अग्निपथ
का राही
डॉ. घनश्याम बादल
सूरज अभी क्षितिज
पर पूरी तरह उगा भी नहीं था कि गाँव की पगडंडी पर शोर गूँज उठा।
“भागो...
ठाकुर के लोगों ने फिर रामखेलावन को पीट दिया...”
बारह वर्ष का
गुरुदत्त दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा। खेत की मेंड़ पर रामखेलावन लहूलुहान पड़ा था।
उसका अपराध केवल इतना था कि उसने अपनी मेहनत की मजदूरी माँगी थी।
उसके चारों तरफ
भीड़ खड़ी थी, पर कोई आगे नहीं बढ़ रहा था। गुरुदत्त
के पिता, जो गाँव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे,
घायल रामखेलावन को उठाने लगे। तभी किसी ने धीरे से कहा—
“मास्टर
साहब, मत पड़िए पचड़े में... बड़े लोगों से कौन बैर ले?”
पिता ने पहली बार
ऊँची आवाज़ में कहा—
“जिस समाज
में अन्याय देखने वाले लोग भी अपराधी से डरने लगें, समझ लो
वहाँ न्याय मर चुका है।”
उस दिन गुरुदत्त
ने पहली बार देखा कि अन्याय केवल लाठी से नहीं, बल्कि
लोगों के डर से भी ताकतवर बनता है।
उस रात वह देर तक
सो नहीं सका।
उसने पिता से
पूछा—
“बाबूजी,
गरीब हमेशा हारता ही क्यों है?”
पिता ने उसके सिर
पर हाथ फेरते हुए कहा—
“गरीब
इसलिए नहीं हारता कि उसके पास धन नहीं होता, बल्कि इसलिए कि
उसके साथ खड़े होने वाले लोग कम होते हैं। जिस दिन लोग साथ खड़े होना सीख जाएँगे,
अन्याय की सबसे ऊँची दीवार भी ढह जाएगी।”
पिता का यह वाक्य
गुरुदत्त के जीवन का संकल्प बन गया।
वर्ष बीतते गए।
गुरुदत्त विश्वविद्यालय पहुँचा। पढ़ाई में तेज, स्वभाव
से शांत और विचारों से बेचैन। उसे पुस्तकालय में जितनी रुचि थी, उतनी ही झुग्गियों और मजदूर बस्तियों में भी थी। छुट्टियों में वह छात्रों
को लेकर गाँवों में जाता, बच्चों को पढ़ाता, श्रमिकों के अधिकारों पर चर्चा करता और लोगों की समस्याएँ सुनता।
धीरे-धीरे उसे
एहसास हुआ कि अन्याय का चेहरा बदल गया है, पर उसका
स्वभाव नहीं। अब लाठी की जगह कागज़, फाइलें, दलाली, फर्जी मुकदमे और प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत
ने ले ली थी।
एक दिन उसने साक्षात देखा कि विश्वविद्यालय के बाहर सफाई कर्मचारी कैलाश
अपनी बकाया मजदूरी माँग रहा था। जवाब में उसे सबके सामने थप्पड़ मारा गया। सैकड़ों
छात्र तमाशा देखते रहे।
गुरुदत्त आगे
बढ़ा।
उसने कैलाश को
उठाया और भीड़ की ओर मुखातिब होकर कहा—
“आज यह
आदमी अपमानित हुआ है। कल तुममें से कोई होगा। अन्याय कभी किसी एक का नहीं होता,
वह धीरे-धीरे पूरे समाज को निगल जाता है।”
उसके शब्दों में
ऐसा कंपन था कि भीड़ में सन्नाटा छा गया।
उसी शाम
विश्वविद्यालय के बरगद के नीचे सात युवाओं की बैठक हुई।
किसी ने पूछा—
“क्या
करेंगे?”
गुरुदत्त ने कहा—
“लड़ेंगे...
लेकिन पत्थर से नहीं, चेतना से।”
“अगर कोई न
आया तो?”
“सत्य के
रास्ते पर पहले कदम हमेशा अकेले पड़ते हैं।”
उसी दिन
लोक ‘जागरण आंदोलन’ की
नींव रखी गई।
आंदोलन धीरे-धीरे
बढ़ने लगा।
एक गाँव में
भूमि-अधिकार का संघर्ष, दूसरे में दलित परिवार को
न्याय, कहीं श्रमिकों का वेतन, कहीं
छात्रवृत्ति का मामला।
हर सफलता लोगों का
विश्वास बढ़ाती गई।
सोशल मीडिया पर
गुरुदत्त के भाषण वायरल होने लगे।
उसकी एक पंक्ति
पूरे देश में गूँजने लगी—
“सवाल
पूछना विद्रोह नहीं, नागरिक का पहला कर्तव्य है।”
युवाओं का सैलाब
उमड़ पड़ा।
लेकिन भीड़ जितनी
बड़ी होती है, उसमें चेहरे उतने ही अपरिचित हो जाते
हैं।
राजधानी में एक
आलीशान कोठी के बंद कमरे में तीन लोग बैठे थे।
पहला—राज्य का
प्रभावशाली नेता प्रबल प्रताप सिंह।
दूसरा—अपराध जगत
का सरगना बलबीर।
तीसरी—चमकती
मुस्कान और बर्फ-सी ठंडी आँखों वाली कुणिका।
कुणिका केवल एक
महिला नहीं थी, वह सत्ता, धन,
ब्लैकमेल और देह-व्यापार के संगठित नेटवर्क की संचालिका थी।
प्रबल प्रताप ने
गुरुदत्त का वीडियो बंद करते हुए कहा—
“यह लड़का
जितना बोल रहा है, उतनी हमारी राजनीति कमजोर हो रही है।”
बलबीर मुस्कराया।
“उड़ा दूँ?”
प्रबल प्रताप ने
सिर हिलाया।
“नहीं।
शहीद बन जाएगा। पहले खरीदो... नहीं बिके तो तोड़ो... और तब भी न टूटे तो बदनाम
करो।”
कुणिका ने धीमे से
कहा—
“हर इंसान
की कोई न कोई कमजोरी होती है। मैं उसकी तलाश करती हूँ।”
कुछ दिन बाद
गुरुदत्त को राजधानी बुलाया गया।
प्रबल प्रताप ने
कहा—
“देश को
तुम्हारे जैसे युवाओं की जरूरत है। चुनाव लड़ो। मंत्री बनो।”
गुरुदत्त
मुस्कराया।
“मुझे
कुर्सी नहीं, व्यवस्था बदलनी है।”
“व्यवस्था
कुर्सी से बदलती है।”
“नहीं...
चरित्र से बदलती है।”
कमरे में खामोशी
छा गई।
गुरुदत्त उठकर
जाने लगा।
तभी कुणिका उसके
सामने आकर बोली—
“इतनी
जल्दी क्या है? दुनिया समझौते पर चलती है।”
गुरुदत्त ने शांत
स्वर में कहा—
“समझौते
रिश्तों को बचाते हैं... सिद्धांतों को नहीं।”
वह चला गया।
प्रबल प्रताप की
आँखों में अब सम्मान नहीं, प्रतिशोध था।
इसके बाद घटनाएँ
तेजी से बदलने लगीं।
आंदोलन में कुछ नए
चेहरे दिखाई देने लगे।
वे हर सभा में
सबसे आगे रहते, सबसे ऊँचे नारे लगाते, लेकिन गुरुदत्त ने देखा कि वे लोगों को उकसाने की कोशिश करते हैं।
एक दिन उसने अपने
साथियों से कहा—
“सावधान
रहना। जो सबसे अधिक क्रांति की बातें करता है, वही कभी-कभी
क्रांति का सबसे बड़ा शत्रु निकलता है।”
पर तब तक बहुत देर
हो चुकी थी।
राजधानी में विशाल
रैली थी।
हजारों लोग जुटे
थे।
गुरुदत्त मंच से
बोल ही रहा था कि अचानक भीड़ का एक हिस्सा भड़क गया।
पत्थर चले।
गोलियाँ चलीं।
सरकारी वाहन जल
उठे।
टीवी चैनलों की
स्क्रीन पर एक ही खबर चल रही थी—
“लोक जागरण
आंदोलन ने हिंसक रूप लिया।”
गुरुदत्त चीखता
रहा—
“रुको...
यह हमारे लोग नहीं हैं...”
लेकिन उसकी आवाज़
शोर में खो गई।
अगली सुबह पुलिस
ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
उस पर देशद्रोह,
हिंसा भड़काने, सरकारी संपत्ति नष्ट करने और न
जाने कितने आरोप लगा दिए गए।
उसके साथी बिखरने
लगे।
कुछ डर गए।
कुछ बिक गए।
कुछ गायब हो गए।
मीडिया ने फैसला
सुना दिया—
“जिसे देश
का नया नायक कहा जा रहा था, वही सबसे बड़ा षड्यंत्रकारी
निकला।”
जेल की अँधेरी
कोठरी में पहली रात गुरुदत्त ने महसूस किया कि कभी-कभी सबसे बड़ा अकेलापन भीड़ के
बीच नहीं,
बदनामी के बाद आता है।
तीसरे दिन उसकी
बैरक में एक दुबला-पतला युवक लाया गया।
चेहरा सूजा हुआ,
आँखों में बुझी हुई आग।
“नाम?”
“कृतार्थ।”
“किस अपराध
में?”
युवक कड़वी हँसी
हँसा।
“सच बोलने
के अपराध में।”
गुरुदत्त चुप रहा।
कुछ देर बाद
कृतार्थ बोला—
“क्या आप
गुरुदत्त हैं?”
“हाँ।”
युवक की आँखें भर
आईं।
“मैंने
आपका आंदोलन जॉइन करना चाहा था... लेकिन उससे पहले ही मेरी दुनिया उजड़ गई।”
“क्या हुआ
था?”
कृतार्थ ने काँपते
हाथों से अपनी कमीज़ के भीतर से एक छोटी-सी, पुरानी
चमड़े की डायरी निकाली।
“यह मेरी
बहन की है... मरने से पहले उसने मुझे दी थी।”
“इसमें
क्या है?”
कृतार्थ ने धीमे
स्वर में कहा—
“इसमें
केवल मेरी बहन की कहानी नहीं... उन लोगों के साम्राज्य की कब्र लिखी है, जिन्होंने उसे मार डाला।”
गुरुदत्त ने डायरी
हाथ में ली।
पहला पन्ना खुला।
उस पर केवल एक
पंक्ति लिखी थी—
“यदि यह
डायरी किसी ईमानदार इंसान तक पहुँच जाए, तो समझना कि मेरी
मौत व्यर्थ नहीं जाएगी...”
गुरुदत्त के हाथ
काँप उठे।
उसे बिल्कुल भी
अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटी-सी डायरी केवल एक लड़की की अंतिम निशानी नहीं,
बल्कि उस पूरे षड्यंत्र की चाबी थी जिसने उसके आंदोलन, उसके सम्मान और हजारों लोगों की उम्मीदों को कुचलने का प्रयास किया था…
(क्रमशः)
भाग
– 2 :
अग्निपथ
का अथक यात्री
जेल की बैरक में
उस रात नींद किसी की आँखों में नहीं थी।
गुरुदत्त बार-बार
उस डायरी के पहले पन्ने को पढ़ रहा था।
“यदि यह
डायरी किसी ईमानदार इंसान तक पहुँच जाए, तो समझना कि मेरी
मौत व्यर्थ नहीं जाएगी...”
उसने धीरे से
पूछा—
“कृतार्थ...
तुम्हारी बहन का नाम?”
“काव्या।”
कृतार्थ की आवाज़
भर्रा गई।
“वह
पत्रकार बनना चाहती थी। सपने बहुत बड़े थे। नौकरी के नाम पर उसे राजधानी बुलाया
गया। वहाँ उसकी मुलाक़ात कुणिका से हुई। उसने कहा –‘बड़ी पत्रकार बनना है तो बड़े
लोगों के बीच चलना सीखो।’ धीरे-धीरे उसे एक ऐसे जाल में फँसा
दिया गया, जहाँ से लौटना लगभग असंभव था।”
“फिर?”
कृतार्थ का गला
रुंध गया, आँखों से आंसू बह निकले “
“अब उसके
शरीर और मन दोनों को रोज नोचा और तोड़ा जाने लगा था। यह सब अब उसकी सहनशीलता से
बाहर हो गया मगर जब उसने विरोध किया, तब उसकी तस्वीरों और
वीडियो से उसे ब्लैकमेल किया गया। उसने सबूत जुटाने शुरू किए। शायद उसे अंदाज़ा हो
गया था कि वह ज़्यादा दिन नहीं बचेगी। मरने से पहले उसने यह डायरी मुझे दी थी।”
गुरुदत्त ने डायरी
खोली।
हर पन्ना किसी
विस्फोट से कम नहीं था।
कुणिका के नेटवर्क
का पूरा ब्यौरा...
बलबीर के अवैध
कारोबार...
प्रबल प्रताप सिंह
तक पहुँचने वाले पैसों का हिसाब...
कुछ अधिकारियों और
दलालों के नाम...
गुप्त लॉकरों के
संकेत...
डिजिटल सर्वरों के
पासवर्ड के इशारे...
और सबसे
महत्वपूर्ण—उन लोगों की सूची, जिन्हें झूठे मुकदमों
में फँसाकर जेल भेजा गया था।
गुरुदत्त ने डायरी
बंद कर दी।
उसकी आँखों में
पहली बार निराशा की जगह संकल्प दिखाई दिया।
अगले दिन उसने जेल
में मिलने आए अपने पुराने साथी निखिल से केवल एक वाक्य कहा—
“आंदोलन
समाप्त नहीं हुआ है... बस उसकी दिशा बदल गई है।”
निखिल समझ गया।
अब नारे नहीं
लगेंगे।
अब सबूत जुटेंगे।
अब भावनाओं से
नहीं,
तथ्यों से लड़ाई होगी।
धीरे-धीरे
गुरुदत्त के बिखरे हुए साथी फिर जुड़ने लगे। वे गुप्त रूप से काव्या की डायरी में
लिखे हर संकेत की पुष्टि करने लगे। जिन लोगों ने कभी डर के कारण चुप्पी साध ली थी,
वे भी धीरे-धीरे सामने आने लगे।
एक चोट खाए वृद्ध
लेखाकार ने वर्षों पुराने खातों की प्रतियाँ सौंप दीं।
षड्यंत्र के शिकार
एक बैंक कर्मचारी ने लॉकरों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराया।
एक ईमानदार
पूर्व पुलिसकर्मी ने स्वीकार किया कि कई झूठे मुकदमे राजनीतिक दबाव
में दर्ज किए गए थे।
एक पीड़ित युवती
ने काँपते हुए कहा—
“यदि
गुरुदत्त हार गया तो हमारी बेटियाँ कभी न्याय नहीं पाएँगी।”
यही वह क्षण था जब
आंदोलन फिर जीवित हुआ—लेकिन इस बार उसके हाथों में पत्थर नहीं,
प्रमाण थे।
उधर प्रबल प्रताप
सिंह निश्चिंत था।
उसने प्रेस
कॉन्फ़्रेंस बुलाकर कहा—
“देश ने
देख लिया कि तथाकथित आंदोलनकारी केवल अराजकता फैलाते हैं।”
उसके समर्थकों ने
तालियाँ बजाईं।
बलबीर ने शराब का
जाम उठाकर कहा—
“खेल खत्म।”
कुणिका मुस्करा
रही थी।
उसे विश्वास था कि
उसकी दुनिया तक कोई नहीं पहुँच सकता।
लेकिन नियति ने
करवट ले ली।
उसी रात राजधानी
के कई ठिकानों पर एक साथ छापे पड़े।
गुप्त सर्वर बरामद
हुए।
लॉकर खुले।
हवाला खातों का
रिकॉर्ड मिला।
कई प्रभावशाली नाम
सामने आए।
सुबह के अख़बारों
की सुर्खियाँ बदल चुकी थीं—
“लोक जागरण
आंदोलन पर लगा हिंसा का आरोप संदिग्ध।”
“राजनीतिक
संरक्षण प्राप्त अपराध-जाल का खुलासा।”
कुछ ही दिनों बाद
अदालत में गुरुदत्त को पेश किया गया।
सरकारी वकील के
पास अब पहले जैसे तर्क नहीं थे।
जज ने पूछा—
“क्या
अभियोजन के पास कोई ठोस प्रमाण शेष है?”
उत्तर में सन्नाटा
था।
गुरुदत्त
सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया।
जब वह जेल के फाटक
से बाहर निकला तो हजारों लोग उसका इंतज़ार कर रहे थे।
लेकिन उसने
विजय-रैली से इंकार कर दिया।
उसने कहा—
“आज जश्न
का नहीं, आत्ममंथन का दिन है। यदि हमारे आंदोलन में स्वार्थी
लोग घुस आए, तो कहीं न कहीं हमारी भी चूक थी।”
अब संघर्ष का
अंतिम दौर शुरू हुआ।
प्रबल प्रताप सिंह
अपनी राजनीतिक शक्ति बचाने में लगा था।
बलबीर भागने की
तैयारी कर रहा था।
कुणिका अपने
विदेशी संपर्कों के सहारे देश छोड़ना चाहती थी।
लेकिन कानून का
घेरा हर दिन छोटा होता जा रहा था।
अदालत में एक-एक
गवाह आया।
एक-एक पीड़ित
बोला।
एक-एक दस्तावेज़
सामने रखा गया।
सबसे अंत में
कृतार्थ ने गवाही दी।
उसने अपनी बहन की
डायरी अदालत में रखते हुए कहा—
“यह किसी
एक लड़की की डायरी नहीं है। यह उन सभी बेटियों की आवाज़ है जिन्हें सत्ता और अपराध
ने मिलकर चुप करा दिया।”
अदालत में कुछ
क्षण के लिए ऐसी खामोशी छा गई कि घड़ी की टिक-टिक भी सुनाई देने लगी।
निर्णय का दिन
आया।
अब तक सरकार भी
चेत चुकी थी संसद में षड्यंत्रकारी तत्वों के खिलाफ कड़े कानून का संविधान संशोधन
पेश किया गया और विपक्ष के होने के बावजूद पास हुआ।
बलबीर के संगठित
अपराधों,
वसूली और हिंसक गिरोह से जुड़े मामलों में कठोर दंड सुनाया गया।
कुणिका के अवैध
नेटवर्क का विधिक रूप से अंत हुआ। उसके विरुद्ध अनेक पीड़ितों के बयानों और
साक्ष्यों के आधार पर निर्णय हुआ, और उसके संरक्षण में
चल रहा पूरा तंत्र ध्वस्त कर दिया गया।
प्रबल प्रताप सिंह
के विरुद्ध भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और पद के
दुरुपयोग से जुड़े मामलों में विधिक कार्रवाई आगे बढ़ी। वर्षों तक दूसरों के
भविष्य का निर्णय करने वाला व्यक्ति अब स्वयं न्यायालय के कटघरे में खड़ा था।
कुछ महीने बाद...
कृतार्थ उसी गाँव
में एक पुस्तकालय खोल रहा था जहाँ कभी लोग डर के कारण सच बोलने से घबराते थे।
दीवार पर काव्या
का चित्र लगा था।
नीचे लिखा था—
“सत्य की
सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह मरने के बाद भी बोलता रहता है।”
उद्घाटन के लिए
गुरुदत्त आया।
कृतार्थ ने भावुक
होकर कहा—
“भैया...
आपने मुझे जीवन लौटा दिया।”
गुरुदत्त
मुस्कराया।
“नहीं
कृतार्थ... मैंने केवल तुम्हें तुम्हारा विश्वास लौटाया है।”
कुछ समय बाद
राजधानी के विशाल मैदान में फिर युवाओं का महासम्मेलन हुआ।
हजारों आँखें मंच
पर खड़े गुरुदत्त को देख रही थीं।
वह कुछ क्षण मौन
रहा।
फिर बोला—
“मैंने
संघर्ष में एक बहुत बड़ी भूल की थी। मुझे लगा था कि हर वह व्यक्ति जो मेरे साथ
नारा लगा रहा है, वह मेरे विचारों के साथ भी है। लेकिन मैंने
सीखा कि आंदोलन को बाहर से जितना खतरा होता है, उससे कहीं
अधिक खतरा भीतर घुस आए स्वार्थ से होता है।”
पूरा मैदान शांत
था।
गुरुदत्त ने आगे
कहा—
“याद रखिए,
आंदोलन खड़ा करना कठिन है, लेकिन उसे पवित्र
बनाए रखना उससे भी कठिन। यदि अपराधी, अवसरवादी और स्वार्थी
लोग किसी जनांदोलन की दिशा तय करने लगें, तो वह आंदोलन जनता
का नहीं, उनकी महत्वाकांक्षाओं का उपकरण बन जाता है। इसलिए
किसी भी संघर्ष की पहली शर्त है—चरित्र। दूसरी—पारदर्शिता। तीसरी—सत्य के प्रति
अटूट निष्ठा।”
तालियों की
गड़गड़ाहट देर तक गूँजती रही।
सूर्य अस्ताचल की
ओर बढ़ रहा था।
उसकी किरणें
गुरुदत्त के चेहरे पर पड़ रही थीं।
उसे लगा जैसे पिता
की आवाज़ फिर कानों में गूँज रही हो—
“जिस दिन
लोग डरना छोड़ देंगे, उसी दिन अन्याय हार जाएगा।”
गुरुदत्त ने आसमान
की ओर देखा।
उसके हाथ में अब
कोई झंडा नहीं था।
कोई नारा नहीं था।
केवल एक जलती हुई
मशाल थी—
जो किसी व्यक्ति
की नहीं,
एक विचार की थी। वह कह रहा था “ विचार
कभी जेलों में बंद नहीं होते । थोड़ा रुक कर लंबी सांस लेते हुए गुरु दत्त ने फिर
गंभीर आवाज में कहा-”दोस्तों,
परिवर्तन केवल क्रोध से नहीं, चरित्र से आता
है। जनांदोलन लोकतंत्र की शक्ति हैं, पर उनकी सफलता इस बात
पर निर्भर करती है कि वे सत्य, अनुशासन और नैतिकता के प्रति
कितने प्रतिबद्ध रहते हैं। जिस आंदोलन में स्वार्थ, अपराध और
अवसरवाद प्रवेश कर जाएँ, वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है।
इसलिए हर संघर्ष के साथ आत्म-संघर्ष भी आवश्यक है। यही किसी भी जनचेतना की सबसे
बड़ी विजय है।
एक गंभीर आवाज
लगातार लोगों को संबोधित कर रही थी लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे उनके कानों में
शब्द पड़ रहे थे- “क्रांति की मशाल हाथ में
लेना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन है उसकी लौ को
स्वार्थ की आँधी से बचाए रखना।”
***
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड – 247667


संपादकीय टीम का धन्यवाद। कृपया पूरी कहानी अवश्य पढ़ें गण।
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