आधी
आबादी : समानता का अधूरा सफ़र
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
अंतरराष्ट्रीय
महिला दिवस' (8 मार्च) अब जश्न का एक और दिन बन
चुका है। रस्मी तौर पर बड़े-बड़े भाषण! सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों की बाढ़! आधी
आबादी की तरक्की के लुभावने दावे! लेकिन इस शोर-शराबे और उत्सव की चकाचौंध के बीच
महिलाओं के बारे में संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट ने एक ऐसी कड़वी हकीकत पेश
की है, जो तमाम खोखले दावों की कलई खोल देती है। रिपोर्ट का
निष्कर्ष सीधा और डराने वाला है— दुनिया के किसी भी देश में महिलाओं को आज भी 'पूर्ण कानूनी समानता' हासिल नहीं है! यह रिपोर्ट
हमें आगाह करती है कि अधिकारों और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए बनी न्याय
प्रणालियाँ महिलाओं और लड़कियों के लिए “हर जगह विफल” साबित हो रही हैं!
इस
रिपोर्ट के तथ्यों पर अगर हम गहराई से गौर करें, तो
समझ आता है कि हम इक्कीसवीं सदी में होकर भी सोच और व्यवस्था के मामले में कितने
पीछे हैं। रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दुनिया भर में पुरुषों की
तुलना में महिलाओं को केवल 64 प्रतिशत कानूनी अधिकार ही हासिल हैं। सयाने कह रहे
हैं कि यह आँकड़ा 'सिस्टमैटिक फेलियर' यानी
व्यवस्था की विफलता का घोषणापत्र है। यह कानूनी भेदभाव महिलाओं को जीवन के हर
क्षेत्र में - चाहे वह शिक्षा हो, संपत्ति का अधिकार हो या
सुरक्षा - पीछे धकेलता है!
कानून
की खामियों का सबसे वीभत्स रूप महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों में दिखता
है। रिपोर्ट बताती है कि 54 प्रतिशत देशों में बलात्कार को अभी भी 'सहमति' के आधार पर परिभाषित नहीं किया गया है। यह
महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता पर सबसे बड़ा हमला है। अगर कानून यह नहीं समझ पाता
कि पीड़ित की असहमति को ही अपराध को तय करने का पैमाना होना चाहिए, तो वह अनजाने में अपराधी को तकनीकी खामियों का फायदा उठाने का मौका देता
है। इसी तरह, राष्ट्रीय कानूनों के तहत लगभग तीन-चौथाई देशों
में लड़कियों को आज भी शादी के लिए मजबूर किया जा सकता है। याद रहे, जब तक 'जबरन विवाह' जैसी
कुरीतियों को कानूनी संरक्षण या ढील मिलती रहेगी, तब तक
आर्थिक सशक्तीकरण की सारी बातें केवल किताबी रहेंगी!
आर्थिक
मोर्चे पर भी तस्वीर उतनी ही धुंधली है। रिपोर्ट के अनुसार,
44 प्रतिशत देशों में 'समान मूल्य के कार्य के
लिए समान वेतन' का कोई कानूनी प्रावधान ही नहीं है। यह न
केवल आर्थिक शोषण है बल्कि महिलाओं की श्रमशक्ति का अपमान भी है। यह असमानता
महिलाओं को जीवन भर आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती है।
तकनीक के इस दौर में हिंसा ने भी नया रूप ले लिया है। रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल जगत में कानून और नियमन की कमी के कारण महिलाओं के विरुद्ध ऑनलाइन उत्पीड़न और हिंसा तेजी से बढ़ी है। वहीं, युद्ध और हिंसक संघर्ष वाले क्षेत्रों में तो हालात और भी बदतर हैं, जहाँ बलात्कार को आज भी युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है! पिछले दो वर्षों के भीतर यौन हिंसा के दर्ज मामलों में 87 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी यह साबित करती है कि संकट के समय महिलाएँ सबसे आसान निशाना बन जाती हैं। अपनी बेटियों पर यह बर्बरता सहते-सहते शायद किसी दिन धरती की छाती फट पड़े!
बेशक,
रिपोर्ट में उम्मीद की यह
एक किरण भी दिखती है कि दुनिया के 87 प्रतिशत देशों में घरेलू हिंसा के
खिलाफ कानून बन चुके हैं और कई देशों ने संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत किया है।
लेकिन केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि
भुक्तभोगी महिलाओं को अक्सर भेदभावपूर्ण सामाजिक मान्यताएँ चुप रहने के लिए मजबूर
करती हैं। सामाजिक कलंक, लोकलाज का डर और पीड़ित को ही दोषी
ठहराने वाली मानसिकता न्याय की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इसके अलावा, मुकदमों का भारी खर्च, लंबी कानूनी प्रक्रियाएँ और
पुलिस-अदालत जैसी संस्थाओं पर अविश्वास महिलाओं को न्याय की चौखट से दूर कर देता
है!
डॉ.
ऋषभदेव शर्मा
208
ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर,
रामंतपुर,
हैदराबाद
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500013


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