डॉ.
रक्षा मेहता
1
कविता
हर ओर
मैंने
देखा है उसे
सूर्य
की किरणों पर
नन्हें
- नन्हें पग धर
उछलते
- कूदते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
वायु
के झोंके पर
नन्हें
पंख फैलाकर
प्रसन्नता
से उड़ते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
चंद्रमा
के घरौंदे में
शीतल
चाँदनी से
नहाते
हुए ।
मैंने
देखा है उसे
सागर
की ठंडी रेत में
खलिहानों
और खेत में
खेलते
- कूदते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
दिन
में,
रात में
धूप
में,
बरसात में
हँसते
- रोते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
गर्मी
और जाड़ों में
मैदानों
और पहाड़ों में
चढ़ते
- उतरते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
करुणाकलित
नेत्रों से
हहराकर-
छलछलाकर
गालों
पर गिरते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
प्राणों
का बलिदान कर
देश
- रक्षा हेतु मर कर
जीवित
होते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
पक्षियों
के पंखों में
प्रकृति
के रंगों में
चमकते
हुए ।
मैंने
देखा है उसे
चलकर
दबे पाँव से
मेरे
हृदय के द्वार से
भीतर
आते हुए ।
मैंने
देखा है उसे
मेरी
कलम पर नाचकर
धीरे
- धीरे काग़ज़ पर
अंकित
होते हुए ।
मैंने
देखा है उसे ……..
मैंने
देखा है उसे ।
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2
पतंगा
दो
क्षण का ,
केवल दो क्षण का
वह
जीवन लेकर आता है
इतने
थोड़े समय में भी वह
प्रेम
के गीत ही गाता है ।
प्रेमाग्नि
में जलता है किंतु
देता
नहीं वह कभी उपदेश
प्रेम,
समर्पण, त्याग, मोह का
मानव
ग्रहण करे उससे संदेश ।
वाह
पतंगा इस जगत - जाल से
नहीं
कभी कुछ पाता है
प्रेम
में जीवन जीता है और
प्रेम
में ही मर जाता है ।
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3
गुंजाइश
न
तोड़ो उँगलियों के पोरों से यूँ,
कि
फूलों में महक अभी बाक़ी है ।
न
बंद करो झरोखों को इस तरह ,
कि
चाँद में चमक अभी बाक़ी है ।
न
उजाड़ो बाग को इस बेरहमी से,
कि
पंछियों की चहक अभी बाक़ी है ।
न
मुरझाया मान लो ज़िंदगी को यूँ,
कि
धड़कन में कसक अभी बाक़ी है ।
न
रौंदो नन्हीं आशाओं को पैरों तले,
कि
कुछ कर गुज़रने की ललक अभी बाक़ी है ।
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4
भूख
के रंग
कुछ
बेबस बच्चे
जो
रहते हैं तादात में
बिना
किसी संबंध के
एक
साथ ….
उनके
पास हैं
पहनने
और बदलने को कपड़े
और
सिर छिपाने को
सुरक्षित
छत ।
उन्हें
तीनों वक्त मिलता है
भरपेट
भोजन ।
फिर
भी एक भूख
करती
रहती है उनका पीछा
निरंतर
….
मातृस्नेह
और पितृच्छाया की भूख ।
इनसे
भी बहुत अधिक
तादात
में बच्चे हैं,
पूरी
धरती जिनका घर
और
पूरा आसमान जिनकी छत है ।
माँ
की ममता का आँचल है
और
पिता का साया भी ।
पर
उन्हें दुनिया में
सबसे
प्यारी है - रोटी ।
रोटी,
जो उनके लिए
ईद
के चाँद से कम नहीं ।
भूख
दोनों ओर है
अलग
- अलग रंगों का संसार लिए हुए ।
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5
बहुत
जटिल है काव्यानुवाद
साधना
कर दानव ने भी
प्रभु
को जब था पा लिया
तो
सबने कुछ पाने हेतु
साधना
का मार्ग अपना लिया ।
तब
करने की जटिल साधना
मैंने
भी की मनमानी
एक
काव्यात्मक कृति का
अनुवाद
करने की थी ठानी ।
स्रोत
भाषा की भूमि से मैं
लक्ष्य
भाषा की ओर बढ़ी
हुई
अचंभित देख यह कि
आगे
थी कठिनाई खड़ी ।
कठिनाई
की उस सेना का
अब
क्या वर्णन मैं करूँ ?
फिर
भी करती हूँ प्रयत्न
कुछ
का विवरण मैं दे सकूँ ।
काव्यकृति
के प्रथम चरण में
क्या
कहूँ कि मैंने क्या पाया ?
कुशल
कवि की रचनात्मकता ने
किस
प्रकार मुझे था भरमाया ।
विविधताओं
से मंडित शैली
सूक्ष्म,
स्थूल, सुदीर्घ, संश्लिष्ट
मेरे
मुख से निकला अनायास
हाय
! यह शैली कितनी क्लिष्ट ।
मैंने
बुद्धि के ज्ञान से
शैली
का कर आकलन
दुविधा
का विनाश किया
तथा
तय किया एक चरण ।
आगे
चलकर मुझे कवि का
अस्तित्व
था ललकार रहा
एक
विषैले सर्प की भाँति
मुझपर
था फुँफकार रहा ।
मैंने
कोई पथ न पाया
किया
उससे तादात्म्य स्थापित
कर
लिया इस प्रकार मैंने
मार्ग
अपना पुनः सुनिश्चित ।
अनुवाद
रूपी पर्वत से
होने
लगा था अकस्मात्
एकार्थी,
द्विअर्थी तथा बहुअर्थी
शब्द
चट्टानों का निपात ।
सटीक
शब्द चयन के ज्ञान से
मैंने
कर लिया समाधान
किंतु
हल न हुई पूरी समस्या
निरंतर
पड़ता रहा व्यवधान ।
कुछ
आगे चलकर पाया मैंने
शब्द
व अर्थालंकारों का चक्रव्यूह
असंभव
तो न था किंतु
भेद
पाना था अत्यंत दुरूह ।
श्लेष,
यमक, अनुप्रास ने
झकझोर
दिया मस्तिष्क पटल
विकंपित
हृदय में प्रश्न उठा
क्या
हो न पाऊँगी सफल ?
किंतु
फिर भी धैर्य धारण कर
अग्र
चरण पर धरा चरण
अलंकारों
से प्रयाण कर
ले
ली प्रतीकों की शरण ।
प्रतीकों
के बाणों ने तब
मेरी
बुद्धि को भेद दिया
हाय!
शरण क्यों आई इनकी
यह
सोच हृदय में खेद हुआ ।
ज्यों
ही खोज पाई थी मैं
प्रतीक
रूपी समस्या का हल
भिन्न
- भिन्न व रंग - बिरंगे
बिम्बों
का पाया कोलाहल ।
काव्य
के इस अनुवाद में
उत्पन्न
हुई समस्याएँ अनन्त
आगे
तुकांतता की स्रोतस्विनी
अवरुद्ध
किए हुए थी पंथ ।
ज्यों
- ज्यों कठिन संघर्ष से
मैंने
धारा को पार किया
त्यों
- त्यों अनुभव हुआ कि जैसे
मेरा
अब उद्धार हुआ ।
किंतु
इन सबके उपरांत
जब
काव्यानुवाद पूर्ण हुआ
जान
पड़ी वह कोई नवीन कृति
यह
देख हृदय विदीर्ण हुआ ।
मेरे
विविध प्रयत्नों से
निर्मित
हुआ था जो अनुवाद
उसे
देख हृदय ने घोष किया
हाय
! बहुत जटिल है काव्यानुवाद ।
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डॉ.
रक्षा मेहता


बहुत-बहुत आभार 🙏 - रक्षा
जवाब देंहटाएंमैं आपकी किस दृष्टि से सराहना करूँ- एक अनुवादक होने के नाते या कवियत्री होने के नाते?!! आपने क्या खूब लिखा है! आज ही मैं इसे अपने अनुवाद कला के छात्रों से साँझा करती हूँ l यही सब थ्योरी इन्हें इन दिनों सीखा रही हूँ |
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