रंगों
की नगरी है
ज्योत्स्ना
प्रदीप
1
ये
भोर निराली है
धरती
रंगों की
लगती
लो ! थाली है।
2
अब
आस करो पूरी
साजन
आ जाओ
कैसी
है मजबूरी।
3
रंगों की
नगरी है
सबके
हाथों में
टेसू की
गगरी है।
4
सखियाँ
खुशियाँ लाईं
तुझ
बिन साँवरिया
आँखें
ये,
भर आईं।
5
वो
खूब मनाती हैं
मुझको
ख़ुश करने
होरी
भी गाती
हैं।
6
सखियों
ने बतलाया
आँगन
में देखो
साजन
तेरा आया।
7
दुख़ मन से लो छूटे
उग
आये फिऱ से
मन
में कितने बूटे।
8
मेरी
होली आई
सतरंगी
नभ ने
मुस्कानें फैलाईं।
ज्योत्स्ना
प्रदीप
देहरादून


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें