सोमवार, 31 अगस्त 2026

व्यक्ति विशेष-विशेष व्यक्तित्व

महाकाव्य जैसा व्यक्तित्व  :  पद्मश्री डॉ. रामदरश मिश्र

  शशिबिन्दुनारायण मिश्र

    रामदरश मिश्र एक ऐसे साहित्यकार थे, जो जीया वही लिखा और जो लिखा वैसा ही जीया। रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व और कृतित्व एक महाकाव्य जैसा दिखाई पड़ता है। महाकाव्य का रूपक अनायास नहीं है। उनके लेखन में जितना विधागत वैविध्य है,वह किसी कवि-लेखक में नहीं मिलता है। उनका किसी ख़ास विधा के प्रति आग्रह नहीं दिखता है। उन्होंने हिन्दी की समस्त विधाओं में सिद्ध लेखन किया। खण्डकाव्य भी लिखना शुरू किया था, पर बाढ़ की अस्त-व्यस्तता ने उसे छिन्न-भिन्न कर दिया, वे पन्ने बाढ़ में गायब हो गये। जब उसे लिखना शुरू किया था तो उसे लेकर 'मदनेश' जी के पास दिखाने गये थे। ऐसा अपनी आत्मकथा में लिखा है, उस समय वे देवरिया के बरहज बाजार में शायद इण्टर की पढ़ाई कर रहे थे। उनकी रचनाओं और व्यक्तित्व में कहीं अन्तर्विरोध नहीं दिखाई देता है। उनका श्रेष्ठ साहित्य उनके आचरण में दिखाई देता है। प्रोफ़ेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं --”रामदरश मिश्र का व्यक्तित्व पञ्चमहाभूतों में से एक जलतत्त्व के समान था। जल रहस्यमय और आकर्षक होने के साथ-साथ सहज,सरल और जीवनदायी होता है। रामदरश मिश्र का जीवन और साहित्य भी इसी जलतत्त्व की तरह स्वाभाविक,निर्मल और आत्मीय रहा। उनके व्यक्तित्व में जितनी सहजता और आत्मीयता थी, उनकी रचनाओं में भी उतनी ही गहरी तरलता और जीवनानुभूति दिखाई देती है।” कहानियों और उपन्यासों में आमजन और ग्रामीण चेतना का रामदरश मिश्र जैसा सहज कुशल चित्रण हिन्दी में बहुत कम साहित्यकारों ने किया है। वे हमवतन थे, अतः उन्हें बहुत निकट से जानने का अवसर मिला। हम लोग भाग्यशाली रहे कि हमेशा उनका सानिध्य और साहचर्य मिलता रहा। रामदरश जी जितने सहज- सज्जन रचनाकार थे, उतना ही उनका सहज, सरल और विराट व्यक्तित्व था। समय की पाबंदी और वाणी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके व्यक्तित्व को गौरव प्रदान करती थी। उनके पास बैठने पर कभी अत्यंत लघुता का बोध हुआ हो ऐसा मैंने कभी अनुभव नहीं किया। छोटे से छोटा व्यक्ति यदि दूरभाष पर कह देता कि हम फलाँ तारीख़ को इतने बजे आप से मिलने आयेंगे तो वे ठीक उस समय पर अपने मकान के गेट पर खड़े होकर आगंतुक की प्रतीक्षा करते रहते। यदि किसी बहुत बड़े के सामने बार-बार हमें अपनी लघुता (छोटेपन) और भय का एहसास होता हो तो हम काहें को उसे बड़ा मानें और उसके पास जायें ही क्यों? बड़ा होने की जो मुकम्मल परिभाषा है, जिस नाते किसी को बड़ा व्यक्तित्व वाला कहा जाता है,उस साँचे में रामदरश मिश्र का महाकाव्य जैसा रचनाकार व्यक्तित्व पूरी तरह से फिट बैठता था। बिहारी का एक दोहा है --

अति अगाध अति ऊथरौ, नदी कूप सर बाइ।

जो ताको सागरु जहाँ, ताको प्यास बुझाइ।।”

रामदरश जी के पास बैठने, जुड़ने और बात करने से एक प्रकार से संतुष्टि और तृप्ति का बोध होता था। बिहारी ने यह दोहा रामदरश मिश्र जैसे लोगों के लिए ही लिखा होगा। आजकल तो देखा जाता है कि यदि किसी को जुगाड़ से या किसी की दया से या फ़रेब से कोई सफलता या कोई छोटा-मोटा पद मिल जाता है तो उसका अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच जाता है, भले ही रास्ता चलने की उसे कायदे की तमीज न हो।

रामदरश जी से एक बार मैं 'मार्क्सवाद' पर बहस कर बैठा था, उसमें मैंने कुछ अतिरेक में कह गया था, शायद पहली मुलाकात में ही, वह मेरी नादानी ही रही। मैं दावे से कह सकता हूँ कि उस समय हिन्दुस्तान का दूसरा कोई भी वामपंथ को पसंद करने वाला व्यक्ति वहाँ रहता तो मुझ पर बिगड़ जाता, लेकिन वे धीरे-धीरे मुस्कराते और समझाते रहे,अन्त में उन्होंने कहा कि देखो, “शशिबिन्दु ! तुम मार्क्सवादी विचारधारा का चाहे जितना विरोध कर लो, पर मार्क्सवाद जीने की एक दृष्टि तो देता ही है।” उस दिन से मैं रामदरश मिश्र की उदारता, हृदय की विशालता और विवेकशीलता का कायल हो गया। यद्यपि वे घोषित मार्क्सवादी कभी नहीं रहे।‌ हिन्दी में दो तरह के मार्क्सवादी दिखाई देते हैं, एक कट्टर मानसिकता के मार्क्सवादी और दूसरे उदार दृष्टिकोण के मार्क्सवादी। हिन्दी का ज्यादा अहित कट्टर मानसिकता के मार्क्सवादियों ने किया है, जिनके लेखन और वक्तव्य का एक मात्र उद्देश्य धर्म, शास्त्र, संस्कृति, आस्था और परम्परा आदि का विरोध कर विध्वंसक वातावरण तैयार करना होता है,ताकि येन-केन-प्रकारेण चर्चा में बने रहें, साहित्य में किसी बड़े मूल्य की स्थापना करना उनका उद्देश्य नहीं होता। उदार दृष्टिकोण के मार्क्सवादी चीजों को समझने की हर संभव कोशिश करते हैं। बहरहाल, हिन्दी के जो बड़े रचनाकार कभी भी किसी खेमेबाजी या शिविर से नहीं जुड़े, उनमें डॉ रामदरश मिश्र का सर्वप्रमुख स्थान है। रामदरश मिश्र के महाप्रयाण से साहित्य में एक युग का अंत हो गया। उनके निधन से बड़ा खालीपन आया है। रामदरश मिश्र के महाप्रयाण से लगभग साल भर बाद उनकी 103 वीं जयंती पर रामदरश जी के आरम्भिक काव्यगुरु मनीषी रचनाकार पं० गणेशदत्त मिश्र 'मदनेश' की जन्मभूमि रानापार में 'रामदरश मिश्र न्यास', भारतीय हिन्दी अध्यापक परिषद और अखिल भाग्य महाविद्यालय रानापार के संयुक्त तत्वावधान में 14 अगस्त 2026 शुक्रवार को 'रामदरश मिश्र के साहित्य में जल जवार और जीवन' विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त अवसर पर मैंने जो लिखित वक्तव्य दिया था। वह आंशिक संशोधनों के साथ प्रस्तुत है --

यह आयोजन राप्ती-गोर्रा दोआब घोर कछार के लिए विशेष महत्त्व का है। यह केवल रामदरश मिश्र को श्रद्धाञ्जलि देना ही नहीं, बल्कि उनके साहित्य में निहित 'जल जवार और ग्रामीण जीवन, प्रकृति, कछार की संस्कृति और सहज मानवीय मूल्यों पर आधारित गम्भीर विमर्श को नयी पीढ़ी तक पहुँचाना भी है, क्योंकि उनकी रचनाओं में लोकजीवन और प्रकृति की लय, मिट्टी की सोंधी महक और मनुष्य के संघर्ष एवं संवेदना का सहज स्पंदन मिलता है। रामदरश मिश्र के भीतर जब कविता का आदि स्रोत फूटा था-- रामदरश मिश्र मिडिल स्कूल बिशुनपुरा में छठवीं कक्षा में पढ़ते हुए सर्जनात्मक दबाव महसूस करने लगे थे और उसी समय कविता लिखी। उस कविता का इस जवार से गहरा नाता है। बिशुनपुरा बाज़ार के पूरब बगीचे में कांग्रेस की सभा थी। यह सन् 1934-1935 की बात होगी। उसी को केंद्र में रखकर एक राष्ट्रीय कविता लिखी और फिर सिलसिला चल निकला। किसी ने सुझाव दिया कि ये कविताएँ 'मदनेश' जी को दिखाओ। पं० गणेशदत्त मिश्र 'मदनेश' जी उस समय के प्रतिष्ठित कवि और संस्कृत के विलक्षण विद्वान् थे। 'मदनेश' जी, रामदरश मिश्र की जन्मभूमि डुमरी के बगल के गाँव रानापार के मूल निवासी थे और अपनी उदारता, जिंदादिली तथा अपनी जीवनशैली में फ़ल्सफ़ा अंदाज़ के लिए विख्यात थे। रामदरश मिश्र के ही शब्दों में – “मैं संकोच के साथ 'मदनेश' जी के पास गया। उस समय वे खेत में थे। उन्हें खोजता हुआ उनके खेत में पहुँचा। अपना परिचय दिया। आने का उद्देश्य बताया। जब वे मेरी कविताएँ देख रहे थे तो मैं डर रहा था कि कहीं वे उन्हें उठाकर फेंक न दें और कहें कि ले जाओ कूड़ा- करकट, लेकिन देखा बाँछें खिलती गयीं और पढ़कर बोले --”अच्छा, बहुत अच्छा। बहुत अच्छी प्रतिभा है तुम्हारे भीतर। बहुत अच्छा लिखोगे। मुझे अपने साथ लेकर अपने घर आये और 'सुकवि' की कई प्रतियाँ दीं, बोले --” ये कविताएँ पढ़ो, इनसे तुम्हें बहुत कुछ मिलेगा।” 'मदनेश' जी सनेही स्कूल के कवि थे। उन्हीं की परम्परा में मँजी हुई घनाक्षरी और सवैये लिखे हैं जिनका केन्द्रीय स्वर प्रकृति और प्रेम है और अन्य छन्दों में देश तथा समाज-सुधार सम्बन्धी कविताएँ लिखी हैं। मैं कविताएं लिखता गया, वे सुधारते गये। मुझे छंदों का ज्ञान होता गया और शुरू के तीन-चार वर्षों में ही मैं अनेक वर्णिक और मात्रिक छंदों का ज्ञाता तथा प्रयोक्ता बन गया।” डॉ रामदरश मिश्र ने अनेकशः पं० गणेशदत्त मिश्र 'मदनेश' को अपने आरम्भिक काव्यगुरु के रूप में अतिशय आदरपूर्वक स्मरण किया है। इण्टरमीडिएट कक्षाओं में पढ़ाई के दौरान ही 17 वर्ष की आयु में रामदरश मिश्र की पहली कविता गोरखपुर से निकलने वाली मासिक पत्रिका 'सरयूपारीण' में फरवरी 1941 के अंक में प्रकाशित हुई थी, यद्यपि रामदरश जी उस रचना को भूल चुके थे, जानकारी होने पर उन्होंने मुझसे 1991 में पत्र- व्यवहार किया (उस कविता के निमित्त उनके द्वारा मुझे लिखे गये दोनों पत्र भी यहाँ प्रकाशित हैं)। वह पत्र-व्यवहार मेरे घरेलू / गाँव के नाम 'मुंसिफ मिश्र' से हुआ है -- 









रामदरश मिश्र की पहली प्रकाशित कविता यहाँ पढ़ें ----

रजनी के इस शान्त प्रहर में, कहो चंद्र क्यों घूम रहे?

नील गगन के अञ्चल को तुम कमल वदन से चूम रहे।

निकल कहाँ से इसी समय तुम प्रभा-बीज को बोता है,

नीरवता के अखिल राज्य में सकल विश्व जब सोता है।

मर्म बता दो हमें आज तुम क्यों मृदु-मृदु मुस्काते हो ?

किस तरंग से पुलकित होकर फूले नहीं समाते हो ?

तेरी मंजुल मुस्काहट से छिटक रहे सुषमा के पुंज।

दिल सीने से हैं निकालते चाँद से ये सुंदर कुंज।

लोनी- लोनी  मृदु लतिकाएँ छकी हुई करके मधुपान।

सुख-विभोर हो जाती क्षणभर निरख तुम्हारी मृदु मुस्कान।।

बार - बार अवलोक  तुम्हें  ये आँखें  नहीं  अघाती  हैं।

पी - पीकर मधु छटा तुम्हारी प्रतिक्षण प्यासी जाती हैं।

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देख-देख यह तुझे देखकर होकर अति आनन्द विभोर।

श्वेत  कौमुदी  में  ये निर्झर कैसा  झरते कल - कल रोर।

निर्झरिणी भी मृदु मुस्काती धारण कर उज्ज्वल परिधान।

करती  है  अभिसार    जाने  कहाँ  छेड़ती  सुन्दर  तान।

करते हैं कल-नृत्य गगन में तुझे देख तारों के वृंद।

नाच रहे हो नीले सर में नवल प्रभा से ज्यों अरविंद।”

          प्रतिष्ठित समालोचक और कथाकार डॉ रामदेव शुक्ल कहते हैं – “रामदरश मिश्र जी बचपन से ही गीत लिखने लगे थे,बनारस जाने से पहले उन्हें कवि जी कहा जाने लगा था। उन्होंने शुरू में गीतकार के रूप में ही पहचान बनाई, फिर वे कविता के क्षेत्र में आ गये। कविता के साथ-साथ कथा लेखन शुरू किया, रामदरश मिश्र ने जिस भी विधा में लिखा, बड़ी आत्मीयता और गहराई से लिखा,सभी विधाओं को उन्होंने समान गौरव प्रदान किया। रामदरश मिश्र के जीवन और साहित्य में किसी भी तरह की चेष्टा नहीं है, बल्कि सहजता है, जिसे उनकी रचनाओं में सहज ही देखा जा सकता है।”

      रामदरश मिश्र का गाँव डुमरी या रानापार ही नहीं, राप्ती- गोर्रा का पूरा कछार,जवार सदैव बाढ़ और सूखे की चपेट में रहता था। बचपन और जवानी में वे इसके भोक्ता रहे,उनका मन भी नदियों की आह और कराह सुनकर आह और कराह से भर उठता था। सन् 1938 में कछार में आई प्रलयंकारी बाढ़ पर 'मदनेश' जी ने बड़ा ही एक जीवन्त गीत लिखा था – “उजड़ गये हैं अब क्या बसेंगे, ये राप्ती का कछार सुन लो।” इस गीत ने रामदरश मिश्र को बहुत हद तक प्रेरित और प्रोत्साहित किया था। राप्ती और गोर्रा नदियाँ उनके जीवन में कैसे समायी हुई हैं और सलीके से कैसे उनके गीतों में उतर जाती हैं, ज़रा इस दृश्य को 'नदियाँ कहाँ चली जाती हैं, उनके इस गीत में पढ़ें --

छोड़ हमें प्यासा का प्यासा नदियाँ कहाँ चली जाती हैं?

उठती  गिरती, हँसती-गाती  लहरें  आतीं  बह  जाती हैं

छूटी  हुई  रेत  पर  आँखें  मौन  ताकती  रह  जाती  हैं

किसके लिए कहाँ जाता है, यह आता जाता-सा पानी

छोड़ हमें प्यासा-का-प्यासा नदियाँ कहाँ चली जाती हैं

पल-पल, दिन-दिन, मौसम-मौसम ने राग लेकर आता है

हम  सामने  खड़े  रह  जाते, जाने  किसको  गुहराता है

किसके लिए घूमता लेकर समय ढेर -सा यह अपनापन

रह जाती आवाज गूँजती, सदियाँ कहाँ चली जाती हैं?”

      गोर्रा नदी, राप्ती की ही शाखा है या कि राप्ती की बेटी है। हम लोगों का गाँव चारों ओर नदियों से घिरा हुआ है। उत्तर-पूर्व में गोर्रा नदी और पश्चिम-दक्षिण में राप्ती नदी से। हम सबका जीवन वर्षा ऋतु में एक तरह से अभिशप्त रहता था और उसका असर जाड़े तक रहता था। वर्ष 1998 में और वर्ष 2017 में हमारे जवार में आई भयंकर बाढ़ से नयी पीढ़ी भी उस दंश से आक्रांत रही है। रामदरश मिश्र के दिल्ली विश्वविद्यालय में सन् 1970-1972 में शिष्य रहे सुविख्यात कवि एवं व्यंग्यकार डॉ. अशोक चक्रधर ने राप्ती-गोर्रा नदियों को लेकर रामदरश मिश्र के जीवन के लिए बड़ा सुन्दर एक रूपक गढ़ा है, ज़रा देखें --

इस माथे पर शिकनें लाखों, कुछ अपनी, कुछ दुनिया की,

जिसके  चारों- ओर  नदी  हो, उस  तट  का  वाशिंदा  हूँ,

मैं  उस तट  का  वाशिंदा  हूँ, जहाँ धूप-छाँव आती-जाती हैं,

कभी खुशियाँ आकर लौट जाती हैं,कभी उदासी छा जाती है,

पर मैं वहीं खड़ा रहता हूँ, हर मौसम का स्वागत करता हूँ।

नदी  किनारे  बैठा, हर  लहर  को  तकता  रहता  हूँ।।”

यह रूपक बताता है कि रामदरश मिश्र के जीवन में कितने उतार-चढ़ाव, सुख और दुःख आये होंगे। हिन्दी की समस्त विधाओं में शताधिक उत्कृष्ट कृतियों के सिद्ध कृतिकार डॉ० रामदरश मिश्र जी के जीवन के उत्तरार्ध में हिन्दी के सभी श्रेष्ठ सम्मान और पुरस्कार मिले,यथा -सरस्वती सम्मान, व्यास सम्मान, भारती भारती सम्मान, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान और अन्ततोगत्वा भारत सरकार ने पद्मश्री नागरिक अलंकरण से भी सम्मानित किया, लेकिन रामदरश मिश्र का रचनात्मक व्यक्तित्व तब तक इन सम्मानों और पुरस्कारों से बहुत ऊपर उठ चुका था।


शशिबिन्दुनारायण मिश्र

‘नारायण-आश्रम’ 53- डी, गोरक्षनगर, सिंघड़िया,

पोस्ट-कूड़ाघाट गोरखपुर,

उत्तरप्रदेश - पिनकोड - 273008

1 टिप्पणी:

  1. प्रकाशन के लिए हार्दिक धन्यवाद। --शशिबिन्दुनारायण मिश्र

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