मंगलवार, 30 जून 2026

कहानी



सच्चा रिश्ता

आर्या झा

आभा! तुम इस घर से विदा ले रही हो मगर हमारे दिल से नहीं....कभी मत भूलना कि तुम इन बच्चों की बड़ी बहन हो और बड़ी बहन माँ समान होती है हमेशा अपने छोटे भाइयों का मार्गदर्शन करना” बाबूजी ने कहा। वह बड़ी तो थी मगर कितनी बड़ी, मेहँदी लगे हाथों से सिंधौंरा जैसे छूटते-छूटते बचा था। मुड़कर छोटे भाइयों की ओर देखा तो रो-रोकर सब हलकान हुए जा रहे थे।

किसी का नाक बह रहा था तो किसी की आँखें....ज़रूरी है क्या विदाई.... साथी की ओर देखा तो वह भी भावुक दिखा मगर उनकी छुट्टियाँ नहीं थी। पुलिस की नौकरी में छुट्टियाँ होती कहाँ हैं। ऐसे में किससे क्या बोले। कुछ बोलने को हुई तो जैसे आवाज़ ही नहीं निकली। रो-रो कर गला सूख चुका था तो माँ ने लोटे से उसके गले को तर किया और कहा,

जाओ बेटा मगर! हमें न भूल जाना!”

और वह हिचकियाँ लेती माँ की छाती से चिपकी यह सोचने लगी अब ये लोग पानी कैसे पियेंगे। जिस गिलास में बाबूजी पानी पीते थे वह मेरे साथ ससुराल जा रहा है।

एक ऐसा परिवार जहाँ प्रेम ने सबको एक साथ बाँध रखा था, उस गाँठ को जबरन खोलकर किसी और के संग जोड़ दिया गया था मगर उसके लिए अपने लोगों से दूर होना और नए नेह से जुड़ना आसान था क्या। यह तो तब संभव होता जब वह अपने परिवार के प्रेम से तृप्त होती। वह भी उसे पूरा कहाँ मिला था। जैसे ही होश संभाला उसे माँ ने अपने मायके भेज दिया था। उसे ठीक से नहीं पता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया। वह तो पढ़ना चाहती थी। उसे बड़े होकर डॉक्टर बनना था। वह माता-पिता से दूर नहीं जाना चाहती थी मगर उसकी माँ वही करतीं जो उनकी इच्छा होती।

पता नहीं इस विस्थापन के पीछे उनकी क्या मंशा थी। शायद मायके से अति जुड़ाव ताकि बच्ची के बहाने आना-जाना लगा रहे या फिर अपनी माँ पर यह भरोसा कि वह नातिन को गृहकार्य में दक्ष कर देंगी या फ़िर सुरक्षा की भावना क्योंकि शहरी परिवेश में उसे संभालने में अन्य बच्चों की अनदेखी होती जो भी कारण रहा हो मगर उसके लिए वे दिन बेहद कष्टकर थे।

अक्सर रो-रोकर पिता को चिट्ठियाँ लिखा करती ताकि वे आकर उसे अपने साथ ले जाएँ मगर वह वही करते जो माँ कहतीं। माँ तो जैसे बस बेटों की माँ थीं। बेटियाँ उनके लिए सेविकाओं से ज्यादा न थीं। जिन्हें पहले मायके में और बाद में ससुराल में खटना था। उनके प्रति एक ही भाव था कि उनका ब्याह कराकर उन्हें उनके घर विदा कर दिया जाए। बाबूजी का माँ के सिवा कौन था। माता पिता बचपन में ही परलोक सिधार गए थे। चाचा-चाची ने बड़ा किया और माँ से शादी करा दी। किशोर ही थे दोनों तब से माँ को ही देखा था तभी तो उनका कभी विरोध नहीं करते थे। उन्हें लगता कि इतने बड़े कुल की बेटी उनके साथ निर्वाह कर रही है यही बहुत बड़ी बात है। ऐसे मातापिता के घर से उसकी दूसरी विदाई हो रही थी। पहली तो बचपन में ही हो गई थी।

शादी के बाद पूर्णिया से पटना आना था। भाइयों से विदा लेकर कार में बैठी तो आँखें नींद से बोझल थीं। मन ही मन कॉलेज जाने के ख्वाब समेटे अपने लाल गोटेदार आँचल में सिमट कर सो गई। सोलह साल की उम्र में ऐसे भी आँखों में नींद और नींद में सपने ही अधिक होते हैं। उसकी आँखों में भी आगे पढ़ने का सपना था। बाबूजी ने कहा भी था,

हाईस्कूल करा दिया है, अब आगे की पढ़ाई ससुराल में करना।” साठ के दशक में ऐसा ही होता था। उसकी शादी 1969 में हो गई थी।

ससुराल में सास नहीं थीं। मायके में छोटे भाइयों के अभिभावक स्वरूप छोटी सी दुल्हन के हिस्से यहाँ भी बिन माँ के आधा दर्जन बच्चे आए। सब के लिए खाना बनाते-खिलाते खुद कब बच्चों की माँ बन गई एहसास ही नहीं हुआ। जब समझ आई तो अपनी बची हुई पढाई पूरी की।

इस बीच समय-समय पर जब भी मायके आती उसे वापस लौटने की इच्छा ही नहीं होती। एक तरफ मोह का बंधन था दूसरी ओर कर्तव्यों के घेरे,वह दोनों में संतुलन स्थापित करती जीवन नैया खे रही थी कि लंबी बीमारी के बाद पिताजी का निधन हो गया तो उसे लगा उसने अपने आदर्श को खो दिया। अब तक पिता के कहे अनुसार ही चलती आई थी। उन्होंने जब जो कहा उसने किया अब उसे सब स्वयं ही सोचना था।

पिता ने जीते जी सारे आदर्श उस में भर दिए थे। इतनी आत्मकथाएँ और बंगाली उपन्यास पढ़ने के लिए दिए थे कि वह जीवन के सभी पहलुओं से अवगत थी। उन्होंने अपने जीवनकाल में उसे परिवार से दूर न होने दिया था बल्कि नौकरी से सेवानिवृत्त होने पर तीनों लड़कों के बीच ही बेटी के लिए भी ज़मीन खरीद लिया था। हालांकि ज़मीन की ख़रीदी के लिए बिटिया शुरुआत से ही उनके पास एक अकाउंट खुलवा कर उसमें पैसे जमा करती आई थी। चाहते तो उसका ज़मीन कहीं दूर भी ख़रीद सकते थे मगर उनकी बड़ी बेटी उनकी नजर में उनके बेटों की अभिभावक थी जो उनके बाद भी परिवार का ध्यान रखती। ज़मीन के चार टुकड़ों के बीचोबीच बिटिया के नाम की ज़मीन थी।

जब तक वह जीवित रहे किसी ने उससे कुछ न कहा। उसके नाम की जमीन पर छोटे भाई का मकान बन गया और उसमें माँ और भाई रहने भी लगे मगर खून से इतर के रिश्ते शाँति से कहाँ बैठते हैं। जब तब यह विषय उठता कि बड़ी दीदी के नाम की ज़मीन छोटे भाई के नाम पर हो जानी चाहिए। पिता के स्थान पर माँ थीं जो कह देतीं,

आभा को किस बात की कमी है जो मायके में आकर बसेगी। मैं कह दूँगी तो वह ज़मीन छोटे के नाम कर देगी।”

इस बीच 2019 आया, साथ कोरोना लाया। आभा पति के साथ बच्चों के पास थीं। धीरे-धीरे जैसे-जैसे महामारी विषयक जानकारी फैलती गई आभा के पति बीमार होते चले गए। एक किस्म की घबड़ाहट अंदर तक समा गई मानो यह संपूर्ण संसार नष्ट हो जाएगा जबकि आभा आशान्वित रहती कि सब ठीक हो जाएगा मगर कहते हैं न जन्म और मृत्यु तो पुर्वनिर्धारित है उसकी तिथि टल नहीं सकती। कोरोना का डेल्टा वेरिएंट जिसने मार्च-अप्रैल 2021में पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी उसने शिवेंद्र जी को भी अपने चपेट में ले लिया। आभा को ऐसा लगा जैसे उसकी दुनिया ही तबाह हो गई। पिता को खोकर भी वह जीवनसाथी की हिम्मत पर संभल सकी थी मगर अब उसका वह संबल भी टूट चुका था।

उस वक़्त उसे मायके की ज़रूरत थी मगर कोई नहीं आया। दिन,हफ्ते,महिने निकलते गए मगर किसी ने झाँकने की भी हिमाकत नहीं की। आभा के पास उसके साथ कोई था तो उसके अपने बच्चे थे मगर शिवेंद्र जी के साथ मिलकर जिनके लिए तमाम फ़र्ज़ निभाए थे वे सब के सब भुला दिए गए थे। दिल टूटा,मन रोया भी मगर फ़िर पिता की सिखाई बातों ने ही हौसला दिया और वह धीरे-धीरे संभलने लगी। ऐसे में जब फिर से ज़मीन के हस्तांतरण का मामला सामने आया तो इस बार उसकी दृढ़ता अलग थी।

मैंने कभी नहीं कहा कि मुझे मेरी ज़मीन वापस दो....तुम लोग आराम से रहो!”

वो सब छोड़ो.... तुम वह ज़मीन भाई के नाम कर दो!”

माँ ने कहा तो उससे भी न रहा गया। बोली,

मेरे पिता की निशानी है। उन्होंने मेरे लिए खरीदा था। मैं उससे अपना नाम नहीं हटा सकती।”

इससे तुम्हें क्या हासिल होगा।।?”

संतुष्टि मिलेगी.... आपने जब जो कहा मैंने किया। भाई बहन के काम आई...।”

वह भी तुम्हारे लिए एक पैर पर खड़े रहे।।!”

जब तक बाबूजी थे तभी तक.... अब तो मुझसे कोई सीधे मुँह बात तक नहीं करता।”

जितना किया कम नहीं है.... समय-समय पर तुम्हें आर्थिक मदद भी दी गई है जिसके बदले में ये ज़मीन तुम्हें वापस लौटाना होगा....!”

माँ ने आदेशात्मक रवैया अपनाते हुए ओजपूर्ण आवाज़ में कहा तो आभा ने विरोध जताया,

जो मैंने किया है वह कोई ज़मीन नहीं कर सकती। मत भूलो कि तुम्हारा बेटा जिस नौकरी का पेंशन उठा रहा है वह मेरा ही दिया हुआ है।”

तुम बड़ी हो..... माँ समान हो।।बच्चे कुपात्र हों तो भी माता कुमाता नहीं होती।”

मेरे पास तीन मकान है जिसमें दो का किराया आ रहा है। मुझे सचमुच कुछ नहीं चाहिए मगर जिस तरह काम निकालने के बाद तुम लोगों ने मुझे दूध की मक्खी सा निकाल फेंका है इस तरह मेरे साथ अन्याय हुआ है।।”

क्या बोलती हो।।क्या हमने तुम्हें यही शिक्षा दी थी?”

त्यागमयी बड़ी बहन बनाया था मगर क्यों माँ।।क्या मुझे जनने में दर्द न हुआ था।।क्या मैं अपने किसी फर्ज में चूकी हूँ। मुझमें और तुम्हारे पुत्रों में ऐसा कौन सा फर्क है जो उनका हक मुझसे ज्यादा है।।” बोलते बोलते साँसे फूलने लगी तो स्वर को विराम देते हुए कहा,

आज अगर मैंने त्याग किया तो कल को मेरी बेटी भी त्याग की मूर्ति बनेगी जो मुझे बर्दाश्त नहीं होगा।” इतना कहकर फोन रख दिया।

उसके बाद विदाई से अब तक का सफ़र आँखों में यूँ गुजर गया जैसे ये कल की ही बात हो। पूरी उम्र स्वाभिमान के साथ जीने वाली आभा को ज़मीन,जगह या मकान का कोई मोह न था बल्कि वह तो उस मिठास की दीवानी थी जो उसके अबोध भोले-भाले भाइयों की तोतली बोली में था। जिसे याद कर अब भी उसका कलेजा फटता था मगर आगे बढ़ने की होड़ में वे अपनी स्नेही बहन को भूल चुके थे। भूल चुके थे कि जिस बहन ने गाहे- बगाहे आशीर्वाद के साथ न केवल अनगिनत रुपए थमाए थे बल्कि अपना अगाध स्नेह लुटाया था जो उस ज़मीन से कहीं ज्यादा क़ीमती था। आज उसके एवज़ में उसे स्नेह व सम्मान की ही तो भूख थी। उसने कुछ ज्यादा तो नहीं माँग लिया था।

हालाँकि वह जानती थी कि एक नोटिस बस एक ही नोटिस में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और अंततः वही हुआ जब वकील से सलाह लेकर नोटिस भेजा तो एक ही झटके में ऊँट पहाड़ के नीचे आ गया था। ज़मीन के बदले ज़मीन की बात पर अदालत के बाहर ही पूरा मामला सलट गया। माँ ने बराबर माप की एक जमीन उसे बतौर तोहफ़ा दिया तो उसने भी हस्ताक्षर कर अपनी जमीन का हस्तांतरण भाई के नाम कर दिया।

बढ़ती उम्र के साथ सारे रिश्तों के मायने बदल चुके थे। जिन अबोध भाइयों के लिए अपने सुख का त्याग किया उनकी नजर में वह त्याग था ही नहीं तो आभा ने ज़मीन पर पिता की याद में एक पुस्तकालय का निर्माण कराया जिसमें वे समस्त उपन्यास सहेजे गए जो पिता ने किशोरी पुत्री को भेंट किए थे। पिता की आखिरी इच्छा को पूर्ण करने में पचपन वर्ष जरूर लगे मगर इस कार्य को अंजाम देकर वह आत्मसंतोष से भर उठी। सारे झूठे रिश्तों के बीच एक सच्चा रिश्ता भी था जो किताबों से किताबों तक का था। 

 

आर्या झा

 

 

 

 

 

 

 

 

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