विष्णु
पद छंद
1.
छुप-छुप
मीरा रोये ..
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी
मन
का मंदिर सूना-सूना,झर-झर अश्रु बहें।
रोये
मन का कोना-कोना,किससे पीर कहें।।
गलियाँ छूटीं द्वारे
छूटे ,सबने
छोड़ दिया।
ठौर कहाँ जो तूने मोहन,मुखड़ा मोड़ लिया।
टूट गए सब
रिश्ते-नाते, सुमिरन कौन करे।
एक
बार दुख पूछो मोहन,तुम भी मौन धरे।।
श्वास-वर्तिका छोटी होती,लौ भी मंद
पड़ी।।
देखूँ कैसे
तुमको मोहन,
पलकें बंद पड़ी।।
***
चौपाई
छंद
2.
श्रीराम-सेतु
देख-देख
लंका का सागर।
नाच
रहे हनुमन के वानर।।
राम-नाम
की लिए शिलाएँ।
काँधे पर ढो-ढोकर लाएँ।।
राम
नाम की जय है करते।
जोर-जोर हुँकार है भरते।।
तैर
रहीं विकराल शिलाएँ।
वानर
उनको साथ मिलाएँ।।
खड़े
हुए नल-नील किनारे।
राम
लखन सब हर्षित सारे।।
देख
प्रभु श्रीराम की माया।
देवलोक आनन्द
समाया।।
***
3.
नीति
वाक्य
प्रथमपूज्य हैं घर की माता,
फिर मंदिर को जाना जी ।
तात-चरण
के जैसा पावन,
जग में नहीं ठिकाना जी ।।
अन्न
कभी मत छोड़ो जूठा,
जब भी खाएँ खाना जी ।
खून
पसीने से कृषकों के,
बनता है हर दाना जी ।।
दान
पुण्य करते हो जितना,
वही लौट कर आना जी ।
सेवा
सबसे बड़ा धरम है,
वेदों ने भी माना जी ।।
रूप
छोड़ गुण को ही देखो,
जब भी बहुएँ लाना जी ।
बिटिया-तुल्य
समझना उसको,
अगर चैन सुख पाना जी ।।
***
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश
जबलपुर


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