शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

कविता

प्रहार

डॉ. अनु मेहता

देखिए-शिरोरेखा गायब, चंद्रबिंदु लापता

और नदारद कहीं अनुस्वार हो गया,

 

भाषा की गुमशुदगी का ये किस्सा

मानो एक मामूली समाचार हो गया।

 

वर्तनी की लड़ाई, मात्राओं के युद्ध में

अज्ञानता का इतना विस्तार हो गया।

 

व्याकरण को बड़ी भारी ठेस लगी,

भाषा के हृदय पर प्रहार हो गया।

 

संस्कृति और सभ्यता का चिह्न है भाषा

बाज़ारवाद में यह महज़ व्यापार हो गया।

 ***


डॉ. अनु मेहता

प्राचार्य एवं विभागाध्यक्षा,

आणंद इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीजी स्टडीज इन आर्टस,

आणंद


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

फरवरी 2026, अंक 68

शब्द-सृष्टि फरवरी 2026, अंक 68     मुक्तक – नव संवत्सर – डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा कविता – बसंत राग – दुष्यन्त कुमार व्यास कविता – 1. कुटुंब (आ...