मंगलवार, 30 जून 2026

कविता

 

धुन और धन

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

 

भीड़ अपने में मदमस्त थी।

वीणावादक तार छेड़े जा रहा था।

उसे परिवार की रोटी की चिंता थी।

 

किसी ने कहा—

बजाओ आज कुछ ऐसा कि

बीता ज़माना याद आ जाए।”

 

वह सोचता रहा—

मैं दुःख भूलने के लिए

वीणा के तारों को छेड़ता हूँ।

 

भरी जेबों में

किस बात की कमी...

जो जाना चाहते हैं वे

भूले भटके ज़माने में

छेड़ने को तैयार है

रुद्रवीणा के अंतस को

 

क्या छेड़कर किसी के अंतस को

सुख की नदी का

उत्स फूटता है भला?

 

पर जब आदेश आया है,

तब उसे मानना ही पड़ेगा।

 

बात धुन की नहीं,

मुद्दा धन का है।

धन से सुर बिकता है,

कलाकार मदारी सा दिखता है।

धुन सुकून दे न दे,

धन जठर-ज्वाला को

अवश्य ही बुझाता है।

***

डॉ. सुपर्णा मुखर्जी

हैदराबाद


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