गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

आलेख

इतिहास, मिथक और आस्था का संगम ‘रामटेक’

श्रीराम पुकार शर्मा

रामटेक, पौराणिकता, आध्यात्मिकता, ऐतिहासिकता और मनोरम प्राकृतिक स्वरूपों से परिपूर्ण एक अनुपम चतुरंग संगम-स्थल है, जो महाराष्ट्र के विदर्भ अञ्चल, जो पौराणिक पात्र रुक्मिणी (श्रीकृष्ण की पत्नी), दमयंती (नल की पत्नी) और लोपामुद्रा (महर्षि अगस्त की पत्नी) की जन्मभूमि रही है, वह वर्तमान नागपुर शहर से लगभग ५० किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित, श्रीराममय एक पवित्र नगर-कस्बा है । इसके पार्श्व में बहुत ही करीब एक पहाड़ी की चोटी पर गढ़ (किला) है, जिसमें श्रीराम जी का भव्य मंदिर स्थित है । इसे ‘श्रीराम गढ़मन्दिर’ कहा जाता है । सघन हरीतिमा से आच्छादित, इस पर्वत के गढ़ या किला मंदिर से तथा इसके निकटवर्ती विभिन्न प्राचीन मंदिरों से आठों प्रहर गूँजित श्रीरामनाम की पावन गूँजित ध्वनि, पूरे क्षेत्र को ही आठोंयाम भक्तिमय बनाए रखती है और आगंतुकों के मन-मंदिर में धनुर्धारी वनवासी श्रीराम की आकर्षक तेजपुंज छवि को अंकित कर देती है । यहाँ पर स्थित लगभग सभी मंदिर, अपनी पौराणिकता, स्थापत्य-कला के चमत्कारों व धर्मगत सांस्कृतिक महत्वों से युक्त, भारत के अतीत के एक सुंदर चित्र-पट को ही प्रस्तुत करते हैं ।

पौराणिक काल में यह ‘रामटेक’ पर्वत प्रसिद्ध सघन दण्डकारण्य का ही एक हिस्सा हुआ करता था । पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक तथ्यों, शिलालेखों तथा पांडुलिपियों में यह पर्वत रामगिरि, सिंदूरगिरि, तपमगिरि या तपगिरि आदि विभिन्न नामों से वर्णित है । इसके विविध नाम, इसकी भव्य पौराणिकता, आध्यात्मिकता, ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक महत्व को ही अभिव्यक्त करते हैं । इसके बहुत पास ही इसकी घाटी में खिंडसी, अंबाला सहित कई पवित्र झील, जलकुंड, जल-प्रपात, प्राचीन मंदिर आदि हैं, जो सम्मिलित भाव से अतीत से लेकर आजतक विभिन्न आध्यामिक साधकों, प्रकृति-प्रेमियों और इतिहास-शोधकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं । वर्तमान में यह रामटेक प्राचीन श्रीराम मंदिर, अगस्त मुनि आश्रम, कालिदास स्मरण स्थल, बहुत ही सुंदर खिंडसी झील, अंबाला झील, जैन दिगम्बर शांतिनाथ मंदिर आदि के लिए प्रसिद्ध है । हरीतिमायुक्त पहाड़ियों, सघन घाटियों, वन्य-जीव-जंतुओं व पक्षियों से युक्त यह पर्वतीय स्थल, आगंतुकों के मन को सांसारिकता से मुक्त करने में पूर्ण रूपेन सक्षम है ।

लगभग सतयुग के अन्त में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र - हिरण्यकशिपु या हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष हुए थे । हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या करके ब्रह्मा जी से अपनी समझ के अनुसार स्वयं की अमरता के लिए विचित्र वरदान प्राप्त कर लिया था । जिसके अनुसार न वह किसी मनुष्य द्वारा, न पशु द्वारा; न दिन में, न रात में; न घर में, न बाहर; न धरती पर, न आकाश में; न किसी अस्त्र से और न किसी शस्त्र से ही मरेगा । इस वरदान को पाते ही वह अपने आप को अमर समझने लगा । फलतः वह प्रबल अहंकारी, अत्याचारी और ईश्वर विरोधी बन गया और स्वयं को भगवान तक घोषित कर दिया था । उसने अपने ही विष्णु-भक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए कई प्रयास किया था । कई पौराणिक कथाओं में उल्लेखित है कि अंततः भगवान विष्णु ने नरसिंह (आधा नर-आधा सिंह) के विचित्र स्वरूप को धारण कर, संध्या के समय (न दिन/न रात); दहलीज पर (न अंदर/न बाहर); अपनी जांघों पर रखकर (न धरती/ न आकाश); अपने छुरे सदृश नखों (न अस्त्र/न शस्त्र) से उसका वध इसी पर्वतीय चोटी के आस-पास ही कहीं किया था । माना जाता है कि उस समय उससे प्रवाहित अथाह रक्त से यह अञ्चल रक्तिम हो गया था, जिसका रक्ताभ स्वरूप आज भी परिलक्षित होता है । भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए, तो यहाँ की लौह-अंश युक्त क्वार्टजाइट और नीस संरचनात्मक चट्टानों और उसके अपरदन से निर्मित, यहाँ की प्राचीन और कठोर भूमि, सौर-प्रकाश में रक्तवर्णी आभा विखेरती है । इसी कारण, इस पहाड़ी को इसके रक्तिम स्वरूप के अनुकूल ‘सिंदूरगिरि’ भी कहा जाता है ।

इस ‘सिंदूरगिरि’ के आस-पास का सम्पूर्ण भू-भाग, कम ऊँचाई के पर्वतीय शिखरों, घाटियों, सरिताओं, झीलों आदि से युक्त विराट प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण हुआ करता था । त्रेता युग में यह अञ्चल विराट दंडकारण्य का ही एक हिस्सा हुआ करता था । इसी पर्वत-शिखर पर महर्षि अगस्त अपने विद्व शिष्यों के साथ रहते और तप-कार्य किया करते थे । फलतः ऋषियों की तप-भूमि के अनुकूल इस पवित्र स्थान को कई शास्त्रों में ‘तपमगिरि’ या ‘तपगिरि’ नामों से भी उल्लेख किया गया है । अपने वनवास काल में दक्षिण भूमि-प्रदेश में गमन करने के समय, श्रीराम जी अपनी भार्या सीता जी और अनुज श्रीलक्ष्मण जी के साथ महर्षि अगस्त जी के आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए, इस ‘तपगिरि’ पर्वत पर आए थे । उस समय इस वनांचल में असुर और उनके क्रूर सहयोगी विचरण किया करते थे । वे क्रूर, तामसी, बलाढ्य और मायावी असुरगण, अक्सर साधारण जनों, साधु-संतों और ऋषि-मुनियों की अकारण ही हत्या कर, उनके शरीर का भक्षण कर जाया करते थे ।

श्रीरामकथा के आदि ग्रंथ ‘वाल्मीकि रामायण’ में प्रत्यक्ष रूप से तो कहीं भी, इस ‘तपगिरि’ या ‘तपमगिरि’ का उल्लेख नहीं हुआ है, परंतु वनवास काल में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का दण्डकारण्य क्षेत्र में भ्रमण तथा दक्षिण भारतीय प्रदेशों की ओर गमन आदि स्पष्ट रूप में वर्णित है । ‘पद्म पुराण’ में भी कहीं-कहीं राम के दक्षिण भूमि प्रवास से संबंधित कई तीर्थ-स्थानों का उल्लेख हुआ है, जिनसे कुछेक स्थानीय परंपराएँ इस ‘रामगिरि’ या ‘रामटेक’ को श्रीराम की वनयात्रा से जोड़ती हैं ।

दण्डकारण्य में विचरण करते हुए, मुनिश्रेष्ठ शरभंग को बैकुंठधाम भेजने के पश्चात श्रीराम जी, सीता जी, लक्ष्मण जी और ‘मुनिबर बृदं बिपुल संग’ उस विराट दण्डकारण्य में आगे बढ़े चले । एक स्थान पर ‘मुनिबर बृदं बिपुल’ ने श्रीराम जी को ‘हड्डियों का एक विराट अंबार’ को दिखाया था, जो ऋषि-मुनि और साधु-भक्तों के अवशेष मात्र थे । गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने ‘रामचरितमानस’ के ‘अरण्यकाण्ड’ में इस संदर्भ में लिखा है -

‘अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥

जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी । सबदरसी तुम्ह अंतरजामी ॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए । सुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥’

‘मुनिबर बृदं बिपुल’ के श्रीमुख से इतना सुनते ही भक्त-वत्सल वनवासी श्रीरघुवीर के नेत्रों में करुणा, अश्रू बनकर छलक आई । फिर उन्होंने अपनी दोनों आजान भुजाओं को उठाकर, दसों दिशाओं को साक्षी मानकर कठोर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूँगा ।

‘निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह ।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥’

चुकी इसी ‘तपगिरि’ पर्वत शिखर पर श्रीराम जी ने धरती को असुरों से मुक्त करने की कठोर प्रतिज्ञा ली थी । फलतः श्रीराम की प्रतिज्ञा (टेक) स्थल के रूप स्मरण हेतु इस पर्वत-शिखर को ‘रामटेक’ की पवित्र संज्ञा प्रदान की गई, जो आज तक स्थाई है । इसी रामटेक पर्वत पर महर्षि अगस्त के आश्रम में श्रीराम जी अपनी भार्या सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ उनके श्रीदर्शन को प्राप्त करने पधारे थे । महर्षि अगस्त ने रावण तथा उसके अनुचर असुरों के अत्याचारों से श्रीराम जी को अवगत करवाया और उन्हें रावण के शस्‍त्र-ज्ञान की भी जानकारी दी । फिर उन्होंने श्रीराम जी को पुरुषोत्तम जानकर ही अत्याचारी असुरों के नाश हेतु उपयुक्त दिव्य ब्रह्मास्‍त्र भी प्रदान किया था, जिससे श्रीराम जी ने अंततः रावण का वध किया था । तत्पश्चात श्रीराम जी ने यहीं पर सभी तीर्थों को ‘अम्बाकुंड भोगवती’ में आमंत्रित किया और असुरों द्वारा मारे गए सभी ज्ञात-अज्ञात ऋषियों के लिए तर्पण भी किया था । वर्तमान में वह ‘अंबाकुण्ड’ या ‘अम्बाला झील’ के नाम से प्रसिद्ध है । इसी स्‍थान पर माता सीता जी ने रसोई बनाकर अपने हाथों से स्‍थानीय सभी ऋषियों-मुनियों को भोजन कराया था । ‘अंबाकुण्ड’ या ‘अम्बाला झील’ के किनारे अभी भी सालों भर, तर्पण-यज्ञ अनुष्ठित होते ही रहते हैं ।

महर्षि अगस्त्य जी अपनी पत्नी लोपामुद्रा, जो विदर्भ की राजकन्या थी, के साथ ही, श्रीराम को देवी सीता एवं अनुज लक्ष्मण के साथ इसी तपोगिरि (रामटेक) पर्वत पर ज्योति के रूप में सदैव विराजमान रहने का सादर आग्रह किया था । उनके आग्रह को सम्मान देते हुए, श्रीराम जी अपनी भार्या सीताजी और अनुज श्रीलक्ष्मण जी के साथ अपने वनवास काल के महत्वपूर्ण चार माह इसी तपोभूमि पर बिताए थे । वे आस-पास के सघन वनों में विचरण करते हुए, ऋषि-मुनियों और मनुष्यों के जीवन की रक्षा हेतु, असुरों और उनके क्रूर सहयोगियों का संहार करते रहे थे । यहीं पर उन्होंने संबुक राक्षस का भी वध किया था । फिर बाद में वे पंचवटी की ओर गमन किए थे । इसके बाद से यह पवित्र ‘रामटेक’ पर्वत ‘रामगिरि’ के भी नाम से प्रसिद्ध रहा है । यहाँ के पहाड़ी दर्रे, घाटियाँ, झरनें, पगडंडियाँ, झीलें आदि, आज भी श्रीराम की पौराणिक यात्रा की गवाही देते हैं । ऐसा माना जाता है कि महर्षि अगस्त्य जी के आश्रम में जो ज्योति आज भी प्रज्ज्वलित है, वह वास्तव में त्रेता युग से विराजमान श्रीराम, देवी सीता एवं लक्ष्मण का ही प्रतिरूप स्वरूप ज्योति ही विराजमान है ।

प्राचीन ऐतिहासिक कविकुलश्रेष्ठ कालिदास ने अपनी प्रमुख साहित्यिक दूतिकाव्य ‘मेघदूत’ के प्रारम्भिक अंश को इसी ‘रामगिरि’ या ‘रामटेक’ पर लिखा था । ‘मेघदूत’ के मंगलाचरण श्लोक (प्रथम श्लोक) में श्रीराम-सीता जी के साथ इस ‘रामगिरि’ या ‘रामटेक’ के संबंध को बताते हुए, अपने नाट्य-पात्र यक्ष के बारे में बताते हुए, इस पवित्र रामगिरि पर्वत की वंदना की है -

‘कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः
शापेनास्तंगमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः ।
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ॥’

अर्थात, - ‘अपनी सद्यविवाहिता पत्नी के प्रति विशेष प्रेमाग्रह के कारण, अपने प्रति कर्तव्य में एक सेवक यक्ष की लापरवाही करने के कारण, उसके स्वामी धन कुबेर ने एक वर्ष के लिए निर्वासित होने का श्राप दे दिया, जिससे उसकी सारी महिमा या शक्तियाँ समाप्त हो गई । अपनी प्रिया के विरह-दग्ध में श्रापित यक्ष, जनकतनया (सीता) के स्नान करने से पवित्र जलधाराओं और जलकुंडों वाले, स्निग्ध-छाया से युक्त, इसी रामगिरि पर ही किसी आश्रम में निवास करता है ।’

‘मेघदूत’ के इस श्लोक का ‘रामगिर्याश्रमेषु’ शब्द स्पष्ट करता है कि यह रामगिरि, कालिदास के काल में अर्थात, गुप्तकाल में भी एक विशेष तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध था । यहाँ कई आश्रम हुआ करते थे । इसके साथ ही ‘जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु’ शब्द भी जनक-पुत्री सीता द्वारा स्नान करने के कारण, यहाँ के जलकुंडों को पवित्र जलाशय के रूप में परिणत होने का उल्लेख हुआ है । अर्थात श्रीराम–सीता से संबंधित होने के कारण, इस रामगिरि पर्वत को विशेष आदर-सम्मान देने की परंपरा, उस काल से आज तक प्रचलित है ।

ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार रामटेक में स्थित प्राचीन राम मंदिर, जिसे स्थानीय लोग ‘गढ़ रामगिरि मंदिर’ कहा करते हैं, का निर्माण चौथी-पाँचवीं सदी में गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री और वाकाटक शासक रुद्रसेन की पत्नी प्रभावती देवी ने अपने विशेष मार्गदर्शन में करवाया था । उन्होंने मंदिर की पूजा तथा अन्य व्यवस्था हेतु कई प्रकार के दान दिये थे । उनसे संबंधित ताम्रपत्र और शिलालेख, आज भी रामटेक के श्रीलक्ष्मण स्वामी के मंदिर में तथा अन्यत्र मौजूद हैं । बाद में नागपूरकर भोंसला राजघराने के संस्थापक महान पराक्रमी प्रथम रघुजी ने रामटेक के अंबाला झील में स्नान कर हाथ में उसके जल को धारणकर प्रतिज्ञा की थी कि देवगढ़ के युद्ध में विजय मिलने पर, वे गढ़ (रामगिरि या रामटेक) पर श्रीरामजी की मूर्तियों की स्थापना करेंगे । श्रीराम जी के आशीर्वाद से देवगढ़ की युद्ध में उन्हें आशातीत विजय प्राप्त हुई । तब उन्होंने जयपुर से श्रीरामजी की मूर्तियाँ मँगवाई ।

लेकिन उन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करने के एक दिन पूर्व ही उनके स्वप्न में श्रीरामजी ने बताया कि पास में प्रवाहित सूर नदी में डूबी सूरक्षित मेरी मूर्तियों को ही स्थापना करो । तुरंत उनकी सेना सूर नदी में मूर्तियों को ढूँढने के लिए उतरी । उस नदी में केवल श्रीराम जी की ही नहीं, बल्कि सीतामाई और लक्ष्मणस्वामी, तीनों की प्रस्तर से निर्मित भव्य मूर्तियाँ प्राप्त हुईं । इन तीनों मूर्तियों को ही राजा रघु जी ने बहुत धूमधाम से गढ़मंदिर में स्थापना कारवाई । जयपूर से लाई गई मूर्तियाँ, आज भी गढ़पर सुरक्षित रखी हुई हैं । राजा रघुजी ने भगवान की नित्य सेवा-पूजा-अर्चना के लिए विद्व श्रध्दायुक्त सेवकों की नियुक्त और धार्मिक स्थलों पर अक्सर होने वाले हमलों से रक्षार्थ मंदिर के परिसर के चतुर्दिक मजबूत किला का निर्माण करवाया । फलतः इसे ‘गढ़ (किला) मंदिर’ भी कहा जाने लगा है । भले ही रामटेक में श्रीराम-प्रवास की बातें सदियाँ बीत गई हैं, परंतु तब से आज तक इसका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि समयानुकूल बढ़ता ही गया है, जो इसके साथ श्रीराम की सानिध्यता की ही महिमा है ।

इसी काल के रामटेक के गढ़ परिसर में श्रीविष्णु को समर्पित दो प्रमुख मंदिर - वराह मंदिर और त्रिविक्रम मंदिर भी निर्मित हैं । इन मंदिरों से कुछ ही दूरी पर भगवान नरसिंह को समर्पित दो अन्य मंदिर - रुद्र नरसिंह और केवल नरसिंह, भी विदर्भ प्रदेश के वाकटक राजवंश काल में निर्मित हैं । इन सभी मंदिरों की विस्तृत स्थाप्य-कला, नक्काशी व मूर्तिकला शैली पर, गुप्त तथा वाकाटक कालीन कलात्मक शैलियों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है । उनकी स्थापना के सदियों बाद 12वीं और 14वीं शताब्दी के बीच स्थानीय यादव वंश ने भी रामटेक के विकास में अपना विशेष योगदान दिया था । उनके शासन काल में राम के पवित्र पदचिह्नों को यत्र-तत्र ढूंढ-ढूंढकर छोटे-बड़े कई मंदिरों का निर्माण हुआ था, जिससे रामटेक का धार्मिक महत्व अपेक्षाकृत और बढ़ गया । बाद में मराठा राजवंशों ने भी इस पावन स्थल के धार्मिक महत्व को बनाए रखा । इस प्रकार रामटेक पौराणिक काल से लेकर आज तक धर्म और कला के परस्पर अभिन्न घनिष्ठ स्वरूप का प्रबल दृष्टांत बना रहा है ।

श्रीराम की लंबी वनयात्रा के दौरान भले ही यह ‘रामटेक’ उनके थोड़े दिनों के लिए ही सही, प्रवास-स्थल बनकर, उनकी सानिध्यता को प्राप्त किया था । यहाँ पर भव्य मंदिरों के निर्माण से बहुत पहले से ही, प्रारंभिक स्थानीय उपासक लोग भगवान श्रीराम के ही माने जाने वाले पवित्र चरण-चिह्नों की पूजा-अर्चना और अपने अनुकूल चढ़ावे चढ़ाते रहे थे । रामटेक के गढ़मंदिर को आज भी तपस्या और साधना-सिद्धि के लिए प्रबल जागृत-स्थल माना जाता है । महर्षि अगस्त के शिष्य परंपराओं में भगवान विष्णु के अंश, सिध्दयोगी नागार्जुन स्वामी, १३ वीं सदी के महानुभाव पंथ के संस्थापक समाज सुधारक और दार्शनिक सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी गिरधर, १६ सदी के श्रीनारायाण स्वामी आदि के लिए यह रामगिरि तपः-स्थल रहा है । माना जाता है कि श्रीचक्रधर स्वामी, आज भी अदृश्य रूप में रामटेक में ही वास करते है और कई बार वे अपने भक्तों तथा स्थानीय लोगों को अपना दिव्य दर्शन दे चुके हैं ।

रामटेक में कविकुलगुरु कालिदास के स्मरण हेतु ‘कालिदास स्मारक स्थल’ भी निर्मित है, जो बहुत कुछ अपनी प्राचीनता को अपने में समेटे सुंदर कलात्मक स्मारक भवन है । उसके अंदर की विभिन्न दीवारों पर कालिदास के नाटकों के विविध प्रसंगों और पात्रों की अनुकृत मनोरम छवि अंकित हैं । कहीं ऋषिकन्या शकुंतला हिरण-शावक के साथ खेलती हुई, कहीं यक्ष द्वारा मेघों को संवाद देते हुए, कहीं ‘रघुवंशम्’ के श्रीराम-सीता-लक्ष्मण के मनोरम छवि अंकित है । ‘कालिदास स्मारक स्थल’ में महाकवि के नाटक के विविध पात्र और प्रसंग, सब के सब जीवंत हो उठते हैं ।

 

विदर्भ (उत्तर-पूर्वी महाराष्ट्र) में लोक प्रचलित ‘रामगिरी-माहात्म्य’ की मराठी व्याख्या में इस ‘रामटेक’ को श्रीराम, सीतामाई और लक्ष्मण स्वामी का प्रवास का पवित्र स्थल मानकर, इससे संबंधित कई स्तुति-परक पद्य रचना मिलते हैं । समय के साथ ही, वे स्तुतिपरक गेय पद्य स्थानीय वैष्णव और श्रीरामभक्ति के कीर्तन या पारायण में स्थायी स्थान को प्राप्त कर लिये हैं । विदर्भ अञ्चल के मंदिरों तथा उनके विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में वे स्तुति-परक पद-गीत सादरपूर्वक गाए जाते हैं । वे पद्य-रचना ‘रामटेक’ या ‘रामगिरि’ को एक विशेष तपोभूमि और आध्यात्मिक पावन-क्षेत्र रूप में प्रतिष्ठित कराती हैं । यथा; -

‘रामगिरीचा हा डोंगर पावन, सीतेच्या चरणांनी पावला ।
रामनामा गाजे शिखरावर, वन-तपोभूमी तेजाळला ।’

रामटेक के ‘श्रीरामचंद्र स्वामी मंदिर’ में प्रायः प्रतिदिन ही स्थानीय भक्ति-परंपरा के अनुकूल चार चरण वाले विदर्भ की पद्य रचना ‘ओवी’ और बिना लय भंगित ‘अभंग-रूप’ के लोक-पद गाए जाते हैं । इन गेय-पदों में भी रामगिरि पर बसे श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जी की स्तुति और और आदर-सम्मान मिलता है । यथा; -

‘रामगिरी वसे श्रीराम, सीते संगे दिव्य धाम;
दर्शनासी येती जन, पावन होते त्रिभुवन ।’

आज भी यह ‘रामटेक’ अनगिनत श्रीराम-भक्ति अन्वेषी साधु-संतों की तप-साधना की भूमि रही है । यहाँ की आध्यात्मिकता, चतुर्दिक फैले मनोरम प्राकृतिक सौन्दर्य और यहाँ के कण-कण में विद्यमान ऐतिहासिक तथ्य, अपने-अपने आधार पर प्रतिवर्ष अनायास ही हजारों-लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं । भक्त विशेष को अपने अन्तः में रामटेक और इसके इर्द-गिर्द में सर्वत्र ही तपस्वी वल्कल वस्त्र धारण किए हुए वनवासी श्रीराम, सीता और लक्ष्मण जी ही दिखाई देते हैं । यही तो रामटेक की यथार्थता है ।


श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा –
711101

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