शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कविता

 




वसन्त जब आता है

पार्वती देवी गौरा

सच है वसन्त जब आता है

विरहिन को ही तरसाता है

पुष्प महकने जब  लगते

प्रियतम की याद दिलाता है।

सच है----

दिन बीतता गिन-गिन कर

करवट लेकर बीते रातें

आँखों की निदिया लेकर वह

 जाने कहाँ उड़ जाता है ।

सच है ---

अश्रु गिरे नैनों से झर-झर

मन व्याकुल हो जाता है

विह्वल होकर इधर-उधर

फिर खुद को समझाता है।

सच है--

पापी पपिहा जब भी बोले

दिल को बहुत जलाता है

चमक चांदनी नभ में ऊपर

लगता उसे चिढ़ाता है।

सच है--

कोयल की मीठी बोली

तन-मन आग लगाता है

आम्र मंजरी की सुगंध

सुधियों को सरसाता है।

सच है---

 ***



पार्वती देवी गौरा

देवरिया


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