सोमवार, 31 अगस्त 2026

काव्य

 



प्रवासी मन

प्रीति अग्रवाल

 

मेरा देश मुझसे अलग तो नहीं,

है यादों, इरादों और वादों में वो।

 

मेरी तख्ती में, मेरी स्याही में वो,

कलम से जो निकली, जुबानी में वो।

 

हर गीत, हर कविता, कहानी में वो,

है मीठे सुरों की रवानी में वो।

 

मेरे शिल्प में, मेरी शैली में वो,

विचारों में और संस्कारों में वो।

 

पंख फैला जब उड़ती हूँ मैं,

बुलंद हौसलों की, उड़ानों में वो।

 

वो मुझ में निहित,

हूँ मैं उसमें ढली, सद्भावना की धरोहर मिली।

 

जीवन की अनमिट कहानी में वो,

हर पात्र की छवि, सुहानी में वो।

 

मैं प्रवासी सही, मेरे प्रियजन वहीं,

प्रार्थनाओं में, शुभकामनाओं में वो।

 

मेरा देश मुझसे अलग तो नहीं, उसकी मिट्टी में मैं, मेरी मिट्टी में वो!!

 ***

प्रीति अग्रवाल

कैनेडा


2 टिप्‍पणियां:

  1. एक और सुंदर अंक के लिए ढेरों बधाई पूर्वा जी,!🌹


    पत्रिका में स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार!!

    जवाब देंहटाएं
  2. "मैं प्रवासी सही, मेरे प्रियजन वहीं,
    प्रार्थनाओं में, शुभकामनाओं में वो।
    मेरा देश मुझसे अलग तो नहीं,
    उसकी मिट्टी में मैं, मेरी मिट्टी में वो!!"
    -- वाह, अपने देश की माटी की महक, कविता के शब्द -शब्द में समाहित है। भावपूर्ण कविता. बधाई प्रीति जी

    जवाब देंहटाएं

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