ऋतु-गीत
: लोक जीवन की धरोहर
इंद्र
कुमार दीक्षित
हमारी
भारतीय संस्कृति में वर्ष पर्यंत उल्लास पूर्वक मनाए जानेवाले उत्सव ,पर्व त्यौहार और समारोह मूलतः कृषि कर्म से जुड़े हुए हैं,जो खेतों की जुताई की सहित, बीज बुआई की समहुत, फसल की सिंचाई निराई गुड़ाई
उसमें में फल ( बीज)लगने के समय नवान्न ग्रहण(नेवान ) करने,उनकी
कटाई कर खलिहान में एकत्र करने, मड़ाई दंवाई, अन्न घर में लाने रखने, खरिहान बढ़ाकर कुर्मुन्नन करने
के क्रिया कलापों से संबंधित अवसरों के हैं।
हमारा सारा जीवन-चक्र छ: ऋतुओं
वसंत, ग्रीष्म,वर्षा, शरद, शिशिर और हेमंत के इर्द-गिर्द घूमता है। इन
ऋतुओं को उल्लास पूर्वक भोगने की परंपरा में
लोक मानस ने देवी देवताओं (सूर्य,चंद्रमा, इंद्र, वरुण, कुबेर, यम ,शिव ,पार्वती, दुर्गा, काली, डीह बाबा बरम
बाबा, स्थानीय देव-
देवी गण आदि) की
कल्पना किया तथ उनका आशीर्वाद लेने के क्रम में पूजन अर्चन, गीत,पचरा स्तुति आदि से उन्हें प्रसन्न कर
आशीर्वाद प्राप्त कर सुखपूर्वक
जीवनयापन में प्रवृत्त रहा।
ऋतु गीतों की यह परंपरा कितनी पुरानी है,
हम कह नहीं सकते। इनमें, चैती, पचराही(चैत में ), ग्रीष्म
(वैशाख-जेठ) में मुंडन जनेऊ, हवन, शादी ब्याह के गीत, वर्षा (आषाढ़ सावन भादो) में, रोपनी सोहनी, कजरी, मल्हार, आल्हा ,लोरिकायन, प्रेमाख्यान, रामायण
शरद (भादो ,क्वार)में देवी गीत ,शिशिर
( कार्तिक अगहन)में कटनी, ओसौनी, छठ पूजा,गोधन , पीडिया और नहान गीत,हेमंत (पूस माघ)में विरह,
कुटनी, पिसनी, जतसार,
गौना आदि के गीत और
वसंत(फागुन) में होली ,धमार, फाग और बारहमासा गीत प्रमुख रूप से गाए जाते हैं। ये
गीत ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों, युवक युवतियों,
महिलाओं तथा बड़े बूढों पुरुषों के लोक कंठ में युगों-युगों से रचे
बसे तो हैं ही, काल क्रम में नित नवीन होकर जुड़ते भी रहे
हैं।
आदिवासी और ग्रामीण जन-जीवन
का प्रकृति से सहज साम्य-साहचर्य होता है, उनके सारे
क्रिया कलाप खेलकूद खेती बारी, शादी ब्याह, मनोरंजन और शिक्षा वनों खेतों नदियों,
पहाड़ों, रेगिस्तानों, मैदानों के बीच ही संपन्न हुआ करते हैं इसलिए उनके जीवन की घड़ी ऋतुओं
द्वारा ही संचालित हुआ करती है, उद्योग तकनीक शिक्षा
और राजनीति ने विगत पचास वर्षों से इसमें हस्तक्षेप करके प्रकृति से उनके लय का संतुलन बिगाड़ कर रख
दिया है। कृषि प्रधान देश होने के कारण हमारे देश की संस्कृति और साहित्य पर
ग्रामीण परिवेश और लोक का विशेष प्रभाव है।यही कारण है कि जन्मोत्सव,मुंडन, जनेऊ, नव गृह प्रवेश,
शादी ब्याह, वधूआगमन, तीर्थाटन,
साइत समहुत, पूजन अर्चन,
कूप खनन, मरणोपरांत के संस्कार उचित और अनुकूल ऋतुओं में किए
जाने की परंपरा अक्षुण्य रूप से प्रचलित है।
संस्कृत , हिंदी
तथा लोक साहित्य में षड् ऋतुओं का मनमोहक वर्णन मिलता है, आयुर्वेद में भी रहन सहन खानपान ,इलाज ऋतु चक्र के परिवर्तन के अनुरूप ही किए जाने का
विधान वर्णित है। देखा जाय तो मनुष्य के सामाजिक आर्थिक,सांस्कृतिक
और राजनीतिक जीवन के प्रत्येक पक्ष को ऋतु चक्र प्रभावित करता है।
ऋतु गीतों की प्रथम कड़ी का आरंभ इच्छा ( काम) के देवता कामदेव की आराधना की ऋतु
वसंत से होता है।
कवि
बोल उठता है – ऋतुपति गए आय हाय गुंजन लागे भंवरा,
टेसू कचनार अनारवा वन में विकसाय।
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बीत
गया है ताप शीत का आतप हुआ सघन है
दिग्दिगंत
के बांध खुल गए नंदी धारा गगन है।।
मधु ऋतु में संसार के सभी जड़ चेतन जीव
असीम उल्लास उत्साह और ऊर्जा से भर उठते हैं, शिराओं
में रक्त संचार बढ़ जाता है, तन मन अनुराग रंजित हो उठता है,
कवियों के मन में नवीन कल्पनाएँ साकार होने लगती
हैं,वह प्रकृति- देवी के नवल
श्रृंगार पर मुग्ध हो उठता है,और उसकी सरस वाणी से वासंती गीत सहज ही फूट पड़ते हैं –
डोले
बिरिछिया के पाती,पवन उतपाती अंगनवाँ
फुलवा
के कलियन पर डोले भंवरवा
सुधिया
जगावे रामा सँझवा सबेरवा,
ग़मकि
ग़मकि उठे बेइला जगावे अधिराती पवनवा।
होलिका दहन के साथ ही नव-संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है, खेतों में पकी फसलों
की बालियाँ झुक कर लटक जाती हैं , आम की मोजरें छोटी
हरी गदराई अमियों से लद जाती हैं, महुआ के फूलों की मादक सुगंध नथुनों में भर कर मन को बेचैन कर देती है और
कोयल की कूक बाग बगीचों में उथल पुथल मचा देती है। ऐसे में भोर-भिनुसारे हाथों में हंसिया उठाए किसान जब खेतों में खड़ी फसल काटने निकलता
है तो उसके कंठ से चइता के मधुर बोल स्वत: फूट पड़ते हैं –
कुहू
कुहू बोले कोयलिया हो रामा अमवा के बगिया
कंगना
में नेहिया के आसरा बन्हाइल
अंगूरी
के पौरे-
पोर मुनरी कसाइल ।
निनिया उड़ासे अधिरतिया हो रामा,
अमवा के बगिया।।
प्रगल्भ वसंत जब रेखिया उठान पर होता है उसी बीच आता है ‘नवरात्र’ देवी
आराधना का पर्व। गाँव सीवान का काली चौरा
प्रात: काल चूड़ी सजे हाथों में महकते फूलों की डाली उठाए सौभाग्यकमिनी
ललनाओं के स्वर में देवी गीतों से गूँज उठता है –
निबिया
की डारी मइया डारेली झूलाअवा कि झूली झूली हो
मइया
गावेली गीति की झूली झूली हो।।
संपूर्ण वातावरण धार कपूर लवांग अगरबत्ती
की पवित्र धूम्र सुगंध से आप्लावित हो उठता है और मन मस्तिष्क में दिव्य
तरंगें उठने लगती हैं। गोस्वामी तुलसी दास
ने भी चैत्रमास की प्रकृति का क्या मोहक वर्णन किया है –
फूलहि
फ़लहि विटप विधि नाना, मंजु वलित वर बेलि बिताना।
गुंज
मंजुबर मधुकर श्रेणी त्रिविध बेयार बहहिं सुख देनी।।
लोक जीवन का नियंता सूर्य जब मेष राशि पर
आता है तो ख़रमास लगता है, इसमें दिन के तापमान में
वृद्धि के साथ पछुआ हवा चलने लगता है,गाँव सीवान तप्त हो
उठते हैं, मार्ग धूल धूसरित हो जाते हैं कृषक समुदाय फसल की
कटाई में व्यस्त हो जाता है, तब यह खरमास जो जनेऊ के लग्न उत्सव के लिए पवित्र माना जाता
है घरों की आंगन बांस से छाए मंडपों और
आम्र पल्लव के बंदनवारों, लिपी पुती कच्ची मिट्टी की दीवारें
हल्दी अयपन गेरू से बने मांगलिक प्रतीकों
तथा हथेलियों की छापों से सज उठते हैं, पीली धोतियाँ और गमछे अलगनियों तथा छज्जों पर सूखते हुए दूर
से ही मंगल उत्सव का संकेत देने लगते हैं,महिलाओं
के मधुर स्वर में संझा पराती,बरुआ, हवन
एवं जनेऊ के गीत गूँजने लगते हैं --
चइतहि बरुआ के तेजी
भयो बैसाखे जे पहुंचेला रे ,
उनूकर
धोती मो फ़िचबों जे बाबा नवगुन दिहैं रे।
भिखी
देहु माई असीस देहु हम त कासी के बाभन रे ।।
खेती के काम से किसान को थोड़ी फुर्सत
मिलते ही आगे खरमास बीतते बीतते विवाह की
लगन शुरू हो जाती है, सुबह शाम सँझा पराती,
चौक पुरावन, मट कोरवा, पितर
नेवता शगुन, बन्ना बन्नी, हल्दी चढ़ाई, नहछू नहवावन, द्वारचार, वरनेति, पाणी ग्रहण, कन्यादान, कोहबर,
गारी, और बिदाई जैसी अनगिनत वैवाहिक रस्मो रिवाज के सरस गीत स्त्रियों के
मधुर कंठ से उठकर वातावरण को गुंजायमान करने लगते हैं। ये गीत वेद ऋचाओं की
भांति पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाओं के कंठ में
आज भी सुरक्षित हैं जिनसे लोक संस्कृति की व्यापकता का अनुमान लगाया जा सकता है,
एक विवाह गीत –
हमारा
ना चाहीं समधी दान ना दहेजवा ना चाहिं धन भंडार हे।
सुन्नर
चाहिं पतोहिया ए समधी,
निम्मन कुलधन- धाम हे!
कुलवा बखानी ले राजा दरबारिया जे
धीयवा
मड़उआ के बीच हे!!
ये सारे मांगलिक कार्य आषाढ़ मास की एकादशी तक शेष हो जाते हैं, तब आकाश में उमड़ते घुमड़ते घने बादलों
और उनसे बरसती बूंदों से किसानों के चेहरे खिल उठते हैं, धरती सरस हो उठती है और किसान नई फसल के बुआई रोपनी सोहनी में प्रवृत्त हो
जाते हैं – कवि कह उठता है –
बरखा
के बुनिया से मटिया सोन्हाइल ,
जेकरे
महक पर मन ललचाइल
अइसन
परेला फुहार रे बरखा के आइल बहार रे
झूमि झूमि बरसे बदरवा!
उधर
सावन की फुहार पड़ते ही सर्वत्र हरियाली छा जाती है,पीपल
बरगद नीम की मोटी मोटी डालों पर झूले पड़ जाते हैं, विवाह गौने के बाद ससुराल गई
लड़कियों का मन पीहर( मायका ) आने के लिए मचल उठता है और वे अपने भाइयों को लिवा
जाने का संदेश पठाने लगती हैं।
ई
मन परे माई के दुलार हो,
सवनवा में आ जइह भइया!
पंचइया,राखी ,तीज , बहुरा जैसे
त्योहारों के बीच सावन में कजरी की बहार आ जाती है –
आइ
गइले सावन के बहार हो पड़ेले रिम झीम बुनिया
झंझरे
गडुआवा गंगा जल पानी
कइसे
घइला उठाईं मो संभार हो पड़ेले रिम झीम
बुनिया!
उधर धारासार बरसते भादों के मेघ खेती किसानी के काम को कुछ दिन के लिए विराम दे
देते हैं, यह समय पावस मास में परदेस कमाने गए पी के याद में घर बैठी बिरहनो के लिए
अत्यंत क्लेशदायक होता है –
आगी
लगे जरि जा भवनवा
सवनवां
में ना अइलें बलमू।।
चिँनगारी
छोडि छोडि चमके बिजुरिआ
आगि
बन बरसेले कारी रे बदरिया।।
भादो
बन बरसे नयनवा ।।सवनवां---
कतहूँक
जाइलाँ त लागे नाहीं मनवाँ
घरवा
में ढूकीलां त काटेला अंगनवा
कगवो
ना बोलेला सगुनवां।।सवनवां-----
घनघोर बरसात के न कटने वाले नीरस दिनों के बीतते ही प्रकृति एक
बार फिर ‘सम’ पर आ जाती है। खरीफ की फसल में धान की बालियाँ पक कर लटक जाती हैं,
उधर धान की कटाई और गेहूँ के फसल की बुआई के बीच दशहरा, दिवाली, गोधन, छठ और पीडिया के पर्व गाँव सीवान के हृदय की
सांस्कृतिक धड़कन बढ़ा देते हैं , बाहर देस परदेस में कमाने
गए बहरवासू लोग बरस बरस का त्यौहार मनाने अपने गाँव के घर लौट पड़ते हैं, किसी को
कोसी भरने की फिक्र है तो किसी को खाद बीज
का जुगाड़ करना है, किसी को बहन के गौने का चक्कर है तो किसी
को भाई का विवाह तय करना है।
छठ
पर्व अब न केवल बिहार वासियों का वरन
दूसरे देशों में बसे पूरे
भारतवंशियों का त्यौहार बन चुका है, पटना से
मुंबई तक, दरभंगा से कोलकाता तक ही नहीं
न्यूयार्क
और लंदन तक इसकी धूम है। यह पूरे विश्व में भारतीयों का सांस्कृतिक प्रतीक बन कर
उभरा है। संपूर्ण विश्व के लोग इस ठेठ बिहारी त्योहार को लोक जीवन की अनूठी विरासत
समझते हुए अत्यंत आदर श्रद्धा और आकर्षण से देख रहे हैं छठ गीतों के माधुर्य का
आनंद उन्हें कुछ ही समय के लिए सही जीवन
की परेशानियों से मुक्ति के रूप में नजर आता है।
काँचहि
बाँस के बहगियाँ बहंगी लचकत जाय,
रहिया
में पूछेले कवन रामा हो बहंगीं कहंवा के जाय।।
गोधन
और छठ के पर्व के बीतते ही फिर से शादी ब्याह की लगन की शुरूआत हो जाती है
और यह क्रम मध्य दिसंबर तक चलता है जब पुनः एक महीने के लिए खरमास चालू हो जाता है, इस समय समस्त मांगलिक कार्यक्रम
स्थगित हो जाते हैं जो सूर्य के उत्तरायण होने पर मकर संक्रांति के बाद शुरू होते हैं। लोक जीवन
में ये दो महीने नियम धर्म से अध्यात्म और परलोक साधना में व्यतीत किया जाता है। कार्तिक
पूर्णिमा से लेकर माह शिवरात्रि तक
तीर्थाटन, नदियों में स्नान ध्यान पूजा पाठ और संगम तट पर
कल्पवास को समर्पित होता है।
स्त्री पुरुष समूह बनाकर गीत भजन गाते
बजाते स्नान पर्वों पर पावन नदियों में
स्नान करते है, पितरों का तर्पण करके ब्राह्मणों एवं
दिन दुखियोंको दान दक्षिणा देकर परलोक साधना करते हैं। पुराणों और शास्त्रों में
वर्णित विधि विधानो को करते हुए मुक्ति की
कामना करते हैं।
इस स्नान पर्व के लिए रंग बिरंगे वस्त्रों आभूषणों में सजी धजी महिलाएँ गीत गाती हुई जब नदियों की ओर जाती हैं तो यह दृश्य अद्भुत
होता है –
कर
असनान( स्नान) विमल जल सरजू में ।।
गोडवा
कहे हम तीरथ करबो,
हथवा
कहे हम करबो दान, विमल जल सरजू में।।
जीभिया
कहे हम हरि गुन गाइब
कनवा
कहे हम सुनब पुरान, विमल जल सरजू में।।
कर
असनान ( स्नान,) विमल जल सरजू में।।
इस
प्रकार हमारा लोक जीवन बारहों महीने अपने काम धंधे,बिजनेस
व्यापार, खेती किसानी में व्यस्त रहते हुए वर्षभर चलने वाले पर्व त्योहारों पर बदलती हुई
ऋतुओं के साथ गीत संगीत का
सम्यक आनंद लेते हुए अनवरत चलता
रहता है, यदि विचार कर देखा जाय तो ये लोक पर्व ,लोक गीत संगीत, अपने अपने विशेष रहन सहन खान पान ,परिधान और बोली भाषा हमारी समृद्ध संस्कृति की धरोहर
हैं।
लेकिन विगत करीब तीन दशकों में बाजारवादी सभ्यता के
वैश्विक दबाव , उपभोक्ता संस्कृति के फैलाव आधुनिकता
की भागदौड़,मूल्यहीनता और विपुल धन कमा लेने की आत्म घाती होड़,प्रदर्शन
प्रियता से उपजी रिक्तता एवं खोखलेपन ने हमारे लोक जीवन के माधुर्य, शांति, समरसता, सद्भाव और
मेलजोल की भावना की समरस लय के रिदम को तोड़ कर रख दिया है। संवेदनाएँ सूखती जा
रहीं हैं, करुण और दारुण स्थितियाँ आज मनुष्य के मन में कोई
बेचैनी और हलचल नहीं पैदा करतीं। वह ऐसे अवसरों पर जरूरी हस्तक्षेप से बचने लगा है, यही कारण है कि युगों युगों से हमारे लोक जीवन की नसों में में प्रवाहित होता आ रहा जीवन रस सूखने लगा है। परंपरागत
जीवन मूल्यों के प्रतीक लोक गीत और ऋतु गीतों की स्वस्थ और जीवंत परंपरा को बचाकर
आगे की पीढ़ियों तक पहुँचा पाना मुश्किल लग रहा है, जो रियल
जीवन में था अब वह रील में सिमटने को विवश हो रहा है।
ऐसे
में जरूरत है कुछ ठहरकर,पीछे मुड़कर एक बार फिर अपने
संस्कृति के सौंदर्य मूलक तत्वों के तलाश की!
इंद्र
कुमार दीक्षित
5/45
मुंसिफ कालोनी,
देवरिया
रामनाथ (उत्तरी) निकट वन विभाग कार्यालय
देवरिया
( उ. प्र.) 274001
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धन्यवाद और आभार आदरेय परमार जी!
जवाब देंहटाएंआपने यह आलेख प्रकाशित कर मुझे उपकृत किया।सादर शुभकामनाएं ।