बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

खण्ड-3

 


7

व्यवहारविदे’ की दृष्टि से उपन्यास साहित्य

भारतीय काव्यशास्त्र में ‘काव्यप्रयोजन’ की चर्चा के  क्रम में आचार्य मम्मट का मत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहा है । आचार्य मम्मट ने अपने ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में काव्यप्रयोजनों की व्यवस्थित व वैज्ञानिक चर्चा की है-

काव्यं यशसेङर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरेक्षतये ।

सद्यः परिनिवृतये कांतासंमितयोपदेशयुजे ।।”

इस श्लोक में काव्य अर्थात् साहित्य के प्रमुख छः प्रयोजन बताए गए हैं । इन छः प्रयोजनों में से सिर्फ एक ‘व्यवहारविदे’ ( व्यवहार जानने-समझने के लिए / व्यवहार ज्ञान के लिए ) की दृष्टि से यहाँ हम थोड़ी चर्चा कर रहे हैं ।

वैसे यह प्रयोजन लेखक/कवि-पाठक दोनों के लिए है । उपन्यास के तत्वों में एक परिवेश या वातावरण है । श्रेष्ठ उपन्यास की रचना उसके यथार्थ-परिवेश निर्माण पर आधारित है । उपन्यास में जिस समाज का वर्णन किया जाता है उसके लोक-व्यवहार, रीति-रिवाजों, मान्यताओं, विश्वासों-अंधविश्वासों के यथार्थ चित्रण के लिए लेखक को स्वयं जद्दोजहद करनी पड़ती है । उपन्यास की एक परिभाषा है- “ A Novel is in its brodest definition a Personal, a direct impression of life’- उपन्यास में लेखक समाज का जो अनुभव निरूपित करता है वह प्रत्यक्ष और वैयक्तिक होता है । पढ़ा हुआ या सुना-सुनाया हुआ नहीं । ऐसा कहा जाता है कि ‘सागर, लहरें और मनुष्य’(उदयशंकर भट्ट) लिखने से पूर्व उसका लेखक मुंबई के मछुआरों की बरसोवा बस्ती में कुछ समय जाकर रहे थे । देशकाल या परिवेश के यथार्थ निर्माण के  लिए लेखक को कई बार अनुसंधान की प्रक्रिया से गुजरता पड़ता है । ‘मादाम बोवरी’ का लेखक अपने मित्र की श्मशान यात्रा में जाते समय भी सोचता है कि शायद मुझे मेरी ‘बोवरी’ के लिए कुछ मिला जाय । प्रसिद्ध एतिहासिक उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा लिखने से पूर्व अपने विषय के संबंध में खूब छान-बीन करते थे । इस प्रकार उपन्यास लेखन में स्वयं लेखक का व्यवहार ज्ञान तो पक्का होता ही है, परंतु पाठक भी उससे लाभान्वित होता है । झवेरचंद मेघाणी के उपन्यास में हम कठियावाड ( सौराष्ट्र), पन्नालाल पटेल के उपन्यासों में उत्तर गुजरात, नागार्जुन-रेणु के उपन्यासों में बिहार, बंकिम-शरद-टैगोर आदि के उपन्यासों में बंगाल, प्रेमचंद के उपन्यासों में उत्तरप्रदेश , राजेन्द्र अवस्थी ( ‘जंगल के फूल’ के लेखक) से आदिवासी समाज, प्रभा खेतान से मारवाडी समाज की पहचान, मैत्रेयी पुष्पा से बुंदेलखंड का ग्रामीण समाज, राही मासूम रजा, शानी, असगर वजाहत, मेहरून्निसा परवेज, नासिरा शर्मा आदि के उपन्यासों में मुस्लिम समाज के रीति-रिवाज और उनकी बारीकियों को बाकायदा समझ सकते हैं । इस प्रकार उपन्यास एक छोटा-सा जेबी थियेटर भी है ।  

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खण्ड-3

 


6.

बिहारी की बहुज्ञता

रीतिकाल के कवि बिहारी तथा ‘सतसई’ को पढ़ते समय तथा महज़ इस एक रचना को लेकर उन्हें मिली ख्याति-प्रसिद्धि विद्वानों की इस बात को बराबर पुष्ट-प्रमाणित करती है कि किसी साहित्यकार की कीर्ति उनकी रचनाओं की संख्या के हिसाब से नहीं होती, गुण के हिसाब से होती है ।

रीतिकाल के इस प्रमुख व अत्यधिक ख्यात कवि के दोहे मूलतः शृंगार, नीति, भक्ति के साथ-साथ अन्य ज्ञान-विज्ञान के विषयों व शास्त्रों  के विविध संदर्भों को भी अच्छी तरह से प्रस्तुत करते हैं ।

हमारे साहित्याचार्यों ने तीन काव्य हेतुओं-प्रतिभा, व्युत्पति और अभ्यास की चर्चा की है। व्युत्पत्ति का अर्थ है- प्रगाढ़ पांडित्य, जो लोक, शास्त्र और काव्य के निरीक्षण एवं अभ्यास से यह प्राप्त होता है ।

बिहारी के काव्य में उनकी शास्त्र बहुज्ञता देखी जा सकती है । दरअसल बिहारी हिन्दी के एक ऐसे कवि है जिनका ‘व्युत्पत्ति पक्ष’ अत्यंत समृद्ध व संपन्न है । काव्यशास्त्र के साथ-साथ आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, चित्रकला, इतिहास, पुराण, राजनीति, नीतिशास्त्र प्रभृति के कई संदर्भ उनके काव्य में निरूपित हैं ।

यह कवि काव्यशास्त्र के बड़े ज्ञाता थे । अलंकार, रस, भाव, गुण, नायिका भेद, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति आदि काव्यशास्त्रीय अनुशासन का अच्छी तरह से पालन करते हुए इन्होंने अपनी ‘सतसई’ के दोहों की रचना की है ।

अन्य शास्त्रों से संबंधित कुछेक उदाहरण

ज्योतिष

मंगल बिन्दु सुरंग मुख ससि केसर आड़ गुरु ।

इक नारी लहि संग रसमय किय लोचन जगत ।।

राजनीति

जुरे दुहुनि के दृग झमकि रुके न झीने धीर ।

हलुकी फौज हरौल ज्यों परत गोल पर भीर ।।

गणित

कुटिल अलक छुटि परत मुखि बढिगै इतौ उदोतु ।

बंक बकारी देत ज्यौं दामु रूपैया होतु ।।

दर्शन-ज्ञान

जोग जुगति सिखई सबै मनो महामुनि मैन ।

चाहत प्रिय अद्वैतता काननु सेवतु (चारी) नैन ।।

नीतिशास्त्र

कनक-कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय ।

या खाए बौराए जग, या पाए बौराए ।।

आयुर्वेद

बहु धनु लै अहिसान कै पारों देह सराहि ।

बैद बधू हंसि भेद सों रही नाह मुँह चाहि ।।

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खण्ड-3

5.

सूरदास : भक्ति एवं कवित्व

आचार्य  वल्लभाचार्य के शिष्य व पुष्टिमार्ग के भक्त कवि होने के नाते सूरदास ने अपने काव्य में इसी मार्ग के सिद्धांतो का प्रतिपादन किया । कृष्ण भक्ति का सरल-सहज मार्ग सूर ने अपने काव्य में दिखाया है । भक्तिकाल की सगुणधारा के यह कृष्ण भक्त अष्टछाप के प्रमुख कवि थे ।

सूरदास की भक्ति सख्य भाव की है । इस सख्य भाव के साथ-साथ सूरदास ने कृष्ण के प्रति नंद-यशोदा के वात्सल्य भाव तथा राधा और गोपियों के दाम्पत्य व माधुर्य भाव की सुंदर व्यंजना की है । असल में सूर की भक्ति का आधार ‘पुष्टि मार्ग’ है ।

सूरदास की भक्ति रागानुगा भक्ति है जिसमें कर्म कांड का स्थान नहीं है, उनकी भक्ति भावना में सिद्धांत पक्ष की अपेक्षा माधुर्य भाव की प्रधानता है । ” सूर काव्य में दार्शनिक स्वरूप को देखें तो उन्होंने वल्लभाचार्य के ‘ शुद्धाद्वैतवाद’ की मान्यताओं को ग्रहण किया । उनके पदों में दार्शनिक नीरसता के स्थान पर माधुर्य भाव से परिपूर्ण भक्ति की सरसता अधिक दिखाई पड़ती है ।

भ्रमरगीत’ तो सूर का एक अनुपम काव्य है । मूलतः विरह-काव्य होते हुए भी कवि ने इसमें दार्शनिक विचारों को भी व्यक्त किया है । यह इसलिए भी स्वाभाविक है कि इसका जन्म ही भारत के सर्वश्रेष्ठ धर्मग्रंथ ‘भागवत’ के क्रोड में हुआ ।

सूरदास का सृजन एक ऊँचे कवित्व का उत्तम उदाहरण है । सूर के कवित्व के बारे में पं.हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं- “ सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करने बैठते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे दौड़ा करता है । उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है । संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है । वह अपने को भूल जाता है । काव्य में इस तन्मयता के साथ शास्त्रीय पद्धति का निर्वाह विरल है । पद-पद पर मिलने वाले अलंकारों को देखकर भी कोई अनुमान नहीं कर सकता कि कवि जान बूझकर अलंकारों का उपयोग कर रहा है ।....... काव्यगुणों की इस विशाल वनस्थली में एक अपना सहज सौंदर्य है । वह उस रमणीय उद्यान के समान नहीं, जिसका सौंदर्य पद-पद पर माली के कृतित्व की याद दिलाया करता है, बल्कि उस अकृत्रिम वनभूमि की भाँति है जिसका रचयिता रचना में ही घुलमिल गया है ।”

संक्षेप में कृष्ण भक्ति काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि सूरदास के काव्य में वात्सल्य एवं शृंगार जैसे जीवन के महत भावों के साथ-साथ कख्य-माधुर्य भक्ति की धारा प्रवाहित है। कला पक्ष के लिहाज़ से भी उनका काव्य उत्तम कोटि का रहा है।  अतः यह कहना बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं – सूर काव्य भाव एवं कला का मणिकांचन संयोग है।

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खण्ड-3

4.

तुलसीदास का काव्य

भावुकता व पांडित्य, दोनों के पूर्ण समन्वय वाला कवि-व्यक्तित्व गोस्वामी तुलसीदास । तुलसीदास की रचना शैली तथा उनके काव्य में विषय विस्तार व विषय-वैविध्य को लेकर रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं- “हिन्दी काव्य की सब प्रकार की रचनाशैली के ऊपर गोस्वामी जी ने अपना ऊँचा आसन प्रतिष्ठित किया है । यह उच्चता और किसी को प्राप्त नहीं ।”....  भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि यदि किसी को कह सकते हैं तो इन्हीं महानुभाव को । और कवि जीवन का कोई एक पक्ष लेकर चले हैं- जैसे वीरकाल के कवि उत्साह को, भक्तिकाल के दूसरे कवि प्रेम और ज्ञान को; अलंकार काल के कवि दांपत्य प्रणय या शृंगार को । पर इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों और व्यवहारों तक है । एक ओर तो वह व्यक्तिगत साधना के मार्ग में विरागपूर्ण शुद्ध भगवदभक्ति का उपदेश करती है, दूसरी ओर लोकपक्ष में आकर पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों का सौंदर्य दिखाकर मुग्ध करती है । व्यक्तिगत साधना के साथ ही साथ लोकधर्म की अत्यंत उज्ज्वल छटा उनमें वर्तमान है ।”

तुलसीदास का काव्य मतलब भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि । उनका ‘रामचरितमानस’ ग्रंथ तो भारतीय धर्म, दर्शन, भक्ति, लोक, संस्कृति को लेकर भारतीय साहित्य का शीर्षस्थ ग्रंथ है । शिवमंगलसिंह सुमन ने तो यहाँ तक कहा कि यदि किन्हीं कारणों से हिन्दुओं के तमाम धर्मग्रंथ नष्ट हो जायें, लेकिन यदि ‘मानस’ बच जाय तो हिन्दु धर्म पुनः पल्लवित हो सकता है ।

वैसे तो तुलसीदास के काव्य में लगभग सभी रसों का परिपाक मिलता है फिर भी प्रमुख या अंगीरस तो शांत रस ही है । आखिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के परम भक्त जो ठहरे !

पायो परम विश्राम राम समान हित नाही कहूँ’

तुलसीदास की चर्चा के इस प्रसंग में हम यहाँ एक और जानकारी देना चाहेंगे, जो हमें कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया के मंच से प्राप्त हुई - डॉ. सुनीता वर्मा, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी का एक ग्रंथ ‘आयुर्वेद मर्मज्ञ गोस्वामी तुलसीदास’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ ।  इस ग्रंथ में लेखिका ने एक अलग दृष्टि से तुलसीकाव्य का अध्ययन करते हुए उनके साहित्य में निरूपित कुछ आयुर्वेद से संबंधी संदर्भों को प्रस्तुत किया है । इस ग्रंथ में तुलसीदास द्वारा आयुर्वेद की अवधारणा, तुलसी साहित्य में स्वास्थ्य संबंधी वर्णन, विविध रोग तथा उसके इलाज हेतु उपचार एवं औषधियाँ, वैद्य एवं चिकित्सा संबंधी विचार, विविध वनस्पतियाँ जैसे मुद्दों की सोदाहरण चर्चा है । प्रस्तुत ग्रंथ के बारे में प्रो.पुनीत बिसारीया का मत है- “ स्पष्ट है कि डॉ.सुनीता जी का समीक्षा ग्रंथ गोस्वामी जी के साहित्य में आयुर्वेद चिंतन जैसे नवीन एवं प्रासंगिक विषय को विकसित, विश्लेषित  एवं उद्घाटित करने में पूर्णतः सफल रहा है । ”

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खण्ड-3

3.

संत-काव्य (ज्ञानाश्रयी शाखा)

          हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की जिस शाखा को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ज्ञानाश्रयी शाखा कहा है उसी को डॉ. रामकुमार वर्मा ने संत-काव्य कहा है । वैसे ‘संत’ और ‘भक्त’ इन दोनों में कोई मूल अंतर नहीं है । दोनों का आशय एक ही है, परंतु हिन्दी में निर्गुण उपासकों को भक्त कहने की एक रूढ़ि है । लेकिन साथ में यह भी सच है कि इस रूढ़ि  का आग्रहपूर्वक पालन भी नहीं होता । कबीर को संत कबीर और भक्त कबीर दोनों कहा जाता है । इसी तरह तुलसीदास के साथ भी संत और भक्त दोनों विशेषणों का प्रयोग चलता है ।

           कबीर ने अपने एक दोहे में संत के लक्षण इस प्रकार दिए हैं-

निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह ।

विषया सूँ न्यारा रहे, संतन का अंग एह ।।

दरअसल हिन्दी में संत परंपरा का वास्तविक आरंभ कबीर से माना जाता है । कारण कि हिन्दी में संत कवियों की अविच्छिन्न परंपरा कबीर से ही आरंभ होती है । उनका व्यक्तित्व इतना विराट और प्रभावशाली था कि संत परंपरा में उनके परवर्ती ही नहीं बल्कि उनके समकालीन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे । कबीर के समकालीन संतों में प्रमुख नाम रैदास, धर्मदास, पीपा, धन्ना, कमाल आदि नाम आते हैं और उनके बाद गुरुनानक,दादू, रज्जब, पलटूसाहब, गरीबदास, प्राणनाथ, सहजोबाई आदि संत कवियों को विशेष महत्त्व दिया जाता रहा है ।

          संत कवियों की विचारधारा सामान्यतः निजी अनुभूतियों पर टिकी हुई हैं । प्रायः सभी संत-कवि उपदेश वृत्ति के थे । उन्होंने जहाँ निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल दिया, वहीं रामनाम की महिमा का गान भी किया । गुरु को परमात्मा से बढ़कर माना । सत्संग, परोपकार, दया, क्षमा आदि का समर्थन किया वहीं धर्म के नाम पर चलने वाले तमाम आडंबरों का निर्भिकता पूर्वक विरोध भी किया ।

अपने सामाजिक सरोकारों के कारण संतकाव्य का एक विशेष महत्व है । पूरी संतकाव्य परंपरा जातपाँत के भेदभाव की घोर विरोधी है । सभी संत भक्ति के मार्ग में सहज साधना के समर्थक तथा बाह्याडंबरों और कर्मकांडों के घोर विरोधी है ।

          मध्यकालीन हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल, जिसमें संतकाव्य परंपरा की सबसे बड़ी उपलब्धि कबीर और उनकी वाणी है । “वस्तुतः संत व्यक्तित्व के सभी गुण एवं संतकाव्य की सभी मान्यताएँ पहली बार उन्हीं के काव्य के माध्यम से पूर्णतया प्रस्फुटित हुई हैं । जहाँ उसने अनिर्वचनीय ब्रह्म को वैयक्तिक रागात्मकता से अभिसिंचित किया, वहाँ माया का भी डटकर विरोध किया । इस प्रकार शुष्क एवं सैद्धांतिक, दार्शनिकों को सरस व्यावहारिक पाठ पढ़ाया । आडम्बरपूर्ण धर्म के ठेकेदारों को आडंबरहीन भाव परायण भक्ति का मूल्य बताया ।” ( बृहत् साहित्यिक निबंध, डॉ. यश गुलाटी, पृ. 352)

          वैसे तो कबीर काव्य का विषय क्षेत्र काफी विस्तृत है । अध्यात्म, ब्रह्म, आत्मा, मोक्ष, रहस्यसाधना, माया, दर्शन, योग, भक्ति भावना, सामाजिक चिंतन आदि अनेक विषयों का निरूपण उनके काव्य में हुआ है । लेकिन जब हम कबीर व उनके काव्य की प्रासंगिकता की बात करते हैं तो इस संदर्भ में कबीर का समाजदर्शन, सहज धर्म संबंधी विचार तथा भाषा, इन तीन विषयों के परिप्रेक्ष्य में वे आज ज्यादा प्रासंगिक लगते हैं ।

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खण्ड-3

2

नाथ-साहित्य

कुछ विद्वानों का मत है कि सिद्धों की वाममार्गी भोगप्रधान साधना की प्रतिक्रया के रूप में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई । डॉ.विजयपाल सिंह के मतानुसार “ दार्शनिकता की दृष्टि से वह पतंजलि के हठयोग से संबंध रखता है । ”

नाथपंथ के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए डॉ.रामकुमार वर्मा लिखते हैं- “ गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय को जिस आंदोलन का रूप दिया वह भारतीय मनोवृत्ति के सर्वथा अनुकूल सिद्ध हुआ है, उसमें जहाँ एक ओर ईश्वरवाद की निश्चित धारणा उपस्थित की गई, वहीं दूसरी और विकृत करने वाली समस्त परंपरागत रूढ़ियों पर आघात किया ।” 

नाथों की संख्या नौ मानी गई है । ये नौ नाथ कौन ? इस संबंध में विद्वानों के मत अलग-अलग हैं । आचार्य रामचंद्र शुक्ल और पं.हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों ने नाथों की संख्या तो नौ बताई पर इनके द्वारा बताए गए नामों में एकरूपता नहीं है । रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘गोरक्ष सिद्धांत’ संग्रह के मत को उद्धृत करते हुए इस परंपरा के नौ नाथों के नाम दिए हैं- नागार्जुन, जड़भरत, हरिश्चंद्र , सत्यनाथ, भीमनाथ, गोरक्षनाथ, चर्पट, जलंधर और मलयार्जुन ।

नाथ साहित्य का संबंध नाथपंथ से है । नाथपंथ या नाथ-संप्रदाय से जुडे योगियों द्वारा रचित यह साहित्य भी हिन्दी साहित्येतिहास के आदिकाल की एक प्रमुख व बहुचर्चित काव्यप्रवृत्ति रही है । नाथपंथी साधकों के साहित्य में मुख्यतः निम्नांकित विशेषताएँ दृष्टिगत होती हैं-

शैवदर्शन • गुरु महिमा • हठयोग• आचरण की शुद्धता • पंच मकारों का निषेध ( पाँच तरह के विकारों- मांस, मत्स्य, मदिरा, मुद्रा, मैथुन का विरोध ) • सामाजिक-धार्मिक कर्मकांडों का विरोध ( वर्णव्यवस्था, गृहस्थ जीवन, मूर्तिपूजा, शास्त्रविधान आदि का निषेध ) • आत्मकेन्द्रित-शरीरकेन्द्रित-पिंड केन्द्रित साधना • वाममार्गी साधना पद्धति का विरोध • पंजाबी, राजस्थानी, खडीबोली मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा

नाथ साहित्य के प्रमुख कवि गोरखनाथ ही है । गोरखनाथ की रचनाएँ हिन्दी और संस्कृत दोनों में मिलती हैं । ऐसा बताया जाता है कि इनकी लगभग चालीस रचनाएँ हिन्दी में और कुछ रचनाएँ संस्कृत में है । डॉ.पिताम्बर बड़थ्वाल ने इनकी रचनाओं का संकलन गोरखबानी नाम से किया है ।

गोरखनाथ एवं गोरखपंथ की रचनाओं में निरूपित कतिपय विषयों को लेकर, इन रचनाओं की साहित्यिकता को लेकर कई विद्वानों ने कुछ सवाल उठाए, परंतु पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी एवं अन्य कुछ विद्वानों ने इन रचनाओं में निहित साहित्यिक गुण को स्वीकार करते हुए इन्हें साहित्यिक रचनाओं की श्रेणी में रखा है । “ गोरखनाथ ने अपनी रचनाओं में गुरु महिमा, इंद्रियनिग्रह, प्राणसाधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुण्डलिनी जागरण, शून्य समाधि आदि का वर्णन किया है । इन विषयों में नीति और साधना की व्यापकता मिलती है । यही कारण है कि आचार्य रामचंद शुक्ल ने इन रचनाओं की साहित्य में सम्मिलित नहीं किया था । किन्तु, डॉ.हजारीप्रसाद द्विवेदी इस पक्ष में नहीं है । पूर्वोक्त विषयों के साथ जीवन की अनुभूतियों का सघन चित्रण होने के कारण इन रचनाओं को साहित्य में सम्मिलित करना ही उचित है ।” ( हिन्दी साहित्य का इतिहास, सं. नगेन्द्र, पृ. 83)

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खण्ड-3

1

सिद्ध साहित्य

आदिकालीन हिन्दी साहित्य की मुख्य पाँच धाराओं में ‘सिद्ध साहित्य’ का उल्लेख सबसे पहले किया जाता है । “वैदिकधर्म की जटिलता और कर्मकाण्ड के खिलाफ बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी । उसी बौद्ध धर्म से आगे चलकर हीनयान, महायान, मंत्रयान, वज्रयान, सहजयान आदि संप्रदाय निकले । इनमें सिद्धों का संबंध मंत्रयान, वज्रयान, सहजयान आदि संप्रदायों से है । वे जीवन की सहजचर्या में विश्वास रखते हैं । मंत्र-तंत्र, डाकिनी, शाकिनी आदि की बातें भी इनमें आती हैं । वे पाँच मकार-मांस, मत्स्य, मदिरा, मुद्रा, मैथुन-का सेवन करते हैं । इनके द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति होती है, ऐसा वे मानते हैं । प्राचीन चार्वाक तथा आधुनिक चिंतकों में ओशो रजनीश जी से उनके विचार मिलते हैं । मंत्रों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने वाले योगियों को ‘सिद्ध’ कहते थे । ( हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त सुगम इतिहास , डॉ.पारुकांत देसाई, पृ-07-08)

सिद्धों की संख्या चौरासी बताई गई है । रोचक बात तो यह है कि इन सिद्धों के जो नाम हैं उनमें अधिकतर नाम का अंतिम शब्द-वर्ण ‘पा’ है । यथा- लूहिपा, लीलापा, सरहपा, कण्हपा, जालंधरपा, महीपा, निर्गुणपा । सरहपा (दोहाकोश), शबरपा (चर्यागीत), लुईपा तथा कण्हपा मुख्य कवि हैं । शास्त्रीय चिंतन की अपेक्षा साधना का अधिक महत्त्व, गुरु महिमा, रहस्यात्मकता, योग, रुढियों तथा बाह्याडम्बरों का विरोध जैसी विशेषताएँ इस साहित्य की मूल पहचान रही हैं  । सिद्धों की वाणी तथा सिद्ध साहित्य की कतिपय विशेषताओं से आगे चलकर मध्यकालीन संत कवि भी थोड़े बहुत प्रभावित रहे। 

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जुलाई 2026, अंक 73

  शब्द-सृष्टि जुलाई 2026, अंक 7 3 परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है ! संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार...