ख़ामोशी
प्रीति
अग्रवाल
कैसे
कह दूँ
तुम
ही ग़लत थे
बीच
हमारे
फासले
बहुत थे
कहती
रही
नयनों
से अपने
जी
की बतियाँ
सारे
असमंजस
सारे
सवाल
न
पाकर जवाब
बुझती
रही
बिखरती
रही मैं
टूटती
रही
सुबकती
रही मैं
कब
जानोगे
कभी
तो समझोगे
लंबा
जीवन
प्रतीक्षा
ही प्रतीक्षा
नादानी
मेरी
क्यों
समझ न पाई
तुम
ठहरे
मौन
के उस पार
शब्दों
के आदि
जो
मैं कह न सकी
सुनते
कैसे
खामोशी
बहुत थी
बीच
हमारे
ना
ग़लत मैं
ना
ग़लत तुम थे
सच
तो है ये,
ग़लत
हम दोनों
हम
दोनों सही थे!
–0–
प्रीति
अग्रवाल
कैनेडा

वाह! बहुत बढ़िया चोंका।सुदर्शन रत्नाकर
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आदरणीया दीदी!!
हटाएंबहुत भावपूर्ण
जवाब देंहटाएंआपका हृदयतल से आभार!
जवाब देंहटाएंएक और सुंदर , सार्थक अंक! पत्रिका में स्थान देने के लिए आदरणीया पूर्वा जी का हार्दिक आभार!
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