साधारणता
में सुख : एक मोची के बहाने
शशिबिन्दुनारायण
मिश्र
दुनिया के हर प्राणी में अपने ढंग की विचित्रता
होती है,
आपमें , हममें और सबमें। यही विचित्रता संसार
में हर व्यक्ति के भीतर आकर्षण के लिए कुछ मौलिक आधार पैदा करती है। आचार्य
हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह वाक्य कभी पढ़ा था। ऐसे ही आधार वाले एक शख्सीयत से
पिछले सप्ताह बोर्ड परीक्षा मूल्यांकन की समाप्ति पर भेंट हुई, पेशे से मोची, उम्र 68- 70
वर्ष के लगभग, नाम जीतनराम। यात्राक्रम में मुझे अपने उपानह
में मरम्मत और पालिश की जरूरत थी, समय सायं 5 बजे का रहा होगा। उस वक्त इस मोची को थोड़े फुर्सत में पर धीमे स्वर में
तन्मय होकर कुछ गुनगुनाते हुए देखा- सुना। शब्द जो मेरे कानों में पड़े --
"पीरितिया कs रीति नाहीं जनलेंs, पिया
हमके छोड़ि गइलें'।।" सुंदर और सुरीली आवाज। पूरी तरह
प्रसन्नचित मुद्रा। मैं चकित रह गया। मैं सोचने लगा कि इस मोची का बावरा मन ऐसा
गीत क्यों गा रहा है? क्या उसके प्यार का स्वप्न टूटा है
अथवा इसकी जवानी के किसी असीम पवित्र प्यार का दर्द उभर आया है अथवा इसकी माशूका
ने इसके साथ कभी विश्वासघात किया है? मैंने कुरेदा कि -का हो
जीतन भाई ! "जवानी के कवनो प्यार के
दर्द उभरि गइल बाs काs ?" जीतन
लजा गये। कहा --"अकेल बइठल रहलीं हँs, कवनो गाहक ना
रहलें तs गुनगुनाये लगलीं।"
इस मोची को अद्भुत मस्ती में देखकर धनपशुओं पर
विचार किया, जिनके पास सबकुछ होता है, पर न सुकून होता है, और न भीतरी मस्ती, न विचारशीलता। सच्ची प्रसन्नता से युक्त उन्नत व्यक्तित्व के लिए अगाध
विद्वता, अपरिमित धन, लोकप्रियता,
सफलता और राजनीतिक या प्रशासनिक या किसी भी तरह का बड़ा पद, ऊँची पहुँच कभी मानक नहीं होती है। असली सुख तो सुकून में है, शान्ति में है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने किसी भी कार्य के प्रारम्भ में
सबसे पहले शान्ति की कामना की है -- "द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष ँ् शान्ति:
....... ......... ....... शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा
शान्तिरेधि।।" भारतीय मनीषा की सर्वोत्तम खोज 'शान्ति'
ही है। यह भी कहा जा सकता है कि संसार के लिए सर्वाधिक जरूरी शब्द
है 'शान्ति'। यदि शान्ति नहीं है तो
जीवन की सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ हैं।
लक्ष्य के प्रति समर्पण और अपने छोटे-बड़े
कार्य/ पेशे के प्रति तत्पर निमग्नता से प्राप्त सुखी लोग,
सम्बन्धों का लिहाज़ और परवाह करने वाले लोग मेरे लिए श्रद्धेय हो
जाते हैं और मेरी लेखनी स्वत: स्फूर्त होकर उन पर चल पड़ती है। चूँकि मैं स्वयं
बहुत ही साधारण व्यक्ति हूँ, न किसी उच्च पद पर हूँ और न तो
बलवान ही हूँ, यह मेरे जीवन का यथार्थ है अर्थात् किसी भी
तरह का आधुनिक वी० आई० पी० नहीं हूँ। उस पर करैला नीम चढ़ा, अपना
काम सिद्ध करने के लिए चाटुकारिता की तमीज भी नहीं है, तो
स्वाभाविक है जीवन कठिन होगा, विरोधी और निंदक भी अधिक
होंगे। हाँ यह सही है कि विद्यार्थिभाव आज भी बना हुआ है, पढ़ने-
लिखने का शौक बरकरार है। साधारण होने के कारण मुझसे साधारण लोग ही मिलते हैं और
ऐसे लोग ही पसंद आते हैं। कभी-कभार ही अच्छे पदों पर सहज और साधारण लोग मिलते हैं,
तो प्रसन्नता से उनसे भी जुड़ना हो पाता है। कोई भी कार्य छोटा या
बड़ा नही होता है, कार्य के प्रति छोटी या बड़ी नीयत होती है,
जो उस कार्य को महत्त्वपूर्ण बनाती है। कर्त्तव्य कैसा भी हो,
जरूरी तो है उसके प्रति निष्ठा और समर्पण। निष्ठा ही किसी कार्य
अथवा व्यक्ति को महत्त्वपूर्ण और बड़ा बनाती है। अंग्रेजी और उर्दू साहित्य के
विलक्षण अध्येता पितामह पं० रामानुज मिश्र ने पेंसिल से अपनी डायरी में एक पन्ने
पर लिखा था -- "Loyalty is greater than the power." (निष्ठा किसी भी सत्ता से बड़ी चीज है)
कर्त्तव्य के
प्रति निष्ठा और जागरूकता ने ही छोटे और साधारण लोगों को दुनिया में असाधारण,
प्रसन्नता से भरा हुआ और महान् बनाया है, उन्हें
अमरता प्रदान की है। रैदास जैसे मोची भी उन्हीं में से एक थे जो कई सौ वर्षों बाद
आज भी हमारे धार्मिक और सभ्य समाज के लिए वरेण्य सन्त बने हुए हैं। रैदास
दीनों-हीनों और दरिद्रों की सेवा में ही ईश्वर की सेवा का दर्शन करते थे। उनका
जीवन दर्शन था -'मन चंगा तो कठौती में गंगा।' रैदास को हमारे सभ्य समाज ने बन्धुत्व का सन्देष्टा कहा है। उत्कृष्ट जीवन
के लिए अभिप्रेरणा का सिद्धांत है -'आत्म-साक्षात्कार'। यह जीवन का दार्शनिक सिद्धांत भी है। यह सबमें और सर्वत्र नहीं होता है।
यह चीज जीतन मोची में भी मुझे दिखाई देती है। 1970 के आसपास
बनारस में एक कवि सम्मेलन आयोजित था, जिसमें उस समय के
हिन्दी के बड़े कवि धूमिल भी आमंत्रित थे। धूमिल के साथ दो अन्य हिन्दी के
महत्त्वपूर्ण कवि मंच पर पहुँचने से पहले बनारस में ही सायं एक मोची की दुकान पर
जूते में पालिश कराने के लिए रुके। धूमिल की प्रसिद्ध कविता 'मोचीराम' उसी घटना पर आधारित है। इस घटना के बारे
में प्रसिद्ध साहित्यकार अरुणेश 'नीरन' जी अक्सर चर्चा करते थे। कवि धूमिल की कविता 'मोचीराम'
में जूते में पालिश कराने के लिए सामने खड़े तीन प्रसिद्ध कवियों से
उन्हें देखे बगैर मोची दृढ़ता और परम स्वाभिमान से कहता है ---- "राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे/ क्षण भर
टटोला और फिर/ जैसे पतियाये हुए स्वर में वह हँसते हुए बोला-- / बाबू जी ! सच कहूँ
मेरी निगाह में, न कोई छोटा है न कोई बड़ा है/ मेरे लिए हर
आदमी एक जोड़ी जूता है, जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है
..... ..... ...... सबको जलाती है सच्चाई/ सबसे होकर
गुजरती है/ कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं/ कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अन्धे
हैं/ वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं/ और पेट की आग से डरते हैं/ जबकि मैं जानता
हूँ कि 'इंकार से भरी हुई चीख'/ और एक
समझदार चुप/ दोनों का मतलब एक है-/ भविष्य गढ़ने में, चुप और
चीख/ अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से/ अपना-अपना फ़र्ज़ अदा करते हैं।" कविता बहुत बड़ी है। धूमिल की यह कविता सामाजिक
यथार्थता और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है। कवि धूमिल ने सामाजिक वास्तविकता
का उद्घाटन करते हुए व्यंग्य के बहाने मोची के दर्द को वाणी दी है और कहना चाहा है
कि हर व्यक्ति को चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उसे अपनी सीमा और
दायरा मालूम होना चाहिए। यह कवियों को चुभने वाली बात रही होगी, लेकिन उक्त मोची की अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा और जागरूकता ने बेहद
संवेदनशील कवि धूमिल से उच्च कोटि की कविता लिखवा ली और वह कविता आज हिन्दी की अमर
कविता है। कई बार मैंने देखा है कि बहुत ऊँचे लोग जिनके पास ऊँचा पद या अधिक
विद्वता या किसी प्रकार की अन्य जुगाड़ू लोकप्रियता या सफलता है और आप उनसे किसी
मामले में कमतर हैं तो ऐसे बड़े लोग चाहते हैं कि कमतर लोग उनके लिए सदैव सुलभ
रहें, उनके आगे-पीछे दुम हिलायें, उनकी
तारीफ़ में बोलें- लिखें, लेकिन ऐसे बड़े लोग कमतर लोगों के
लिए अपना समय देना, बड़प्पन के साथ आचरण प्रस्तुत करना अपना
अपमान, अपनी हेठी समझते हैं। कमतर लोगों के लिए ऐसे तथाकथित
बड़े लोगों के समय की या उनकी उपस्थिति की जरूरत पड़ी तो उनकी तबियत खराब होने का
बहाना होता है अथवा उनके उत्तरों से लगता है कि उनके सिर पर पूरे हिन्दुस्तान की
व्यस्तता का भार है। जहाँ आत्मीय सम्बन्धों के लिए परवाह न हो, जहाँ आत्मीय सम्बन्धों में भी जरूरत पड़ने पर बड़े-छोटे या अधिक प्रसिद्धि
या कम प्रसिद्धि जैसे भाव आड़े आ रहे हों तो ऐसे सम्बन्धों से अलग हो जाना ही
श्रेयस्कर होता है। मैं चाहता हूँ किसी से भी सहज भाव से धीरे- धीरे सम्बन्ध बने,
परस्पर सम्बन्धों में काइयाँपन न हो, बड़े-छोटे
के धरातल पर नहीं। जो लोग भी बड़े-छोटे के
भाव से मुक्त होकर पारस्परिक आत्मीय सम्बन्धों के औचित्य को शिरोधार्य करते हैं,
सम्बन्धों के धरातल पर वे ही बड़े और आदरणीय लोग हैं। मोची का
हाव-भाव कवि धूमिल के हृदय का स्पर्श कर गया होगा। मोची रैदास को भी तो लोगों ने
बहुत बाद में समझा। मेरे गाँव में एक बेहद सज्जन व्यक्ति थे बटोही हरिजन (1926-
2007) बेहद निर्धन लेकिन परम स्वाभिमानी, व्यक्तित्व
में नैतिकता, सद्विवेक और ईमानदारी की पराकाष्ठा, कह सकते हैं समग्रता में एक उदारमना सर्वथा निष्कपट व्यक्तित्व। बटोही
मेरे प्रपितामह मनीषी रचनाकार पं० गणेशदत्त मिश्र 'मदनेश'
के लिए गाँव में बेहद विश्वसनीय थे, बटोही की
निष्कपटता और वफादारी के कारण 'मदनेश' जी
उन्हें पुत्रवत स्नेह देते थे। बटोही मेरे पिता जी से उम्र में 15-16 वर्ष बड़े थे। अनपढ़ बटोही के पास एक पाई भी भूमि जीवन भर नहीं रही,
पर वैसी नैतिकता और स्वाभिमान वाले व्यक्ति गाँव और गाँव के आसपास
के गाँवों में बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। अनपढ़ बटोही वैचारिक और नैतिक
श्रेष्ठता के मानदण्ड थे। अनीति को कभी स्वीकार न करने वाले अपनी पूरी जिंदगी को
दाँव पर लगाकर सम्मान के लिए बटोही अपने जीवन में धन-धान्य से पूर्ण दो समर्थ
अहंकारियों से टकराये भी थे, अपमानित भी हुए, हानि भी उठाई, पर बाद में अहंकारियों को परिणाम भी
भुगतना पड़ा। सन् 1975 में मेरे परिवार में अलग- विलग होने
की बात पर प्रपितामह कवि 'मदनेश' की
अगाध विद्वता, बड़प्पन, प्रतिष्ठा और
सामाजिक प्रभाव का हवाला देते हुए बटोही ने परिवार में अलगाव के जिम्मेदार लोगों
को बहुत धिक्कारा था और परिवार को त्यागने की धमकी दी थी और कुछ दिनों के लिए
त्याग भी दिया था। व्यक्ति अपनी मृत्यु के वर्षों बाद भी यदि आदर से याद किया जा
रहा है तो सोचिए कि वह जीते-जी अपने जीवन में कितना जीवन्त रहा होगा, मनुष्यता के धरातल पर उसने कितनी बड़ी कमाई की होगी। आखिर में करोड़ों
-अरबों की सम्पत्ति वाले कितने लोग अपनी मृत्यु के वर्षों बाद याद किये जाते हैं?
शायद एकाध प्रतिशत या उससे भी कम। संस्मरणों की शृंखला में बटोही पर
सबसे पहले मैंने अपनी समग्र ऊर्जा के साथ संस्मरण लिखा है। देश के जाने-माने
साहित्यकार पद्मश्री डॉ रामदरश मिश्र के आरम्भिक काव्यगुरु थे पं० गणेश दत्त मिश्र
'मदनेश', उनके लेखन का स्रोत यही भाव था। 'वसंत मनाओ' शीर्षक की उनकी कविता हृदय को झकझोरती
है। निराला की 'भिक्षुक' और 'वह तोड़ती पत्थर' कविताएँ पढ़कर क्या मन विचलित नहीं
हो जाता है। प्रेमचंद की 'कफ़न', 'पूस
की रात', 'दूध का दाम', ,बूढ़ी काकी', 'नशा', और
'विध्वंस', जैसी कहानियाँ हमारी मानवीय
संवेदनाओं को झकझोरती हैं, साथ ही शोषित वर्ग के प्रति
सहानुभूति जगाती हैं। इन रचनाकारों का मेरे हृदय पर ऐसा अमिट प्रभाव पड़ा है कि
कहीं भी कोई पसीने से लथपथ मजदूर अथवा कोई मोची दिखता है तो हृदय द्रवित हो जाता
है और उसके प्रति स्वाभाविक सहानुभूति उमड़ पड़ती है। यदि कोई धनवान हो/ किसी
महत्त्वपूर्ण पद पर हो/ माना कि बहुत सफल हो/ बड़ा कवि- लेखक हो और वह धन- पद-
लोकप्रियता के आधार पर भी बहुत बड़ा हो और उस अहं में अहर्निश जी रहा हो और उसमें
किसी प्रकार का किसी के लिए सहानुभूति और त्याग का भाव न हो तो ऐसे बड़े लोगों से
कोसों दूर रहना उचित लगता है, फ़रमाइशी लेखन या किसी को खुश
करने के लिए कुछ भी लिखना अच्छा नहीं लगता है। इस जीतन मोची की दुकान तक ले जाने
वाले मेरे आत्मीय एल० आई० सी० के सेवानिवृत्त डिवीजनल मैनेजर ए० के० पाण्डेय जी
हैं, पाण्डेय जी स्वभावत: भले आदमी हैं, मेरे लिए आदरणीय हैं, सहयोगी, विश्वस्त
मित्र और बड़े भाई सदृश हैं। पाण्डेय जी की हार्दिक इच्छा थी कि मैं जीतन मोची पर कुछ लिखूँ। पाण्डेय जी एकाधिक बार
मुझे जीतन के घर भी लेकर गये हैं, जीतन जब जीवित थे, खाना-पीना भी हुआ है। आज के समय में अपने से कमतर लोगों से एक रस होकर
सहजतापूर्वक सम्बन्ध निबाहना बहुत बड़ी बात होती है, समाज
में ऐसे लोग विरले ही होते हैं। आदर्श ऐसे ही लोग बनते हैं और किसी के हृदय में
ऐसे लोग ही दीर्घ काल तक विराजमान रहते हैं। जीविकोपार्जन का छोटा- बड़ा जो भी
उचित साधन हो, (वह साधन यदि दूसरों को कदापि कष्ट न देने
वाला हो) उसमें यदि व्यक्ति की निष्ठा हो, कह लीजिए व्यक्ति
का जीविकोपार्जन के लिए जो भी औचित्यपूर्ण पेशा हो और उस पेशे के प्रति व्यक्ति
में वफादारी हो, तो उसमें ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रीयता
है, व्यक्ति चाहे जिस कुल का हो, चाहे
जितना विपन्न हो, चाहे जैसा भी हो वह श्रद्धेय हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति ही नागरिक कर्त्तव्यों से युक्त होता है। अपने नागरिक दायित्वों से
युक्त व्यक्ति ही बड़ा है, श्रद्धेय है और वही असली
राष्ट्रवादी व देशभक्त है। हालाँकि इस भौतिक जीवन में जीवन यात्रा निर्विघ्न
निर्वाह के लिए सबको यदा-कदा कुपात्र लोगों के सामने भी झुकना पड़ता है, जो सचमुच में उसके हकदार नहीं होते पर वे साहित्य की किसी विधा में
उत्कृष्ट व्यक्तित्व के रूप में कभी गढ़े तो नहीं जा सकते हैं। कवि धूमिल जैसा
हिन्दी का बड़ा कवि यदि 'मोचीराम' पर
उच्च कोटि की कविता लिखता है तो यह कितनी बड़ी बात है। कवि धूमिल को तो उस मोची
में केवल काम के प्रति निष्ठा दिखी थी। आज इस जीतन मोची में मुझे भी वही निष्ठा,
वही नागरिक कर्त्तव्य दिखाई दिया।
जीतन भाई से मिलना
महज़ संयोग ही रहा, अपने काम में पूरी तरह से
तल्लीन और प्रसन्नता से भरा हुआ। जीतन / बटोही जैसे लोग मुझे कभी भूलते नहीं हैं।
जीतन के पास अच्छा गाने और नगाड़ा बजाने का बेहतरीन हुनर भी था। जीतन अपना काम
करते जा रहे थे, भोजपुरी गीत गुनगुनाते जा रहे थे, मेरा कार्य सम्पन्न होते ही इनकी दुकान पर 4-5
ग्राहक और आये, जिनमें दो लड़कियाँ थीं। लड़कियों ने सैंडिल
बनवाकर 20/- की जगह 10/- देते हुए
झिकझिक किया तो जीतन ने कहा कि "जा बहिनी लोगन, खुश रहs।" हर ग्राहक को संतुष्ट करना , पैसे के लिए
किसी भी ग्राहक से झिकझिक / तू-तू, मैं-मैं न करना, काम करते हुए गुनगुनाते रहना और बातचीत करते हुए चेहरे पर हँसी या
मुस्कराहट लिये हुए यह मोची मेरे लिए प्रिय हो गया। छोटे से छोटे, तुच्छ से तुच्छ काम में भी श्रेष्ठ क्षमता या दक्षता से तल्लीन होना ही
हमें और आपको वरेण्य बनाता है। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। आपकी दक्षता
और निष्ठा ही आपको बड़ा बनाती है।
एक कर्त्तव्यनिष्ठ चपरासी भी किसी अकर्मण्य/
कामचोर अधिकारी से अधिक वरेण्य हो सकता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो
ने आवश्यकताओं के पदानुक्रम में जो अभिप्रेरणा का सिद्धांत दिया है,
उनमें बुनियादी जरूरतें, सुरक्षा, जुड़ाव, सम्मान और आत्म- साक्षात्कार प्रमुख हैं।
आत्म-साक्षात्कार अर्थात् अपनी श्रेष्ठ क्षमता को पहचानना और उसे प्राप्त करना,
अपने आप को सर्वश्रेष्ठ रूप में बनाना। आत्मिक दिव्यता के साथ
आत्मशक्ति इसी से पैदा होती है। इसका उच्च पद -निम्न पद अथवा अमीरी-गरीबी से
रञ्चमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। यह आत्म- साक्षात्कार का भाव धूमिल की कविता के
नायक मोचीराम में, जीतन मोची में, संत
रैदास और बटोही आदि जैसे लोगों में अथवा किसी में भी देखते हुए मैं आह्लादित होता
रहता हूँ। यह आत्म-साक्षात्कार का भाव ही तमाम हानियों, बाधाओं,
संघर्षों, तनावों, अपमानजनक
परिस्थितियों के बावजूद हमें भीतर से प्रसन्न रखता है। यही प्रसन्नता वह मानवीय
मूल्य है जो हमें एहसास कराता है कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? वक्त आपसे यह कभी नहीं पूछता है कि आपने कितने अरब रूपए का महल बनवाया या
कितने करोड़ रूपए की गाड़ी में चले या बल-अधिकार का दुरुपयोग कर कितनों के हक पर
डाका डाला ? समय तो हमेशा यह पूछता ही है कि हम किस तरह के
मनुष्य हो सके, हमने दातव्य भाव से कितनों के चेहरे पर
मुस्कान बिखेरी, अपने आसपास के लोगों को कितना सुनना और
समझना चाहा? स्वाभिमान के साथ जीना और दूसरों को उनका हक
देकर भीतरी प्रसन्नता से युक्त होना, यह आसान नहीं होता।
गुलज़ार साहब की पंक्ति है -- "मुस्कराते बहुत हो तुम, कभी
खुश भी रहा करो।" छोटे-छोटे
दुकानदारों और कमजोर लोगों पर धौंस जमाते हुए, डाँटते हुए,
लात- मुक्का तानते हुए, सताते हुए तथाकथित
बलवान पर स्वभावत: उद्दण्ड लोग अक्सर देखे जाते हैं। मेरा अनुभव कहता है कि कमजोर
की आह हमेशा लगती है। महाभारत के उद्योग पर्व में एक श्लोक आता है। शरशैय्या पर
पड़े हुए अपने जीवन के अन्तिम दिनों में भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा
था----
"आक्रुश्यमानो
नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षत:।
आक्रोष्टारं च
निर्दहति सुकृतं च तितिक्षत:।।"
यह है तो युधिष्ठिर के लिए उपदेश पर पूरे
महाभारत का यह निष्कर्ष भी है। भाव यह है कि सहज- सरल- कमजोर की आह एक न एक दिन
सताने वाले को दग्ध कर देती है, क्षमाशीलता का सबसे
बड़ा परिणाम यही होता है, बशर्ते आप प्रतिक्रियावादी न हों।
दिन डूबने वाला था, जब मैंने फोटो के लिए आग्रह किया,
तो उक्त मोची ने चेहरा उठाया और फिर सकुचाते हुए तुरन्त नीचे कर
लिया। आज कुछ फुर्सत में था। बोर्ड परीक्षा में मूल्यांकन समाप्ति पर घर आ रहा था।
इसलिए सोचा समय का सदुपयोग हो और सार्थक लेखनी चले। मेरे एक मित्र हैं डॉ गिरिजेश
कुमार पाण्डेय,जो एक ऐडेड इण्टर कॉलेज में प्रिंसिपल हैं,
बड़े ही काबिल प्रिंसिपल हैं, वाग्विदग्धता व
लोक व्यवहार के भी धनी हैं और वास्तव में आदर के पात्र हैं। 2026 बोर्ड परीक्षा में
मूल्यांकन के लिए हम लोग एक ही केन्द्र पर ड्यूटी कर रहे थे। दोपहर में जलपान के
लिए हम बाहर निकले। एकदम साधारण मामूली ठेले वाली दुकान। जलपान के बाद ठेले वाले
ने चालीस रूपए बिल बताया। मैं पैसे देता, मुझे रोकते हुए डॉ०
पाण्डेय ने पहले ही उसे पचास रुपए की नोट थमा दी। दस रूपए दुकानदार वापस कर ही रहा
था कि डॉ० पाण्डेय ने कहा रखे रहो फिर कभी आयेंगे और हमलोग चल दिये थे। दुकानदार
आधे मिनट तक पाण्डेय जी को विस्फारित नेत्रों से देखता रह गया। हमने एक मामूली दुकानदार
के चेहरे पर जो प्रसन्नता देखी, उसका वर्णन नहीं किया जा
सकता। दातव्य भाव में जो सुकून है, वह किसी चीज में नहीं है।
पाण्डेय जी को
हमने देखा है कि एकदम से छोटे-छोटे दुकानदारों या किसी मोची से काम कराकर पैसे
देने के बाद 10-5 रूपए कभी वापस नहीं लेते। डॉ०
गिरिजेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि मिश्र जी ! उस दुकानदार के चेहरे पर जो खुशी का
भाव है, वही हमारे लिए वास्तव में पुण्य है, यदि हम दूसरे के चेहरे पर खुशी नहीं ला सकते तो दिखावे वाले सारे धार्मिक
अनुष्ठान और दान-पुण्य व्यर्थ लगते हैं। आप लोग भी अपने आसपास ऐसे लोगों की तलाश
कर सकते हैं, ऐसे लोग जरूर होंगे आपके आसपास, जो बड़े तो नहीं पर मनुष्य जरूर हैं, आप और कुछ
उन्हें नहीं दे सकते, पर हृदय से महत्त्व के दो शब्दों का
दान तो कर ही सकते हैं। किसी भी भौतिक प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा शब्द अधिक कारगर
होते हैं, उपनिषदों के अनुसार शब्द ही तो वास्तव में ब्रह्म
हैं, ईश्वर हैं। कुछ भी न हो तो तत्काल आत्मिक परम शान्ति और
सुख मिलता है। यह आलेख भी मैंने केवल अपने अन्त:करण के सुख के लिए लिखा है,
किसी दूसरे को प्रभावित करने के लिए नहीं लिखा। यह अलग बात है कि
यदि आप रुचिपूर्वक पढ़कर सन्तुष्ट हो लेते हैं तो मैं आपका हृदय से आभारी हूँ।
गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने भी रामचरितमानस -- "स्वान्त: सुखाय रघुनाथ गाथा-
भाषानिबद्ध मतिमञ्जुलमातनोति।।" लिखा है। रामचरितमानस को कोई पढ़े या न पढ़े,
कोई श्रद्धापूर्वक पढ़कर लाभ उठाये अथवा अथवा पगला-पगला कर तुलसीदास
को गरियाये अथवा चाहे तो वह भी जवाब में रामचरितमानस से बढ़िया महाकाव्य लिख डाले।
इससे तुलसी बाबा पर भला क्या प्रभाव पड़ता है?
शशिबिन्दुनारायण
मिश्र
रानापार,
बिशुनपुरा,
गोरखपुर,
उत्तरप्रदेश,
पिनकोड-273405

.jpeg)
मोची जीतन राम के व्याज से लेखक ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े एक सरल सहज कर्तव्य के प्रति निष्ठावान,स्वावलंबी ,स्वाभिमानी और ईमानदार व्यक्ति के जीवन में जो आत्म संतोष,प्रसन्नता, सेवाभाव की महत्ता का दिग्दर्शन कराया है,वह यद्यपि है तो दुर्लभ
जवाब देंहटाएंपरन्तु वही मनुष्यता का मानक और व्यक्तित्व का आभूषण है।इसके सामने धन दौलत ,अपार बाहुबल,प्रतिष्ठा एवं विपुल यश भी बौना है।
यह आलेख पढ़ने के बाद लगता है कि अब तक जो यश ख्याति अर्जित की गई वह इस संत प्रकृति जीतन राम के सामने तुच्छ है।`मन चंगा तो कठौती में गंगा` मोची जीतनराम आज के दूसरे रैदास ही हैं। मिश्र जी को इस प्रभावी आलेख के लिए बहुत बहुत साधुवाद।