विद्या ददाति विनयं
श्रीराम पुकार शर्मा
मानव जीवन की सार्थकता किसमें निहित है – ‘केवल ज्ञान-संचय
में या उसके सदुपयोग में ?’ इस संदर्भ में ‘भारतीय मनीषा’ या ‘भारतीय
लोक-नीति वचन’ का एक सूत्र है -
‘विद्या ददाति विनयं, विनयाद्
याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात्
धर्मं ततः सुखम् ॥’
अर्थात, - ‘विद्या व्यक्ति को विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से उसमें योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से ही उसे धन प्राप्त होता है, धन से धर्म (सत्कर्म) संचालित होता है और धर्म से ही व्यक्ति को स्थायी सुख प्राप्त होता है ।’ विद्या से ही साधक को ‘यश’ की भी प्राप्ति होती है । यह श्लोक केवल ‘विद्या’ की प्रशंसा मात्र ही नहीं करता है, बल्कि यह श्लोक व्यक्ति के व्यवहारिक जीवन की सम्पूर्ण यात्रा को ही प्रदर्शित करता है ।
यह विद्या ही साधक या विद्यार्थी के मन से अहंकार को दूर कर, उसको अनुशासित, शालीन और सामाजिक बनाता है, जिससे वह समाज को अपना बेहतर योगदान दे सके । लेकिन इस श्लोक में उल्लेखित शब्द ‘विनय’ का आशय, केवल झुकना मात्र न होकर, सही बातों को स्वीकार करने की क्षमता, अपनी गलती को सुधारने की इच्छा और निरंतर कुछ नया सीखते रहने की प्रवृत्ति से है । साधक में ‘विनय’ भाव का जागरण तभी होता है, जब उसमें जिज्ञासा, श्रद्धा और विचार-शक्ति तीनों का समुचित संतुलन बन जाता है । वर्तमान में लोग ‘ज्ञान’ शब्द का आशय, केवल सूचना प्राप्ति-मात्र को ही मान लिये हैं । परंतु यह श्लोक स्पष्ट संकेत करता है कि यदि ज्ञान से विनय नहीं आया, तो वह ज्ञान अभी अधूरा ही है । अभी भी उसे प्राप्ति के लिए चित्त को एकाग्र करने की आवश्यकता है ।
एकलव्य वन में रहते हुए, औपरचिक शिक्षण से नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण में जागृत भाव से गुरू द्रोणाचार्य को अपना गुरू मानकर, उनकी प्रतिमा को स्थापित कर, निरंतर श्रद्धा, विनय और अखंड-साधना के साथ धनुर्विद्या का अभ्यास किया । वह गुरू द्रोणाचार्य-शिष्य अर्जुन के समकक्ष धनुर्विद्या में पारंगत भी हुआ था । लेकिन उसको जागतिक सम्मान न प्राप्त हुआ था । उसकी गुरू-भक्ति और तन्मय साधना, यह दर्शाती है कि सच्चा विनय बाहरी मान्यता से नहीं, बल्कि अंतःकरण की श्रद्धा और समर्पण से उत्पन्न हुआ करता ।
इसी प्रकार बालक नचिकेता, तीन दिनों तक मृत्यु के देवता यम का प्रतीक्षा किया । फिर यम के समक्ष बिना डर-भय का ही अत्यंत ही विनम्रता, धैर्यता और दृढ़ता के साथ आत्मा और मृत्यु के रहस्य से संबंधित कई प्रश्न पूछा । अंततः उसकी विनय, धैर्य और सत्य के प्रति विशेष आग्रह से प्रसन्न होकर, यम ने उसे परम ज्ञान को प्रदान किया । नचिकेता का यह प्रसंग भी ‘विद्या ददाति विनयं’ के वास्तविक अर्थ को अत्यंत सजीव रूप में प्रकट करता है ।
उपरोक्त दोनों प्रसंग स्पष्ट करते हैं कि जहाँ अंतःकरण में विनय और गुरू के प्रति श्रद्धा होती है, वहाँ ज्ञान के सभी द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं । जहाँ साधना और श्रद्धा, ज्ञान के मार्ग को प्रशस्त करती हैं, वहीं जिज्ञासा और विनय उसे पूर्णता को प्रदान करते हैं ।
जब कोई कहता है कि – ‘मैं सब कुछ जान गया हूँ ।’ तो वहीं पर उसके ज्ञान का विकास-क्रम थम जाता है । लेकिन जब किसी को अनुभव होता है कि - ‘अभी तो मुझे बहुत कुछ जानना शेष है ।’ तब उसका ज्ञान निरंतर ऊर्ध्वमुखी प्रगतिशील बना रहता है । वास्तव में ‘विद्या ददाति विनयं’ का मूल अर्थ यही है कि सच्चा ज्ञान मन के अहंकार को नष्ट करता है । अहंकार ही व्यक्ति से कहलवाता है कि - ‘मैं सब कुछ जानता हूँ ।’ फिर अहंकार इतना प्रबल हो जाता है कि व्यक्ति के मन में कोई नई बात या ज्ञान भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाती है । इसके विपरीत विनय कहती है, - ‘मुझे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है । मैं सीखने के लिए तत्पर हूँ ।’ यही भाव उसमें ज्ञान प्रवेश हेतु सभी द्वार खोल देता है । अहंकारी मन जल से भरे हुए उस पात्र के समान होता है, जिसमें और जल नहीं डाला जा सकता है, जबकि विनम्र मन सर्वदा खाली पात्र की तरह होता है, जिसमें बराबर कुछ न कुछ और ज्ञान-जल डाला जा सकता है ।
उपनिषदों में भी स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ है कि जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण ज्ञानी मान लेता है, वह वास्तव में ज्ञान के मार्ग से भ्रमित है । जब कोई कहता है कि ‘मैं इतना जान गया हूँ कि मुझे अब कुछ नहीं जानना है ।’ ऐसा कहने वाला व्यक्ति स्वयं के अज्ञान-कक्ष के भीतर ही घूमते रहता है । भारतीय महान चिंतक ब्रह्मवादी याज्ञवल्क्य का भी मानना है कि जहाँ जानने की सीमा समाप्त होती है, वहाँ अज्ञानता का बोध प्रारंभ हो जाता है । प्रारंभ में साधक या शिष्य किसी वस्तु को उसके रूप, नाम और तथ्य मात्र को ही समझता है । फिर धीरे-धीरे वह उसके कारण, तत्त्व और सिद्धांत तक पहुँच जाता है । फिर उस पर से परत दर परत जितना हटते जाता है, उतना ही वह उसके सत्य के निकट पहुँचते जाता है । याज्ञवल्क्य संन्यास लेने का विचार करते हैं और अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं कि वे अपनी सारी भौतिक संपत्ति उसे सौंप जाना चाहते हैं । इस पर विदुषी मैत्रेयी अत्यंत विनम्र होकर जानना चाहती है कि ‘यदि उसे सम्पूर्ण पृथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो जाए, तो क्या वह अमरत्व (परम सुख) को प्राप्त कर सकती है ?’ याज्ञवल्क्य असमंजस में पड़ गए और उत्तर देते हैं, - ‘नहीं, धन से केवल सांसारिक सुख ही प्राप्त हो सकता है, अमरत्व नहीं ।’ तब आत्मसंयमी मैत्रेयी अपने हाथों को जोड़े प्रार्थना पूर्वक कहती हैं, - ‘यदि उससे अमरत्व नहीं मिलता, तो मुझे उस धन का क्या प्रयोजन ? आप मुझे वह ज्ञान दें, जिससे अमरत्व की प्राप्ति हो ।’
यदि व्यक्ति ज्ञान उपार्जन के मार्ग को बंद कर देवे, तो उसका संचित ज्ञान अप्रासंगिक होते हुए मलिन हो जाएगा । उसमें कीड़े-मकौड़ों के समान हानिकारक तत्व पैदा होंगे और फिर उसे विषैला बना देंगे । संसार स्थिर नहीं है, सारा ब्रह्मांड स्थिर नहीं है । सब गतिशील है । ज्ञान की प्रकृति भी स्थिर नहीं, प्रवाही होती है । प्रतिपल संदर्भ भी बदलते रहते हैं । पुरानी समझ, नए संदर्भ में अपर्याप्त हो जाती है । जबकि निरंतर अर्जित ज्ञान, संचित ज्ञान को परिमार्जित करते हुए, उसे हमेशा प्रासंगिक बनाए रखता है । यदि ज्ञान सरोवर में नए जल आते रहे, तो वह सदैव ताज़ा और उपयोगी बना रहेगा । लेकिन जल का आगमन द्वार बंद कर दिया जाए, तो ठहरा जल धीरे-धीरे दूषित और अनुपयोगी हो जाएगा । अर्थात, जो सीखना बंद करता है, वह अप्रासंगिक बन जाता है । वह एक तरह से बोझ बन जाता है ।
तो क्या केवल सीखते रहना ही पर्याप्त है । तब तो हम कुछ भी सीख
सकते हैं - कुकर्म या सुकर्म । लेकिन केवल सीखते रहना ही पर्याप्त नहीं है । बल्कि
अपनी ज्ञान चक्षु को खोले हुए, उसे कैसे सीखना है, किस दिशा में सीखना है और किस उद्देश्य से सीखना है ? इनका भी उसके साथ समायोजन
होना चाहिए । ज्ञान का मूल्य तभी होता है, जब वह विवेक और
धर्म से निर्देशित हो । अन्यथा, अनजाने में ही पाप-क्रम में भी प्रवृत हो सकते हैं
। इसीलिए भगवद्गीता में भी ‘ज्ञान’ के साथ ‘बुद्धि’ और ‘विवेक’ पर भी विशेष बल
दिया गया है । इसी से उस ज्ञान का परीक्षण भी होता जाता है कि क्या वह ज्ञान कल्याणकारी
है या हानिकारक ? क्या यह समाज-उत्थान में सहायक है ? क्या
यह धर्म के अनुकूल है या विपरीत ?’
लेकिन तब एक बात ध्यातव्य है । साधक या शिष्य, अभी अबोध है,
तब भला वह सही-गलत का निर्णय स्वयं कैसे कर सकता है ? अनुभव या निर्णय-शक्ति का विकास, तो अभी उसमें हुआ ही नहीं है
। ऐसे में आवश्यकता होती है, उसे एक अनुभवी मार्गदर्शक या ‘गुरू’ की, जो उसकी गलतियों
को शीघ्र पहचान लेवे । उसके परिणामों का पूर्वानुमान कर सके और साधक या शिष्य को भ्रमित
होने से बचा लेवे । गरु आवश्यक है, परंतु साधक या शिष्य में
जागरूकता का भी विकास होना आवश्यक है । गुरू मार्ग दिखाएगा, परंतु उसका अनुसरण, तो
शिष्य को ही करना होगा । इसके लिए साधक को विनम्र भाव से, प्रश्न
और सेवा के द्वारा गुरू से ज्ञान को प्राप्त करते रहना चाहिए । प्रारंभ में गुरू
की बातें, बाहरी प्रकाश समान होता है, परंतु धीरे-धीरे वही प्रकाश साधक के अंतःकरण
में विवेक के रूप में स्थायी बन जाता है । फिर वह स्वयं भी निर्णय लेने में सक्षम
हो जाता है । भगवद्गीता में भी कहा गया है, -
‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥’
अर्थात, - ‘तुम उस (तत्त्व) ज्ञान को गुरू के पास जाकर समझो । उन्हें (गुरू को) साष्टांग प्रणाम करो, विनम्र होकर उनसे जिज्ञासा प्रकट करो और उनकी सेवा करो । वे तत्त्वदर्शी (ज्ञानी) तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे, क्योंकि उन्होंने सत्य का साक्षात् दर्शन किया है ।’
भारतीय शिक्षण के क्षेत्र में सम्पूर्ण प्रकृति, परिवेश और उससे संबंधित सभी उपादान ‘गुरू’ ही हैं । इन सभी से साधक को ज्ञान प्राप्ति होती है, बशर्ते साधक की दृष्टि सीखने वाली हो । इसका सुंदर उदाहरण, ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) के संयुक्त अवतार, दत्तात्रेय के जीवन का है । उन्होंने २४ गुरूओं से ज्ञान प्राप्त किया था । परंतु उनके वे सभी गुरु, व्यक्ति नहीं, बल्कि पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, पशु-पक्षी और विभिन्न जीव-जन्तु आदि रहे थे । जैसे; पृथ्वी - सहनशीलता और धैर्य, वायु - निरासक्ति (सबमें रहकर भी बंधन रहित), आकाश - शून्यता और अनंत विस्तार, चींटी - परिश्रम और परस्पर संगठन, मधुमक्खी - संचय और सामूहिकता, गाय - शांति और करुणा आदि शिक्षाएँ प्रदान करते हैं । परिस्थितियाँ हमारे कठोर गुरू हुआ करती हैं । ये सभी हमारे मौन गुरू हैं, जो बिना शब्दों के, अपने-अपने आधार पर हमें निरंतर यथार्थ शिक्षा प्रदान करते हैं । सबसे बड़ी बात होती है कि जिसमें सीखने की दृष्टि या लालसा है, उसके लिए सृष्टि का प्रत्येक कण ही गुरू है ।
लेकिन अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं । जब विद्या या ज्ञान व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाता है, तो फिर उच्च ज्ञान को प्राप्तकर भी विद्वान व्यक्ति अपराध प्रवृत्ति का क्यों हो जाता है ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसके अनगिनत उदाहरण यत्र-तत्र मिलते ही रहते हैं । एक ओर कहा जाता है कि ‘विद्या ददाति विनयं’ और दूसरी ओर कुछ विद्या से महिमा मंडित विद्वान यथा; डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासक आदि दुराचारी, मानव, समाज और राष्ट्र विरोधी क्यों हो जाते हैं ? ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर दोषी कौन है, विद्या या व्यक्ति ?
विद्या कभी दोषी नहीं हो सकती है । वह तो अपने आप में निष्पक्ष होती है । वह व्यक्ति को केवल सामर्थ्यवान बनाती है । वह निर्माण और विनाश - दोनों का साधन बन सकती है । वह न तो सुकर्म कराती है, न कुकर्म ही । उसके कार्य की प्रकृति, उसे वहन करने वाले साधक पर निर्भर करता है । जैसे - अग्नि भोजन पका सकती है और लापरवाही में उसे जलाकर नष्ट भी कर सकती है । यह तो भोजन बनाने वाले के चरित्र पर निर्भर करता है । यदि विद्या साधक के हृदय को न स्पर्शकर, केवल बुद्धि तक सीमित रह जाए, तो ऐसे में साधक स्वार्थी, क्रूर और चतुर बन जाता है । साधक के अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, कामना जनित भावनाएँ, विद्या को अनैतिक कार्यों के लिए अपना उपकरण बना लेती हैं । अतः विद्या के साथ विवेक और ‘संस्कार’ का होना अनिवार्य है । विद्या ज्ञान-शक्ति देती है, तो उसे संयमित करने दिशा संस्कार ही देता है ।
देखिए न, राम और कृष्ण में तथा रावण और कंस में, प्रचुर ज्ञान था । परंतु रावण और कंस के ज्ञान को अहंकार ने गति प्रदान किया, तो उनका भयानक अंत हुआ । लेकिन राम और कृष्ण ने अपने ज्ञान को अपने उन्नत संस्कार जनित चित से साधा, तो देखिए उनकी जयंती आज भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है । जैसा कि पूर्व में बताया गया कि कभी-कभी व्यक्ति एक विशेष स्तर तक पहुँचकर मान लेता है कि ‘मैं ही श्रेष्ठ हूँ ।’ यहीं से उसमें एक सूक्ष्म अहंकार जन्म लेता है, जो पोषित होकर कालांतर में उसके ज्ञान और सत् कर्मों का प्रबल बाधक बन जाता है । सच्चे (पूर्ण) ज्ञान की पहचान अहंकार को समाप्त कर देने में है । यदि ज्ञान, अहंकार का क्षय नहीं करता है, तो वह अभी पूर्ण नहीं, बल्कि वह ज्ञान-यात्रा के मध्य में ही ठहरा हुआ है ।
तब यह कैसी विडंबना है कि दिव्य ‘शिव तांडव स्तोत्रम’ के रचनाकार तत्कालीन महाज्ञानी रावण को पूर्ण ज्ञान न प्राप्त था ? जबकि पहले उसने अपने दिव्य ज्ञान के आधार पर महान ‘शिव तांडव स्तोत्रम’ ग्रंथ की रचना की थी । बाद में वह दुराचारी और पापी बना था । तो फिर प्रश्न उठता है कि क्या उसका दिव्य ज्ञान, उसमें दुराचरण के प्रवेश को न रोक पाया था ?
तो इसका साफ उत्तर है कि साधक को सच्चे ज्ञान की प्राप्ति और उसका सदुपयोग, उसके निर्मल चित और उसके उच्च संस्कार पर निर्भर करते हैं । रावण के साथ भी यही हुआ । वह अपने पिता ऋषि विश्रवा के उच्च संस्कार के बल पर, तो दिव्य ज्ञान को अर्जित कर लिया । लेकिन उस पर, आसुरी कुल सम्बन्धित माता कैकेसी के आसुरी संस्कार प्रबल रहे थे । बालक के उच्च संस्कार और चरित्र के निर्माण में माता-पिता दोनों के कर्मों का गहरा प्रभाव होता है, तथापि प्रारंभिक अवस्था में मातृ-संस्कारों की ही भूमिका विशेष रहती है । देव तुल्य पिता से प्राप्त अतुलित विद्या शक्ति, उसकी मातृ-आसुरी वृति के पराश्रय पाते ही, निरंतर दुराचार और पाप-कर्म की ओर बढ़ती चली गई । फिर तो वह जगत को ही त्रास देने देव-विरोधी दानव ही बन गया ।
लेकिन इसके विपरीत ‘रत्नाकर’ ज्ञान के अभाव में दस्यु-कर्म में संलग्न था । परंतु बाद में ज्ञान, उसके सुसंस्कार से युक्त होकर, उसके चित को शुद्ध किया । फिर तो वह त्रिकालदर्शी ‘वाल्मीकि’ बनकर ‘रामायण’ जैसी अद्भुत रचना कर डाली । यहाँ पर सुसंस्कार का आशय प्राप्त ज्ञान को कल्याणकारी स्वरूप प्रदान करने से है । इसी तरह से सच्चे ज्ञान का आशय भी केवल तथ्यों को जानना ही नहीं है, बल्कि अन्तः में संचित अहंकार का क्षय, वासनाओं का शमन और विवेक का स्थिरीकरण करने से है । उसमें संचित दुराचार को जड़ से मिटाता है । तो कहा जा सकता है कि साधक में दुराचार का बढ़ना, ज्ञान का दोष नहीं, बल्कि उसके कुसंस्कार, अधूरे ज्ञान और अशुद्ध चित का परिणाम है । शुद्ध चित्त में ज्ञान, प्रकाश बनता है और अशुद्ध चित्त में वही ज्ञान, अहंकार बन जाता है ।
जब सुसंस्कार और चित्त-शुद्धि, ज्ञान संचयन और उसके कल्याणकारी कार्य-स्वरूप के लिए मूलभूत आधार हैं, तो प्राचीन भारतीय समाज ने सिर्फ ज्ञान (शिक्षा) देने वाली संस्थाएँ क्यों बनाईं ? चित्त-शुद्धि वाली संस्थाएँ क्यों न बनाई ?
ऐसा नहीं है कि चित्त-शुद्धि या सुसंस्कार के लिए प्राचीन काल में संस्थाएँ नहीं थीं । प्राचीन भारत में आश्रम व्यवस्था, गुरूकुल प्रणाली, तपोवन, मठ, संन्यास आदि व्यवस्थित परंपरा मौजूद थे । ये सब केवल तथ्य या विषय को पढ़ाने तक ही सीमित न थे, बल्कि जीवन को अनुशासित और सुसंस्कारी बनाने के भी केंद्र हुआ करते थे । उदाहरण के लिए नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशीला, कांचीपुरम, काशी आदि में स्थापित विश्वविद्यालय और संस्थाएँ । वहाँ साधक, विद्या अध्ययन के साथ ही स्वयं समस्त कार्यों को संपादित करते हुए, अपने आचरण के प्रति सजग रहते थे । चित्त की शुद्धि व्यक्ति के स्वयं के अभ्यास, संस्कार और जीवन-शैली से आती है, वे यह सब वहीं प्राप्त किया करते थे । याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त आदि ऋषि-मुनियों के आश्रमों में, विद्या का अर्थ ही, साधक के सदाचरण, उचित साधना और आत्मानुशासन का योग हुआ करता था, जो साधक को श्रेष्ठ बनाया करते थे । इसलिए वहाँ ‘ज्ञान’ अपने आप ‘शुद्धि’ से जुड़ा था ।
कोई भी संस्था पढ़ा तो सकती है, नियम भी दे सकती है, पर भीतर के अहंकार, लोभ, ईर्ष्या को साधक स्वयं ही अभ्यास से देख और साध सकता है । चित्त की शुद्धता के बिना, बहुत पढ़े-लिखे विद्वजन यथा; डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासक आदि दुराचारी, बेईमान, हत्यारे, प्राणी-उत्पीड़क होते जा रहे हैं । मूल बात यह है कि ज्ञान तो बढ़ा है, पर अन्तः चेतना जागृत न हुई है । बुद्धि तेज हुई है, पर मन शुद्ध नहीं हुआ है । फलतः मन अपराध प्रवृत्ति की ओर गतिशील ही रहा ।
तो अब प्रश्न उठता है कि हमारे सनातनी समाज और देश में ‘चित्तशुद्धि’ के स्थान पर ‘सूचनात्मक ज्ञान’ को ही क्यों प्रमुख माना गया ? उसी से सम्बन्धित विद्यालयों और संस्थाओं की स्थापना क्यों हुई है ? ‘चित्त-शुद्धि’ विषयक संस्थाओं की स्थापना क्यों न हुई है ?
यह सत्य है कि आज अधिकांश लोग शिक्षित और विशेष डिग्रीधारी
हैं । पर उनमें ‘विद्या ददाति विनयं’ की सर्वथा कमी है । समयानुसार बड़े नगर, राज्य और उनकी माँगों को पूर्ण करने वाले बड़े बाजारों की
स्थापना हुई । फिर उनके संचालन, भरण-पोषण और रक्षा के लिए बड़ी संख्या में मात्र सूचना-ज्ञान
से सम्पन्न शिक्षित लोगों की आवश्यकता भी बढ़ी । याद रहे ‘चरित्र और चित्त-शुद्धि’
कदापि नहीं । उनकी माँगों के अनुकूल ही शिक्षण संस्थाएँ, सूचनात्मक-ज्ञान सम्पन्न ‘शिक्षा-दुकान’
के स्वरूप को धारण कर सिर्फ सूचनात्मक-ज्ञान-सम्पन्न शिक्षितों को ढालने लगी हैं ।
अर्थात, आज शिक्षा सेवा का माध्यम कदापि नहीं, बल्कि धन-उपार्जन का बड़ा माध्यम है
। फलतः इसमें चित्त-शुद्धि का कोई स्थान ही नहीं बचा रह गया है । ऐसे परिवेश में विद्वान
लोग भौतिक सुख-साधनों से अवश्य सम्पन्न हुए हैं, पर चरित्र और चित्त-शुद्धि के
अभाव में अहंकारी और ईर्ष्यालु भी हुए हैं । नतिजन पारिवार व समाज से क्रमशः दूर भी
होते जा रहे हैं । जीवन में बिखराव और एकाकीपन बढ़ता गया है । वर्तमान सभ्यता ने वैश्विक
व्यापार जनित ज्ञान को, तो प्रचुर विकसित किया है, पर चित-साधना
को नगण्य कर दिया है । फलतः आज चतुर्दिक त्रासजन्य वातावरण दिखाई दे रहा है ।
वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था में सफलता का मानदण्ड अधिक से अधिक ‘अंक-प्राप्ति’ बन गया है, जो विद्यार्थी में परस्पर प्रेम के स्थान पर ईर्ष्या-द्वेष, प्रतिस्पर्धा, बढ़ते मानसिक दबाव, एकाकीपन आदि उनके निश्चल हृदय को कुंठित करते जा रहे हैं । विद्यार्थी निरंतर कागज पर सूचना प्राप्त करने वाली संवेदन-शून्य मशीन बन गया है, क्योंकि उसकी सफलता को केवल ‘अंक, पद, धन’ से आँका जा रहा है ।
अंक, बुद्धि को मापते हैं, पर व्यवहार और आत्मचिंतन, मानवीय उच्च चरित्र को प्रकट करते हैं । यही तो जीवन
और समाज के लिए की आवश्यकता है । अतः आज की आवश्यकता
यह नहीं कि विद्यार्थी केवल अंकों की प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बनें, बल्कि यह है कि वह विनय, विवेक और
चरित्र में भी उत्कृष्ट बनें, क्योंकि वही शिक्षा वास्तव में ‘विद्या’ कहलाने
योग्य है । तभी शिक्षा का मूल उद्देश्य भी
पूर्ण होगा ।
‘विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम् ।’
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा – 711101









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