मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

आलेख

दीपपर्व

डॉ. घनश्याम बादल


दीप बन जलने का संदेश देता है दीपपर्व

अप्पो दीपो भव: कहता है मानव को।

 

दीपावली, प्रकाश का पर्व है जो प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष बहुत कुछ कहता है ।  हर दीया यही संदेश देता है कि जीवन में सबके साथ हिलमिल कर रहने ,खुशियों की रोशनी बाँटने,सबके जीवन में , सुख का  उजास भरने और सबको मधुरता का अहसास कराने  का दूसरा नाम है दीवाली । अकेले आप कितना चमकें, कितना जलें पर दीवावली नहीं बन सकते । यह समष्टि,व्यष्टि और देश व समाज की खुशहाली के उत्सव का महापर्व है ।

दिवाली के संदेश :

जियो सब के लिए :

            दीवाली का पर्व संदेश देता है कि जैसे दीपक प्रकाश के लिए है वैसे ही व्यक्ति समाजहित के लिये है । यदि दीया प्रकाश बाँटने में कोई अवदान नहीं करता है तो महज मिट्टी का आग में पका पिंड मात्र है, उसकी कोई महत्ता नहीं है इसी प्रकार यदि व्यक्ति केवल अपने तक सीमित है वह समाज के लिए कुछ नहीं कर रहा है धर्म के लिए कुछ नहीं कर रहा है तो फिर उसका भी होना न होना बराबर है ।

रोशन करें देश, समाज

 इतना ही नहीं हिल - मिलकर रहने के संदेश के रूप में दीया यह इंगित करता है कि उसकी महत्ता महज उसकी वजह से नहीं वरन बाती व तेल के कारण है । जब तक यें तीनों हिल-मिल कर रहते व कार्य करते हैं तभी तक समाज को रोशन कर सकते हैं तीनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण और अधूरे हैं । साथ - साथ हों तब भी बात नहीं बनती उसके लिए भी अग्नि चाहिए, तूलिका चाहिए यानी प्रकाश अपने आप में जीवन के पाँच तत्वों को समेटे है जो प्रतीक रूप में जल , अग्नि ,वायु , पृथ्वी व आकाश का  प्रतिनिधत्व करते हैं  दीए , तेल बाती आग व तूलिका के रूप में ।

खुशियाँ बाँटिए

उसी तरह हर तरह से सक्षम व समर्थ होने के बाद भी अगर हम देश समाज व जरूरतमंदो के लिए कुछ नहीं करते तो सब व्यर्थ है । अर्थ होने पर भी अर्थहीन है समाज के लिए कुछ नहीं करने वाला व्यक्ति । पर क्या आज इस छिपे संदेश को हम पढ़ समझ पा रहे हैं ? अगर समझते तो दिखावे पर धन न फूँकते, दुखियों के दुख को देख कर भी अनदेखा न करते अपितु दीए की तरह खुशियाँ बाँटते ।

पंच पर्वा है दिवाली

दीपावली में 'पाँच' का बड़ा महत्व है यह सृष्टि के पंचतत्वों , पंच पुण्यों , पंच विकारों , मिष्टान्नों  व पाँच दीयों से शुरू  होने वाला पर्व है । कार्तिक मास की अमावस्या को हम समष्टि  के प्रकाश का पर्व बना सकते हैं ।  मिल जुलकर  रहने का संदेश दे सकते हैं । जैसे प्रकाश पर्व अकेला नहीं आता बल्कि  अपने साथ पांचपर्व धनतेरस, रूपचतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, तथा यमद्वितीया लेकर आता है ।  वैसे ही हम भी पांच सात सात्विक विचारों व गुणों को जोड़ कर, खुद दीए जैसे बनकर दीवाली की रोशनी को कहीं ज्यादा सार्थक व चमकदार बना सकते हैं ।

चंचला लक्ष्मी को करे स्थिर

मिथकों में कहा गया है कि इन पाँचों पर्वों की पूजा से चंचला लक्ष्मी स्थिर रूप से उस घर में विराजती हैं जहाँ कम से कम पांच लोग मिलकर पूजा करते हैं । धन , यश , वैभव , ज्ञान व बुद्धि की प्राप्ति के लिए दीवाली मनाने का उल्लेख वेदों में है तो इससे भी सबक लें हम । धर्म,जातिवाद,संप्रदायवाद,क्षेत्रियतावाद, संकीर्णता व सामाजिक कुरीतियों को नष्ट कर अपनी लक्ष्मी को स्थिर करने का प्रण लें इस बार दीवाली पर ।

जीवन में जोड़ें राम तत्व

दिवाली मुख्यत: हिंदुओं का पर्व है और हिंदू इसे अपने तौर तरीकों, रीति-रिवाजों और संस्कृति के अनुसार मनाने के लिए स्वतंत्र हैं । उनके लिए राम के अयोध्या लौटने का बड़ा महत्व है । रावण का वध करके जहाँ दशरथ पुत्र राम अयोध्या वापस आते हैं और बाद में उसे अपने राम राज्य से समृद्ध व आदर्श राज्य बनाते हैं उसी तरह हम भी दिवाली के पर्व पर राम को महज दशरथ पुत्र राम की वापसी न मानकर राम रूपी तत्व में में नए आयाम जोड़कर कुछ इस तरह मनाएँ कि सत्य,न्याय मर्यादा, संस्कृति और अच्छाइयों का रामराज्य स्थापित हो सके।  इसके लिए हमें पहले तो अपने अंदर के ही उस रावण को मारना होगा जो लगातार हमारी नैतिकता, उज्ज्वल, चरित्र और उन अच्छे विचारों को मार रहा है जिनकी आज बड़ी जरूरत है । उसके बाद हमें अपने मन की अयोध्या को ऐसे दीपों से उजियारना होगा जो न केवल हमारे  मन अपितु  इस भूमंडल को भी आलोकित कर सके ।

प्रदर्शन नहीं दर्शन पर जोर

दिवाली पर हम मिट्टी के दीए जलाकर गरीबों के घर में दिवाली का प्रकाश भेजें जो बड़ी हसरत से हमारी ओर आशा भरी निगाहों से निहारते हैं । संपन्नता  का प्रदर्शन भारत में कभी भी अच्छा नहीं माना गया है हम संपन्न हों, लक्ष्मी पुत्र बनें इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन, अगर हम  अपने आसपास के दुखी लोगों के चेहरों पर एक मुस्कान ला सकें तो इससे बड़ी संपन्नता और आत्म संतुष्टि दूसरी नहीं हो सकती । दीया भी रोशनी अपने लिए नहीं करता बल्कि दूसरों के लिए करता है। ‌

सूरज न सही जुगनू ही बन जाएँ

जैसे एक छोटा सा दीप घनघोर अंधेरे में जलता है और  जितना भी हो सकता है प्रकाश करके अंधकार को लगातार चुनौती देता है उसी तरह हम भी अपनी जिजीविषा और नेक कमाई के जरिए इस घने अंधेरे में एक दीपक बनकर किसी के जीवन में चमक ला सकते हैं । सूरज न सही जुगनू तो बन ही सकते हैं।

इकाई नहीं पंक्ति बनें

अब यह सोचना कि एक अकेले से भला क्या होने वाला है उचित नहीं है क्योंकि अगर हर दीया यह सोचने लगे कि उस अकेले के जलने से क्या होगा तो फिर दीपावली यानी दीपमाला अथवा दीपों की पंक्ति कैसे बनेगी और अंधेरा कैसे हारेगा ? इसी तरह  मानव एक इकाई के रूप में जितना बन पड़े उतना करें और समष्टि के हितभाव के साथ मिलकर  परोपकार की उजास फैलाएँ तो पूरे देश ही नहीं पूरी धरा पर एक आलौकिक दिवाली सुशोभित हो जाए।

ताकि लौट आए रामराज

दिवाली केवल प्रकाश पर्व ही नहीं अपितु मुक्ति का पर्व भी है  जब यह जग हर तरह के तमस से मुक्त हो जाएगा तो फिर रामराज्य किसी कल्पना मात्र का विषय नहीं रह जाएगा और हम वास्तव में राम की वापसी का जश्न आपस में स्नेह, प्रेम, करुणा, दया, ममता, राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता तथा जीवन में उच्च आदर्शों एवं नैतिकता को लाकर रामराज्य की स्थापना करने में अपना महत्तम योगदान दे पाएँगे ।



डॉ. घनश्याम बादल

215, पुष्परचना कुंज,

गोविंद नगर पूर्वाबली

रुड़की - उत्तराखंड - 247667


1 टिप्पणी:

  1. सार्थक और सकारात्मक संदेश देता प्रेरक आलेख। हार्दिक बधाई डॉ. घनश्याम बादल जी

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