शुक्रवार, 29 मई 2026

विशेष

 


कवीन्द्र रवीन्द्र शरणम् : आत्मानुभूति से उद्भूत एक साहित्यिक समर्पण

सुरेश चौधरी इंदु


“आमि ढालिबो करुणा-धारा / आमि भाँगिबो पाषाण कारा

आमि जगत प्लाबिया बेडाबो गहिया / आकुल पागोल पारा।”

करुणा की यह अविरल धारा केवल एक कवि का उद्घोष नहीं, बल्कि मानवता के अंतःकरण में स्पंदित होने वाली वह शाश्वत चेतना है, जिसका मूर्त रूप हैं रबीन्द्र नाथ टैगोर। उनका साहित्य—जिसे हम ‘रवीन्द्र-साहित्य’ के नाम से जानते हैं—एक ऐसे भाव-सागर की अनुभूति कराता है, जिसमें अवगाहन करने वाला व्यक्ति निरंतर डूबता चला जाता है, किन्तु उसे किनारा नहीं मिलता; क्योंकि वह किनारा नहीं, बल्कि अनंत की यात्रा है।

साहित्य से संस्कार तक : एक अंतर्धारा

मैं स्वयं को साहित्य का औपचारिक विद्यार्थी नहीं मानता, किन्तु संस्कारों की भूमि में अंकुरित वह चेतना, जो बाल्यकाल से ही वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, महाभारत, भगवद्गीता और पुराणों के अध्ययन से सिंचित हुई—वह अंततः साहित्य की ओर ही प्रवाहित हुई। ननिहाल के विशाल पुस्तकालय में Suryakant Tripathi Nirala, Jaishankar Prasad, Ramdhari Singh Dinkar, Maithili Sharan Gupt जैसे महान साहित्यकारों की कृतियों ने भावभूमि को समृद्ध किया और छायावाद की प्रांजलता ने मन को विशेष रूप से आकर्षित किया।

परंतु एक प्रश्न बार-बार उद्वेलित करता रहा—जब हिंदी साहित्य में इतनी ऊँचाइयाँ हैं, तो फिर Gitanjali के रचयिता रवीन्द्रनाथ को वह वैश्विक प्रतिष्ठा क्यों? हिंदी अनुवादों में वह आकर्षण क्यों नहीं दिखता?

अनुवाद और मूल के मध्य का अंतर

यह प्रश्न केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक गहन साहित्यिक अनुभव की ओर संकेत करता है। मैंने अनुभव किया कि जब कोई कवि जिस भाषा में सोचता है, उसी में सृजन करता है, तब उसके शब्दों में भावों की जो सहजता और गहराई होती है, वह अनुवाद में पूर्णतः स्थानांतरित नहीं हो पाती। यही कारण था कि प्रारंभ में रवीन्द्र-साहित्य के हिंदी अनुवाद उन्हें आकृष्ट नहीं कर सके।

किन्तु Kolkata आगमन के पश्चात जब बंगला भाषा और संस्कृति से साक्षात्कार हुआ, तब धीरे-धीरे रवीन्द्रनाथ का वास्तविक स्वरूप उद्घाटित होने लगा। देवनागरी लिपि में लिखित बंगला कृतियों, तथा गीतबितान जैसे ग्रंथों के अध्ययन ने एक नए साहित्यिक संसार के द्वार खोल दिए।

आत्मानुभूति का पुनर्जागरण

जीवन के व्यावसायिक और रोगग्रस्त चरणों के बीच साहित्य से दूरी बनी रही, किन्तु 2010 के पश्चात पुनः एक आत्मिक जागरण हुआ। इसी क्रम में पहली कविता का सृजन हुआ—“जाग-जाग, हे नारी जाग”—जो भीतर सुप्त काव्य-धारा के पुनः प्रवाह का संकेत था।

लेखन के इस पुनरारंभ में छायावादी संस्कारों की छाप स्पष्ट दिखाई दी—निराला की निर्भीकता, प्रसाद की गहनता, पंत की कोमलता और दिनकर की ओजस्विता। परंतु इन सबके मध्य कहीं न कहीं रवीन्द्रनाथ की करुणा और व्यापक दृष्टि का बीजारोपण भी होने लगा।

रवीन्द्र का साक्षात्कार : शब्द से परे

जैसे-जैसे रवीन्द्रनाथ का मूल साहित्य पढ़ा गया, वैसे-वैसे यह अनुभूति प्रबल होती गई कि उनका प्रत्येक शब्द क्षरता से परे, एक शाश्वत अनुभूति का वाहक है। वह केवल काव्य नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है—एक ऐसा रहस्यमय संसार, जिसमें प्रवेश करने के बाद व्यक्ति स्वयं को भूल जाता है।

इसी भावावेश में लेखक के अंतःकरण से यह स्तुति स्वतः प्रस्फुटित हुई—

गुरुवर नमन शतशत नमन

साहित्य प्रगल्भ पराकाष्ठा

नव-तरंग अंतस की आस्था,

विभावरी मंडित व्योम पर

विधु सम अवभासित

जन गण मन अधिनायक

सत्यनिष्ठ जन नायक

विशालता का  उद्गम

दूरदर्शिता का परिचायक,

नवरचना संवाहक

नव प्रेरणा संचारक

हृदयंगम रोचित कला प्रसारक,

विश्व भारती विचारक,

चित्र कला, संगीत कला, साहित्य कलाधिपति

अद्भुत विलक्षण प्रतिभाधिपति,

गीत गीतांजलि भाव भावांजलि अतिमति

पुरुष्कृत कलावती

भारत भाल के द्यूतित श्रृंगार

परमात्मा के अप्रतिम उपहार,

नमस्कार नमस्कार नमस्कार !

यह केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि एक साधक का अपने आराध्य के प्रति समर्पण है।

भावानुवाद : एक साधना

रवीन्द्र-साहित्य के प्रति इस आकर्षण ने एक नई साधना को जन्म दिया—भावानुवाद की साधना। उद्देश्य केवल शब्दों का अनुवाद नहीं, बल्कि उस मूल भाव की धड़कन को पकड़ना था। “आज खेला भंगार खेलिबे” और “माया मोन बिहारीणी” जैसे गीतों पर अनेक बार प्रयास किए गए, जब तक कि मूल भाव के समीप पहुँचने का संतोष न मिला।

इस प्रक्रिया में संगीत का समावेश भी हुआ—रवीन्द्र-संगीत की परंपरा में गीतों को ढालने का प्रयास, संगीतकारों और नवोदित गायकों के सहयोग से, इस साधना को एक जीवंत रूप देने लगा।

समर्पण और संतोष

इस प्रकार कवि गुरु की 68 कविताओं का छन्दों में अनुवाद का कार्य पूर्ण हुआ और एक मानसिक संतुष्टि की प्राप्ति भी। यह अनुवाद केवल अनुवाद नहीं  बल्कि एक दीर्घ आत्मिक यात्रा का परिणाम है—संस्कारों से आरंभ होकर जिज्ञासा, संघर्ष, अनुभूति और अंततः समर्पण तक की यात्रा।

यह उनकी अनेक कृतियों में से एक होते हुए भी, उन्हें जो संतोष प्रदान करती है, वह अवर्णनीय है। यह संतोष इसलिए भी विशेष है, क्योंकि इसमें केवल साहित्य नहीं, बल्कि आत्मा की सहभागिता है।

उपसंहार : रवीन्द्र की शाश्वत प्रासंगिकता

रवीन्द्रनाथ का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। वह मनुष्य को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर एक व्यापक मानवतावादी दृष्टि प्रदान करता है। विषम परिस्थितियों में वह मार्गदर्शक बनता है, और जीवन के संघर्षों में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

अंततः, यही प्रार्थना मुखरित होती है—

तेजस   रूप   लिए   प्रभु,  द्वार   मेरे  आना

नाथ  तमस  अंतस  का, सूरज बन मिटाना

तेजस.....

 

अंदर   सरिता  में  जब,  बाढ़  सी  आती है

आशाओं  का  मर्दन,  नित्य  कर  जाती  है

ले  वारि  मेघ  से  तुम, छटा प्रिय बिखराना

तेजस....

रवीन्द्र-जयंती के इस पावन अवसर पर, यह लेख उसी करुणा-धारा के प्रति एक विनम्र अर्घ्य है—जिसने न केवल साहित्य को, बल्कि समूची मानवता को आलोकित किया है।

***


सुरेश चौधरी इंदु

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता 700046


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