सोमवार, 31 अगस्त 2026

संपादकीय


AI: सृजनात्मक उपयोगिता


डॉ. पूर्वा शर्मा

AI – एक ऐसा शब्द है जिससे आज के इस आधुनिक-डिजिटल युग में शायद ही कोई अपरिचित होगा। AI यानी Artificial Intelligence अर्थात् कृत्रिम बुद्धिमत्ता। हर क्षेत्र, हर वर्ग, हर आयु के लोग अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से AI का उपयोग कर रहे हैं।  AI केवल विज्ञान एवं तकनीक तक ही सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा हो या चिकित्सा या भले ही हो फिर कृषि अथवा व्यापार या फिर सृजनात्मकता से जुड़े क्षेत्र जैसे – साहित्य, पत्रकारिता, संगीत, चित्रकला, सिनेमा, विज्ञापन या मनोरंजन; इन सभी क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का बोलबाला है यानी यूँ कहिए कि AI अब हमारे जीवन का और हमारे कामकाज का एक अभिन्न हिस्सा और एक महत्त्वपूर्ण आधार-माध्यम बनता जा रहा है ।

आसान शब्दों में कहा जाए तो AI एक ऐसा मददगार है जो मनुष्य न होकर भी एक बुद्धिजीवी की तरह हर जगह-हर क्षण हमारी मदद करने के लिए तत्पर है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसके माध्यम से हम अपने उपकरणों को हर तरह का कार्य करने में दक्ष कर रहे हैं। किसी कार्य को करने के लिए जहाँ हम अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं वहाँ पर अब AI नामक यह सहायक चुटकियों में इस कार्य को अच्छी तरह से सम्पन्न करता है। 

AI के आने से एक ओर जहाँ हमारा काम सरल हुआ है वहीं दूसरी ओर लोगों में एक चिंता भी बनी हुई है कि क्या इसके आने से हमारी सोचने की क्षमता, रचनात्मकता और रोजगार इत्यादि को खतरा है? इसका उत्तर ‘हाँ’ एवं ‘ना’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘हाँ’ इसलिए कि यदि हम इसे ही अपनी सोचने की क्षमता का विकल्प बना लें तो अवश्य ही यह एक खतरा साबित हो सकता है लेकिन यदि हम इसे अपने एक सहायक के रूप में साथ रखें तो अवश्य ही वह हमारे लिए वरदान साबित हो सकता है। उदाहरण के तौर पर – क्या कैमरे के आविष्कार से चित्रकला खत्म हो गई? जवाब हमारे सामने स्पष्ट ही है।    

AI के पास है – बहुत सारा डेटा(Data) अथवा इनफार्मेशन और इन जटिल सूचनाओं का विश्लेषण भी, इसके साथ ही इस जानकारी को उपयोगी बनाने के अनगिनत तरीके, गलतियों की संभावना कम और सबसे महत्त्वपूर्ण बात कम समय में तेजी से कार्य करने की अद्भुत क्षमता। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक क्षेत्र में AI कार्यरत है। लेकिन यहाँ हम बात करेंगे सृजनात्मकता की; क्या सृजन के क्षेत्र में AI उतना ही उपयोगी है जितना कि अन्य क्षेत्रों में ? जब हम सृजन-लेखन की बात करते हैं तो इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष होता है –संवेदना-अनुभूति। किसी भी भाषा में लेखन-सृजन का कार्य करने के लिए उस भाषा के शब्दों-व्याकरण का ज्ञान तो आवश्यक है ही, लेकिन इसके साथ महत्त्वपूर्ण है – हमारी संवेदना। मनुष्य अपनी अनुभूति को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है और तब किसी रचना का जन्म होता है।  

हाँ, एक बात अवश्य है कि AI किसी भी लेखन कार्य के लिए आपको उस विषय से संबंधित जानकारी उपलब्ध करवा सकता है, शीर्षक-संवाद-शैली आदि को लेकर अनेक विकल्प सुझा सकता है। उदाहरणतः यदि किसी आलेख को लिखने के लिए AI का उपयोग किया जाए तो वह महज 5 से 10 मिनट या उससे भी कम समय में एक बढ़िया लेख तैयार कर सकता है। लेकिन AI उसके पास उपलब्ध सामग्री और उसके विश्लेषण से यह सृजनात्मक कार्य करेगा, तो संभव है कि इस कार्य में वह उपलब्ध बातों-जानकारियों के अतिरिक्त कुछ नयापन अथवा मौलिकता लाने में असमर्थ हो। एक रचनाकार के विचार, उसकी कल्पना शक्ति का अंदाजा लगाना असंभव है और इसके साथ उसकी संवेदना-संस्कृति-परिवेश-परिस्थिति के संयोग से वह क्या मौलिक-क्या नया गढ़ सकता है! इस बात को स्वयं सर्जक भी नहीं जानता। सृजन के क्षेत्र में AI को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण बातें-मुद्दे इस प्रकार हैं –

AI के आने से एक बात स्पष्ट है कि रचनाकार की मौलिकता को एक नयी चुनौती मिली है। आप क्या नया लिख सकते हैं? क्या अनूठा गढ़ सकते हैं? किस नये दृष्टिकोण से किसी पुराने विषय को प्रस्तुत कर सकते हैं ? यह आपको एक नवीनता-नयापन लाने के लिए नयी दिमागी कसरत करवाने के लिए उकसा सकता है। आपके अनुभव को, आपकी पीड़ा-संघर्षों-आनंददायक क्षणों को एक नये आयाम पर पहुँचाने में सहायक हो सकता है। इतना कुछ पहले से लिखा जा चुका है लेकिन जो किसी ने पहले लिखा नहीं-सोचा नहीं, आपकी ऐसी किसी कल्पना को एक नयी उड़ान दे सकता है। AI की स्वयं की कोई भावनाएँ नहीं है इसलिए उसकी सृजनात्मकता में आपके हृदय में डुबकी लगाती संवेदनाओं की गहराई-गाढेपन का स्पर्श वैसे  शायद संभव नहीं जैसे आपको अनुभव हो रहा हो।  अपनी निज अनुभूतियों को ठीक उसी आकार में गढ़ने की चुनौती एक रचनाकार के पास सदैव ही रहती है जो उसने भोगा है। हमारी संस्कृति-परंपरा-सामाजिक एवं लोकजीवन का चित्रण करने में AI सहायक हो सकता है लेकिन इन संदर्भों-संकेतों को सही एवं उचित तरह से प्रस्तुत कर सके यह उतना अनुभवी भी नहीं। नये प्रतीक-बिंब-व्यंग्य-अलंकारों आदि को रचने-गढ़ने का सामर्थ्य तो आज भी सर्जक की कलम में ही छुपा है।  सर्जक के लिए पहले भी यह एक चुनौती थी और आज भी है। AI चूँकि एक उपकरण है तो वह रचना को ज्यादा अच्छे सलीके से, तरीके से सुव्यवस्थित बनाने का कार्य करता है, इसके कारण एक और चुनौती हमारे सामने है और वह है – मानवीय संस्पर्श। किसी भी सृजन में मानवीय संस्पर्श का कार्य सिर्फ़ और सिर्फ़ सर्जक के द्वारा ही संभव है।  

इस बात में कोई संदेह नहीं कि आज का दौर AI का दौर है, और हमें नये ज़माने के साथ चलना है। इसलिए AI को एक सहायक की तरह साथ रखकर सर्जक अपने कार्य को आसान बना सकता है, आसानी से सूचनाओं का एकत्रीकरण-विश्लेषण करके अपनी सृजन-प्रक्रिया को गति दे सकता है, उसे व्यापक बना सकता है। एक सर्जक अपनी सृजनात्मक प्रतिभा और AI की बुद्धिमत्ता दोनों के ठीक-ठीक ताल-मेल से अपनी रचना में और अधिक निखार ला सकता है। जैसे वह AI की मदद से अपने द्वारा तय-निर्धारित किसी विषय के अनेक विकल्प को देख सकता है,  उसके चयन में सहायता ले सकता है, इतना ही नहीं उसमें सुधार-संशोधन की संभावनाएँ भी देख सकता है और अंततः अपने अनुभव-अपनी संवेदनाएँ-अपनी जीवन दृष्टि-अपने विवेक का सही उपयोग करके अपनी रचना के अंतिम ड्राफ्ट को ताज़ी मौलिक कृति के रूप में पाठकों के समक्ष पहुँचाने में सफल हो सकता है। इस सृजन के पीछे उसका उद्देश्य क्या है?, यह जिम्मेदारी तो सदैव सर्जक की ही रहती है और इस तरह के सर्जनात्मक कार्य में भी यह उसी पर ही आधारित होगी। लेकिन हम यह बात न भूलें कि मौलिकता-जीवनानुभव-संवेदना-जीवन मूल्यों एवं मानवीय संस्पर्श को प्रस्तुत करना तो पहले भी सर्जक का कर्तव्य रहा है और आज भी है।   

 


डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा  

 


2 टिप्‍पणियां:

  1. AI जहां हम सबका सहयोगी बन गया है वहीं इस पर आंख मीच कर भरोसा करना कष्ट दे सकता है । AI को हम अपना सहायक बनाकर ही रखेंगे तो बेहतर होगा । पूर्वा ने सही व्याख्या की है,आशीर्वाद ।

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  2. AI के आगमन ने अनेक चिंताओं को जन्म दिया है, लगातार इस पर विचार विमर्श भी हो रहे हैं, आपका आलेख इन चिंताओं को समेटते हुए सही निष्कर्ष दे रहा है कि "मौलिकता-जीवनानुभव-संवेदना-जीवन मूल्यों एवं मानवीय संस्पर्श को प्रस्तुत करना तो पहले भी सर्जक का कर्तव्य रहा है और आज भी है।" बधाई डॉ. पूर्वा जी।

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