गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कविताई

 

विष्णु पद छंद

1.       

छुप-छुप मीरा रोये ..

 

डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी

मन का मंदिर  सूना-सूना,झर-झर अश्रु बहें।

रोये मन का कोना-कोना,किससे पीर कहें।।

गलियाँ  छूटीं द्वारे   छूटे ,सबने  छोड़  दिया।

ठौर  कहाँ जो तूने मोहन,मुखड़ा मोड़ लिया।

 

टूट  गए  सब रिश्ते-नाते, सुमिरन कौन करे।

एक बार दुख पूछो मोहन,तुम भी मौन धरे।।

श्वास-वर्तिका  छोटी होती,लौ भी मंद पड़ी।।

देखूँ  कैसे  तुमको  मोहन, पलकें  बंद पड़ी।।

***

चौपाई छंद

2.

श्रीराम-सेतु

 

देख-देख लंका का सागर।

नाच रहे हनुमन के वानर।।

राम-नाम की लिए शिलाएँ।

काँधे  पर ढो-ढोकर लाएँ।।

 

राम नाम की जय है करते।

जोर-जोर  हुँकार है भरते।।

 

तैर रहीं  विकराल शिलाएँ।

वानर उनको साथ मिलाएँ।।

 

खड़े हुए नल-नील किनारे।

राम लखन सब हर्षित सारे।।

देख प्रभु श्रीराम की  माया।

देवलोक  आनन्द  समाया।।

***

3.

नीति वाक्य

 

प्रथमपूज्य हैं घर की माता,

        फिर मंदिर को जाना जी ।

तात-चरण के जैसा पावन,

       जग में नहीं ठिकाना जी ।।

अन्न कभी मत छोड़ो जूठा,

         जब भी खाएँ खाना जी ।

खून पसीने से कृषकों के,

          बनता है हर दाना जी ।।

 

दान पुण्य करते हो जितना,

          वही लौट कर आना जी ।

सेवा सबसे बड़ा धरम है,

              वेदों ने भी माना जी ।।

रूप छोड़ गुण को ही देखो,

          जब भी बहुएँ लाना जी ।

बिटिया-तुल्य समझना उसको,

         अगर चैन सुख पाना जी ।।

***    


डॉ. अनिल कुमार बाजपेयी काव्यांश

जबलपुर


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