मनोरम
छंद
1
हाय
गर्मी
डॉ.
अनिल कुमार बाजपेई ‘काव्यांश’
हाय गर्मी
हाय गर्मी।
हे
प्रभो कुछ डाल नर्मी।।
आसमानी आग
बरसे।
चैन
सुख को लोग तरसे।।
जल
रही धू-धू धरा ये।
हे
मनुज ये क्या किया रे।।
पेड़
सारे काट डाले।
खेत
सारे पाट डाले।।
बन रहे ऊँचे
भवन क्यूँ।
जल
रहे जंगल सघन क्यूँ।।
छील डाली घास सारी।
लील
डाली आस सारी।।
बन
रही चौड़ी सड़क हैं।
पेड़ कटते बेधड़क हैं।।
हर
तरफ सीमेंट पत्थर।
हाल
होते और बद्तर।।
चेत
जा अब भी समय है।
आ
रही निश्चित प्रलय है।।
आग पीना
आग खाना।
आग
ही अंतिम ठिकाना।।
***
वाचिक
राधा छंद
2
सत्यपथ
सत्य
नित होता प्रताड़ित यातना झेले ।
झूठ
के मुख पर सदा मुस्कान है खेले ।।
अंत
में पर सत्य की ही जीत है होती ।
झूठ
की झूठी हँसी फिर बाद में रोती ।।
सत्य होकर
भी अकेला ही पड़े भारी ।
झूठ
के सौ पाँव फिर भी व्याप्त लाचारी ।।
सत्य के चारों
तरफ सूरज करे फेरे ।
झूठ
को तो भोर में भी घोर तम घेरे ।।
हाय
पर मानव कहाँ ये बात सब माने ।
नित्य ही
गाता रहे वह झूठ के गाने ।।
झूठ से अर्जित प्रतिष्ठा में
रहे फूला ।
छद्म
सुख आनन्द का वो झूलता झूला ।।
सत्यपथ
के जो पथिक हैँ शान से चलते ।
झूठ के
राही स्वयं को उम्र भर छलते ।।
इसलिए मानव अभी से चेत तुम जाना ।
अन्यथा तुझको
पड़ेगा व्यर्थ पछताना ।।
***
माधव
मालती छंद
3
माँ
माँ
उमा में माँ जया में, माँ बसी माँ भगवती में।
माँ
यशोदा माँ अहिल्या, माँ विराजीं हैं सती में।।
उर्मिला के आँसुओं में, देवकी की पीर
में है।।
मांडवी के
मौन में है, माँ सिया के नीर में है।।
स्वर्ग
सी है गोद माँ की,कृष्ण सँग बलराम खेले।
शत्रुघन
लक्ष्मण भरत के,साथ में श्रीराम खेले।।
श्री
गजानन पार्वती की,गोद में सुखधाम पाते।
अंजना
की गोद हनुमन,खेलते अभिराम पाते।।
देवकी
की गोद पावन,जन्म लेते थे कन्हैया ।
पल
बढ़े होते जहाँ पर,थीं यशोदा-गोद मैया ।।
युग
बदल जाएँ करोड़ों,माँ सदा ही माँ रहेगी ।
चोट जब संतान खाये,आँख माँ की ही बहेगी ।।
***
डॉ.
अनिल कुमार बाजपेयी ‘काव्यांश’
जबलपुर


सुन्दर सृजन
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