गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

कविताई

 



1.

युद्धं देहि!

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

(1)

वह एक भूखा राक्षस है,

गर्जना से बहरा बनाता आकाश को,

निगलता आता खेतों को

और मिट्टी में दफन करता रोटियों को।

उसके दाँतों में फँसे हैं गाँवों के मासूम चेहरे।

खिलौनों के टुकड़े चबाता,

जबड़ों से टपकाता गरम लाल लहू।

 

खंदकों में सिसकते सिपाही,

भूखे पेटों की चीखें।

राक्षस हँसता है

आग की जीभ से चाटता शहरों की हड्डियाँ।

 

यूक्रेन के धुँधले मैदानों में,

ग़ाज़ा के बालुई-खंडहरों में,

वह फैलता जाता अनंत,

मानवता की अंतिम साँस चुराता, गाता-

युद्धं देहि! युद्धं देहि!! 

(2)

बमों की बौछारें, आँसुओं की लाल बारिश,

आकाश से गिरती बूँदें,

नदियों को बनातीं खून की अविरल धारा।

 

रातें काली, फिर भी

चमकतीं विस्फोटों की लपटें,

माताओं के वक्ष पर गिरतीं,

दिलों को चीरतीं।

 

सड़कों पर, बाजारों में,

अस्पतालों और घरों पर,

बहती है ज़िंदा आग,

पेट्रोल की फुंकार मारते हैं

आसमान से बरसते विषैले नाग।

बना रहे धरती को बाँझ

भीतर तक।

 

हर बूँद में अनेक विलाप,

हर धारा में असंख्य अनाथों की पुकार।

बमों-मिसाइलों की वर्षा

फसलें उगाती सिर्फ कब्रों की; दूर-दूर तक।

हर दिशा से उठता मृत्यु का राग-

युद्धं देहि! युद्धं देहि!! 

(3)

हँसता है राक्षस

छीनकर बच्चों की हँसी।

बचपन की मुस्कान  बन गई

एक ही पल में टूटे काँच की चुभन,

हर कदम खून की लकीरें,

पैरों तले कुचली दूध की बोतलें।

 

कल के खेल के मैदान

आज पटे पड़े हैं मौत के कुँओं से;

खिलौने सारे चीर डाले संगीनों ने।

हँसी के टुकड़े चमकते,

आँखों में सिसकियाँ जगाते।

 

अफगानिस्तान के रास्तों पर,

तेहरान के स्कूलों में,

बचपन मरता है धीरे-धीरे,

चुभन से सिसकता।

 

मासूम चेहरे काले धुएँ में डूबे,

सपने चूर-चूर, यह चुभन अमिट,

युद्ध की विरासत, पीढ़ियों को कुरेदती।

प्रतिध्वनियों में गूँजता है अट्टहास-

युद्धं देहि! युद्धं देहि!! 

(4)

घायल है सफ़ेद कबूतर,

तोड़ दिए गए हैं पंख उसके,

जला दी गई है जैतून की शाख;

फिर भी तड़पता उड़ने को,

आकाश की ओर निहारता।

 

परों से टपक रहा काला खून,

चोंच में विलाप की धुन,

ट्रक पर लदी शरणार्थी मानवता को देख

आँखों से झरता आँसुओं का झरना।

 

यमन के पहाड़ों से,

लेबनान की घाटियों से,

हरमुज़ के जलडमरूमध्य से-

उड़ने को लालायित,

गिरता है बार-बार,

फिर उठता, फिर फिर उठता

फड़फड़ाता है उम्मीद की घायल पाँखें।

 

कभी तो थकेगा राक्षस,

कर देगा कबूतर को आज़ाद!

 

पर, राक्षस कभी थकता है क्या???

राक्षस कभी छकता है क्या???

 

मृत्यु का पाश लिए हाथ में

लाशों के ढेर पर नाचता है राक्षस-

युद्धं देहि! युद्धं देहि!!

युद्धं देहि! युद्धं देहि!! 

(5)

बुद्धं देहि! बुद्धं देहि!!

बुद्धं देहि! बुद्धं देहि!!

******


2.

कविता है : युद्ध के बावजूद

 

बमों की बारिश में खाड़ी का आसमान फट रहा है,

तेल के कुएँ फट रहे हैं,

सारे खाड़ी देश—

सऊदी, कुवैत, बहरीन, अमीरात—

एक-एक कर फूँके जा रहे हैं।

आग की लपटें समंदर को चाट रही हैं,

रेत की हर कण में ज़िद चमक रही है—

सबको जला दो, सबको मिटा दो।”

 

उसी ज़िद की छाया में

सूखे कुएँ में डूबता दीपक

अपनी लौ को निगल रहा है,

फिर भी जलता है—

जैसे अबादान और बुस्हेर के कुएँ

तेल की आग में डूबते हुए भी

एक आखिरी चिंगारी बचा रहे हैं।

 

टूटे दर्पण का अंतिम टुकड़ा

तेहरान और तेल अवीव के बीच लुढ़क रहा है,

जिसमें दोनों तरफ़ की आँखें

एक-दूसरे को देख रही हैं—

खुद को ही नहीं पहचान पातीं।

टुकड़ा हँसता है,

खून और तेल से चमकता है।

 

रक्तरंजित पतंग

खाड़ी के आसमान पर उड़ रही है,

डोरी कट चुकी है,

फिर भी लहराती है—

जैसे दुबई और दोहा के बीच

लोगों के सपने

मिसाइलों की छाया में भी

ऊँचे जाते हैं, गिरते नहीं।

 

खनिज युद्ध के बीच

ज़मीन फट रही है,

काला तेल और नीला पानी

एक-दूसरे को नोच रहे हैं,

फिर भी एक हरा पौधा

पत्थर चीरकर निकल आया है—

जिसकी पत्तियाँ

बमों की आँच और ज़िद की लपटों में भी

हिल रही हैं,

मुरझाती नहीं।

 

पानी माँगता बच्चा

रियाद की जलती सड़क पर खड़ा है,

नदी सूखी,

तेल के कुएँ उबल रहे,

तो उसने कागज़ का जहाज़ बनाया,

उसमें अपनी आँसू की एक बूँद डाली।

जहाज़ सूखे तट और जलते खाड़ी पर भी

बहने लगा—

जैसे कविता

इस ज़िद के युद्ध में

अकेली तैर रही हो।

 

दीपक डूब रहा है,

दर्पण टूट रहा है,

पतंग गिर रही है,

पौधा जल रहा है,

बच्चा चुप है।

 

फिर भी

एक छोटी सी लौ,

एक टुकड़ा,

एक डोरी,

एक पत्ता,

एक जहाज़—

सब साथ-साथ

साँस ले रहे हैं।

 

और यही साँस

अभी भी

दुनिया को

ज़िंदा रखे हुए है।

***


3.

धरती के युद्धप्रिय चौधरियों के नाम

 

सुनो,

धरती के युद्धप्रिय चौधरियो!

 

तुम्हारी संगमरमरी मेज़ों पर

फैले हुए नक्शों से बहुत दूर

आज रात

आकाश की छाती फट रही है।

 

एक-एक करके

खुल रहे हैं नरक के दरवाज़े;

और हर दरवाज़े से

एक जलती हुई धातु उतरती है

जो थोड़ी देर बाद

किसी शहर की नींद में गिरती है

और उसे

मलबे में बदल देती है।

 

देखो, चौधरियो!

तुम्हारी रणनीतियों की चमक

कैसी लगती है धरती पर-

 

एक घर

जिसकी दीवार से

अभी भी टँगा है

किसी बच्चे का स्कूल-बैग,

और उसके नीचे

धूल और खून में दबा पड़ा है

वही बच्चा

जिसकी कॉपी से झाँक रहा है

कल का लिखा

अधूरा निबंध

मेरा प्रिय त्योहार।”

 

एक अस्पताल

जहाँ

ऑक्सीजन के सिलेंडरों से पहले

पहुँच गया है धुआँ।

 

एक माँ

जो मलबे में

अपने बच्चे का नाम पुकारते-पुकारते

अचानक चुप हो गई है -

उसे दिख गई है

उसकी लाल जूती

पत्थरों के बीच।

 

यही है

तुम्हारी सुरक्षा?

यही है

तुम्हारी विजय?

 

सुनो चौधरियो!

तुम्हारी भाषाओं में

युद्ध एक शब्द है,

एक नीति है,

एक प्रेस-कॉन्फ़्रेंस है।

 

लेकिन धरती की भाषा में

युद्ध का मतलब है-

 

किसी शहर का

रातों-रात अनाथ हो जाना।

किसी स्कूल की घंटी का

हमेशा के लिए

खामोश हो जाना।

किसी पिता का

अपने ही हाथों से

अपने बेटे की कब्र खोदना।

 

और इसी सबके बीच

पृथ्वी

अपनी डायरी खोलकर बैठी है-

 

डायरी

जिसके पन्ने

काग़ज़ के नहीं

मानव देह की स्मृतियों के बने हैं।

 

धरती लिख रही है-

 

आज

एक बाज़ार

धुएँ के नीचे दब गया।

आज

एक शहर ने

अपनी आख़िरी साँस ली।

आज

एक बच्चा

आकाश से नफ़रत करना सीख गया।

 

और तुम?

तुम इन पंक्तियों को पढ़ते हुए

बस जोड़ते हो

अंकों की एक ठंडी पंक्ति-

कितने मरे

कितने घायल

कितने विस्थापित।

 

शर्म करो, चौधरियो!

धरती की डायरी

कोई सरकारी रिपोर्ट नहीं है

जिसे तुम

ग्राफ़ और आँकड़ों में बदल दो।

उसके हर शब्द में

एक चीख़ है

जिसे सुनने की ताक़त

तुम्हारे काँच के कमरों में नहीं बची।

 

देखो-

आकाश में फिर खुला है

एक और नरक का दरवाज़ा।

एक और आग

नीचे उतर रही है

जैसे

सभ्यता के माथे पर

दागा जा रहा हो

लाल-गर्म लोहा।

 

और तुम

उसी आग के नीचे

नई-नई भाषाएँ गढ़ रहे हो-

संतुलन

प्रतिरोध

रणनीतिक जवाब।

 

लेकिन याद रखो, चौधरियो-

जब इतिहास

अपनी अंतिम डायरी लिखेगा

तो वह इन शब्दों को नहीं लिखेगा।

 

वह लिखेगा-

इस पृथ्वी पर

कुछ ऐसे लोग भी थे

जो अपनी सत्ता की भूख में

आकाश को

नरक का दरवाज़ा बना बैठे थे।

 

वह लिखेगा-

उनके समय में

धरती की डायरी के पन्ने

इतने लाल हो गए थे

कि नदियों को भी

अपना पानी धोते-धोते

रोना आने लगा था।

 

वह यह भी लिखेगा-

उन चौधरियों की विजय-गाथाएँ

आख़िरकार

उसी राख में दब गईं

जिसमें

उनके गिराए हुए शहर पड़े थे।

 

सुनो,

धरती के युद्धप्रिय चौधरियो!

अभी भी समय है।

आकाश के उन नरक-दरवाज़ों को

बंद करो।

अगर वे खुले रहे

तो एक दिन

धरती की रक्त-डायरी

इतनी भारी हो जाएगी

कि इतिहास

उसे उठाने से

इनकार कर देगा।

***

डॉ. ऋषभदेव शर्मा

208 , सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर,

रामंतपुर,

हैदराबाद - 500013

***

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