भामाशाह
सुरेश चौधरी
(जैन शिरोमणि दानवीर भामाशाह की 479 वीं जन्म जयंती पर शत शत अभिनंन्दन
–
28 जून, 1547 को जन्म, मृत्यु 1600)
इदृशो दानवीरो न भूतो न भविष्यति !!
भामाशाह नाम सबने
सुना है दान का पर्याय भामाशाह थे परन्तु क्या आपको मालूम है वे उतने ही शूरवीर थे,
वे राणाप्रताप की सेना की कुशल रणनीतिकार थे, उनका
छोटा भाई ताराचंद कांवड़िया तो अद्भुत वीर था उस समय का इकलौता तलवारबाज था जो घोड़े
पर बैठ मुख से लगाम संभालता और दोनो हाथ से तलवार चलाता। आईये उन्हें स्मरण करें
मेरे प्रस्तावित महाकाव्य चितौड़ के पन्नो से.....।
आदिनाथ आराधक
भामाशाह और ताराचंद
हठीले
वैश्य
पर दोनों युद्ध कुशल तलवार चलाने
वाले सजीले
वयोवृद्ध भामाशाह
जहाँ लड़ते आगे
बढ़ते जाते थे
तारा कांवड़िया
दोनो हाथों से
तलवार चलाते थे
कौन भूल
सकता है योगदान
इन दोनों भाईयों
का
स्वदेश धर्म
संस्कृति के रक्षक
दानवीर अनुयायियों का
सन पन्द्रह
सौ सैंतालीस उनतीस
अप्रैल जन्मे भामाशाह
रणथंबौर के
किलेदार भारमल ओसवाल
पिता की चाह
पच्चीस सहस्र
स्वर्ण मुद्राएं बीस लक्ष
रुपये कर अर्पित
बारह वर्ष
पर्यंत पच्चीस सहस्त्र
सैन्य दल कर
संगठित
दान त्याग
का महाकाव्य रच
डाला भामाशाह बलिदानी
मेवाड़ दानवीर
अमर भामाशाह सा
नहीं कोई दानी
मेवाड़ भूमि
वीर प्रसूता, त्याग-धरा, बलिदान-विभूता
भामाशाह, तराचंद अमर,
चिरस्मरणीय
उज्ज्वल भूता
राणा प्रताप
सखा सम थे, शत्रु भंजन
अति न्यारे थे
भामाशाह ह्रदय
समर्पित, प्राणों से भी
प्यारे थे
हल्दीघाटी रणक्षेत्र
बने, जब राणा रुधिर
से सने
भामाशाह तले
तरुणों का, वीरत्व पुनः
ज्वलंत बने
तारा चंद
भव्य पराक्रमी, वीर रस
धारा पूर व्रती
दोनों करों
में खड्ग उठाकर, शत्रुओं पर
पड़ी विपत्ति
गिरि मंदरों
के पूजक भी, आबू पर
जैन धरोहर दी
भामाशाह वंशजों
का स्वप्न, शिल्प कला
में प्राण भरी
दिलवाड़ा जैन
मंदरों की भव्यता
निज गाथा कहती है
त्याग, सेवा, और श्रद्धा की, चित्रित अमृत
नित्य बहती है
राणा का
दुख जब गहन हुआ, यवन चढ़े
जब रणधरा
भामाशाह प्रकट
भाल उठा, बना सहारा
आश्रय-धरा
वीर तारा चंद
समान उठा, युग्म-तलवारों में
ज्वाला
बड़े बड़े
ध्वस्त अरि मस्तक हुए जहाँ चला उसका कराला
छिन्न भिन्न
हो बर्बर सेना, ज्यों सिंह
पुकारे अरण्य में
तारा वीर
महा-शूर बना, जयघोष गूँजा
क्षेत्ररण में
भामाशाह न
केवल दाता, कर्म-युद्ध का
भी था ज्ञाता
रण कुशल
सेनापति बना, राणा का
विश्वास प्रदाता
विपदा
- काल
के अंगी थे, राजनीति के
भी रंगी थे
कौशल में
चाणक्य समान, रण में अरि
मर्दन संगी थे
कभी स्वर्ण
बरसाए हँसकर,
कभी रुधिर बहाए
हँसकर
कभी समर्पण
किया राणा को, कभी समर
बने प्रलयंकर
तारा चंद
का कृत्य अलौकिक, धारा चला कर
दावानल
दोनों हाथों
से उठ खड्ग, शत्रु बनाए
भस्मावृत्त हर पल
धन्य भूमि
वह मेवाड़ धरा, जहाँ सृजित ऐसे
दीप जरा
धन्य वसुंधरा
जननी बनी, जहाँ वीरता
बही मुस्करा
कर्मशील थे, धर्मशील थे,
रणभट, दानवीर, विनम्र थे
प्रणति उन्हें
युगों युगों तक, जिनसे गाथा
मेवाड़ अमर थे
स्वर्ण दान सी
पुनीत कथा,
नभ को भी कर दे चकित कथा
भामाशाह
- तारा
चंद की, शौर्य-कथा सदा प्रणीत
कथा
शौर्य, त्याग, तप, धर्म-ध्वजा, इनके चरणों
में कर जोड़
सुन हर
भारतवासी बोले – जय भामाशाह!
जय चितौड़
जय भवानी!
जय वीर भूमि!
जय त्यागी पावन रक्तभूमि भामाशाह
–
तेरा वंदन करूँ, धन्य करो,
हे गौरव-भूमि
***
सुरेश
चौधरी
एकता
हिबिसकस
56
क्रिस्टोफर रोड
कोलकाता
700046


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