सुखी रहने का सबसे सरल रास्ता :
भलाई करें , अपेक्षा छोडें
डॉ.
घनश्याम बादल
दूसरों के हाथों में न दें अपने सुख की डोर। सुखी रहने का सबसे सरल रास्ता है ‘नेकी कर दरिया में डाल’।
कहा
जाता है कि मनुष्य जीवन सृष्टि में विद्यमान सभी योनियों में उत्पन्न प्राणियों
में सर्वश्रेष्ठ है । इसका सबसे बड़ा कारण है मनुष्य के पास एक विकसित मस्तिष्क का
होना। जहाँ यह मस्तिष्क मनुष्य को सभी
प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ बना देता है वहीं इसी मस्तिष्क की वज़ह से मनुष्य कई
विकारों का शिकार भी होता है। चूँकि मनुष्य के पास तर्क शक्ति है इसलिए वह कारण और
परिणाम को आपस में जोड़कर सोचता है। यदि
वह किसी के लिए कुछ अच्छा करता है तो फिर इस करता के कारण से जिसके प्रति उसने कुछ
किया है उससे एक अपेक्षा भी रखता है जिसे हम आशा, प्रत्याशा,
उम्मीद या एक्सपेक्टेशन भी कह सकते हैं और यही तत्व मनुष्य के
मनोविकारों की सबसे बड़ी जड़ है ।
सरल
शब्दों में कहें तो अपेक्षा या प्रत्याशा करने के कारण ही मनुष्य दुखी होता है
क्रोध व असंतोष का शिकार बनता है और अपने
व्यक्तित्व में जाने अनजाने में कितने ही विकार पैदा कर लेता है।
इसमें
दो राय नहीं कि मनुष्य का जीवन आशा और अपेक्षाओं के सूक्ष्म ताने-बाने से बुना हुआ
है। ‘उम्मीद’ जहाँ जीवन को आगे बढ़ाने की
ऊर्जा देती है, वहीं ‘प्रत्याशा’ अक्सर हमारे मन को
बंधनों में जकड़ देती है। आध्यात्मिक दृष्टि से इन दोनों के बीच का अंतर समझना
अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही अंतर हमारे सुख-दुःख, संबंधों और मानसिक शांति को निर्धारित करता है।
आशा एक सकारात्मक ऊर्जा है,
यह भविष्य के प्रति विश्वास जगाती है, परंतु
प्रत्याशा किसी विशेष परिणाम या व्यक्ति से बंधी होती है। जब हम किसी से अपेक्षा
रखते हैं, चाहे वह प्रेम, सम्मान,
सहयोग या मान्यता की हो। तो हम अनजाने में अपने सुख का नियंत्रण
दूसरे के हाथों में सौंप देते हैं। यही बंधन दुख का मूल कारण बनता है। संस्कृत में
कहा गया है:
आशा
नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृंखला।
यया
बद्धाः प्रधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पंगुवत्॥
अर्थात्
आशा एक अद्भुत श्रृंखला है, जिससे बंधे हुए मनुष्य
दौड़ते रहते हैं, और जो इससे मुक्त हो जाते हैं, वे स्थिर हो जाते हैं।
यह
श्लोक आशा के द्वैत स्वरूप को दर्शाता है।
वह प्रेरक भी है और बंधनकारी भी। जब आशा ‘स्वीकार’ के साथ जुड़ी होती है,
तब वह उत्साह बनती है; पर जब वह ‘प्रत्याशा’
बन जाती है, तब वह मानसिक क्लेश का कारण बनती है।
मन
और संबंधों पर प्रत्याशा के प्रभाव
जब
हमारी अपेक्षाएँ पूरी होती हैं, तो क्षणिक सुख और
संतोष मिलता है। लेकिन यह सुख स्थायी नहीं होता, क्योंकि मन
तुरंत नई अपेक्षाएँ गढ़ लेता है। दूसरी ओर, जब अपेक्षाएँ
पूरी नहीं होतीं, तो निराशा, क्रोध,
हताशा और कभी-कभी संबंधों में दूरी उत्पन्न होती है।
विशेष
रूप से निकट संबंधों में प्रत्याशा एक अदृश्य दबाव बन जाती है। हम चाहते हैं कि
सामने वाला व्यक्ति हमारी भावनाओं को बिना कहे समझे, हमारे
अनुसार व्यवहार करे, और हमारे मानकों पर खरा उतरे। जब ऐसा
नहीं होता, तो हम आहत होते हैं और धीरे-धीरे संबंधों में
कटुता आ जाती है।
भगवद्गीता
का एक प्रसिद्ध श्लोक इस स्थिति को स्पष्ट करता है:
कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन।
मा
कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात्
मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की
चिंता नहीं करनी चाहिए। जब हम इस सिद्धांत को जीवन में उतारते हैं, तब अपेक्षाओं का बोझ स्वतः हल्का हो जाता है। भले ही आज के युग में
व्यक्ति इस सिद्धांत को सही नहीं माने लेकिन यह जीवन का शाश्वत सत्य है की
अपेक्षाओं की वजह से ही अधिकांश संबंधों में खटास आती है एवं मन में दुर्भावना
पनपती है।
प्रत्याशा
का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
असंतोष
की वृत्ति: अपेक्षाएँ जितनी बढ़ती हैं, संतोष
उतना ही घटता है।
अहम्
का विस्तार: “मुझे यह मिलना चाहिए” — यह भावना अहंकार को पोषित करती है।
निर्भरता:
व्यक्ति अपने सुख के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है।
वर्तमान
से विच्छेद: मन भविष्य की कल्पनाओं में उलझा रहता है,
जिससे वर्तमान का आनंद खो जाता है।
कैसे संभालें?
स्वीकार का अभ्यास करें:
जीवन
और लोगों को जैसे हैं, वैसे स्वीकार करना सीखें।
यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि यथार्थ का सम्मान है।
अपेक्षा
नहीं,
संवाद रखें:
रिश्तों
में मौन अपेक्षाओं के बजाय स्पष्ट संवाद करें। इससे भ्रम और तनाव कम होते हैं।
आत्मनिर्भरता
विकसित करें:
अपने
सुख का स्रोत बाहरी नहीं, आंतरिक बनाएं। ध्यान,
स्वाध्याय और आत्मचिंतन इसमें सहायक हैं।
कृतज्ञता
का भाव रखें:
जो
है,
उसके लिए आभार व्यक्त करें। कृतज्ञता अपेक्षाओं को संतुलित करती है।
निष्काम
कर्म करें :
फल
की चिंता छोड़कर कर्म में आनंद खोजें। यही सच्ची स्वतंत्रता है।एक और सुंदर
सुभाषित इस संदर्भ में मार्गदर्शक है:
संतोषः
परमं सुखं, तृष्णा दुःखस्य कारणम्।
अर्थात्
संतोष ही परम सुख है और तृष्णा अतिरिक्त इच्छा/अपेक्षा) दुःख का कारण है।
आध्यात्मिक
निष्कर्ष
आध्यात्मिक
दृष्टि से देखा जाए तो प्रत्याशा एक प्रकार का मानसिक बंधन है,
जो हमें वर्तमान क्षण से दूर ले जाता है। जबकि सच्चा आनंद
‘अप्रत्याशित’ जीवन जीने में है-जहाँ हम
कर्म करते हैं, प्रेम करते हैं, परंतु
बदले में कुछ पाने की शर्त नहीं रखते।
जब
मनुष्य अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीना सीख लेता है, तब
उसके संबंध भी सहज हो जाते हैं और मन भी शांत हो जाता है। वह दूसरों को बदलने की
कोशिश नहीं करता, बल्कि स्वयं के दृष्टिकोण को बदलता है। यही
परिवर्तन आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत है।
अस्तु,
जीवन का सार इसी में है कि हम आशा रखें, पर
प्रत्याशा के बंधन में न बंधें; प्रेम करें, पर शर्तों के बिना; और कर्म करें, पर फल की चिंता के बिना। यही अंतस स्वतंत्रता का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है,
और यही सच्चे सुख का आधार भी है इसलिए यदि जीवन में सुखी रहना है तो
अपने सुख की डोर दूसरों के हाथों में मत दीजिए और इसका सीधा सा रास्ता है आपको जो
करना है किसी की भलाई के लिए कीजिए लेकिन बदले में यह अपेक्षा मत रखिए कि आपके
प्रति भी दूसरी तरफ से ऐसा ही व्यवहार होगा यानी साधारण शब्दों में कहें तो ‘नेकी
कर दरिया में डाल’ ही आत्म संतुष्टि, वह विकारों से बचने का
का सबसे सरल रास्ता है।
***
डॉ.
घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड – 247667


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