1
कजरी
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
जबसे
गइलें पिया परदेसवाँ, सून लागे भवनवाँना
बदरा
बरसत बा सवनवाँ नाहीं अइलें सजनवाँ ना।।
धानी
रंग धरती धानी रे चुनरिया
बगिया
में घहरे कारी रे बदरिया
बिजुरी
चमके गगनवाँ ना
नाहीं
अइलें सजनवाँ ना
बदरा ...........।।
झिर
झिर झिरके पुरुवा बयरिया
बरसत
मेघ कइसे खेलबे कजरिया
मेघवा
नाचे मगनवाँ ना
नाहीं
अइलें सजनवाँ ना।।
बदरा...............।।
बहत
पवन। से पठवलीं पतिया
बदरा
के धार से बतलवलीं बिपतिया।
नाहीं
मनलें कहनवाँ ना
नाहीं
अइलें सजनवाँ ना।।
बदरा...............।।
***
2
मेघ
मल्हार
सावन
की पुरुवाई, आई बारिश की बौछार
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार,
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार।।
तन मन भीगे बौछारों से बादल छाये घुँघराले
नृत्य कर रहे मोर मगन हो बारिश में मतवाले।
ढादुर ढोल बजाए, बादलों
से गिरती जलधार
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार ।।
नित्य सुधा बन बूँदें भरती हैं अमृत के प्याले
डाल डाल की शोभा न्यारी झूम रहे मतवाले।
मनो मेघ ने विनती सुन ली,
चातक करुण पुकार।
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार।।
चमक दामिनी लज्जित होती निरखि धरा छवि न्यारी,
कोकिल करती गान बाग में लगती है अति प्यारी।
नव तरुवर नव पल्लव विहँसे, अमृतमय रस धार,
चलो हम गाएँ मेघ मल्हार
चलो
हम गाएँ मेघ मल्हार।।
***
(सावन
में गाया जाने वाला यूपी, बिहार, झारखंड,
छत्तीस गढ़ का परम्परागत लोकगीत)
(मोहन
पाण्डेय ‘भ्रमर’ की प्रकाशित पुस्तक ‘महुआ’ से)
डॉ. मोहन पाण्डेय ‘भ्रमर’
हाटा,
कुशीनगर, यूपी


मोहन पाण्डेय भ्रमर के दोनों गीतों में सावन के महीने में वर्षा की फुहारों के बीच प्रकृति सुंदरी के नर्तन का अद्भुत दृश्य सृजित किया गया है।
जवाब देंहटाएंकविवर भ्रमर जी को बधाई!
आपका आशीर्वाद बना रहे
हटाएं