1
सूर्य भी कहने लगा है
दुष्यंत
कुमार व्यास
सूर्य
भी कहने लगा है, रास रथ की थाम करके
ताप
से मैं भी जला हूँ, चाँदनी की छाँव पाने।
हर
समय मैं ही जलूँ क्यों, क्या रहा अपराध मेरा,
अश्व
मेरे भी थके है, है कहा अब हो बसेरा,
जन्म
से लेकर अभी तक,बस सफर में ही रहा हूँ
पर
नहीं मुझको मिला है ,आज तक भी हाथ तेरा
भूख
की मजबूरियों ने, इस तरह से है फँसाया,
चाह
कर भी आ न पाया, प्रेम के कुछ गीत गाने।
आँख
में थे चंद सपने, जेब कोने से फटी थी
मेडलों
को बेच करके पेट की खाई भरी थी
पाँव
में छाले पड़े थे , हाथ में गेती उठाई,
और
श्रम की धार देकर, खेत में फसलें उगाई
स्वेद
से लथपथ चला हूँ, बोझ माथे पर धरा है,
खेत
की आधी फसल ले, आज बनिये को चुकाने।
रक्त
की बूँदें बहाकर,चंद सिक्के थे कमाये,
प्रेयसी
के केश में जब फूल जूही के लगाये
जिंदगी
की इक अधूरी साध को पूरित किया था
दूसरों
के लिए ही अब तलक खुद ही जिया था
कर
प्रिया ने कुछ इशारा, नेह का दीपक जलाके,
आज
फिर से था बुलाया लाज का घूँघट उठाने।
दर्द
की लेकर लकीरें और काया अनमनी सी
लालसा
बहने लगी थीं रेत मुठ्ठी में बँधी सी
सर्प
ने फिर फन उठाया, और फुँकारा हृदय भी,
कामना
कहने लगी थी, आज पाले यह सभी भी
सूर्य
भी कहने लगा है, अब मुझे अवकाश दे दो
ताप
से मैं भी जला हूँ, चाँदनी की छाँव पाने।
2
माँ!
कैसे बीतीं रातें तेरी, उनका हाल सुना डालें।
नहीं मिल रहे शब्द मुझे हैं,
केवल आँसू झरते हैं
मौन अधर भी अनबोले हैं,
जाने क्या कुछ कहते हैं।
शब्दों
में सामर्थ्य नहीं है, तेरी बातों को ढालें।
कैसे
बीतीं रातें तेरी,उनका हाल सुना डालें।।
मेरा
रोना,
तेरा गाना,
दोनों मिलते जाते थे।
रोते-गाते हम दोनों के,
आँसू भी मुस्काते थे।।
चादर
कितनी बदली तैनें, कितने सपने थे पाले।
मन्नत
कितनी बाँधी दर-दर, सबके हाल सुना डालें।
भले
बढ़ा हो कद मेरा पर,
आँचल तेरा लहराया
जिसके नीचे आकर मेरा,
भाग्य सदा ही हर्षाया।
जीता
जब भी मैं दुनिया से, फूल गई तेरी छाती।
हारा
जब मैं अपनों से तो, सदा पीठ तू सहलाती।।
कभी
खेलता तेरी गोदी,
उँगली पकड़ी पाँव चला।
आज उठा अपने हाथों से,
काठ चिता पर दिया जला।
कितना
निष्ठुर बन बैठा मैं, मंत्र पढ़ें मरने वाले।
पुत्र
धर्म का पालन करते, सारे आँसू पी डाले।।
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दुष्यंत
कुमार व्यास
रतलाम


बहुत भावपूर्ण हैं दोनों कविताएँ।हार्दिक बधाई कवि दुष्यंत जी को ।
जवाब देंहटाएंविभा रश्मि हैदराबाद