शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

संपादकीय

एक साहित्यकार का जाना...... !?

डॉ. पूर्वा शर्मा

उड़ जाएँगे,

 ताल के हंस फिर

कहाँ आएँगे ?

(हाइकु, डॉ. गोपाल बाबू शर्मा)

संसार का सबसे बड़ा और शाश्वत सत्य है – ‘मृत्यु’“न किंचित शाश्वतम्” – सृष्टि में कुछ भी स्थायी नहीं है-न समय-न स्थिति-न हमारे सरोकार और न जीवन! जो इस संसार में आया है उसका जाना निश्चित ही है।  इस मृत्यु को भला कोई पराजित कर पाया है! यहाँ तक कि जितने भी अवतार-महापुरुष-महान आत्माएँ  इस धरा पर अवतरित हुई हैं सभी को अपने नश्वर देह का त्याग करना ही पड़ा है। लेकिन वो कहते हैं ना कि साथ क्या जाएगा? साथ तो कुछ नहीं जाएगा लेकिन मनुष्य अपने पीछे जीवित लोगों के लिए छोड़ जाता है अनंत यादें.....स्मृतियाँ.....। उस व्यक्ति विशेष के जीवनकाल में किए विविध कार्य-परोपकार-सत्कार्यों आदि की बदौलत वह लोगों के हृदय में-समाज में एक विशेष स्थान बना लेता है। और यदि यह व्यक्ति एक साहित्यकार हो तो उनका इस दुनिया से जाना सिर्फ उनके परिजनों की ही नहीं बल्कि पूरे समाज की क्षति होती है, क्योंकि साहित्यकार ने जितना इस दुनिया से-समाज से लिया है उससे कहीं ज्यादा उसने समाज को लौटाया है। अपने अनुभव, अपनी सूझ-बूझ और अपनी लेखनी के जादू  के चलते साहित्यकार अपने जीवन के अनेक अनुभवों को शब्दों के माध्यम से हमारे समक्ष रखता है-परोसता है। किसी ने ठीक ही कहा है कि – किसी रचनाकार का इस दुनिया से जाना महज एक आदमी का दुनियाभर से जाना नहीं है, और उसमें भी ऐसे साहित्यकार का जाना जिसने अपनी लेखनी से गहरी संवेदना, उच्च विचार, मजबूत मानवीय-सामाजिक सरोकार, जीवन राग-विराग, जीवन-जगत के सौन्दर्य तथा पीड़ित मानवता को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया है-निरूपित किया हो। ऐसे सर्जक का जाना साहित्य जगत की एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई लगभग असंभव! साहित्यकार अपने पीछे छोड़ जाता है अपना वह रचना संसार जो उसे साहित्य जगत में ‘अमरतत्व’ प्रदान करता है। वह नहीं है पर उनका शब्द रूपी शरीर, यश रूपी काया सदैव – “न ममार न जीर्यति।” 

ऐसे ही एक उम्दा साहित्यकार डॉ. गोपाल बाबू शर्मा जी ने 7 जुलाई, 2026 को इस नश्वर संसार से विदाई ली। 

मरे नहीं इंसानियत, मरता है इंसान।

कालजयी है कृति वही, जिसमें होती जान ।।

(दोहा, डॉ. गोपाल बाबू शर्मा)

डॉ. गोपाल बाबू शर्मा (जन्म-04 दिसम्बर, 1932) बहुत ही सरल-सहज व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे, नियमित-संयमित जीवन जीने वाले शर्मा जी में कर्तव्यनिष्ठा भी बहुत थी। अपने जीवन का अधिकांश समय उन्होंने पढ़ने-पढ़ाने और सृजन कार्य में व्यतीत किया। अपने जीवन के नब्बे वर्ष पूर्ण करने तक भी उन्होंने लेखनी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी सहृदयता-सरलता-सहजता, सृजन-लेखन, संस्कार-सद् व्यवहार, सेवभावी-समर्पण भाव, ज्ञान-संवेदना से सदैव सभी को प्रभावित किया।

मैं अकेला ही लड़ा संसार से, डर नहीं बिल्कुल लगा तलवार से।

दानवों के सामने कब झुक सका, झुक गया मैं आदमी के प्यार से।। 

 (मुक्तक, डॉ. गोपाल बाबू शर्मा)

एक लेखक-व्यंग्यकार-कवि-समीक्षक-अध्यापक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. गोपाल बाबू शर्मा ने न जाने कितने ही पाठकों को प्रभावित किया है। साहित्य की विविध विधाओं में उनका सृजन बेहतरीन ही रहा लेकिन उनकी लेखनी से निकली व्यंग्य की नुकीली-चुटीली उत्कृष्ट रचनाओं ने सदैव ही पाठक के हृदय में सर्वोच्च स्थान बनाया। शर्मा जी ने अपनी व्यंग्य की पैनी धार से बहुत गंभीर विचारों-तथ्यों-बातों-समस्याओं-घोटालों को बड़ी ही सरलता-सहजता से अपने साहित्य में प्रकट किया है। शर्मा जी की हास्य-व्यंग्य से परिपूर्ण रचनाओं का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा बल्कि उनका उद्देश्य समाज में फैले भ्रष्टाचार-अमानवीकरण-कृत्रिमता-विडंबना आदि तत्त्वों-परिस्थितियों को उजागर करने एवं रोकने का रहा है। शर्मा जी सामाजिक सरकोर के लेखक हैं। कथ्य की विविधता उनके व्यंग्य में दिखाई देती हैं।

“जिस प्रकार जैन्टिलमैन को सूट-बूट से, अराजकता को लूट से और सिपाही को सैल्यूट से अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार सत्य को झूठ से अलग करना असम्भव है।...... सत्य और झूठ एक ही बाप के दो सगे बेटे हैं, एक ही गुरू के दो चेले हैं, एक ही मालिक के दो नौकर और एक ही ससुर के दो दामाद हैं। दोनों का टी० बी० और डाक्टर अथवा गन्दगी और मच्छर जैसा साथ है।सत्य तो यह है कि दुनिया में झूठ के बिना गुजारा ही नहीं।”

(झूठ बराबर तप नहीं)

काव्य की विविध शैलियों व छंदों (दोहा, गीत, ग़ज़ल, हाइकु, मुक्तक, बालगीत, हास्य-व्यंग्य आदि) एवं संवेदना या विषय की दृष्टि से भी उनके काव्य फलक व्यापक एवं वैविध्यपूर्ण रहा है। सामान्य से अतिसामान्य, विशेष से अति विशेष विषय को बहुत ही कलात्मक ढंग से अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करने का गुण उनकी विशेषता रही। डॉ. गोपाल बाबू शर्मा के उन्नीस कविता संग्रह, सोलह व्यंग्य संग्रह, दो लघुकथा संग्रह, दो शोध समीक्षात्मक कृतियाँ, एक लोकसाहित्य एवं एक निबंध संग्रह सहित कई संपादित कृतियाँ (कुल लगभग इकतालीस पुस्तकें) प्रकाशित हुई है।

उमड़-उमड़ कर बादल आते, करते हैं अन्तस को घायल ।

आसमान ऐसा लगता है, फैल गया हो जैसे काजल ।

पुरवइया का चंचल अंचल, मन को उड़ा-उड़ा ले जाता;

रिमझिम-रिमझिम बूँदों के स्वर, थिरक उठी हो जैसे पायल ।

(कहेगा आईना सब कुछ)

विपुल मात्रा में साहित्य सृजन करने वाले हिन्दी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. गोपाल बाबू शर्मा जी आज हमारे बीच भले ही मौजूद नहीं है लेकिन वे अपनी कलम के माध्यम से, अपने ज्ञान एवं संवेदना के माध्यम से, अपनी विभिन्न रचनाओं के माध्यम से साहित्य जगत में अपनी मौजूदगी बनाए रखेंगे। समकालीन साहित्य जगत के साथ नयी पीढ़ी को भी प्रोत्साहित करने-मार्गदर्शन देने का कार्य उनके साहित्य के माध्यम से होता रहे ऐसी आशा करते हैं। हमारे लिए साहित्य के प्रति उनका अगाध प्रेम, साहित्य से जुड़े उनके स्वप्नों को पूरा करने का प्रण ही उनके प्रति सही मायने में सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस साहित्यिक आत्मा को नमन!

आओ काँटों में महकें, मन का हर द्वार सजाएँ।

हर बहता आँसू पोंछें, जितना हो प्यार लुटाएँ।।

यह जीवन एक सफ़र है, हर साथ बिछुड़ने को है।

क्या पता कौन-सा किस्सा, कहते-सुनते सो जाएँ।।

(डॉ. गोपाल बाबू शर्मा)

***

डॉ. पूर्वा शर्मा

वड़ोदरा (गुजरात)

 

7 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ साहब ! पूर्ण परिचय सहित बेजोड़ संस्मरण

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  2. शशिबिन्दुनारायण मिश्र

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  3. सादर नमन। नाम भी सुना था और उनको पढ़ा भी था, लेकिन परिचय न था। जो अब हुआ। स्मृति शेष होने पर। नमन । डॉ पूर्वा जी को धन्यवाद।

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  4. डॉ. गोपाल बाबू शर्मा का जाना एक ऐसी क्षति है जिसे शायद ही पूर्ण किया जा सके, वे एक व्यक्ति और साहित्यकार दोनों ही रूपों में उत्कृष्ट थे,आपने सत्य ही कहा है - "डॉ. गोपाल बाबू शर्मा जी आज हमारे बीच भले ही मौजूद नहीं है लेकिन वे अपनी कलम के माध्यम से, अपने ज्ञान एवं संवेदना के माध्यम से, अपनी विभिन्न रचनाओं के माध्यम से साहित्य जगत में अपनी मौजूदगी बनाए रखेंगे।"
    अनूठे साहित्यसेवी को नमन 🙏

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  5. डॉ गोपाल बाबू शर्मा का जाना हिन्दी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। साहित्यकार के साथ ही वे एक नेक दिल इंसान भी थे। एक बार किसी पत्रिका में मुझे न जानते हुए भी मेरे हाइकु पढ़कर पूरे पोस्ट कार्ड को प्रशंसा से भर दिया था। मुझे उनकी पुस्तक ‘खोल दो खिड़कियाँ’ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।जिसकी मैंने समीक्षा लिखकर भेजी थी। पूर्वा जी आपने विस्तार से उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालकर बनके बारे में जानने का अवसर दिया हैं। आभार। दिवंगत आत्मा को सादर नमन। सुदर्शन रत्नाकर

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  6. डॉ गोपाल बाबू शर्मा का जाना हिन्दी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। साहित्यकार के साथ ही वे एक नेक दिल इंसभी थे। एक बार किसी पत्रिका में मुझे न जानते हुए भी मेरे हाइकु पढ़कर पूरे पोस्ट कार्ड को प्रशंसा से भर दिया था। यह उनकी पुस्तक ‘खोल दो खिड़कियाँ’ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मैंने उसकी समीक्षा लिखकर भेजी थी। पूर्वा जी आपने विस्तार से उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालकर बनके बारे में जानने का अवसर दिया हैं। आभार। दिवंगत आत्मा को सादर नमन। सुदर्शन रत्नाकर

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  7. डॉ गोपाल बाबू शर्मा का जाना हिन्दी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। साहित्यकार के साथ ही वे एक नेक दिल इंसभी थे। एक बार किसी पत्रिका में मुझे न जानते हुए भी मेरे हाइकु पढ़कर पूरे पोस्ट कार्ड को प्रशंसा से भर दिया था। यह उनकी पुस्तक ‘खोल दो खिड़कियाँ’ पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मैंने उसकी समीक्षा लिखकर भेजी थी। पूर्वा जी आपने विस्तार से उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालकर बनके बारे में जानने का अवसर दिया हैं। आभार। दिवंगत आत्मा को सादर नमन। सुदर्शन रत्नाकर

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