जाना
लोकगायन की स्वर-सम्राज्ञी का:
एक थी तीजन बाई
डॉ.
घनश्याम बादल
भारतीय
लोककला की विशाल परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने आप में व्यक्ति से संस्था बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ की महान पंडवानी
गायिका तीजन बाई ऐसी ही ज्वलंत मशाल थी जो अपने गायन क्षेत्र में एक मिसाल बन कर
रहीं । उन्होंने केवल पंडवानी लोकगायन शैली
जीवित ही नहीं रखी, बल्कि उसे गाँव की चौपालों
से निकालकर विश्व के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँचाया।
तीजन
बाई की दमदार आवाज़, प्रभावशाली अभिनय, सशक्त मंच-संचालन और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली अद्भुत
प्रस्तुति ने उन्हें भारतीय लोककला का पर्याय बना दिया। उनका निधन केवल एक कलाकार
का अवसान नहीं, बल्कि भारतीय लोक-संस्कृति के एक स्वर्णिम
अध्याय का विराम है।
तीजन
बाई 24 अप्रैल, 1956 को तत्कालीन मध्यप्रदेश (वर्तमान
छत्तीसगढ़) के दुर्ग जिले के गनियारी गाँव में एक साधारण परिवार में जन्मीं। बचपन
से ही अपने नाना से महाभारत की कथाएँ और पंडवानी गायन सुनने का अवसर मिला। यही
उनके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बनी। आर्थिक अभाव, सामाजिक
उपेक्षा और रूढ़ियों से भरे वातावरण में उन्होंने अपने भीतर के कलाकार को जीवित
रखा। उस समय पंडवानी की कापालिक शैली में मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना पुरुषों
का क्षेत्र माना जाता था, किंतु तीजन बाई ने इस परंपरा को
तोड़ते हुए निर्भीकता से इसी शैली को अपनाया और इतिहास रच दिया।
तीजन बाई का विवाह बहुत कम आयु में हो गया, लेकिन कला के प्रति समर्पण के कारण वैवाहिक जीवन अधिक समय तक नहीं चल सका। सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक कठिनाइयों और पारिवारिक विरोध के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। मात्र तेरह वर्ष की आयु में सार्वजनिक मंच पर उनकी पहली प्रस्तुति हुई और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पंडवानी वस्तुतः महाभारत की कथाओं का गेय एवं नाटकीय प्रस्तुतीकरण है। तीजन बाई ने इसे केवल गायन तक सीमित नहीं रखा। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव और कभी दुर्योधन की तलवार। वे स्वर, अभिनय, संवाद, भाव-भंगिमा और शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से पूरा महाभारत मंच पर उतार देती थीं। उनकी आवाज़ में ऐसी ऊर्जा थी कि श्रोता स्वयं को कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उपस्थित अनुभव करने लगते थे। उनकी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह लोकभाषा की सहजता और शास्त्रीय संवेदनशीलता का अद्भुत संगम थी। उन्होंने सिद्ध किया कि महान कला किसी भाषा, क्षेत्र या वर्ग की मोहताज नहीं होती। जिन लोगों को छत्तीसगढ़ी भाषा का ज्ञान नहीं था, वे भी उनकी प्रस्तुति से भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।
देश
के अनेक सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
उन्होंने फ्रांस, इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, रूस तथा अनेक
अन्य देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। उनकी कला ने विश्व को
बताया कि भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं, बल्कि
गाँवों की लोकपरंपराओं में भी बसती है।
तीजन
बाई को अनेक असंख्य सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें पद्मश्री (1988),
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्मभूषण
(2003) तथा देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण
(2019) से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय
एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया। यें सम्मान एक कलाकार को नहीं, बल्कि
भारत की समृद्ध लोकपरंपरा को मिले।
तीजन
बाई ने पंडवानी को विलुप्त होने से बचाया अनेक युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया और
यह विश्वास जगाया कि लोककला केवल अतीत की धरोहर नहीं,
बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक शक्ति भी है। विशेष रूप से उन्होंने
महिलाओं को यह साहस दिया कि वे परंपरागत सीमाओं को तोड़कर अपनी प्रतिभा का
प्रदर्शन करें।
पिछले
कुछ समय से उपचाराधीन लगभग 70 वर्ष की तीजन बाई 5 जुलाई, 2026 को रायपुर में एम्स में लंबी बीमारी के
बाद दिवंगत हुई । राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों,
साहित्यकारों, कलाकारों तथा सांस्कृतिक
संस्थाओं की भावभीनी श्रद्धांजलि खुद अपने आप में बताती है कि तीजन बाई भारतीय लोक
कला क्षेत्र की कितनी बड़ी शख्सियत थी इसमें दो राय नहीं कि भारतीय लोककला के लिए
उनका निधन अपूरणीय क्षति है।
तीजन
बाई का जीवन केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं है,
बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की प्रेरक
गाथा है। उन्होंने सिद्ध किया कि प्रतिभा यदि दृढ़ संकल्प के साथ जुड़ जाए तो
सामाजिक बंधन भी उसके मार्ग में बाधा नहीं बन सकते। वे उस भारत की प्रतिनिधि थीं
जहाँ मिट्टी की सुगंध, लोकभाषा की मिठास और संस्कृति की
गहराई मिलकर विश्व को आकर्षित करती है।
आज
जब वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के दौर में लोककलाएँ अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं,
तब तीजन बाई का जीवन और उनकी साधना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो
जाती है। उनकी कला हमें यह सिखाती है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना
नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुँचाना
है।
यदि
भारत को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता सुरक्षित रखनी है तो तीजन बाई जैसी लोक विभूतियों
की परंपरा को जीवित रखना होगा।
तीजन
बाई का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, किंतु
उनकी गूँजती हुई आवाज़, महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने
वाली उनकी शैली और लोकसंस्कृति के प्रति उनका समर्पण सदैव भारतीय जनमानस में जीवित
रहेगा।
वें
आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक महान गायिका नहीं, बल्कि
लोककला की अमर साधिका, सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक और भारतीय
अस्मिता की शाश्वत स्वर-सम्राज्ञी बनी रहेंगी।
पंडवानी
गायन शैली आज तीजन बाई के अभाव को महसूस कर रही है और आने वाला समय लोक कला के
क्षेत्र में यह कहने को विवश कर देगा कि एक थी तीजन बाई जिसने पंडवानी गायन शैली
को साथ में आकाश पर पहुंचाया। उसे महान गायिका को विनम्र श्रद्धांजलि... !
***
डॉ. घनश्याम बादल
215,
पुष्परचना कुंज,
गोविंद
नगर पूर्वाबली
रुड़की
- उत्तराखंड – 247667


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें