँ खुशियाँ लाईं

तुझ बिन साँवरिया

आँखें ये, भर आईं।

5

वो खूब मनाती  हैं

मुझको ख़ुश करने

होरी भी  गाती  हैं।

6

सखियों ने बतलाया

आँगन में देखो

साजन तेरा आया।

7

दुख़  मन से लो छूटे

उग आये फिऱ से

मन में कितने बूटे।

8

मेरी होली आई

सतरंगी नभ ने

मुस्कानें  फैलाईं।

**** 



ज्योत्स्ना प्रदीप

देहरादून


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