‘सनातन
धर्म’ : मेरी दृष्टि में
शशिबिन्दुनारायण
मिश्र
सनातन
शब्द का प्रयोग बहुधा मैं भी विश्वासपूर्वक कर देता हूँ;
प्रसंगवश अध्यापन के समय में और पारस्परिक वार्ता में भी (यथा-
सनातन धर्म, सनातन संस्कृति, सनातन
विचारधारा व सनातन संविधान आदि) अतः कुछ लोग मुझे सनातनी / अतीतजीवी की संज्ञा
देते हैं। वर्तमान में सनातन शब्द का राजनीतीकरण होना चिन्ता का विषय है। समय की
माँग है कि सनातन शब्द पर सार्थक चर्चा हो और उसका वास्तविक स्वरूप सबके सामने
आये।
सनातन (वि० / सं० पुं०) - ‘सना’ (सना इत्यव्ययं नैरन्तर्ये
तच्च देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छेद- राहित्यम् ) शब्द से बना है। (सदा+ट्युल,
तुट्, नि, दस्य न:) अर्थ
है ;- हमेशा, सदातन, नित्य, शाश्वत, पुराण, संतत, चिरन्तन, अनादि काल से
चला आ रहा, सनातन = सनात्, सनत्।
सनातनी (वि.) = जो परम्परानुसार आचार- विचार आदि में निष्ठा रखता हो; परम्परानिष्ठ। परम्परा, कदापि रूढ़ि नहीं होती,
उसे रूढ़ि से जोड़कर देखना पूर्णतः अनुचित है। परम्परा का अभिप्राय
है कि जिसमें रस हो, जो आचार-विचार, रीति-रिवाज
मानवता के कल्याणार्थ आत्मसात करने योग्य है। ऐसा मनीषियों ने बताया है। सनातन
शब्द, सनातन धर्म या सनातनी शब्द पर इस सोशल मीडिया के युग
में जिस तरह से विरोध और समर्थन में उन शब्दों के गूढ़ार्थ को जाने बगैर लोग
इधर-उधर की बकवास करते हैं, हँसी आती है। सनातन शब्द
आध्यात्मिक शब्द है। अध्यात्म, धर्म और संस्कृति से अलग हटकर
सनातन का राजनीतिक संदर्भ ग्रहण किया जाना मानसिक दिवालियापन ही है। सनातन का आजकल
की राजनीति से भला क्या वास्ता? राजनीतिक विचारधारा के लोग
यदि सनातन के महत्त्व को समझते, हृदयंगम करते और उसके बीज
तत्त्व को आचरण में उतारकर आमजनमानस को अकुण्ठ भाव से नेतृत्व देते तो बात और
होती। सनातन शब्द तब से है जब से दाशरथि राम और वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। राम और
कृष्ण जैसे हमारे जीवन के अंग हैं वैसे ही सनातन भी। सनातन शब्द को लेकर इस समय न
जाने क्यों दूषित राजनीति कूद पड़ी है। वासुदेव श्रीकृष्ण ने ‘सनातन’ शब्द का प्रयोग अर्जुन के लिए प्रेरणास्वरूप
कुरुक्षेत्र युद्धभूमि पर किया, जहाँ धर्म-अधर्म के बीच
निर्णय होना है। पृथापुत्र अर्जुन से वासुदेव श्रीकृष्ण ने कहा –
“बीजं
मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनाम्।।”
अर्थात्
हे पार्थ ! सम्पूर्ण प्राणियों का सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूँ। अर्थात् सबका कारण
मैं ही हूँ। मेरे बिना प्राणी की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यहाँ जिस बीज का वर्णन
है,
वह बीज सनातन है, अर्थात् अनादि एवं अनन्त है।
यह सनातन ही चेतन तत्त्व अव्यय अर्थात् अविनाशी है। –
“प्रभव:
प्रलय: स्थानं निधानं बीजव्ययम्।”
अर्थात्
संसार का मैं ही निमित्तकारण और उपादनकारण हूँ। मैं अव्यय बीज हूँ,
अर्थात् सनातन हूँ, कभी नष्ट होने वाला नहीं
हूँ। सांसारिक बीज तो वृक्ष से पैदा होता है और वृक्ष को पैदा करके स्वयं नष्ट हो
जाता है। परन्तु ये दोनों ही दोष मुझ में नहीं हैं। –
“न
जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय:।
अजो
नित्य: शाश्वतोsयं पुराणो न हन्यते न हन्यमाने शरीरे।।”
यहाँ
भी वासुदेव श्रीकृष्ण कहते हैं- मेरा जन्म-मृत्यु से सम्बन्ध नहीं है,
मैं शाश्वत और पुराण हूँ। शाश्वत अर्थात् सनातन हूँ (ऊपर सनातन के
शाब्दिक अर्थ में शाश्वत शब्द आया है) सनातन मतलब नित्य-तत्त्व निरन्तर एक रूप
हूँ। पुराण: अर्थात् अविनाशी तत्त्व अनादि हूँ –
“अच्छेद्योsयमदाह्योsयमक्लेद्योsशोष्य एव
च।
नित्य:
सर्वगत: स्थाणुरचलोsयं सनातन:।।”
शस्त्र
शरीर का छेदन तो कर सकता है पर शरीरी का नहीं। यह शरीरी किसी भी शस्त्र से छेदन
योग्य नहीं है। इस शरीरी (आत्मतत्त्व) का शस्त्र के सिवाय मन्त्र / शाप आदि से भी
अनिष्ट नहीं हो सकता है , क्योंकि यह सनातन है,
अचल है, स्थाणु है, अनादि
है, सदा से है। यह शरीरी-देही-आत्मतत्त्व किसी समय नहीं था,
ऐसा सम्भव ही नहीं है। यह नित्य-निरंतर ज्यों का त्यों रहने वाला है,
क्योंकि यह सनातन है। सनातन के निहितार्थ को जानने वाला हर आस्तिक
और धार्मिक व्यक्ति सनातन शब्द को सिर- आँखों पर रखता है, श्रद्धा
का भाव रखता है, भले ही वह जिस भी मत या पंथ का अनुयायी हो।
हमारे विष्णु भगवान इस जगत् के पालनहार और नियन्ता हैं, ऐसा
शास्त्रों का मत है। यह चीज अन्यत्र भी है। एकेश्वरवादी धर्म ईसाई हो, इस्लाम धर्म हो, यहूदी धर्म हो, सबमें वह सनातनता / सनातन बीज तत्त्व स्पष्ट रूप में मौजूद है। ईसाई धर्म
भी मानता है कि ईश्वर त्रिमूर्ति (याहवे- उनके आदिदेव) के रूप में सबमें विद्यमान
हैं। उनका पवित्र आत्मतत्त्व सबके हृदय में वास करता है। यहूदी धर्म भी स्वीकारता
है कि उनके ईश्वर यहोवा सर्वशक्तिमान और अद्भुत हैं, वह
सर्वत्र हैं। इस्लाम धर्म के अनुसार भी अल्लाह सृष्टि का पालनहार है, केवल वही पूजनीय है, वह सबमें और सर्वत्र है।
रामकृष्ण परमहंस द्वारा किसी भी पूजा पद्धति से ध्यान करने पर भगवती काली का ही
साक्षात्कार होता था। इससे यह सिद्ध होता है कि सृष्टि की सर्वव्यापी सत्ता एक है,
जो सनातन धर्म में अद्वैतवाद है, वही अन्यत्र
एकेश्वरवाद। इसमें कोई संदेह नहीं कि ईश्वर एक है, हम सब
अपने विश्वास और श्रद्धा से उसे चाहे जिस रूप में ग्रहण करें। उसका बीज तत्त्व /
आत्मतत्त्व सब में है। वासुदेव श्रीकृष्ण के उपर्युक्त संदेश पर हम सब ध्यान दें,
जिसमें वे कहते हैं कि मैं ही संसार का बीज तत्त्व और निमित्तकारण
हूँ। तो जो संसार का निमित्तकारण है, वही तो सर्वशक्तिमान
ईश्वर है, वही सनातन है, उसे ही सनातन
धर्म में अच्युत और अविनाशी कहा गया है, वही ब्रह्माण्ड का
परमपद है, जिसकी शरण में बड़े-बड़े योगी, संन्यासी और तपस्वी जाकर जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पाने के साथ मोक्ष
पाना चाहते हैं। महात्मा बुद्ध जिस परम
पद की तलाश में महाभिनिष्क्रमण करते हैं। शान्ति की इच्छा वाले सिद्धार्थ महल के
अन्दर अनेकानेक विलासितापूर्ण सुखों से ऊबकर महल और नगर से बाहर वनप्रान्त देखने
निकलते हैं, रास्ते में क्रमशः रोगी, वृद्ध
और शव मिलते हैं, यह सब जीवन में उन्होंने पहली बार देखा था
और आगे बढ़ने पर जटाजूट वाला एक संन्यासी मिलता है, सिद्धार्थ
ने रथ से उतरकर उससे पूछा – “तुम कौन हो?” महान् बौद्ध
दार्शनिक महाकवि अश्वघोष लिखते हैं –
“नृपपुङ्गव!
जन्ममृत्युभीत: श्रमण: प्रव्रजितोsस्मि
मोक्षहेतो:।
जगति
क्षयधर्मके मुमुक्षुर्मृगयेsहं शिवमक्षयं पदं
तत्।।”
संन्यासी
ने सिद्धार्थ को उत्तर दिया- “हे नृपपुङ्गव ! जन्म और मृत्यु के दुःख से डरा हुआ
मैं बौद्ध संन्यासी। मैंने मोक्ष के लिए संन्यास की दीक्षा ली है। विनाशशील संसार
में मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा वाला मैं उस अविनाशी मोक्ष परमपद को खोज रहा हूँ।”
यही तो है सनातन तत्त्व, सनातन धर्म और सनातनता।
वासुदेव श्रीकृष्ण इसी ‘सनातन’ के बारे
में तो बार-बार अर्जुन से कहते हुए समूची दुनिया को संदेश दे रहे हैं और यह
सनातनता का संदेश किसी न किसी रूप में, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम और यहूदी
आदि सबमें और सर्वत्र है। काश् ! जाति और सम्प्रदाय आधारित वोट की राजनीति करने
वाले संकीर्ण मानसिकता के नेता सनातन और सनातनता का वास्तविक संदेश आमजनमानस तक
जाने देते। वैसे भी श्रीमद्भगवद्गीता किसी एक धर्म का ग्रन्थ नहीं है, श्रीमद्भगवद्गीता देश, काल और पंथादि की संकीर्णता
से मुक्त ग्रन्थ है। वह सकल मानवता का ग्रन्थ है। वास्तव में सनातनता में कभी
मतान्धता नहीं हो सकती। मनीषी साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने अपने एक निबन्ध
में सनातनता के बारे में प्रसंगवश लिखा है – “सनातनता में व्यक्ति राममय / कृष्णमय
हो जाता है। राम में उसका मन रमता है। जब रमता है तो आदमी न हिन्दू रहता है,
न ईसाई, न मुसलमान, न
विदेशी रहता है, न स्वदेशी। वह एक सच्चाई का हो जाता है,
जो कभी अप्रासंगिक नहीं होती।”
फादर कामिल बुल्के बेल्जियम में जन्मे एक समर्पित ईसाई पादरी थे। वे खाँटी
कैथोलिक थे। वे रामकथा का उद्भव और विकास पर इलाहाबाद में डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के
निर्देशन में रिसर्च कर रहे थे। उन्होंने रामचरितमानस और अन्य ग्रन्थों को डूबकर
पढ़ा था, वे तुलसीदास के राम के प्रति समर्पित होकर बाद के
दिनों में राम के ही हो गये और भारत में बस गये थे। कामिल बुल्के ने अपने जीवन से
प्रमाणित किया कि राम का होने के लिए हिन्दू होना अनिवार्य नहीं है। यही तो सनातन
होना है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में कहीं भी हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं किया
है। साधु बन जाना, सरकारी बाबा बन जाना, बड़े-बड़े नेताओं / अधिकारियों और धनवानों का बाबा बन जाने से कोई सनातनी
नहीं हो जाता। पं. विद्यानिवास मिश्र अपने एक अन्य निबन्ध में लिखते हैं, उनकी इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि –“सनातन धर्म जब शास्त्र को प्रमाण
मानता है तो वह किसी बँधे-बँधाए सत्य को ही प्रमाण नहीं मानता, बल्कि उस सत्य को जीने के साकार प्रयत्नों की शृंखला को प्रमाण मानता है।
इसीलिए उसका एक नाम है – सनातन धर्म। इस सनातनता में रूढ़ता नहीं है, सतत प्रवाहमयता है।” सच है जहाँ प्रवाहमयता रहेगी, वहाँ
जड़ता / रूढ़िवादिता आ ही नहीं सकती है। जहाँ भी कट्टरता और जड़ता है, वहाँ पर सनातनता नहीं है। कट्टरता और जड़ता से सनातनता का कोई सम्बन्ध हो
ही नहीं सकता है, असम्भव है। इस संसार में जब से सभ्यता और
संस्कृति का जन्म हुआ है, जब से हम सब सभ्य और सुसंस्कृत
कहलाये, सनातन उससे भी पहले से है। मनुस्मृति के अध्याय चार
में महाराज मनु सनातन धर्म के बारे में इस प्रकार कहते हैं –
“सत्यं
ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष
धर्म: सनातन:।।”
आप
ही सब बताएँ कि समाज में शान्ति और सुव्यवस्था के लिए क्या यह सनातन धर्म आवश्यक
नहीं है। हर कोई जब सच और झूठ को लेकर आदर्श की बात करता है तो वह जरूर कहता है,
(चाहे वह मनुस्मृति पढ़ा हो या न पढ़ा हो) कि सत्य बोलना चाहिए,
प्रिय बोलना चाहिए लेकिन अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए, यही तो सनातन धर्म है। महर्षि वेदव्यास जीवन में शान्ति और सुव्यवस्था के
लिए शाश्वत सनातन धर्म को इस ढंग से महाभारत के शान्तिपर्व में व्यक्त करते हैं –
“न
हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन्। अवैरेण हि शाम्यन्ति एष धर्म: सनातन:।।”
अर्थात्
वैर से वैर शान्त नहीं होता। वैर का अन्त सद्भावना और प्रेम से ही सम्भव है,
वैर से नहीं, यही सनातन धर्म है। वेदव्यास ने
महाभारत में आपसी- वैर में प्रतिशोध की भावना को लक्षित कर सकल मानवता को यह संदेश
दिया है। इस सनातन धर्म का हू-ब-हू अनुकरण महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को
संदेश देने के लिए भी किया है।आजकल के बुद्धिस्ट जो कहते हैं कि महात्मा बुद्ध का
भारतीय सनातनता के प्रति आग्रह नहीं है, वे ज़रा देख लें।
पालि भाषा में धम्मपद के प्रथम अध्याय में एक यमक है –
“न
हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनम्। अवेरेण च सम्मन्ति एस धम्मो सनन्तनो।।”
यह
महात्मा बुद्ध के सबसे प्राचीन और मूल उपदेशों में से एक है। यही उपदेश थोड़े-से
भिन्न रूप में जैन धर्म के उदान वर्ग में भी मिलता है। जीवन में शान्ति के लिए
उपर्युक्त संदेश, हू-ब-हू वही भाव महात्मा
बुद्ध के उपदेश में भी है जो महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में मानवता
के हित में शान्ति- सद्भाव के लिए दिया है। सनातनता को आप कभी भी प्रकृति के
नियमों से विच्छिन्न नहीं कर सकते हैं। सनातनता के प्रति आग्रह के कारण ही बौद्ध
धर्म लोकधर्म का रूप धारण करता हुआ हिन्दी भक्ति काव्य धारा में निर्गुण और सगुण
धाराओं का प्रेरक तत्त्व बन गया था। बुद्ध अपने उपदेशों में यह सर्वत्र कहते हैं
कि –
ऐसा
कहा गया है। तो कहाँ पर कहा गया है? इसका
उत्तर सीधा है, सनातन धर्म में। बुद्ध का जड़ता छोड़ने का
आग्रह अवश्य है। वे मध्यम मार्ग अपनाने की बात करते हैं। सनातन धर्म और सनातनता का
विरोध करने का मतलब है अच्छे कर्मों से विमुख होना और भारतवर्ष में अच्छे कर्मों
से विमुख होना वैसे ही हैं –
“सम्प्राप्य
भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्गमुख:। पीयूषकलषं हित्वा विषभाण्डं स इच्छति।।”
आजकल
के कुछ बुद्धिस्ट (सब नहीं, कुछ) जो सनातन धर्म पर
विरुद्ध टिप्पणी करते हैं, वे इस पर क्या कहेंगे? अरे भाई ! सनातन के बारे में पहले ठीक से जान लेना चाहिए, पढ़ लेना चाहिए, गहराई से विचार कर लेना चाहिए,
तब कुछ कहना चाहिए। सनातन और सनातनता भारत और भारतीयता से विच्छिन्न
नहीं है। भारत और भारतीयता से जैसे राम और कृष्ण अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं
वैसे ही सनातन और सनातनता भी। भारतीय प्रज्ञा तो चैतन्य को आदर देती है, चैतन्य के प्रति पूज्य भाव रखती है, चैत्य को नहीं,
यह अनादि काल से होता आया है, हमारी यही
सनातनता है –
“जात:
कदापि कविरेष परं स जीवत्यद्यापि भारतभुव: परमाणुपुंजे।
चैत्यं
न भारतभुवां बहुमानपात्रं चैतन्यमेव तु वयं परिपूजयाम:।।”
जो
युगों- युगों से भारतभूमि के परमाणुओं में भी उच्छ््वसित और जीवित है,
वही सनातन तत्त्व है।
देश-प्रेम और मानव-सौन्दर्य के उपासक कवि
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ भारतीय सनातनता के बारे में लिखते हैं –
“जिस
दिन सबसे पहले जागे, नवल सृजन के स्वप्न घने,
जिस
दिन देश-काल के दो-दो विस्तृत विमल वितान तने,
जिस
क्षण नभ के तारे छिटके, जिस दिन सूरज-चाँद बने,
तब
से है यह देश हमारा, यह अभिमान हमारा है।
भारतवर्ष
हमारा है,
यह हिन्दुस्तान हमारा है।।”
भारतवर्ष ऐसा देश है जहाँ पर सर्वप्रथम
सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ है। भारत के संदर्भ में यही तो है सनातन होना। जो
शाश्वत है, जो हमेशा से है वही सनातन है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते
हैं कि भारत केवल कोई भूखण्ड भर नहीं है, केवल कोई भौगोलिक
स्थान या नक्शा भर नहीं है, न ही केवल कोई राजनीतिक ईकाई है,
न केवल ऐतिहासिक तथ्यों का कोई टुकड़ा है। धन, पद, प्रतिष्ठा की न तो केवल दौड़ है। दुनिया में
जहाँ भी शील और मानवीय मूल्यों की स्थापना है, वहाँ पर भारत
मौजूद है--
“भारत
नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है।
एक देश
का नहीं शील, यह
भूमण्डल भर का है।”
यह सनातन भाव ही भारत का सौन्दर्य है,
जो भारत को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर बनाता है। भारत और सनातनता के बीच
अटूट सम्बन्ध है, दोनों के बीच अन्योन्याश्रितता का सम्बन्ध
है। हम भारतीयों का दायित्व है इस सनातन भाव को सदा अक्षुण्ण बनाए रखना। सनातन
धर्म और सनातनता के इन्हीं वैशिष्ट्यों के कारण देवगण गीत गाते हैं –
“गायन्ति
देवा: किलगीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमि
भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते,
भवन्ति भूय: पुरुषा:
सुरत्वात्।।”
आचार्य रजनीश ‘ओशो’ के निम्नलिखित कथन से हम अपनी बात समाप्त करते
हैं--
“भारत एक सनातन
यात्रा है, एक अमृत पथ है, जो
अनन्त से अनन्त तक फैला हुआ है। ‘हे अमृतस्य पुत्र: ! हे
अमृत के पुत्रों !’ जिन्होंने इस उद्घोषणा को सुना, वे ही केवल भारत के नागरिक हैं। भारत में पैदा होने से कोई भारत का नागरिक
नहीं हो सकता। जमीन पर कोई कहीं भी पैदा हो, किसी देश में,
किसी सदी में,अतीत में या भविष्य में, अगर उसकी खोज अन्तस्थ की खोज है, तो ही वह भारत का
निवासी है। भारत है एक अभीप्सा, एक प्यास- सत्य को पा लेने
की। उस सत्य को, जो हमारी धड़कन-धड़कन में बसा है और हमारी
चेतना की तह में सोया है। उसका पुनः स्मरण, उसकी पुनः
उद्घोषणा भारत है।”
यही तो है सनातन धर्म और सनातनता। बस
समझने की बात है। पश्चिमी प्रभाव और गुलाम मानसिकता से प्रभावित होने के कारण
सनातन धर्म और सनातनता को समझने में कठिनाई है।
***
शशिबिन्दुनारायण मिश्र
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश


वाह अप्रतिम बढ़िया आलेख सनातन धर्म के विषय में बहुत ही बढ़िया पूरी जानकारी मिली
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद। आपने गम्भीरता पूर्वक पढ़ा और टिप्पणी दी। आभार 🙏 आप कहाँ से हैं महोदय 9453609462
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