सोमवार, 31 अगस्त 2026

विशेष


जयतु संस्कृतम्।


सुरेश चौधरी

जयतु संस्कृतम्। जयतु भारतम्। संस्कृत दिवस्य हार्दिकाः शुभाशयाः!

श्रावण मास की पूर्णिमा केवल रक्षाबंधन के स्नेह-सूत्रों का पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारी उस ज्ञान-परंपरा का भी उत्सव है जिसने सहस्राब्दियों तक विश्व-चेतना को आलोकित किया। वर्ष 1969 में भारत सरकार (तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. त्रिगुण सेन का कार्यकाल) ने इसी पावन तिथि को प्रतिवर्ष विश्व संस्कृत दिवसके रूप में मनाने की ऐतिहासिक घोषणा की थी।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब आधुनिक विज्ञान अपनी नई करवटें ले रहा था, उसी दौर में ऑक्सफ़ोर्ड के प्राच्यविद्याविद प्रो. मैक्स मूलर ने ऋग्वेद का संपादन और सायण-भाष्य सहित प्रकाशन कर पूरे पाश्चात्य जगत में तहलका मचा दिया।

उस समय जब एडिसन के फ़ोनोग्राफ़ पर दुनिया के मूर्धन्य विद्वानों की आवाज़ें अमर की जा रही थीं, यूरोप के बौद्धिक सम्मेलनों में मैक्स मूलर जब भारतीय ऋचाओं के दार्शनिक गांभीर्य की चर्चा करते थे, तो बड़े-बड़े विद्वान निरुत्तर रह जाते थे। मैक्स मूलर ने मुक्तकंठ से स्वीकार किया था:

"यदि मुझसे कोई पूछे कि आकाश के नीचे कौन सा ऐसा स्थान है जहाँ मानव मन ने अपने सर्वोत्तम उपहारों का सबसे गहराई से विकास किया है, जीवन की सबसे बड़ी पहेलियों पर विचार किया है... तो मैं भारत की ओर संकेत करूँगा।"

मैक्समूलर ने तो एडिशन से यह भी कहा था कि प्रथम नाद कोई रिकॉर्ड हो तो ऋग्वेद के पहला मंत्र ,परंतु उनकी अपनी इच्छा थी उन्होंने मैरी हेड ए लिटिल लेम्ब को रिकॉर्ड किया था। कई जगहों पर यह भी लिखा है कि अग्निमिले वाले मंत्र को रिकॉर्ड किया गया।

मानव इतिहास की प्रथम वाणी: ऋग्वेद १.१.१ मानव चेतना के सबसे प्रथम लिखित दस्तावेज़ ऋग्वेदका प्रारंभ जिस दिव्य नाद से होता है, वह ऊर्जा और प्रकाश के शाश्वत स्रोत की आराधना है:

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥

भावार्थ: हम उस परम ज्योतिर्मय अग्नि स्वरूप परमात्मा की स्तुति करते हैं, जो इस सम्पूर्ण सृष्टि रूपी यज्ञ के मूल पुरोहित, ऋतु-चक्र के संचालक, समस्त दिव्यता के प्रदाता और हमें जीवन के सर्वश्रेष्ठ रत्नों व ऐश्वर्यों से अलंकृत करने वाले हैं।

संस्कृत की वैज्ञानिकता: किसी चमत्कार की मोहताज नहीं। संस्कृत की महिमा किसी गढ़ी हुई दंतकथा से सिद्ध नहीं होती; इसका वास्तविक चमत्कार इसकी अपनी संरचना में समाहित है।

परिशुद्ध ध्वनिविज्ञान: महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी मानव इतिहास की सबसे सटीक और वैज्ञानिक व्याकरण व्यवस्था है, जहाँ प्रत्येक अक्षर का उच्चारण स्थान और नाद गणितीय सटीकता से निर्धारित है।

अथाह वाङ्मय: खगोल (आर्यभटीय), गणित (लीलावती), चिकित्सा (चरक व सुश्रुत संहिता) से लेकर अध्यात्म और दर्शन तक – संस्कृत केवल पूजा-पाठ की भाषा नहीं, बल्कि भारत की संपूर्ण वैज्ञानिक सोच की वाहक रही है।

आधुनिकता के इस दौर में अपनी जड़ों की ओर लौटना और इस समृद्ध ज्ञान-संस्कृति को सहेजना ही संस्कृत दिवस का वास्तविक संकल्प है।

संस्कृत भाषायाः अस्माकं संस्कृतेः च महिमा शाश्वतो वर्तते।

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सुरेश चौधरी

एकता हिबिसकस

56 क्रिस्टोफर रोड

कोलकाता 700046

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