गीत
वाचालों का जोर जहाँ
दुष्यंत
कुमार व्यास
क्या
कहना उनकी बातों पर, बस झूठों का है शोर यहाँ।
मैं
निपट निहत्था क्या बोलूँ, है वाचालों का जोर जहाँ।।
जो
चुप्पै रहना सीखा है
झगड़ा आधा वो जीता है
पर बहस सदा जो करता है,
वह अपनों से ही रीता है।
मत कहो किसी को कुछ ऐसा,
जो चुभे
हृदय में जाकर के।
दे
तोड़ सभी रिश्ते-नाते,
लड़े
कभी सन्मुख आकर के।
हर बात सुनो तुम चुप्पै से,
क्यों करना शोर-शराबा अब।
शब्दों से कैसे सुलझेगी,
उलझी गुत्थी सालों से जब।
कुछ
कहो नहीं कुछ सुनो नहीं,बस करना अपना काम यहाँ
यह
समय बड़ा ही मलहम है भर देता सबके घाव जहाँ।
शब्दों के
घाव बड़े गहरे,
कुछ और फफोले पड़ते हैं।
पीर छुपा कर अपने मन में,
बस शूल हृदय में गड़ते हैं।
मत करो हरा सहलाकर तुम,
इनको बस यूँ ही रहने दो।
जब झरे अश्रु मृदु नयनों से,
अमरत सा उनको लगने दो।
पा जाते जीवन दान नया,
जब अधर गुलाबी छूते हैं।
अंतस की सारी पीड़ा को,
कुछ क्षण में ही हर लेते हैं।
वह
धरे अधर जब अधरों पर,पूछे नयनों से दर्द कहाँ।
उत्तर
नयनों से देता हूँ, तुमने चूमा है अभी जहाँ।।
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दुष्यंत
कुमार व्यास
रतलाम (मध्यप्रदेश)


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