तुलसी
चाखा रामरस,
पत्नी के उपदेश
श्रीराम
पुकार शर्मा
‘तुलसी
जयंती’ के ५२९ वें पावन गौरवमय अवसर पर कलियुग के श्रीराम भक्तप्रवर और आज घर-घर
में विराजमान भक्ति प्रतीक
“श्रीरामचरितमानस” के अमर कृतिकार गोस्वामी तुलसीदास को सादर हार्दिक नमन
करते हुए,
उनकी ही बातों को आप सभी तुलसी- भक्तों के सम्मुख रखने की धृष्टता
कर रहा हूँ । आप सभी श्रीराम तथा तुलसी भक्तों को मेरा सादर प्रणाम ।
‘सियाराममय
सब जग जानी । करहुँ प्रणाम जोरी जुग पानी
॥’
‘पूरे
संसार में ही प्रभु श्रीराम का निवास है । समस्त चराचर प्रभु श्रीराम का ही स्वरूप
हैं । मैं हाथ जोड़कर उन सभी स्वरूपों में विराजमान प्रभु श्रीराम को प्रणाम करता
हूँ ।’
श्रावण
माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि, संवत् १५५४ को अभुक्त मूल
नक्षत्र में उत्तर प्रदेश के राजापुर गाँव में जन्मे श्रीराम भक्तप्रवर गोस्वामी
तुलसीदास ने उपरोक्त शाश्वत तथ्य को सगर्व स्वीकार किया है । बचपन से ही पिता
द्वारा त्याज्य ‘रामबोला’ बालक को भगवान् शंकर की प्रेरणा से रामशैल के रहनेवाले
बाबा नरहर्यानन्द ने खोज निकला । बालक रामबोला ने बिना कोई पूर्व अभ्यास के ही
‘गायत्री मंत्र’ के अपने सुंदर लयात्मक उच्चारण से वहाँ उपस्थित सब लोगों को चकित
कर दिया था । फलतः बाबा नरहर्यानंद ने उस रामबोला बालक को अपने साथ प्रभु श्रीराम
की जन्मभूमि अयोध्या ले गए । वहीं पर उन्होंने माघ शुक्ल पंचमी, शुक्रवार, संवत १५६१ को बालक ‘रामबोला’ का
‘यज्ञोपवीत-संस्कार’ कर विधिवत उसका नाम ‘तुलसीदास’ रखा और वैष्णवों के पाँच
संस्कारों को करवाकर उसे ‘रामनाम’ का गुरुमंत्र प्रदान किया ।
इस प्रकार
तुलसीदास को ‘रामनाम’ गुरुमंत्र की प्राप्ति तो हो गई, परंतु अभी तक वह महामंत्र उनके अन्तःस्थल में अपना विशेष स्थान न बना
पाया था, जिस कारण तुलसीदास अभी भी हम-आप जैसे ही एक साधारण सांसारिक आग्रही
व्यक्ति ही रहे थे । सांसारिकता तथा दैहिक-प्रेम की प्रबल आसक्ति उन्हें भी अपने
मजबूत बंधन में जकड़े हुए थी । सांसारिकता से वैराग्य और श्रीरामनाम का
आध्यात्मिक महामंत्र उन्हें प्राप्त करना, तो अभी अपेक्षित ही था । अपितु तुलसीदास
को वह अमूल्य महामंत्र किसी साधुजन, मुनि या तपस्वी से न प्राप्त होकर, उनकी
धर्मपत्नी ‘रत्नावली’ के धिक्कारयुक्त उपदेशों के माध्यम से ही प्राप्त हुए था ।
२९ वर्ष की आयु में, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, गुरुवार, संवत् १५८३ को राजापुर से थोड़ी ही दूर
यमुना के उस पार स्थित एक गाँव के भारद्वाज गोत्र की एक सुंदर कन्या ‘रत्नावली’ के
साथ तुलसीदास का विवाह हुआ था । पत्नी के प्रति उनमें प्रबल प्रेमासक्ति की भावना
थी, जो अक्सर साधारण जन में हुआ करती है । एक दिन के लिए भी
अपनी पत्नी का विछोह उन्हें स्वीकार न था । एक प्रकार से उनका गृहस्थ जीवन की नैया
पत्नी की प्रेम-धारा पर सुगमता से तैर रही थी ।
परन्तु तुलसीदास के जीवन का परम उद्देश्य यह सांसारिक जीवन न था । उनकी दिव्य दृष्टि और भक्ति-चक्षु को अभी जागृत होना शेष ही था । काल को सबकुछ स्मरण था । वह तुलसीदास में एक विराट परिवर्तन की तैयारी में लगा हुआ था । उसकी योजना के अनुकूल ही एक बार तुलसीदास की पत्नी रत्नावली, उनकी अनुपस्थिति में अपने मायके चली गईं । रत्नावली के वियोग की पीड़ा ने तुलसीदास के हृदय सहित मस्तिष्क को भी व्यग्र कर दिया । उन्हें अपने दिलो-दिमाग पर नियंत्रण न रहा । फिर रत्नावली से मिलने की प्रबल उत्कंठा में उन्होंने न आव देखा, न ताव । भाद्रपद के कृष्णपक्ष में बरसते घनघोर अंधेरी रात में उफनती यमुना नदी में बहती एक लाश को, लकड़ी का लट्ठा समझ कर, उसी के सहारे यमुना नदी को पार किया । गंभीर रात्रि में अपने ससुराल-घर के प्रवेश द्वार को बंद देखकर, पास के ही एक पेड़ से लटकते हुए एक सर्प को रस्सी समझ कर, उसी के सहारे दीवार को फाँदकर रत्नावली से मिलने के लिए तुलसीदास उसके कमरे में आ धमके । पर रत्नावली आम प्रेमी हृदय पत्नियों की भाँति अपने प्रेमातुर पति को देखकर खुश न हुई और न उसका स्वागत ही की, बल्कि अपने पति को चोरी-छुपके आया देखकर, सामाजिकता तथा लोक-लाज को स्मरण कर, वह बहुत दु:खी और आक्रोशित हुई । उसका व्यथित मन किसी घायल सर्पिणी की भाँति फुफकार उठा । मार्मिक और तीक्ष्ण शब्दों के विष में डूबे बाणों से वह अपने प्रेमातुर पति को धिक्कारने और भेदने लगीं ।
“लाज न आवत आपको, दौरे
आयहु साथ ।
धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहौं मैं नाथ ॥
अस्थि चर्ममय देह मम,
तामें ऐसी प्रीति!
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ?”
अर्थात, ‘हे नाथ ! आपको अपनी पत्नी के
पीछे-पीछे दौड़कर ससुराल आने में तनिक भी लज्जा न आई ? आपके ऐसे दैहिक प्रेम को धिक्कार है ।
हाड़-मांस के मेरे इस शरीर से जितना प्रेम आप कर रहे हैं, यदि
उसका आधा प्रेम भी प्रभु श्रीराम से किया होता, तो आपको
भवसागर से मुक्ति मिल जाती ।’
सांसारिक दैहिक प्रेम में गोता लगाने की प्रबल उत्कंठा रखने वाले प्रेमातुर
तुलसीदास को अपनी पत्नी रत्नावली के उन तीक्ष्ण शब्द-प्रहारों पर तत्क्षण विश्वास
ही न हो पाया । उन्होंने तो अपनी पत्नी से इस उवाच की पुनरावृत्ति करने का निवेदन
किया । इस बार पहले से भी कुछ अधिक तीव्र फुंफकार शक्ति से रत्नावली पुनः उन्हीं
बातों को दुहराते हुए उन्हें धिक्कार दिया । भीषण शब्द और कठोर भाव के प्रबल आवेग
का सामना, उनकी दैहिक प्रेम-भावना न कर सकी । मद्धिम दीया के उस धूमिल
प्रकाश में रत्नावली का मुख-मण्डल देवी भारती सदृश प्रज्ज्वलित हो उठा, जिसकी तेज आभा से तुलसी का प्रेमाग्राही हृदय निर्मल हो गया । महाकवि
‘निराला’ ने अपनी काव्य- रचना में तुलसीदास को भी उस समय रत्नावली के रूप में,
अपनी तेज आभा से युक्त ज्ञानदायिनी माँ भारती का ही दर्शन करवाया है
।
“जागा, जागा संस्कार प्रबल,
रे गया काम तत्क्षण वह जल,
देखा,
वामा वह न थी, अनल-प्रतिमा वह,
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान,
हो गया भस्म वह प्रथम भान ।
देखा, शारदा नील-वसना,
हैं सम्मुख स्वयं सृष्टि-रशना ।”
आशा के विपरीत अपनी पत्नी के धिक्कारपूर्ण वे वचन किसी दिव्य तेज
ज्ञान-किरणों की भाँति तुलसीदास के मन में व्याप्त दैहिक प्रेम-जंजाल को भस्मभूत
कर दिया और उसके स्थान पर मलयानिल-सा नवीन श्रीराम भक्तिरस-धार को प्रस्फुटित कर
दी । उसकी अजस्र धार ने दैहिक प्रेमी तुलसीदास को एक महान आध्यात्मिक
श्रीराम-प्रेमी भक्त बना दिया । इस प्रकार ‘रत्नावली’ ही तुलसीदास की आध्यात्मिक
गुरु रहीं । यही तो काल की गुप्त योजना भी थी । जन्म लेते ही ‘राम’ नाम को उच्चरित
कर, अपने जीवन के परमोद्देश्य श्रीराम-भक्ति को उद्घोषित करने
वाले ‘रामबोला’ को अपने अभीष्ट देव के चरणों तक पहुँचने में अवश्य ही कुछ विलंब हो
गया ।
उस दिव्य ज्ञान से प्रेरित होकर तुलसीदास का हृदय भगवान श्रीराम जी के प्रति
अगाध भक्ति का अंतहीन दीर्घ सफर की ओर उन्मुख हो गया । उसी बरसात की अंधेरी रात
में ही वे उलटे पाँव अपने गाँव राजापुर वापस लौट आये । पर अब मन में प्रभु श्रीराम
की भक्ति की व्यग्रता उन्हें अपने पैत्रिक वासस्थान में भी न टिकने दी । उन्हें
स्वयं अपने आप पर अब कोई वश ही कहाँ था ? अब
तो वे प्रभु श्रीराम के ‘दास’ हो गए थे । अतः प्रभु मिलन की चाहत में जहाँ भी
उम्मीद बंधी, वहीं तत्पर दौड़ गए । कुछ समय के बाद ही वे पुन:
काशी चले गए और वहाँ लोगों को राम-कथा सुनाने के बहाने अपने आप को दिन-प्रतिदिन
प्रभु श्रीराम के करीब, और करीब होते हुए, उनका सामीप्य प्राप्त करने के लिए स्वयं को समर्पित करने लगे ।
फिर एक दिन एक ‘गुरु-प्रेत’ के मार्गदर्शन पर तुलसीदास ने अपने प्रभु
श्रीराम के परमभक्त श्रीहनुमान जी के दिव्य दर्शन को प्राप्त किये और उनके ही
परामर्श से चित्रकूट में संवत् १६०७ की मौनी अमावस्या, बुधवार के दिन, अपने अलौकिक प्रभु
श्रीराम जी का अनुज श्रीलक्ष्मण जी सहित लौकिक दिव्य-दर्शन को आत्मसात किया ।
प्रभु के कर-कमल से अपने मस्तक पर चन्दन लेप को प्रभु आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त कर
तुलसीदास धन्य हो गए । आराधक और आराध्यदेव के इस दिव्य मिलन के लौकिक दृश्य के
साक्षी चित्रकूट घाट के समस्त चराचर बन थे । न जाने कितनी दिव्यात्माएँ अशरीर रूप
में वहाँ उपस्थित होकर ‘चित्रकूट की घाट पर, संतन की भीर’
बढ़ा दी थी । भगवान् द्वारा अपने भक्त को प्रतिष्ठित करने के इस दिव्य दर्शन से भला
प्रभु श्रीराम के दास श्रीहनुमान जी अपने आप को कैसे वंचित रख सकते थे ? यह बात तो असम्भव ही थी कि प्रभु श्रीराम जी अनुज श्रीलक्ष्मण जी सहित
चित्रकूट पधारे, और उनका वत्स स्वरूप निश्छल भक्त श्रीहनुमान
जी वहाँ न पहुँचे । अतः श्रीहनुमान जी ने एक सुग्गे का रूप धारण कर उस पावन
मनोहारी दिव्य दृश्य को आत्मसात किया । उसका वर्णन भी स्वयं श्रीहनुमान जी ने
तुलसीदास के जिह्वा के माध्यम से किया है -
“चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर ।
तुलसिदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर ।।”
फिर अपने प्रभु श्रीराम जी के आदेश पर ही तुलसीदास अयोध्या पहुँचे । वहीं पर
संवत् १६३१ को पावन रामनवमी के दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने अपने प्रभु श्रीराम
को स्मरण कर, उनकी पवित्र गाथा को लोकभाषा अवधी में
"रामचरितमानस" की रचना आरंभ की । दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा
ही योग बना हुआ था, जैसा त्रेतायुग में श्रीराम-जन्म के दिन
था । यह पवित्र रचना दो वर्ष, सात महीने और छब्बीस दिनों में
श्रीराम-सीता विवाह की पावन जयंती, अर्थात संवत् १६३३ के
मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को अपने पवित्र सातों काण्ड सहित पूर्ण हो हुई
।
तुलसीदास-कृत “रामचरितमानस” हर दृष्टि से विश्व की सर्वोत्कृष्ट रचना बनी, जिसकी श्रेष्ठता को काशी के स्वामी स्वयं बाबा विश्वनाथ जी
ने उस पर ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ लिखकर और उसके नीचे अपना हस्ताक्षर कर सिद्ध किया
है । उस समय वहाँ उपस्थित सहृदय लोगों ने मन्दिर में "सत्यं शिवं सुन्दरम्"
की पावन ध्वनि भी श्रवण की थी । तत्कालीन सर्वमाननीय परम विद्वान् महापंडित
श्रीमधुसूदन सरस्वती जी ने इस “रामचरितमानस” को देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और
उस पर अपनी ओर से टिप्पणी लिख दी -
“आनन्द कानने ह्यास्मिं जंगमस् तुलसीतरुः ।
कविता मंजरी भाति राम भ्रमर भूषिता ।।”
अर्थात, ‘काशी के आनन्द-वन में तुलसीदास साक्षात
तुलसी का पौधा है । उसकी काव्य-मंजरी बड़ी ही मनोहर है, जिस
पर श्रीराम रूपी भँवरा सदैव मँडराता रहता है ।’
गोस्वामी तुलसीदास का उद्देश्य कभी भी ज्ञान प्रदर्शन का नहीं रहा है, बल्कि उनका उद्देश्य वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद,
साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण
रक्षा, प्राचीन संस्कृति तथा वेद-सम्मत समाज की स्थापना करना
ही रहा, जिसमें शासक जनसेवक हो और जनता उनकी सन्तान सदृश
प्रेम-भाजन हो । अतः देवभाषा के मर्मज्ञ होते हुए भी उन्होंने तत्कालीन लोकभाषा
अवधी और ब्रज में ही अपने प्रभु श्रीराम के चरित्र के साथ ही साथ अन्य
देवी-देवताओं की अराधना युक्त दर्जनों आध्यात्मिक रचनाएँ कीं । जिनमें रामललानहछू,
वैराग्य-संदीपनी, रामाज्ञा-प्रश्न, जानकी-मंगल, रामचरितमानस, पार्वती-मंगल,
गीतावली, हनुमान चालीसा, विनय-पत्रिका, कृष्ण-गीतावली, बरवै
रामायण, दोहावली और कवितावली विशेष प्रमुख हैं । उनकी ये सभी
रचनाएँ, जनमानस द्वारा आज ईश-भक्ति के प्रतीक और आधार के रूप
में स्वीकृत हैं । तुलसीदास जी की हस्तलिपि सुनहरे मोती सदृश अत्यंत ही सुन्दर रही
थी ।
बाद में गोस्वामी तुलसीदास जी काशी में गंगा जी के किनारे विख्यात असीघाट पर
रहा करते थे । मान्यता है कि एक रात कलियुग ने मूर्त रूप धारण कर उनके पास आकर
उन्हें पीड़ा पहुँचानी शुरू की । तब तुलसीदास जी ने उसी समय श्रीहनुमान जी का
ध्यान किया । हनुमान जी ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें प्रभु श्रीराम जी की
प्रार्थना के पद रचने को कहा । इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम वृहत् कृति
‘विनय-पत्रिका’ की रचना की और उसे अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित कर
दिया । प्रभु श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर, उन्हें निर्भयता प्रदान की ।
अपने १२६ वर्ष के दीर्घ जीवन-काल को श्रीराममय बनाते हुए, संवत् १६८० में श्रावण शुक्ल सप्तमी, शनिवार, (कुछ स्रोतों के अनुसार) को तुलसीदास जी ने
‘राम-राम’ कहते हुए, अपने सांसारिक नश्वर शरीर का परित्याग
कर श्रीराम में एकाकार हो गए -
“संवत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर ।।”
गोस्वामी तुलसीदास जी ने आमरण अपने गुरु रत्नावली द्वारा निर्दिष्ट
श्रीराम को ही अपना सर्वस्व और अपने प्रभु के रूप में स्वीकार किया । रत्नावली
द्वारा सुझाये गए मार्ग को ही अपनाकर ‘रामबोला’ संतशिरोमणि श्रेष्ठ गोस्वामी
तुलसीदास बने । जग को अधर्म की पैशाचिकता से मुक्त कराने और सबको मानसिक रूप से
सबल बनाने के लिए उन्होंने “श्रीरामचारितमानस” जैसे वृहद् ग्रंथ की रचना कर
श्रीरामनाम रुपी अमूल्य व अमोघ मन्त्र जग को प्रदान किया ।
मधुर चंद्र सदृश ‘तुलसी’ की दिव्य शीतल चंद्रिमा में स्नात कराकर सहृदय जनों
के दु:ख, नैराश्य और व्यग्रता जनित भयावह ताप का शमन कर, उन्हें दिव्य संतुष्टि प्रदान की । लेकिन इन सबके पीछे त्यागमयी ‘लक्ष्मण
भामिनी उर्मिला’ सदृश ‘रत्नावली’ के जीवन की वृहत् त्याग और तपस्या ही निहित है
।
***
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस
रोड,
हावड़ा – 711101
***



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