शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

निबंध


मैं सुमन हूँ

   शशिबिन्दुनारायण मिश्र

        सुमन का अर्थ ही होता है, सु+ मन अर्थात् अच्छे मन वाला, फूल को सुमन इसीलिए कहते हैं क्योंकि वो देखने वाले का मन प्रसन्न कर देता है। जिसका मन अच्छा है यानी सज्जन, भला आदमी। सुमन के अनेक अर्थ हैं – बहुत आकर्षक, प्रिय, सुंदर, अच्छे स्वभाव का, उदार, खूब प्रसन्न, मनोहर, संतुष्ट आदि। मनमूल शब्द है, इसमें  सुउपसर्ग लगकर सुमन शब्द बना है, यह विशेषण रूप में प्रयुक्त होता है। सुमन से सुमनस और सुमनित शब्द भी बनते हैं। सुमनस (वि०) का अर्थ है – अच्छे हृदय वाला, सहृदय, प्रसन्नचित्त आदि, लेकिन सुमनस (पुल्लिंग) का अर्थ ज्ञानी, विद्वान् भी बताया गया है और सुमनस (पुल्लिंग) का अर्थ- फूल, पुष्प है ही। सुमनित (वि०) का अर्थ – जिसमें फूल लगे हों, फूल से युक्त पौधा या वृक्ष। सुमन / पुष्प / फूल / कुसुम आदि ये ऐसे पवित्र शब्द हैं, जो हजारों सालों के इतिहास में कभी घिसे-पिटे नहीं। इनमें हमेशा इतना टटकापन रहता है कि इनके उच्चारण मात्र से लगता है कि मन खिला-खिला है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला तो पुष्प-लताओं को सगी बहन जैसा प्रेम करती है और पतिगृहगमन काल में पिता कण्व से कहती है कि –

“तात ! लताभगिनीं तावत् वनज्योत्स्नामामन्त्रयिष्ये।”

और पुष्प-लताओं से कहती है कि –

“(उपेत्य लतामालिङ्गय) भगिनी प्रत्यालिङ्ग मां शाखामयैर्बाहभि:।

अद्य दूरवर्तिनी खलु ते भविष्यामि।”

इसलिए वह सदैव वन्यपुष्प की तरह खिली- खिली रहती है और हजारों सालों बाद आज भी हमारे जैसे साहित्यप्रेमियों के मानसपटल पर खिली-खिली छाई हुई है। भारतीय समाज में प्रायः देखा जाता है कि सुमन शब्द पुल्लिंग और विशेषण होते हुए भी भारतीय लोग प्रायः घर की बालिकाओं का नामकरण सुमन करते हैं। मैं अपने रिश्ते-नाते में देखता हूँ तो अनेक जगहों पर लड़कियों के नाम सुमन मिलते हैं। मेरे विद्यालय में भी बारहवीं कक्षा में अध्ययनरत यदुकुल की एक प्रखर और अनुशासित छात्रा का नाम सुमन यादव है। मेरे क्षेत्र में भी यदुकुल में जन्मी एक जनप्रतिनिधि का नाम सुमन यादव है। समाज में स्त्रियों के नाम फूला या फूलमती भी बहुधा मिलते हैं। मैंने पाया है कि प्रायः नाम का असर भी व्यक्ति के जीवन में धीरे-धीरे दिखाई देने लगता है। इन सभी को मैंने सदैव प्रसन्नचित्त देखा है, विषमतर परिस्थितियों में भी। सुमन-पुष्प-फूल शब्दों के उच्चारण मात्र से लगता है कि व्यक्ति में फूल जैसे गुण होंगे, उसमें कोमलता, विचारशीलता और पवित्रता जैसी विशेषताएँ अवश्य होंगी। पुष्पों की साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक महत्ता तो है ही, ये सुमन/पुष्प मानव जीवन से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। अभिज्ञान शाकुन्तलम्- चतुर्थ अंक में शकुन्तलाया: पतिगृहगमनम्प्रसंग में ऋषि कण्व अपने दो प्रमुख शिष्यों शार्ङ्गरव और शार्ङ्गधर से शकुन्तला की विदाई के समय हस्तिनापुर जाने वाले रास्ते के बारे में बताते हैं,कि शकुन्तला को किस रास्ते से ले कर जाना है –

“रम्यान्तर: कमलिनीहरितै: सरोभिश्छायाद्रुमैर्नियमितार्क मरीचिताप:।

भूयात् कुशेशयरजोमृदुरेणुरस्या: शान्तानुकूलपवनश्च शिवश्च पन्था।।”

अर्थात् इस शकुन्तला का हस्तिनापुरगामी मार्ग कमलिनियों के हरे-भरे तालाबों से मनोहर छायावाले वृक्षों से अवरुद्ध सूर्य की किरणों से गर्मी से कमल के परागतुल्य कोमल धूलि से युक्त, शान्त और अनुकूल वायु सहित तथा कल्याणकारी हो। यानी उस विदा-यात्रा-मार्ग में ऋषि कण्व शुभता से पुष्पित कमलिनी और परागकणों के महत्त्व को कितनी संजीदगी से वर्णन करते हैं। यहाँ पर कुसुमित कमलिनी को तोड़ना नहीं है, सबकुछ अपने आप हो रहा है। हवाओं द्वारा कमलिनी से परागकण अपने आप मार्ग पर आ रहे हैं। धरती के अतिरिक्त इस ब्रह्माण्ड के अन्य किसी ग्रह- उपग्रह पर शायद फूल नहीं खिलते हैं या सुमनों का होना सम्भव नहीं है। हम सुमनमय या पुष्पमय दुनिया में रहते हैं। धरती पर हमारे सामने खिले हुए फूल मिलते हैं। महाकवि कालिदास के रघुवंशम्महाकाव्य में वर्णन आता है –

“रमणीय एष व: सुमनसां सन्निवेश:।”

“फूलों का यह विन्यास / सजावट बहुत रमणीय है।”

इंदुमती स्वयंवर में जब राजा अज प्रवेश करते हैं तो उस समय का वर्णन है। यहाँ पर कालिदास ने सुमनसांका दोहरा अर्थ निकाला है, पहला अर्थ फूल और दूसरा अर्थ सज्जन लोग। सभा के सज्जन लोग भी रमणीय हैं और फूलों की सजावट भी। सुमनसांका कविकुल गुरु कालिदास कैसा अद्भुत प्रयोग करते हैं। बहुत पहले छात्र- जीवन में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की हम सबने एक कविता पढ़ी थी – ‘मैं सुमन हूँ’, उसकी निम्नलिखित पंक्तियों में कवि ने जो प्रेरणा का भाव भरा है वह ध्यातव्य है –

“व्योम के नीचे खुला आसमान मेरा / ग्रीष्म, वर्षा, शीत का अभ्यास मेरा / झेलता हूँ मार- मारुत की निरन्तर / खेलता यों ज़िन्दगी का खेल हँसकर / शूल का दिन-रात साथ मेरा किंतु प्रसन्न मन हूँ / मैं सुमन हूँ।”

फूलों से यह सीख मिलती है कि सच्चा और महान् इंसान वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कराता है और दूसरों को खुशियाँ बाँटता है। फूल अपनी कोमलता, सुगंध और शोभा को निःस्वार्थ भाव से बाँटने के कारण ही अनन्त काल से आदरित होते हैं, लेकिन आजकल का मानव इनका सार्थक उपयोग कम, अपने स्वार्थ और सुविधा के अनुसार दुरुपयोग अधिक करता है। हम फूलों से सुख लेते हैं पर उन्हें वह महत्त्व नहीं देते हैं, जो देना चाहिए। उनकी सुन्दरता की प्रशंसा तो हम करते हैं लेकिन उनके भीतर स्थित शक्ति की नहीं। प्रकृति का खिला पुष्प अपने चैतन्य रूप में क्या चाहता है – माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में पुष्प की अभिलाषा है-

“चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ ......... .....  .....

मुझे तोड़ लेना वनमाली,

तुम देना उस पथ पर फेंक।

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,

जिस पथ जावें वीर अनेक।”

पुष्प की अभिलाषा है कि वह किसी सुन्दरी के सजावट में, प्रेमी- प्रेमिका की माला में, सदन की साज-सज्जा में, सम्राटों (नेताओं) के शव या उन पर पुष्प वर्षा करने में, मनुष्यों के स्वागत में, देवताओं को अर्पित करने के लिए मुझे तोड़ा जाना उसे स्वीकार नहीं है। पुष्प की केवल एक चाह है और वह सर्वोच्च चाह है मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना बलिदान करने वाले वीर- सपूतों के चरणों की धूल बनने की। सुमन का अहंकार से मुक्ति और मोह- त्याग के लिए भी यह संदेश है। हिन्दी समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर रामदरश मिश्र के एक गीत की पंक्तियाँ हैं –

“ये अबोले फूल कितना बोलते हैं,

अजिर में शिशु- सा नया रस घोलते हैं।”

कवि रामदरश मिश्र ने यहाँ फूलों में जो चेतना का सौन्दर्य दिखाया है, वह अकल्पनीय है। ऐसा लगता है कि ये अबोले फूल कवि के आँगन में खेलते हुए छोटे- छोटे शिशु हैं, जो परिवार में नया आनन्द और रस घोलते हैं। ये अबोले फूल प्रतीक रूप में उनके पोते और पोतियाँ भी हो सकते हैं। यह गीत उनकी काव्ययात्रा का एक प्यारा हिस्सा है। आँगन में नया रस घोलने वाले और बिन बोले, कितना बोलने वाले इन अबोले ताजे फूलों को क्या तोड़ा जा सकता है? सच में हम प्रकृति के मनोहारी सौंदर्य के साथ जितनी ज्यादती करते हैं, कम है। डाली पर खिले हुए खूबसूरत ताजे फूलों को जब कोई तोड़ता है, डाल से कली या सुमन को अलग करता है तो लगता है कि किसी अबोले शिशु की चीख निकल पड़ी है। कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता है –‘अनागत’, उसमें उन्होंने अद्भुत और एकदम ताजा बिम्ब दिया है, कविता की पंक्तियाँ हैं –

“फूल जैसे अँधेरे में दूर से ही चीखता हो,

इस तरह वह दरपनों में कौंध जाता है।।”

            अँधेरे में फूल का चीखना और फिर दरपनों में कौंध जाना। चीखने की क्रिया तभी होती है जब कोई अनायास भीतर से आहत होता है या जब मर्म पर चोट लगती है तो फिर सुमन या कली को डाली से तोड़ने, अलग करने का मतलब क्या? प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट करने का हमें अधिकार है क्या? हालाँकि मार्क्सवादी विचारधारा के समीक्षक डॉ. नामवर सिंह इस कविता की समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि – “यहाँ पर केदारनाथ सिंह ने दो बिम्बों को आमने- सामने रखकर एक प्रकार की जटिलता उत्पन्न की है, .... ..... ..... ये चीजें प्रीतिकर चमत्कार उत्पन्न करने के स्थान पर बिम्ब को धुँधला ही बनाती हैं।”  बहरहाल नामवर सिंह जी बहुत बड़े आलोचक हैं, उनके द्वारा बिम्बों के लिए प्रयुक्त जटिलताऔर धुँधलाशब्द पर हम टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि केदारनाथ सिंह द्वारा उन बिम्बों के सहारे प्रीतिकर चमत्कार उत्पन्न करना अनुचित नहीं है। लीलाधर जगूड़ी ने एक जगह लिखा है –

“भाषा किसी ताकत की नहीं / कमजोरी के वर्णन में भी ताकतवर हो जाती है।”

लीलाधर जगूड़ी की ही उनके जीवनानुभव से भरी एक कविता है –

“ख़राब से ख़राब अंतिम क्षण तक मुस्कराते अंतिम फूल।

दूसरों  की  मौत  को  भी  सुगंधित  कर  देते  हैं।।”

ये पंक्तियाँ बताती हैं कि समस्त मृत्युलोकीय जीवन के लिए प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार पुष्प ही हैं क्योंकि पुष्प के अतिरिक्त संसार में दूसरा कोई अपने ख़राब क्षणों में भी दूसरों की मृत्यु को सुगंधित नहीं कर पाता है। कवि लीलाधर जगूड़ी द्वारा यहाँ पर कितनी कुशलता से सुमनों / फूलों के लिए अभिव्यक्ति दी गयी है। फूलों का यह सत्य उनका वास्तविक सौन्दर्य है, हमारे जीवन के लिए इससे बड़ी कोई प्रेरणास्पद बात और कुछ हो ही नहीं सकती है – खराब से खराब अंतिम क्षण में भी मुस्कराते फूल दूसरों की मौत को सुगंधित कर जाते हैं। लीलाधर जगूड़ी की काव्यदृष्टि और जीवनदृष्टि दोनों अद्भुत है। प्रतिष्ठित साहित्यकार गुलशेर खाँ शानी का एक उपन्यास ही है –‘फूल तोड़ना मना है

कवि-संपादक डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय के 31 लघु आलेखों का संग्रह है – ‘हस्तक्षेप। इसमें फूल का उपयोगविषयक एक आलेख है। उसमें डॉ० पाण्डेय ने निष्कर्षत: लिखा है – “मेरा मन पेड़ की टहनी से फूल को अलग करने का नहीं होता है। मुझे लगता है कि प्रकृति ने पेड़ पर तरह-तरह के फूल खिलाकर अपनी सौन्दर्य-चेतना को अभिव्यक्ति दी है। फूल अपने विविध रंग, रूप, गंध और कोमलता में प्रकृति की सौन्दर्य-दृष्टि के विज्ञापक हैं। ये मनुष्य की आँखों को सुख का दान, तितली-भौंरे-मधुमक्खियों को मधु-रस-पराग का अनुदान, प्रकृति- पर्यावरण-परिवेश को सुगंध का प्रतिदान और मानवीय दृष्टि-चेतना और आत्मा में आत्मा का विधान करते हैं। इन्हें वृन्त से अलग करना अपराध-सा लगता है। ... ... ... .... फूल का अपनी डाल पर खिलना-झूमना-इठलाना-मचलना ही प्रीतिकर लगता है। फूल चाहता भी तो यही है –

“यदि दो घड़ियों का जीवन, कोमल वृन्तों पर बीते।

कुछ हानि तुम्हारी है क्या, चुपचाप चू पड़ें जीते।।”

डॉ. वेदप्रकाश पाण्डेय के उपर्युक्त निष्कर्षों से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ। पुष्पित सुमनों के प्रति मेरा भी निष्कर्ष यही है। एक दिन कवयित्री मणिका मोहिनी की एक कविता पढ़ने को मिली –

“बाग में फूल ही खिले थे / पर साथ ही लगी / फूल तोड़ना मना हैकी तख्ती /

आओ हम दोनों  / एक किनारे खड़े हो  / फूलों को खिलते और मुरझाते देखें /

फूलों के साथ-साथ / यह हमारी भी नियति है।”

इस कविता ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। यह कविता मेरी सोच और मेरे प्रकृति-प्रेम के काफी निकट लगी।

बिशुनपुरा इण्टर कॉलेज में मेरे 20 साल पहले के एक पुरातन विद्यार्थी रहे हैं अंकित विश्वकर्मा जी, शुरू से वे बड़े मेधावी और मेहनती छात्र रहे हैं। बिहार के जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा में बतौर एसोशिएट प्रोफेसर नियुक्त हो जाने पर फोन पर उन्होंने नियुक्ति की सूचना देते हुए अपनी खुशी बाँटी और मुझसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। अगले दिन शहर स्थित मेरे आवास पर सुबह-सुबह खूबसूरत माला और मिष्टान्न सहित अपनी खुशी बाँटने पहुँचे थे। माला देखकर मुझे लगा कि विश्वविद्यालय में अपने गाइड के लिए या अन्य किसी प्रयोजन के लिए लिया होगा। मैं कुछ कहता, उससे पहले ही उन्होंने कहा कि “सर ! आपका शुरू से ही बड़ा मार्गदर्शन रहा है, अपनी उपलब्धि पर मैं आपको माल्यार्पण करना चाहता हूँ। आप कभी भी किसी से माला नहीं पहनते हैं, लेकिन मैं पहनाना चाहता हूँ।” अंकित की बात सुनते ही मैं चकित रह गया और अंकित के हाथ से माला लेकर मैंने अंकित विश्वकर्मा को प्रसन्नतापूर्वक माल्यार्पण कर दिया और तस्वीर भी खिंचवाई। पूरे विवरण सहित चित्र को सोशल मीडिया पर भी मैंने साझा किया। क्षेत्र में बहुतों ने उसका अनुकरण भी किया है। मैंने कहा कि – ‘अंकित ! मैं सिद्धांतों से समझौता नहीं करता। मैं किसी को माल्यार्पण करना या किसी से अपना माल्यार्पण करवाना सर्वथा अनुचित मानता हूँ। ऐसा करने वालों को रोकता-टोकता रहता हूँ। मैं इन सबसे हर सम्भव बचता हूँ। कभी-कभी विषम परिस्थितियों में नियम तोड़ना भी पड़ा है, नियम भी तोड़ा है, तो केवल अपने छात्रों और अपने शिक्षकों के लिए। छात्र जीवन के अपने शिक्षकों, जिनकी अध्यापन दक्षता, कर्त्तव्यनिष्ठा, समय की पाबन्दी आदि से प्रभावित रहा हूँ और साथ ही मेरे जिन पुरातन विद्यार्थियों ने अपने अनुशासन, कक्षा में नियमित उपस्थिति के द्वारा मुझ पर प्रभाव छोड़ा है, ऐसे शिक्षकों और विद्यार्थियों को माल्यार्पण करना गर्व की अनुभूति होती है, वह भी ख़ास परिस्थितियों में।  ख़ास परिस्थितियों में इसलिए ताकि रिश्तों को चोट न लगे, जब कोई अपने ऊपर इत्र छिड़कता है या श्रद्धावश या प्रेमवश, स्वार्थ भावना से प्रेरित होकर नहीं, नि:स्वार्थ भाव से विभिन्न समारोहों में किसी को गुलदस्ता भेंट करने के लिए फूलों का इस्तेमाल करते हैं तो हम फूलों और मनुष्य के बीच के रिश्ते का सम्मान करते हैं। लेकिन ध्यान रहे स्वार्थ भावना या प्रदर्शन के लिए नहीं।  पारिस्थितिकी तंत्र के विशेषज्ञ विद्वान्, लेखक और जीवविज्ञानी प्रोफ़ेसर डेविड जॉर्ज हैस्केल ने एक जगह लिखा है – “फूलों के बिना मनुष्य का अस्तित्व नहीं होता। हम फूलों वाली प्रजाति हैं। फूलों ने हमारे विकास को बढ़ावा दिया है और अब हम भोजन और एक स्वस्थ धरती के लिए उन पर निर्भर हैं। फूल मानव निर्मित चुनौतियों का जवाब देते हैं। फूल हमें तेजी से बदलते पर्यावरण के सामने मजबूती और रचनात्मकता का सबक देते हैं। हमें फूलों की रचनात्मकता, सुंदरता और ख़ुशी की पहले से कहीं ज्यादा जरूरत है।” इससे पता चलता है कि फूलों की हमारे जीवन में कितनी उपयोगिता और महत्ता है। आसपास खिले हुए फूलों से हमारा मन अपने आप सीधे जुड़ने लगता है, स्वत: मन खिल उठता है ताजे फूलों की तरह, एक बार मानसिक तनाव कम हो जाता है, यही सुमन / पुष्प की चरितार्थता है। इसीलिए फूलों को सुमन कहा गया होगा। संस्कृत और हिन्दी कवियों ने सदा से ही पुष्प को मानव हृदय का उपमान बनाया है, ख़ास तौर से कमल को। सभ्यता और संस्कृति का विकास होने के साथ ही सुमन की जीवन में उपयोगिता और सांस्कृतिक महत्ता रही है, आज भी है और कल भी रहेगी।

*** 


शशिबिन्दुनारायण मिश्र

रानापार, बिशुनपुरा,

गोरखपुर - उत्तरप्रदेश

पिनकोड –273405


4 टिप्‍पणियां:

  1. सम्पादक डॉ साहब ! इस अंक में ललित निबन्ध 'मैं सुमन हूँ' को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार। आपका -- शशिबिन्दु नारायण मिश्र

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  2. इंद्र कुमार दीक्षित, देवरिया31 जुलाई 2026 को 7:55 pm बजे

    संपादक जी ,सादर वंदन!
    श्री शशिविन्दु नारायण मिश्र जी का निबंध ` मैं सुमन हूँ ` पढ़कर गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रचित श्री राम चरित मानस का वह प्रसंग याद आ गया जब राजा जनक जी की पुष्प वाटिका में जनक नंदिनी सीता मां पार्वती का पूजन करने आई हैं और उसी समय गुरु आज्ञा से पुष्प संचय हेतु राम और लक्ष्मण भी आए हैं।
    राम लक्ष्मण पुष्प लेने के लिए चारों दिशाओं में देखते हैं
    माली के दिख जाने पर उसकी अनुमति लेकर पुष्प तोड़ते नहीं , ग्रहण करते हैं~ `चहुँ दिसि चितइ पूछ माली गण लगे लें दल फूल मुदित मन` इस एक अर्धाली में पुष्प की कोमलता और वृक्ष से उसे ग्रहण करने के पूरे संस्कार को कवि ने यहां रूपायित कर दिया है।प्रकृति के साथ यही भाव अपनाकर मानव सुखी रह सकता है,सुमन प्रकृति के कोमलतम उपहार के रूप में मनुष्य को प्राप्त होते हैं,उन्हें रगड़ना,तोड़ना, मसलना,फेंकना हमारी संस्कृति में वर्जित किया गया है।
    निबंध के कई पहलू बहुत प्रीतिकर लगे।लेखक और संपादक दोनों विभूतियों को मेरी ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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