मंगलवार, 30 जून 2026

जून 2026, अंक 72

 


शब्द-सृष्टि

जून 2026, अंक 72

आलेख – मीर तक़ी ‘मीर’ : अठारहवीं सदी के उथल-पुथल भरे भारत का एक साहित्यिक वृत्तांत – डॉ. ऋषभदेव शर्मा

कविता – धुन और धन – डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

दिन कुछ ख़ास है ! – धरती का हरा गहना है पर्यावरण साधना होगा प्रकृति, पर्यावरण और विकास का संतुलन – डॉ. घनश्याम बादल

कविता – 1. कविता हर ओर 2.पतंगा 3. गुंजाइश 4. भूख के रंग 5. बहुत जटिल है काव्यानुवाद – डॉ. रक्षा मेहता

आलेख – ‘सनातन धर्म’ : मेरी दृष्टि में– शशिबिन्दुनारायण मिश्र

गीत – कोई होड़ नहीं – दुष्यंत कुमार व्यास

कहानी – सच्चा रिश्ता – आर्या झा

विशेष

कविता – योग-स्मृति – मुरारी लाल शर्मा

कविता – योग: एक वरदान – डॉ. रक्षा मेहता

आलेख – अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस : योग :भारत की अमूल्य निधि, विश्व कल्याण का मार्ग – डॉ. घनश्याम बादल

कविता

योग: एक वरदान

डॉ. रक्षा मेहता

 

सर्वोत्तम है योगासन व प्राणायाम

शारीरिक व मानसिक कष्टों को देते विराम

तन रहता स्वस्थ, मन रहता प्रफुल्लित

सुबह - सुबह सब योग करें नित

चेहरे की बढ़ती आभा, काया रहती है मुदित

मस्तिष्क शांत रहता है, प्रसन्न रहता है चित्त

मुद्रा की कांति बढ़ जाती, क्रोध होता शांत

शरीर सदा स्वस्थ रहे, कभी न होता क्लांत

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती, उत्तम रहता पाचन

उसे शारीरिक कष्ट न आए, जो रोज़ करे योगासन

बाल होते काले - घने, आँखों में आती है चमक

चुस्ती - फुर्ती बनी रहती, त्वचा जाती है दमक

हृदय रोग, मधुमेह, कर्क रोग का भी निवारण

ऐसा शक्तिशाली है, यह योग नहीं साधारण

कितना सुंदर, कितना विरला, जन्म मिला हमें मनु का

इस जीवन से प्रेम करें हम, ध्यान रखें अपने तनु का

आओ सब मिलकर योग करें, धरा को स्वर्ग बनाएँ

*** 


डॉ. रक्षा मेहता

हिंदी विभागाध्यक्षा

आर्मी पब्लिक स्कूल

गोलकोंडा


 

विशेष

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस :

योग :भारत की अमूल्य निधि, विश्व कल्याण का मार्ग

डॉ. घनश्याम बादल

समय, देश, भाषा और संस्कृति की सीमाओं को लांघकर सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुई मानव सभ्यता की ज्ञान-परंपराओं में योग ऐसी महान भारतीय परंपरा है, जिसने  केवल शरीर और मन के संतुलन का मार्ग दिखाया है और आत्मिक उन्नयन और वैश्विक सद्भाव का भी संदेश दिया है।

आज जब संसार तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली, पर्यावरणीय संकट और मानसिक अशांति जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब योग मानवता के लिए एक प्रभावी और वैज्ञानिक समाधान के रूप में उभरकर सामने आया है। यही कारण है कि प्रतिवर्ष 21 जून को सम्पूर्ण विश्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

            योग’ शब्द संस्कृत धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है – जोड़ना, मिलाना अथवा एकीकरण करना। योग का वास्तविक अर्थ है व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वय स्थापित करना। भारतीय दर्शन में योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और सार्थक बनाने की एक संपूर्ण पद्धति है। इसी भावना को भगवद्गीता में व्यक्त किया गया है- “समत्वं योग उच्यते।”

अर्थात् जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में संतुलन और समभाव बनाए रखना ही योग है।

योग की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। इसके प्रारम्भिक संकेत वेदों, उपनिषदों और पुराणों में मिलते हैं। महर्षि पतंजलि ने योग को व्यवस्थित रूप प्रदान करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रंथ योगसूत्र में योग की परिभाषा दी –

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”

अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध या नियंत्रण ही योग है। महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। इनके अतिरिक्त महर्षि याज्ञवल्क्य, गोरखनाथ, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, स्वामी शिवानन्द, बी.के.एस. अयंगर, पट्टाभि जोइस, स्वामी रामदेव तथा सद्गुरु जैसे अनेक योगाचार्यों ने योग के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

योग की अनेक शाखाएँ और पद्धतियों में राजयोग मन और ध्यान पर केन्द्रित है, हठयोग शरीर और प्राणशक्ति के संतुलन पर बल देता है, कर्मयोग निष्काम कर्म का मार्ग दिखाता है, भक्तियोग ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का मार्ग है, ज्ञानयोग आत्मबोध और विवेक का मार्ग है तथा कुण्डलिनी योग आंतरिक चेतना के जागरण से सम्बन्धित है। इन विभिन्न शाखाओं का अंतिम उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का समग्र विकास और आत्मसाक्षात्कार है।

आधुनिक युग में तो योग की उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई है। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में लोग तनाव, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, अनिद्रा, अवसाद और हृदय रोग जैसी समस्याओं से ग्रस्त हैं। योगासन, प्राणायाम और ध्यान इन समस्याओं के नियंत्रण और रोकथाम में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। नियमित योगाभ्यास शरीर का लचीलापन बढ़ाता है, रक्तसंचार को सुधारता है, प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाता है तथा मानसिक एकाग्रता और आत्मविश्वास को विकसित करता है। वैज्ञानिक शोधों ने भी सिद्ध किया है कि योग तनाव हार्मोन को कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

योग का महत्व केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग मनुष्य को संयम, अनुशासन, धैर्य, करुणा और आत्मनियंत्रण का पाठ पढ़ाता है। यह व्यक्ति को बाहरी भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। भारतीय संस्कृति में योग को आत्मा और परमात्मा के मिलन का माध्यम माना गया है। इसी कारण योग धर्म से ऊपर उठकर एक सार्वभौमिक जीवन-पद्धति के रूप में स्वीकार किया गया है।

योग की जड़ें भारतीय सनातन परंपरा में हैं, किन्तु इसका उद्देश्य किसी विशेष मत, पंथ या संप्रदाय का प्रचार नहीं, बल्कि मानव कल्याण है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग को प्रतिष्ठित कराने में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2014 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ और 177 देशों ने सह-प्रायोजक बनकर इसका समर्थन किया। इसके परिणामस्वरूप 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। 21 जून को इसलिए चुना गया क्योंकि यह वर्ष का सबसे लंबा दिन माना जाता है और भारतीय परंपरा में इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है।

     2015 में पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया और तब से लेकर आज तक विश्व के लगभग सभी देशों में लाखों लोग योगाभ्यास के माध्यम से इस दिवस को मनाते हैं। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस, टोक्यो, मॉस्को, सिडनी और दुबई जैसे महानगरों में सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक योग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का जीवंत उदाहरण है। योग ने भारत को विश्व मंच पर एक ऐसी पहचान प्रदान की है जो शक्ति, शांति और स्वास्थ्य के समन्वय का प्रतीक है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवल एक वार्षिक उत्सव तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यालयों और परिवारों में योग की संस्कृति विकसित की जानी चाहिए। योग हमें यह सिखाता है कि वास्तविक विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन और जागृत चेतना से संभव है।

    योग भारत की प्राचीन विरासत होने के साथ-साथ आधुनिक विश्व की आवश्यकता भी है। यह शरीर को स्वस्थ, मन को शांत, बुद्धि को प्रखर और आत्मा को प्रकाशित करता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता को संतुलित, स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन की ओर ले जाने वाला वैश्विक अभियान है। आज जब पूरा विश्व अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है, तब योग का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है-

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”

अर्थात् स्वस्थ शरीर ही जीवन के सभी उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन है। योग इसी स्वस्थ, संतुलित और सार्थक जीवन की कुंजी है, जिसे भारत ने विश्व को प्रदान किया है और जिस पर सम्पूर्ण मानवता को गर्व होना चाहिए।


डॉ. घनश्याम बादल

कविता




योग-स्मृति

मुरारी लाल शर्मा

 

 

योग !

योग तुम सचमुच मधुर हो

पर मुझे मालूम होता यदि तुम्हारा

छिपा रखा है वियोगी रूप तुमने”

मैं न तुमसे प्रीत करता।

 

योग !

क्या तुम्हारी सत्य परिभाषा नहीं यह

भ्रान्ति सलिला की कराते दूर से तुम

मरीचिका से युक्त मृग जलता अनल में

देखता तुमको तुम्हारे पास जा कर।

मैं जला हूँ या जला हो मृग

तुम्हारा दोष तो कुछ भी नहीं है

भूल थी मेरी समझ पाया न इसको

मिलन के पश्चात टूटन

यह नियति का ही नियम है।

 

पर सुनो !

रात को नभ में उदय होता शशि जब

अश्रु भर दृग में चकोरा चीखता है

चन्द्रमा कर व्यंग तब यों मुस्कुराए

पा सकेगा क्या मुझे इस जन्म में तू

रे नीड़वासी खग स्वयं को क्यों सताए

 

योग !

क्या निष्पक्ष निर्णय दे सकोगे तुम

कौन है दोषी-रुपहला चन्द्रमा

या कि निर्मल मन चकोरा

जानता हूँ - क्या कहोगे तुम-

भावना में बह गया है नीड़वासी

इसलिए सब दोष सारा है उसी का

आवेश में आकर शशि को चाहता है

 

पर जरा सोचो-ओ मन के मीत मेरे

भावना को जन्म है किसने दिया

स्पष्ट है--

शशि को निरखकर खग हिया विचलित हुआ

रूप की बरसात थी जब हो रही

दोष इतना था कि बस दो बूँद उसकी पी लिया

दृष्टि में मेरी सखे राकेश भी दोषी हुआ

 

अब नहीं स्वीकार करता पूर्णतः मैं दोष अपना

क्योंकि मेरी भावना को भी जगाया था तुम्हीं ने

रूप की लावण्यता के तुम हो दोषी

मुझको है स्वीकार भावुकता हृदय की।

 

याद है मुझको

वो पहला-पहला दिन

बहबस खिंचा था मन तुम्हारी ओर क्यों

नीरजलगे थे नयन नागिनकेश राशि

भीनी-भीनी आ रही थी मल्लिका सी महक तुमसे

भूल पाऊँगा कभी क्या उन क्षणों को

उन क्षणों की याद”

बस एक दर्द बनकर रह गयी

जो न कहनी चाहिए थी-वह कहानी कह गयी।

 

काश तुमने भी किया होता ये अनुभव

दर्द और पीड़ा की सीमा है कहाँ तक

योग - -

तुम तो दबा लोगे योग से मन की व्यथा को

क्या करे वहजो रहा हो

बस वियोगी का उपासक।

 

योग! माना दूर हो मुझसे, ये सच है

पर मुझे जब चाह होती है तुम्हारी

बंद कर दृग में सुधांशु सी छवि को

मैं हृदय के निकट तुमको देखता हूँ।

यह लिखा है गीत या कुछ और

बस इतना समझलो- -

विरह की वेदना से दूर होना चाहता हूँ

कर तुम्हें स्पष्ट, मैं दिल की कहानी।

 

अन्त में स्वीकार हो तो- एक छोटी सी विनय है

मंत्र दो मुझको सखे- उस योग का तुम

हो न पाए फिर किसी से योग मेरा 


मुरारी लाल शर्मा

नार्थ-ईस्ट दिल्ली

 

कहानी



सच्चा रिश्ता

आर्या झा

आभा! तुम इस घर से विदा ले रही हो मगर हमारे दिल से नहीं....कभी मत भूलना कि तुम इन बच्चों की बड़ी बहन हो और बड़ी बहन माँ समान होती है हमेशा अपने छोटे भाइयों का मार्गदर्शन करना” बाबूजी ने कहा। वह बड़ी तो थी मगर कितनी बड़ी, मेहँदी लगे हाथों से सिंधौंरा जैसे छूटते-छूटते बचा था। मुड़कर छोटे भाइयों की ओर देखा तो रो-रोकर सब हलकान हुए जा रहे थे।

किसी का नाक बह रहा था तो किसी की आँखें....ज़रूरी है क्या विदाई.... साथी की ओर देखा तो वह भी भावुक दिखा मगर उनकी छुट्टियाँ नहीं थी। पुलिस की नौकरी में छुट्टियाँ होती कहाँ हैं। ऐसे में किससे क्या बोले। कुछ बोलने को हुई तो जैसे आवाज़ ही नहीं निकली। रो-रो कर गला सूख चुका था तो माँ ने लोटे से उसके गले को तर किया और कहा,

जाओ बेटा मगर! हमें न भूल जाना!”

और वह हिचकियाँ लेती माँ की छाती से चिपकी यह सोचने लगी अब ये लोग पानी कैसे पियेंगे। जिस गिलास में बाबूजी पानी पीते थे वह मेरे साथ ससुराल जा रहा है।

एक ऐसा परिवार जहाँ प्रेम ने सबको एक साथ बाँध रखा था, उस गाँठ को जबरन खोलकर किसी और के संग जोड़ दिया गया था मगर उसके लिए अपने लोगों से दूर होना और नए नेह से जुड़ना आसान था क्या। यह तो तब संभव होता जब वह अपने परिवार के प्रेम से तृप्त होती। वह भी उसे पूरा कहाँ मिला था। जैसे ही होश संभाला उसे माँ ने अपने मायके भेज दिया था। उसे ठीक से नहीं पता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया। वह तो पढ़ना चाहती थी। उसे बड़े होकर डॉक्टर बनना था। वह माता-पिता से दूर नहीं जाना चाहती थी मगर उसकी माँ वही करतीं जो उनकी इच्छा होती।

पता नहीं इस विस्थापन के पीछे उनकी क्या मंशा थी। शायद मायके से अति जुड़ाव ताकि बच्ची के बहाने आना-जाना लगा रहे या फिर अपनी माँ पर यह भरोसा कि वह नातिन को गृहकार्य में दक्ष कर देंगी या फ़िर सुरक्षा की भावना क्योंकि शहरी परिवेश में उसे संभालने में अन्य बच्चों की अनदेखी होती जो भी कारण रहा हो मगर उसके लिए वे दिन बेहद कष्टकर थे।

अक्सर रो-रोकर पिता को चिट्ठियाँ लिखा करती ताकि वे आकर उसे अपने साथ ले जाएँ मगर वह वही करते जो माँ कहतीं। माँ तो जैसे बस बेटों की माँ थीं। बेटियाँ उनके लिए सेविकाओं से ज्यादा न थीं। जिन्हें पहले मायके में और बाद में ससुराल में खटना था। उनके प्रति एक ही भाव था कि उनका ब्याह कराकर उन्हें उनके घर विदा कर दिया जाए। बाबूजी का माँ के सिवा कौन था। माता पिता बचपन में ही परलोक सिधार गए थे। चाचा-चाची ने बड़ा किया और माँ से शादी करा दी। किशोर ही थे दोनों तब से माँ को ही देखा था तभी तो उनका कभी विरोध नहीं करते थे। उन्हें लगता कि इतने बड़े कुल की बेटी उनके साथ निर्वाह कर रही है यही बहुत बड़ी बात है। ऐसे मातापिता के घर से उसकी दूसरी विदाई हो रही थी। पहली तो बचपन में ही हो गई थी।

शादी के बाद पूर्णिया से पटना आना था। भाइयों से विदा लेकर कार में बैठी तो आँखें नींद से बोझल थीं। मन ही मन कॉलेज जाने के ख्वाब समेटे अपने लाल गोटेदार आँचल में सिमट कर सो गई। सोलह साल की उम्र में ऐसे भी आँखों में नींद और नींद में सपने ही अधिक होते हैं। उसकी आँखों में भी आगे पढ़ने का सपना था। बाबूजी ने कहा भी था,

हाईस्कूल करा दिया है, अब आगे की पढ़ाई ससुराल में करना।” साठ के दशक में ऐसा ही होता था। उसकी शादी 1969 में हो गई थी।

ससुराल में सास नहीं थीं। मायके में छोटे भाइयों के अभिभावक स्वरूप छोटी सी दुल्हन के हिस्से यहाँ भी बिन माँ के आधा दर्जन बच्चे आए। सब के लिए खाना बनाते-खिलाते खुद कब बच्चों की माँ बन गई एहसास ही नहीं हुआ। जब समझ आई तो अपनी बची हुई पढाई पूरी की।

इस बीच समय-समय पर जब भी मायके आती उसे वापस लौटने की इच्छा ही नहीं होती। एक तरफ मोह का बंधन था दूसरी ओर कर्तव्यों के घेरे,वह दोनों में संतुलन स्थापित करती जीवन नैया खे रही थी कि लंबी बीमारी के बाद पिताजी का निधन हो गया तो उसे लगा उसने अपने आदर्श को खो दिया। अब तक पिता के कहे अनुसार ही चलती आई थी। उन्होंने जब जो कहा उसने किया अब उसे सब स्वयं ही सोचना था।

पिता ने जीते जी सारे आदर्श उस में भर दिए थे। इतनी आत्मकथाएँ और बंगाली उपन्यास पढ़ने के लिए दिए थे कि वह जीवन के सभी पहलुओं से अवगत थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में उसे परिवार से दूर न होने दिया था बल्कि नौकरी से सेवानिवृत्त होने पर तीनों लड़कों के बीच ही बेटी के लिए भी ज़मीन खरीद लिया था। हालांकि ज़मीन की ख़रीदी के लिए बिटिया शुरुआत से ही उनके पास एक अकाउंट खुलवा कर उसमें पैसे जमा करती आई थी। चाहते तो उसका ज़मीन कहीं दूर भी ख़रीद सकते थे मगर उनकी बड़ी बेटी उनकी नजर में उनके बेटों की अभिभावक थी जो उनके बाद भी परिवार का ध्यान रखती। ज़मीन के चार टुकड़ों के बीचोबीच बिटिया के नाम की ज़मीन थी।

जब तक वह जीवित रहे किसी ने उससे कुछ न कहा। उसके नाम की जमीन पर छोटे भाई का मकान बन गया और उसमें माँ और भाई रहने भी लगे मगर खून से इतर के रिश्ते शाँति से कहाँ बैठते हैं। जब तब यह विषय उठता कि बड़ी दीदी के नाम की ज़मीन छोटे भाई के नाम पर हो जानी चाहिए। पिता के स्थान पर माँ थीं जो कह देतीं,

आभा को किस बात की कमी है जो मायके में आकर बसेगी। मैं कह दूँगी तो वह ज़मीन छोटे के नाम कर देगी।”

इस बीच 2019 आया, साथ कोरोना लाया। आभा पति के साथ बच्चों के पास थीं। धीरे-धीरे जैसे-जैसे महामारी विषयक जानकारी फैलती गई आभा के पति बीमार होते चले गए। एक किस्म की घबड़ाहट अंदर तक समा गई मानो यह संपूर्ण संसार नष्ट हो जाएगा जबकि आभा आशान्वित रहती कि सब ठीक हो जाएगा मगर कहते हैं न जन्म और मृत्यु तो पुर्वनिर्धारित है उसकी तिथि टल नहीं सकती। कोरोना का डेल्टा वेरिएंट जिसने मार्च-अप्रैल 2021में पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी उसने शिवेंद्र जी को भी अपने चपेट में ले लिया। आभा को ऐसा लगा जैसे उसकी दुनिया ही तबाह हो गई। पिता को खोकर भी वह जीवनसाथी की हिम्मत पर संभल सकी थी मगर अब उसका वह संबल भी टूट चुका था।

उस वक़्त उसे मायके की ज़रूरत थी मगर कोई नहीं आया। दिन,हफ्ते,महिने निकलते गए मगर किसी ने झाँकने की भी हिमाकत नहीं की। आभा के पास उसके साथ कोई था तो उसके अपने बच्चे थे मगर शिवेंद्र जी के साथ मिलकर जिनके लिए तमाम फ़र्ज़ निभाए थे वे सब के सब भुला दिए गए थे। दिल टूटा,मन रोया भी मगर फ़िर पिता की सिखाई बातों ने ही हौसला दिया और वह धीरे-धीरे संभलने लगी। ऐसे में जब फिर से ज़मीन के हस्तांतरण का मामला सामने आया तो इस बार उसकी दृढ़ता अलग थी।

मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे मेरी ज़मीन वापस दो....तुम लोग आराम से रहो!”

वो सब छोड़ो.... तुम वह ज़मीन भाई के नाम कर दो!”

माँ ने कहा तो उससे भी न रहा गया। बोली,

मेरे पिता की निशानी है। उन्होंने मेरे लिए खरीदा था। मैं उससे अपना नाम नहीं हटा सकती।”

इससे तुम्हें क्या हासिल होगा।।?”

संतुष्टि मिलेगी.... आपने जब जो कहा मैंने किया। भाई बहन के काम आई...।”

वह भी तुम्हारे लिए एक पैर पर खड़े रहे।।!”

जब तक बाबूजी थे तभी तक.... अब तो मुझसे कोई सीधे मुँह बात तक नहीं करता।”

जितना किया कम नहीं है.... समय-समय पर तुम्हें आर्थिक मदद भी दी गई है जिसके बदले में ये ज़मीन तुम्हें वापस लौटाना होगा....!”

माँ ने आदेशात्मक रवैया अपनाते हुए ओजपूर्ण आवाज़ में कहा तो आभा ने विरोध जताया,

जो मैंने किया है वह कोई ज़मीन नहीं कर सकती। मत भूलो कि तुम्हारा बेटा जिस नौकरी का पेंशन उठा रहा है वह मेरा ही दिया हुआ है।”

तुम बड़ी हो..... माँ समान हो।।बच्चे कुपात्र हों तो भी माता कुमाता नहीं होती।”

मेरे पास तीन मकान है जिसमें दो का किराया आ रहा है। मुझे सचमुच कुछ नहीं चाहिए मगर जिस तरह काम निकालने के बाद तुम लोगों ने मुझे दूध की मक्खी सा निकाल फेंका है इस तरह मेरे साथ अन्याय हुआ है।।”

क्या बोलती हो।।क्या हमने तुम्हें यही शिक्षा दी थी?”

त्यागमयी बड़ी बहन बनाया था मगर क्यों माँ।।क्या मुझे जनने में दर्द न हुआ था।।क्या मैं अपने किसी फर्ज में चूकी हूँ। मुझमें और तुम्हारे पुत्रों में ऐसा कौन सा फर्क है जो उनका हक मुझसे ज्यादा है।।” बोलते बोलते साँसे फूलने लगी तो स्वर को विराम देते हुए कहा,

आज अगर मैंने त्याग किया तो कल को मेरी बेटी भी त्याग की मूर्ति बनेगी जो मुझे बर्दाश्त नहीं होगा।” इतना कहकर फोन रख दिया।

उसके बाद विदाई से अब तक का सफ़र आँखों में यूँ गुजर गया जैसे ये कल की ही बात हो। पूरी उम्र स्वाभिमान के साथ जीने वाली आभा को ज़मीन,जगह या मकान का कोई मोह न था बल्कि वह तो उस मिठास की दीवानी थी जो उसके अबोध भोले-भाले भाइयों की तोतली बोली में था। जिसे याद कर अब भी उसका कलेजा फटता था मगर आगे बढ़ने की होड़ में वे अपनी स्नेही बहन को भूल चुके थे। भूल चुके थे कि जिस बहन ने गाहे- बगाहे आशीर्वाद के साथ न केवल अनगिनत रुपए थमाए थे बल्कि अपना अगाध स्नेह लुटाया था जो उस ज़मीन से कहीं ज्यादा क़ीमती था। आज उसके एवज़ में उसे स्नेह व सम्मान की ही तो भूख थी। उसने कुछ ज्यादा तो नहीं माँग लिया था।

हालाँकि वह जानती थी कि एक नोटिस बस एक ही नोटिस में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और अंततः वही हुआ जब वकील से सलाह लेकर नोटिस भेजा तो एक ही झटके में ऊँट पहाड़ के नीचे आ गया था। ज़मीन के बदले ज़मीन की बात पर अदालत के बाहर ही पूरा मामला सलट गया। माँ ने बराबर माप की एक जमीन उसे बतौर तोहफ़ा दिया तो उसने भी हस्ताक्षर कर अपनी जमीन का हस्तांतरण भाई के नाम कर दिया।

बढ़ती उम्र के साथ सारे रिश्तों के मायने बदल चुके थे। जिन अबोध भाइयों के लिए अपने सुख का त्याग किया उनकी नजर में वह त्याग था ही नहीं तो आभा ने ज़मीन पर पिता की याद में एक पुस्तकालय का निर्माण कराया जिसमें वे समस्त उपन्यास सहेजे गए जो पिता ने किशोरी पुत्री को भेंट किए थे। पिता की आखिरी इच्छा को पूर्ण करने में पचपन वर्ष जरूर लगे मगर इस कार्य को अंजाम देकर वह आत्मसंतोष से भर उठी। सारे झूठे रिश्तों के बीच एक सच्चा रिश्ता भी था जो किताबों से किताबों तक का था। 

 

आर्या झा

 

 

 

 

 

 

 

 

गीत

 



।।कोई होड़ नहीं।।

दुष्यंत कुमार व्यास

 

कितना गिरता है मानव भी, इसकी कोई होड़ नहीं।

जा पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।

 

आज चढ़ावा भी मंदिर का, नहीं सुरक्षित हाथों में।

डाकू वे  ही  बन  बैठें  हैं, रहा नाम था नाथों में।

सोना-चांदी हीरे-मोती, जनता ने थे दे डाले।

अपने घर में ले जा बैठे, खुद पहरा देने वाले।

पुण्य किसी का पाप बन गया, बन कर चोरी का कारण।

मानव के लालच ने देखो, लिख दी फिर से रामायण।

कालकूट सा जहर पिया है, दिखता कोई तोड़ नहीं।

जा पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।

 

 

आशाएँ जिनसे पाली थी, जिन पर था विश्वास किया।

आज उन्हीं उजले हाथों ने, भर कालिख यह काम किया।

किसको अपना हाथ थमाना, किसको अपना मन देना।

उससे ज्यादा मुश्किल लगता, अब मंदिर में धन देना।

तन-मन जिसको अर्पण करके, फूलों की डाली माला।

आज उन्हीं के कारिंदों ने, कांड नया यह कर डाला।

ऐसा कर्म किया है उनने, जिसका कोई जोड़ नहीं।

जा पहुंचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।।

 

जहाँ चढ़ावा भी चढ़ता है, धन की बारिश होती है।

लाख-लाख जनता के मन की, मन्नत पूरी होती है।

वहीं-वहीं पर ठग जुटते हैं, करने को हेरा-फेरी।

मिल-जुलकर होती है भैय्या,भगवन के धन की चोरी।

भंडारे का भोजन हो तो, कुछ जूठन तो गिरती है।

सेवादारों को वह जूठन भी, अनुपम अमरित लगती है।

संत-असंत यहाँ सब बसते, दिखती सब में खोड़ यहीं।

जा पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।

 

यही अयोध्या वह नगरी है, सीता को जिसने त्यागा।

किया कलंकित उस माता को, रजक दोष देकर भागा।

नारी का अपमान किया था, इस कारण से थी उजड़ी।

चोर-उचक्के भर-भर आए, तभी नगर शोभा बिगड़ी।

करी शिकायत सबसे ऊपर, कसे जरा से तार यहाँ।

चला रहा जो बैठा-बैठा भारत की सरकार जहाँ।

सजा मिले बस इन चोरों को, जिसकी कोई होड़ नहीं।

जा पहुँचा है आज रसातल, आगे कोई ठोड़ नहीं।।

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दुष्यंत कुमार व्यास

रतलाम

जुलाई 2026, अंक 73

  शब्द-सृष्टि जुलाई 2026, अंक 7 3 परामर्शक [ प्रो.हसमुख परमार ] की ओर से.... – दिन कुछ ख़ास है ! संपादकीय(डॉ. पूर्वा शर्मा) – एक साहित्यकार...