शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

आलेख


कथाकारों की दुनिया में भीष्म साहनी का स्थान

डॉ. रक्षा मेहता

भीष्म साहनी हिंदी कहानी जगत का एक बड़ा नाम ही नहीं, बल्कि एक ऐसे महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, जिनके बिना हिंदी कथा साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।  उनका जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ। वे आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्होंने 1937 में लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. किया भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उन्होंने भारत आकर 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की उपाधि हासिल की और समाचार पत्रों में लिखने का कार्य किया। बाद में वे भारतीय जन नाट्य संघ से जा मिले। इसके पश्चात अंबाला और अमृतसर में भी अध्यापक रहने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन महाविद्यालय में साहित्य के प्रोफेसर बने। वे छह वर्षों तक मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में अनुवादक के पद पर कार्यरत रहे जहाँ उन्होंने करीब दो दर्जन रूसी किताबों का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने नयी कहानियाँ नामक पत्रिका का संपादन भी किया। साथ ही वे प्रगतिशील लेखक संघ और फ्रो-एशियायी लेखक संघ से भी जुड़े रहे। 1993-1997 तक वे साहित्य अकादमी की कार्यकारी समिति के सदस्य रहे। भीष्म साहनी हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। उन्हें 1975 में उपन्यास ‘तमसके लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1975 में ही शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार), 1980 में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, 1983 में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा 1998 में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया।

भीष्म साहनी ने अपने नाटकों, कहानियों तथा उपन्यासों में मानवीय मूल्यों को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। उनका कथा-साहित्य मानवता, सहानुभूति, करुणा, सहिष्णुता, धैर्य, अपनत्व, समानता, प्रेम और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है। वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना ही नहीं, बल्कि मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना और समाज में मानवीय संवेदना का संचार करना भी है। उनकी रचनाओं में सामान्य जनजीवन, सामान्य व्यक्ति की चुनौतियाँ, सामाजिक विषमताएँ, सांप्रदायिकता, शोषण और मानवीय संघर्षों का यथार्थ चित्रण मिलता है। उनके पात्र सत्ता द्वारा रचित चक्रव्यूह का शिकार बनते हैं, सामाजिक तथा आर्थिक असमानता के पाटों में पिसते हैं, धार्मिक प्रपंचों से प्रताड़ित होते हैं किंतु किसी भी कीमत पर अपनी मौलिकता तथा मनुष्यता को नहीं त्यागते । भीष्म साहनी अपने पात्रों के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विकट तथा विषम क्यों न हों, मनुष्य को अपने मानवीय गुणों और नैतिक मूल्यों का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही शाश्वत मूल्य व्यक्ति की अस्मिता तथा गरिमा को बनाये रखते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं – तमस, झरोखे, बसंती, मय्यादास की माड़ी, कुंतो (उपन्यास), भाग्यरेखा, निशाचर, वांग्चू (कहानी संग्रह), हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में, मुआवज़े (नाटक), बलराज माय ब्रदर (आत्मकथा) तथा गुलेल का खेल (बालकथा)।

भीष्म साहनी अपने साहित्य में यथार्थवाद तथा आदर्शवाद दोनों का अद्भुत सामंजस्य एवं संतुलन बनाए रखते हैं। जब हम यथार्थ की बात करते हैं तो सामाजिक तथा आर्थिक असमानता से उत्पन्न त्रासद स्थितियाँ आती हैं, वहीं दूसरी ओर आदर्शवाद के अंतर्गत शाश्वत नैतिक तथा मानवीय मूल्यों की बात की जाती है। भीष्म साहनी का आदर्शवाद काल्पनिक एवं उथला नहीं है, बल्कि यथार्थ की धरती पर आधारित ठोस व मजबूत आदर्शवाद है। वे मुख्य रूप से प्रेमचंद की परंपरा के लेखक माने जाते हैं किंतु उनकी रचनाओं की विशेषता यह है कि वे पाठक वर्ग को केवल समाज में व्याप्त समस्याओं से अवगत नहीं कराते, अपितु उनका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं और ऐसे बहुआयामी मार्ग खोलते चलते हैं जिनके माध्यम से पाठक स्वतः ही और अधिक समाधान खोजता चला जाता है। समाधान के रूप में मानवीय मूल्यों और संवेदनशीलता की स्थापना करना भीष्म साहनी के साहित्य की मुख्य विशेषता है। उनकी रचनाएँ न केवल समाज की वास्तविकता का पर्दाफ़ाश करती हैं बल्कि समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।

‘बसंती’ उपन्यास में दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों और उनमें रहने वाले मजदूरों के महज़ पेट भर रोटी और तन ढँकने के लिए कपड़ा जुटाने के कड़े संघर्षों और घोर आर्थिक तंगी की सच्चाई दिखाते हुए जहाँ वे एक ओर यथार्थ का चित्र खींचते हैं, वहीं दूसरी ओर उपन्यास की मुख्य पात्र 'बसंती' अपने शोषण और कठिन परिस्थितियों के बावजूद भी हार नहीं मानती और अपनी जिजीविषा व स्वतंत्रता के मानवीय आदर्श को बनाए रखती है।

‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’ नाटक में मध्ययुगीन समाज में फैले अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड और जाति-भेद की वीभत्सता का चित्रण कर जनता को तत्कालीन समाज के प्रति जागरूक करने  के साथ-साथ कबीर दास के माध्यम से समाज-सुधार, समानता और सच्चे मानवीय प्रेम का आदर्श  भी भीष्म साहनी ने प्रस्तुत किया है । धार्मिक बाह्याडंबरों का डटकर विरोध करने वाले क्रांतदर्शी कबीर इस नाटक में आधुनिक समाज के पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाते हैं। यह नाटक इस तथ्य की पुष्टि करता है कि समाज को कबीर की आज भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी मध्यकाल में थी। भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ़ की दावत’ को एक बार पढ़कर कभी भूला नहीं जा सकता। इस कहानी में आधुनिक पीढ़ी द्वारा आँख मूँदकर दिखावेबाज़ संस्कृति का अनुसरण करने  तथा आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर अपने बूढ़े माता-पिता की उपेक्षा करने की दुष्प्रवृत्ति का पर्दाफाश तो किया ही गया है, साथ ही युवाओं को अपने अस्तित्वदाताओं का सम्मान करने की ओर भी प्रेरित किया गया है।

भीष्म साहनी के साहित्य की बात की जाए तो उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास 'तमस' का उल्लेख करना अत्यावश्यक है। भारत-पाक विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास विभाजन के समय पंजाब में हुए भयंकर सांप्रदायिक दंगों के केवल पाँच दिनों के अमानवीय तथा त्रासद इतिहास का सजीव और यथार्थ चित्रण करता है। इसका प्रारंभ नत्थू नामक एक गरीब चर्मकार से होता है, जिसे एक स्थानीय राजनीतिक नेता द्वारा बहला-फुसलाकर और पाँच रुपये का लालच देकर एक सुअर मारने के लिए कहा जाता है। अगली सुबह स्थानीय मस्जिद की सीढ़ियों पर उस सुअर का शव मिलने से पूरे शहर में तनाव फैल जाता है। बदले की भावना में भीड़ द्वारा एक मंदिर के बाहर गौ हत्या कर दी जाती है, जिससे दोनों समुदायों के बीच दंगे भड़क उठते हैं। वर्षों से मिल-जुल कर रह रहे पड़ोसी, शत्रु बन जाते हैं। लूटपाट, आगजनी, और महिलाओं के अपहरण का भयानक दौर शुरू हो जाता है, जिसका लाभ ब्रिटिश प्रशासन उठाता है ।उनकी ‘फूट डालो और राज करो” की नीति सफल हो जाती है।  'तमस' का शाब्दिक अर्थ है - अंधेरा, अंधकार और उपन्यास की दृष्टि से तमस का अर्थ है - अज्ञान । उपन्यास के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार सत्ताधारियों द्वारा भड़काए दंगों में आम इंसान पिसता है, किस तरह धर्म और राजनीति का दुरुपयोग करके सामान्य व्यक्ति के मन में एक-दूसरे के प्रति घृणा तथा विद्वेष का अंधकार भर दिया जाता है क्योंकि उसे सही ग़लत का ज्ञान नहीं होता। एक तमस तत्कालीन वातावरण में आच्छादित था और एक जनता के हृदय में। अत्यंत करुण, संवेदनात्मक तथा मर्मस्पर्शी कथावस्तु होने के कारण यह उपन्यास पाठक वर्ग को अंतरतम तक छू लेता है। ‘तमस’ को आधार बनाकर 1988 में एक हिंदी धारावाहिक का निर्माण किया गया, जो बहुचर्चित रहा।

भीष्म साहनी की रचनाएँ पाठक को तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक परिस्थितियों से तो परिचित कराती ही हैं, साथ ही आज के परिप्रेक्ष्य में पाठक के मन-मस्तिष्क को भी आंदोलित करती हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी का निधन 11 जुलाई 2003 को दिल्ली में हुआ। उन्हें हिंदी कथा साहित्य की अमूल्य निधि के रूप में सदा सँजोया व सराहा जाएगा।                                             

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डॉ. रक्षा मेहता

विभागाध्यक्षा (हिंदी विभाग)

आर्मी पब्लिक स्कूल गोलकोंडा


1 टिप्पणी:

  1. भीष्म साहनी जी का हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान है । बहुत अच्छा आलेख। सुदर्शन रत्नाकर

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