शुक्रवार, 29 मई 2026

आलेख

नींद में जागता अंतर्मन

श्रीराम पुकार शर्मा

नींद, शारीरिक और मानसिक विश्राम की वह प्राकृतिक अवस्था है, जिसमें बाह्य मानसिक चेतना क्षीण हो जाती है और शरीर को आवश्यक आराम प्राप्त होता है । यह केवल शरीर का विश्राम मात्र ही नहीं, बल्कि मस्तिष्क का पुनर्संयोजन की प्रक्रिया भी है । किन्तु इस निद्राजन्य विश्राम अवस्था में भी हमारे अंतर्मन की सूक्ष्म सक्रियता निरंतर बनी रहती है, जो दिन भर के अनुभव, भावना और स्मृति को इस समय व्यवस्थित करते रहता है । शरीर भले ही शिथिल हो जाए, पर अंतर्मन अपने कार्य में सदैव सक्रिय ही रहता है । वह सदैव जागते ही रहता है, अपने ही बनाए हुए, किसी अदृश्य जगत में; चलता ही रहता है, पर किसी अनंत पथ पर । यही कारण है कि नींद केवल विश्राम मात्र ही नहीं, बल्कि एक अन्तः प्रक्रिया भी है, जहाँ हमारा अंतर्मन विभिन्न स्तरों पर निरंतर कार्यरत रहता है । स्वप्न अंतर्मन की इसी सक्रियता की अभिव्यक्ति हैं । चुकी उसकी स्थिति असाधारण हुआ करती है, जिसको समझ पाना, सामान्य मनुष्यों की क्षमता से परे की ही बात है । स्वप्न और स्वस्थ निद्रा, एक ओर हमारे मस्तिष्क को बराबर तरोताजा बनाए, नई जानकारी को अपनाने के लिए तैयार करते हैं, तो दूसरी ओर वे हमारी मानसिक स्वस्थता तथा भावनात्मक संतुलन-प्रक्रिया को संतुलित करने में भी सहायक भी होते हैं ।

एक रात्रि का मेरा अनुभव, अंतर्मन की इस सत्यता को विशेष रूप से स्पष्ट करता है । एक स्वप्न में, मैं एक खेल के मैदान से होकर गुजर रहा था, जहाँ कुछ बच्चे गेंद खेल रहे थे । उनकी गेंद आकर मेरे पैरों से टकराई और उलझ गई । वे उसे लेने के लिए, मेरे पैरों को छूने और टटोलने लगे । कुछ विशेष अनुभूति के कारण, उसी क्षण मेरी नींद खुली, और मैंने पाया कि वास्तव में मेरी पत्नी मेरे पैरों को हिलाती-डुलाती हुई, मुझे जगाने का प्रयास कर रही है । इसी प्रकार किसी अन्य अवसर पर एक स्वप्न में, मैं अपने मेज पर किसी गाने के लय पर ताल ठोक रहा था, जबकि यथार्थ में कोई आगंतुक मेरे दरवाजे को खटखटा रहा था । उस समय स्वप्न और यथार्थ दोनों की ध्वनियाँ, इस प्रकार परस्पर एकाकार हो गई थी कि उनमें भेद कर पाना, संभव न था । प्रतीत होता था, मानो कि दोनों ध्वनियों का स्रोत एक ही हो । ऐसी कई स्वप्न-घटनाएँ मेरे साथ हुई हैं । आपके साथ भी कई बार हुई ही होंगी, जिनमें स्वप्न, यथार्थ जगत को और यथार्थ, स्वप्न जगत को अपने साथ एकाकार कर लिया होगा ।

यहीं से स्वप्न और यथार्थ के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है । ऐसे अनुभव न केवल विस्मयकारी होते हैं, बल्कि मन को गहराई से सोचने के लिए बाध्य करने वाले भी होते हैं । ये संकेत देते हैं कि स्वप्न और यथार्थ के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं होती है । हमारा मस्तिष्क बाह्य संकेतों और आंतरिक अनुभूतियों को एक साथ ग्रहण कर, उन्हें एक एकीकृत अनुभव के रूप में रूपांतरित कर देता है । ऐसी घटनाएँ अक्सर होती ही रहती हैं।

तो क्या, स्वप्न और यथार्थ के बीच कोई ऐसा अन्तः सेतु भी है, जो दोनों को एकाकार कर देता है ?

तो इसका उत्तर है, - जी हाँ । वह सेतु हमारा स्वयं का मस्तिष्क है, जो दोनों लोकों को जोड़ता है । नींद का महत्व केवल शारीरक विश्राम तक ही सीमित नहीं है । पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद के अभाव में व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है, उसकी कार्य-क्षमता घट जाती है, उसकी स्मृति हानि होती है और उसकी रचनात्मकता भी प्रभावित होती है । सुबह उठने पर पूरी तरह तरोताज़ा महसूस करने के लिए, उत्तम गुणवत्ता युक्त, पर्याप्त मात्रा में नींद लेना ज़रूरी है । शारीरिक पोषण जुटाने के लिए जिस प्रकार आहार की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार थकान को मिटाने के लिए, निद्रा की गोद में निश्चिंत पर्याप्त विश्राम लेना आवश्यक होता है । इसी अवस्था में मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है और नई ऊर्जा को संचित करता है । नींद, तंत्रिका तंत्र को सही ढंग से काम करने के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य के और स्फूर्ति लिए भी आवश्यक होता है । अतः नींद, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, भावनात्मक संतुलन और शारीरिक स्वास्थ्यता - तीनों के लिए आवश्यक है । यह मस्तिष्क और शरीर दोनों को पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे हमारा कार्य प्रदर्शन बेहतर बनता है । यही वह समय होता है, जब हमें गहन सपने आते हैं 

    नींद के भीतर एक विशेष अवस्था होती है, जिसे विज्ञान में ‘तीव्र नेत्र गति’ REM (Rapid Eye Movement) कहा जाता है । इस अवस्था में हमारी पलकें, तो बंद रहती हैं, पर उसके अंदर हमारी नेत्र-गोलक गतिशील ही रहते हैं । यही अवस्था हमारे अन्तः का अंतर्मन का भी होता है । हमारा अंतर्मन, जिसे मनोविज्ञान में ‘अवचेतन’ भी कहा जाता है, हमारे अनुभवों और इच्छाओं का भंडार हुआ करता है । परंतु वह हमारे शारीरिक बंधन में नहीं रहता है, बल्कि वह तो पूर्णतः स्वतंत्र ही रहता है । वही हमारे शरीर की आंतरिक और अदृश्य परम सत्ता हुआ करता है । इसी में हमारी गहरी इच्छाएँ, स्मृतियाँ, अनुभव, संस्कार आदि संचित रहते हैं । यह सदा अपने ही निर्मित, किसी सूक्ष्म जगत में जाग्रत रहकर विचरण करते रहता है । इस समय हृदय की तथा श्वसन की गति कुछ तीव्र हो जाती हैं, जबकि शरीर की अधिकांश माँसपेशियाँ अस्थायी रूप से शिथिल ही रहती हैं । ऐसे में शरीर पूर्णतः निद्रा-ग्रस्त रहता है ।

स्वप्न की उत्पति ऐसी ही स्थिति में हमारे अंतर्मन में हुआ करता है । यही वह अवस्था होती है, जिसमें स्वप्न सबसे अधिक सजीव और स्पष्ट रूप में अनुभव किए जाते हैं । इस अवस्था में हमारा अंतर्मन भावनाओं, कल्पनाओं, अनुभवों और स्मृतियों के सूक्ष्म तंतुओं से एक विचित्र स्वप्न-संसार रचता है । साथ ही, बाह्य जगत से आने वाले सूक्ष्म संकेतों, - जैसे ध्वनि, स्पर्श आदि को अत्यंत सूक्ष्म ही क्षण (माइक्रो सेकंड) में ही हमारा अंतर्मन, उसे स्वप्न में सहज रूप से समाहित कर लेता है । विज्ञान में इसे ‘विरोधाभासी नींद’ (Paradoxical Sleep) या ‘सपनों की नींद’ भी कहा जाता है । यह मूल रूप से नींद का ही एक विशेष चरण होता है, जहाँ मस्तिष्क अत्यधिक सक्रिय रहता है । यह लगभग सभी स्तनधारियों, पक्षियों और कुछ सरीसृपों में समान रूप में पाई जाती है । यह चरण याददाश्त को संयोजने, कुछ नया सीखने और भावनाओं को संसाधित करने के लिए महत्वपूर्ण हुआ करता है ।

स्वप्न केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है, वरन यह दर्शन का भी विषय रहा है । भारतीय वेदान्त ‘बृहदारण्यक उपनिषद’ में भी इन तीनों अवस्थाओं यथा; - जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है । जाग्रत अवस्था में हम बाह्य जगत से जुड़े रहते हैं, सुषुप्ति अवस्था में गहन विश्राम की स्थिति में होते हैं और स्वप्न अवस्था में हमारे अंतर्मन की छवियाँ सक्रिय हो उठती हैं । स्वप्न में हमारा अंतर्मन अपनी ही जागृति या क्रिया-कलापों को देखता है । इसी कारण स्वप्न में असंभव बातें भी, हमें संभव प्रतीत होने लगती हैं । हम ऊँचाइयों से गिरते हैं, अजनबी स्थानों में भटकते हैं, पेड़ों की डालियों पर निवास करते हैं, आकाश में उड़ते हैं, अखाद्य पदार्थों को खाते हैं, बिना किसी संकोच के असामान्य परिस्थितियों में उपस्थित होते हैं । परंतु ये सब हमें विचित्र नहीं, बल्कि सहज और स्वाभाविक लगते हैं । न कोई संकोच और न कोई विस्मय ही । इसका कारण यह है कि स्वप्न अवस्था में तर्क और वास्तविकता की जाँच करने वाली हमारी चेतना (बुद्धि) शिथिल हो जाती है, जबकि हमारी भावनाएँ और कल्पनाएँ प्रबल बन जाती हैं । अनुभव केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है । मन का यही अनुभव अधिक प्रभावी होकर हमें स्वप्न के रूप में दिखाई देते हैं ।

 

एक और रोचक बात यह है कि स्वप्न में किसी भी शारीरिक पीड़ा की अनुभूति प्रायः कम या फिर न के बराबर ही हुआ करती है । लेकिन इसके विपरीत भय की अनुभूति अत्यंत तीव्र हो सकती है, क्योंकि इस स्थिति में बौद्धिक तो नहीं, परंतु भावनात्मक क्रियाएँ अत्यधिक सक्रिय हो उठती हैं । जैसे ही स्वप्न में कोई संकट अत्यधिक गहन हो उठता है, तब मस्तिष्क हमें जगा देता है । तब अंतर्मन स्वयं अपनी स्वप्न-रचना से तुरंत ही बाहर निकल आता है । मानो कि एक आंतरिक सुरक्षा-तंत्र सक्रिय हो गया हो । जागने पर हमारी चेतना समझ पाती है कि वह केवल स्वप्न-मात्र था, और फिर हम शांति का अनुभव करते हैं । छोटे बच्चों में यह प्रक्रिया कभी-कभी पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं हो पाती है, जिससे वे स्वप्न से जागने में व्याकुल हो जाते हैं । इसीलिए ऐसी स्थिति में उन्हें स्नेहपूर्वक शांत करना आवश्यक होता है, ताकि वे स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर सकें ।

इस प्रकार नींद में जागता मन’ कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि एक अनुभूत सत्य है । शरीर विश्राम करता है, पर हमारा अंतर्मन अपने सूक्ष्म कार्यों में निरंतर सक्रियशील ही बना रहता है । वह कभी स्मृतियों के गहन वन में विचरता है, तो कभी भावनाओं की गहरी धाराओं में प्रवाहित होते रहता है और फिर वह कभी बाह्य जगत के संकेतों को अपने स्वप्नलोक में समाहित कर लेता है ।

तब ऐसे में प्रश्न उठना स्वभाविक है कि क्या स्वप्न केवल भ्रम है ? क्या यथार्थ से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है ?

स्वप्न वह होता है, जिसे अंतर्मन अपने भीतर रचता है, और यथार्थ वह होता है, जिसे हम बाहर जीते हैं । अर्थात, - स्वप्न केवल सोई हुई चेतना के दृश्य मात्र नहीं होते हैं, बल्कि जाग्रत जीवन के अनकहे सत्य भी हो सकते हैं, जो कभी प्रतीक बनकर, कभी संकेत बनकर और कभी भाव बनकर, हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं । भले ही ये दोनों, हमें दो पृथक जगत प्रतीत होते हैं, वस्तुतः दोनों ही एक ही चेतना के ‘अंतः’ और ‘बहिः’ रूप होते हैं । इनका परस्पर सम्बन्ध अत्यंत ही सूक्ष्म हुआ करता है । स्वप्न उस बीज के समान होते हैं, जो मन की गहराइयों में गिरकर, विचारों को अंकुरित करते हैं । ये विचार ही आगे चलकर कर्म का रूप धारण कर लेते हैं और वही कर्म कभी-कभी यथार्थ की रचना करते हैं

जिस तरह जागृत में जीव के संस्कार, उसे आत्मिक प्रसन्नता और आह्लाद प्रदान करते हैं और निश्चिन्त भविष्य की रूप रेखा बनाते रहते हैं । ठीक उसी तरह संयत और पवित्र मन में भी जो स्वप्न आते हैं, वे भविष्य की उज्ज्वल संभावनाओं के प्रतीक हुआ करते हैं । कुछ लोग उसे समझ पाते हैं, जबकि अनेक लोग उसे न समझ पाते हैं । इस प्रकार स्वप्न न, तो मात्र भ्रम हैं, न ही पूर्ण भविष्यवाणी है, बल्कि वह उस यात्रा का प्रारंभ हैं, जहाँ संभावना धीरे-धीरे सत्य का स्वरूप धारण करने लगती है । इसका सांकेतिक सूत्र इस प्रकार से हो सकता है - स्वप्न भाव विचार निर्णय कर्म यथार्थ । अर्थात, - स्वप्न हमारे मन में भाव उत्पन्न करते हैं, भाव से ही विचार निर्मित होते हैं, विचार से निर्णय, और फिर निर्णय से कर्म बनते हैं । अंततः वही कर्म हमारे यथार्थ को निर्मित करते हैं ।

संभवतः स्वप्न न तो पूर्णतः सत्य होता है, न पूर्णतः असत्य ही । बल्कि उन दोनों के मध्य की विचित्र अनुभूति है । जहाँ बाह्य (ज्ञान) और अन्तः (अंतर्मन) की सीमाएँ धुँधली पड़ जाती हैं । यह अंतर्मन की उस सृजनात्मक शक्ति का परिचायक होता है, जो क्षण भर में एक सम्पूर्ण और विचित्र जगत की रचना कर लेती है । वह फिर उतनी ही सहजता से, उसे तत्क्षण विसर्जित भी कर देती है । स्वप्न हमें यह संकेत देता है कि हमारा अंतर्मन केवल जाग्रत अवस्था तक ही नहीं, बल्कि शारीरिक निद्रावस्था में भी, वह गुप्त रूप में अनेक स्तरों पर कार्य करती रहती है । कभी तो स्वप्न स्मृतियों को बुनता है, कभी भावनाओं को रूप देता है और कभी बाह्य जगत के संकेतों को अपने लोक में समाहित कर, उसे एकाकार करता है । परंतु वह निरंतर अपनी अनंत यात्रा पर अग्रसर ही रहता है ।

इस प्रकार से देखा जाए, तो स्वप्न भले ही भविष्य को सीधे निर्धारित नहीं करते, पर वे भविष्य की दिशा को अवश्य ही प्रभावित करते हैं । फलतः स्वप्न को भ्रम मानकर पूरी तरह से त्याग देना उतना ही अनुचित है, जितना उन्हें पूर्ण सत्य मान लेना । बल्कि उन दोनों के बीच ही संभावित यथार्थ, अपना रूप लेने की प्रतीक्षा करती है । निद्रा जितनी प्रगाढ़ होगी, स्वप्न उतने ही सार्थक और सत्य होंगे । पर यह तभी सम्भव है, जब हमारा अन्तःकरण पवित्र और निर्मल होगा । इसके साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि जो स्वप्न केवल निद्रावस्था में देखा जाता है, वह क्षणभंगुर होता है, पर जिस स्वप्न को समझा और जिया जाता है, वही यथार्थ के बीज हुआ करते हैं । शायद यही स्वप्न का सबसे गहरा रहस्य है ।

श्रीराम पुकार शर्मा

अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,

24, बन बिहारी बोस रोड,

हावड़ा – 711101

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