शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

पुस्तक-चर्चा


दर्द का हमदर्द :

हाइकु-संग्रह ‘पीड़ा के द्वीप’

बलजीत सिंह

सिद्धहस्त साहित्य साधक, अनेक कालजयी कृतियों के रचयिता, कदम-कदम पर साहित्य-सृजन हेतु मुझे प्रेरित व दिशा निर्देश देने वाले हाइकुकार आदरणीय सूर्य नारायण गुप्त सूर्यजी के तीसरे हाइकु-संग्रह ‘पीड़ा के द्वीप’ की पाण्डुलिपी मिली। पढ़ कर मन तृप्त हो गया।

हाइकु-संग्रह – ‘चूँ-चूँ-चूँ’ और ‘चीं-चीं-ची’ के प्रकाशन के बाद ‘पीड़ा के द्वीप’ इनका यह तीसरा हाइकु-संग्रह है। वर्तमान समाज में जिस प्रकार गिरावट आ रही है। उसी दर्द का यथार्थ हृदयस्पर्शी चित्र देखेंः-

1. खाली है हाथ छोड़ के चला गया/बेटा भी साथ।

2. तलाश में हूँ/वृद्धाश्रम में मृत्यु की आशा में हूँ।

3. सारे आयाम/जीवन की संध्या में हुए नाकाम ।

4.  मन न मार/ जीवन के दो रूप/जीत व हार।

नारी व्यथा की कथा को हाइकु में पिरों कर प्रस्तुत करने का एक अलग ढंग की कुछ अन्य बानगी :-

1. उठी न डोली/भर सका न बाप/दूल्हे की झोली।

2. ओ भ्रूण कन्या/बन सकी न परी/कोख में मरी।

3. नारी की कथा/माण्डवी, उर्मिला व/सीता की व्यथा।

प्राकृतिक सौंदर्य का चित्र उनके प्रकृति-प्रेम को कैसे दर्शाता है। कुछ उदाहरण देखेः -

1. नदी का कूल/ हरे-भरे बाग में/खिले हैं फूल।

2. कर लो यार/फूलों से दोस्ती और काँटों से प्यार।

3. चाँद के साथ/सितारे की बारात सुहानी रात। आदि-आदि....।

आज के राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र को दर्शाते कुछ हाइकुः-

1. दें उपदेश खा कर खीर-पूड़ी/चरते देश।

2.  चुनावी दाँव/रेत की नदी में है वादों की नाव। आदि-आदि।

अंत में जीवन के समग्र परिवेश को नये आकार-प्रकार में साकार करने वाले तथा मुझे क्षणिका व हाइकु लिखने के लिए सदैव प्रेरित करने वाले, ऐसे शब्द-शिल्पी गुरुवर के प्रति मेरे मन में जो उद्‌गार प्रस्फुटित हुआ वह हाइकु श्री सूर्य नारायण गुप्त सूर्यको सादर समर्पित है :-

गुरु महान / बाँटे ज्ञान-प्रकाश / सूर्यसमान ।

***


बलजीत सिंह

ग्राम व पोस्ट- राजपुरा (सिसाय)

जिला हिसार 125049

(हरियाणा)

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