दर्द
का हमदर्द :
हाइकु-संग्रह
‘पीड़ा के द्वीप’
बलजीत
सिंह
सिद्धहस्त
साहित्य साधक, अनेक कालजयी कृतियों के रचयिता,
कदम-कदम पर साहित्य-सृजन हेतु मुझे प्रेरित व दिशा निर्देश देने
वाले हाइकुकार आदरणीय सूर्य नारायण गुप्त ‘सूर्य’ जी के तीसरे हाइकु-संग्रह ‘पीड़ा के द्वीप’ की पाण्डुलिपी मिली। पढ़ कर मन
तृप्त हो गया।
हाइकु-संग्रह
– ‘चूँ-चूँ-चूँ’ और ‘चीं-चीं-ची’ के प्रकाशन के बाद ‘पीड़ा के द्वीप’ इनका यह
तीसरा हाइकु-संग्रह है। वर्तमान समाज में जिस प्रकार गिरावट आ रही है। उसी दर्द का
यथार्थ हृदयस्पर्शी चित्र देखेंः-
1.
खाली है हाथ छोड़ के चला गया/बेटा भी साथ।
2.
तलाश में हूँ/वृद्धाश्रम में मृत्यु की आशा में हूँ।
3.
सारे आयाम/जीवन की संध्या में हुए नाकाम ।
4.
मन न मार/ जीवन के दो
रूप/जीत व हार।
नारी
व्यथा की कथा को हाइकु में पिरों कर प्रस्तुत करने का एक अलग ढंग की कुछ अन्य
बानगी :-
1.
उठी न डोली/भर सका न बाप/दूल्हे की झोली।
2.
ओ भ्रूण कन्या/बन सकी न परी/कोख में मरी।
3.
नारी की कथा/माण्डवी, उर्मिला व/सीता की
व्यथा।
प्राकृतिक
सौंदर्य का चित्र उनके प्रकृति-प्रेम को कैसे दर्शाता है। कुछ उदाहरण देखेः -
1.
नदी का कूल/ हरे-भरे बाग में/खिले हैं फूल।
2.
कर लो यार/फूलों से दोस्ती और काँटों से प्यार।
3.
चाँद के साथ/सितारे की बारात सुहानी रात। आदि-आदि....।
आज
के राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र को दर्शाते कुछ हाइकुः-
1. दें
उपदेश खा कर खीर-पूड़ी/चरते देश।
2.
चुनावी दाँव/रेत की नदी में
है वादों की नाव। आदि-आदि।
अंत
में जीवन के समग्र परिवेश को नये आकार-प्रकार में साकार करने वाले तथा मुझे
क्षणिका व हाइकु लिखने के लिए सदैव प्रेरित करने वाले,
ऐसे शब्द-शिल्पी गुरुवर के प्रति मेरे मन में जो उद्गार प्रस्फुटित
हुआ वह हाइकु श्री सूर्य नारायण गुप्त ‘सूर्य’ को सादर समर्पित है :-
गुरु
महान / बाँटे ज्ञान-प्रकाश / ‘सूर्य’ समान ।
***
बलजीत
सिंह
ग्राम
व पोस्ट- राजपुरा (सिसाय)
जिला
हिसार 125049
(हरियाणा)



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